Tuesday, 22 November 2011

मीडिया को नियंत्रण नहीं सच्ची आज़ादी की दरकार है!

मुझे याद है जब मेडिकल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर मैंने पत्रकारिता की राह पकड़ी थी तो मेरे एक डॉक्टर मित्र ने मुझ पर व्यंग्य किया था  कि " इस देश में डॉक्टर, इंजीनियर या सरकारी अफसर बनाना जितना मुश्किल है... पत्रकार बनाना उतना ही आसान!" जब इस पेशे में आया तो इस सच से सामना हुआ कि वाकई यहाँ तो माईक पकड़ कर कोई भी रिपोर्टर बन सकता है. और सुन्दरता के दम पर कोई भी एंकर बन सकता है. इसके लिए किसी तरह की डिग्री या अनुभव की बंदिश ना तो सरकार की तरफ से है ना ही मीडिया संस्थानों की तरफ से. लेकिन इस इस विचार से मैं कभी सहमत नहीं रहा. इस वाकये का ज़िक्र मैंने इसलिए किया क्योंकि, मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर इन दिनों एक बड़ी बहस छिड़ी है. बहस हो रही है और बहस होनी भी चाहिए. लेकिन समझ नहीं आता पूरी बहस से मीडियाकर्मी और उनके मानवाधिकारों को क्यों गायब कर दिया गया है? जिस देश में पत्रकारिता सेवा मानी जाती रही हो, और मीडिया मजदूरों की मेहनत का मेवा पूंजीपति खाते रहे हों, जहां इमानदार पत्रकार भूख से तड़प- तड़प कर अपना दम तोड़ देता हो,( ऐसे पत्रकारों की लिस्ट लम्बी है जो भूख-बीमारी से मर गए या फिर माफिया का निशाना बन गए) वहां आप पत्रकारिता में सारोकारों की बात कैसे कर सकते हैं.

कुछ लोग मीडिया पर नियंत्रण की बात कर रहे हैं तो कुछ मीडिया को बंधनों में बाँधने की मुखालफत कर रहे हैं. लेकिन मेरी छोटी बुद्धि में एक बात नहीं आ रही है वो ये कि क्या हिन्दुस्तान में कभी मीडिया आज़ाद था? क्या सच में मीडियाकर्मी बिना दबाव प्रभाव के पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ काम करते रहे हैं? क्या पत्रकारों और संपादकों पर उन्हें नौकरी देने वाले उद्योगपतियों का दबाव नहीं होता है? क्या मीडियाकर्मी अपने मीडिया मालिकों के हिंतों के खिलाफ जाकर जनहित की बात कर सकते हैं? क्या सम्पादक उन्हें नौकरी देने वाले कार्पोरेट्स के बीच खुद को स्वतन्त्र महसूस करते हैं? अगर ऐसा नहीं है तो फिर मीडिया स्वतंत्र कब था? क्यों इस बात को समझने की ज़हमत कोई नहीं उठाता कि सरकार और उद्योगपतियों की तना-तनी में मासूम मीडियाकर्मी पिस रहे हैं.

मुझे लगता है इस वक्त बात मीडिया पर नियंत्रण की नहीं बल्कि मीडिया को आज़ाद करने की होनी चाहिए. बहस इस बात पर होनी चाहिए कि मीडिया को किस तरह सच्ची आज़ादी दी जाए ताकि पत्रकार तमाम तरह के दबाव प्रभाव से मुक्त होकर पूरी इमानदारी और निष्ठा के साथ जन-हित में काम कर सके. मीडिया बहुत बड़ी ताकत है जो देश और समाज में परिवर्तन की शक्ति रखती है, इसे पूंजीपतियों के हाथों की कठपुतली बनाने से रोकना होगा. इन सबके बीच पत्रकारों के मानवाधिकारों की भी बात होनी चाहिए.

क्या हमारी सरकार और सूचना और प्रसारण मंत्रालय ये नहीं जानता कि उदारीकरण के इस दौर में भी हमारे देश में पत्रकारिता एक सुरक्षित पेशा नहीं बन पाया है. तो फिर आप इस पेशे में अच्छे और योग्य लोगों के आने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं. फिर आप ये भी कहते हैं कि मीडिया में योग्य लोगों की कमी है. तो आदरणीय काटजू साहब क्या आपने या सरकार ने कभी ये जानने की ज़हमत उठाई है कि मीडिया में लोगों के चयन की प्रक्रिया क्या है? क्या आपने किसी अखबार या न्यूज़ चैनल में भर्ती का कोई विज्ञापन देखा है? इन तमाम मुश्किलों के बाद अगर कुछ योग्य लोग गलती से इस पेशे में आ जाते हैं तो वो यहाँ के गैर पेशेवरान तौर तरीकों को देख कर जल्द ही इसे छोड़ देता है. ऐसे में आप गरीब पत्रकारों की दुर्दशा के बावजूद ये उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि देश में गंभीर पत्रकारिता को बढ़ावा मिल सकता है.

जो सिस्टम हमने हिन्दुस्तानी पत्रकारिता में बनाया है उसमें हम 'नीरा राडिया' तो पैदा कर सकते हैं लिकिन सरोजिनी नायडू या ऐनी बेसेंट नहीं. अब आप कहेंगे तो इस समस्या का हल क्या हो....हैरानी है आज़ादी के इतने साल बाद हमारी सरकार को पत्रकारिता की सुध लेने की सूझी है. जबकि देश के सैंकड़ो विश्विद्यालय दशकों से बेकार पत्रकारों की फ़ौज खडी कर रहे हैं. ये सिर्फ इसलिए क्योंकि छुरी अब अपनी ही गर्दन पर आन पड़ी है. जब मीडिया सरकार को चुनौती देने लगा तो इसपर नकेल कसने की तैयारी शुरू हो गई है. लेकिन अब भी पत्रकारों की दुर्दशा की तरफ सरकार का ध्यान नहीं है. जबकि सच्चाई ये है कि  पत्रकारों की फ़िक्र किये बिना सरकार मीडिया में अनुशासन नहीं ला सकती.

अगर हमारी सरकार की मंशा में खोट नहीं है तो  काटजू साहब, पहले पत्रकारिता को बाज़ार के चुंगल से आज़ाद की कीजिए, संपादकों को टीआरपी के खेल से मुक्त कीजिये, फिर एक स्वतन्त्र नियामक आयोग का गठन कीजिए. जो इस बात पर कड़ी निगरानी रखे कि कोई समाचार पत्र या समाचार चैनल आचार संहिता का उल्लंघन तो नहीं कर रहा है. ये स्वतन्त्र नियामक आयोग पत्रकारों के हितों की रक्षा के साथ ही भ्रष्ट पत्रकारों के खिलाफ मिलने वाली शिकायतों की भी सुनवाई करे. ये इसलिए ज़रूरी है क्योंकि कोई  भी उन पत्रकारों और उन परिस्थितियों की बात नहीं कर रहा जिसकी वजह से इमानदार पत्रकार पिस रहे हैं और पत्रकारिता हाशिये पर चली गई है. सरकार को ये स्वीकार करना होगा कि पत्रकारिता अब सेवा या धर्मं नहीं रहा. ये भी डॉक्टर या इंजीनियर या फिर वकालत की तरह ही एक पेशा है. इसलिए इस पेशे के भी तय मापदंड होने चाहिए. इसमें भी समाज के हर तबके की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए. इसे चिकित्सा जैसे एक ज़िम्मेदार व्यवसाय के रूप में स्थापित कर हम इस समस्या का निदान खोज सकते हैं.

हैरानी इस बात पर है कि सरकार मीडिया पर नियंत्रण की बात कर रही है, जबकि सरकार ये अच्छी तरह जानती है कि हमारे देश में मीडिया स्वतन्त्र नहीं है. वो तो पहले से ही उद्योगपतियों के नियंत्रण में हैं. जो आजादी के बाद से ही मीडिया को कठपुतली की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. अब आप इसे उद्योगपतियों के उन्मुक्त नियंत्रण से सरकारी निगरानी के दायरे में लाना चाहते हैं. लेकिन आप मीडिया को सच्ची आज़ादी क्यों नहीं देना चाहते हैं? क्या आपको सच्ची आज़ादी का मतलब नहीं पता? ठीक है हो सकता है आपको सच्ची आज़ादी का मतलब सच में नहीं पता हो. काटजू साहब सच्ची आज़ादी का अर्थ है सच बोलने की आज़ादी. मीडिया को तथ्यों और सबूतों के साथ सच बोलने की आज़ादी दे दीजिये फिर देखिये यही मीडिया राष्ट्र निर्माण में कितनी सशक्त भूमिका निभाता है. आप कहेंगे रोका किसने है? तो मीडिया की आज़ादी पर अंकुश को इस बात से समझा जा सकता है कि क्या दूरदर्शन या आल इंडिया रेडियो पर सरकार की गलत नीति के खिलाफ कोई खबर चल सकती है? या दूरदर्शन पर सरकारी भ्रष्टाचार का खुलासा हो सकता है? यदि ऐसा नहीं है तो फिर निजी मीडिया अपने मालिकों के व्यावसायिक हितों के खिलाफ जाकर जन-हित की बात कैसे कर सकता है.

यदि हम मीडिया की बुराईयों को दूर करना चाहते हैं तो हमें इस सिस्टम को बदलना होगा. मीडिया को सच बोलने की पूरी आज़ादी देनी होगी. जिस दिन हम सरकारी मीडिया को सरकार के गलत कदमों का विरोध करने के काबिल बना देंगे, और निजी मीडिया को जनहित में अपने मालिकों के हितों के खिलाफ खड़ा होने के काबिल बना देंगे, उस दिन हमारा मीडिया सच्चे अर्थों में नियंत्रित हो जाएगा. और उसी दिन उसे सच्ची आज़ादी भी मिल जायेगी. लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि मीडिया में एकाधिकारवाद को समाप्त किया जाए. अखबारों और समाचार चैनलों में जन भागीदारी को बढ़ावा देकर ही हम उसे जनता के प्रति जवाबदार बना सकते हैं. यदि अखबार और समाचार चैनलों में जनता की आधे से ज़्यादा पूंजी लगी होगी तो उसे जनता के प्रति जवाबदार बनाने से कौन रोक सकता है?
-योगेश गुलाटी

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