Wednesday, 15 July 2009
Thursday, 21 May 2009
सत्ता की मलाई के लिए मारामारी
चौतरफा समर्थन से उत्साहित नजर आ रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कड़े रुख के कारण कैबिनेट में ज्यादा मंत्रिपद की मांग पर अड़े यूपीए के प्रमुख सहयोगी डीएमके की दाल नहीं गल पाई। आखिरकार उसने सरकार से बाहर रह कर समर्थन देने का फैसला किया है। मंत्रिपद की जद्दोजहद में कड़ा रुख अपनाते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पहले के साढ़े छह सांसद पर एक कैबिनेट मंत्री के फामरूले को सख्त बनाते हुए संदेश भिजवा दिया कि दस सांसदों पर एक कैबिनेट मंत्री बनाया जाएगा। मनमोहन शुक्रवार शाम 6:30 बजे प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे।
नाराज हुआ डीएमके
इस फामरूले से डीएमके ने नाराजगी जताते हुए बातचीत समाप्त कर दी और कहा कि वह सरकार का बाहर से समर्थन करेगा। डीएमके रेल मंत्रालय, भूतल परिवहन मंत्रालय, आई टी जैसे अहम मंत्रालय मांग रहा था। लेकिन कांग्रेस रेल, भूतल परिवहन मंत्रालय देने को राजी नहीं हुई।
मनाने की कोशिश
देर रात तक चली डीएमके को मनाने की कोशिश में दो कैबिनेट मंत्री, एक स्वतंत्र प्रभार और चार राज्य मंत्री देने का फामरूला सामने आया। लेकिन डीएमके ने अझागिरी, कोनीमोझी, दयानिधि मारन के साथ टी आर बालू और ए राजा को भी कैबिनेट मंत्री बनाने की मांग रख दी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी, गुलाम नबी आजाद, अहमद पटेल जैसे नेता डीएमको को मनाने में कामयाब नहीं हुए। करुणानिधि ने कहा है कि चेन्नई में पार्टी कार्यसमिति की बैठक में भावी रणनीति तय की जाएगी। एजेंसी के मुताबिक कांग्रेस ने कहा है कि बातचीत अभी जारी है। डीएमके पिछली सरकार की तरह सीट और विभाग मांग रहा है जो उसे स्वीकार नहीं है।
ममता राजी, मिलेगी रेल
मनमोहन के नए फामरूले के तहत ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को एक कैबिनेट मंत्रालय दिया जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस के कोटे से पांच राज्य मंत्री भी बनाए जा सकते हैं। पहले ममता डीएमके से एक ज्यादा मंत्री की मांग पर अड़ गई थीं, पर बाद में वह मान गईं।
क्यों मानी ममता?
तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी एक कैबिनेट व पांच राज्यमंत्रियों के फामरूले पर राजी।
कारण
पश्चिम बंगाल में दो साल बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। ममता को यदि मुख्यमंत्री बनना है तो यह कांग्रेस के समर्थन से ही संभव। उद्योगों के खिलाफ होने की छवि से मुक्त होने के लिए उदार आर्थिक नीतियों वाली कांग्रेस के साथ की जरूरत। तृणमूल को पश्चिम बंगाल में एकतरफा जीत हासिल नहीं हुई है। इसलिए वाम मोर्चे पर अभी से दबाव बनाने के लिए सत्ता और साथ की जरूरत।
एनसीपी नाखुश
एनसीपी कोटे के मंत्रालयों पर भी लगातार बातचीत चलती रही। सूत्रों के मुताबिक शरद पवार को केवल कृषि मंत्रालय देने की बात पर एनसीपी खेमा खुश नजर नहीं आया। प्रफुल्ल पटेल के मंत्रालय को लेकर भी असमंजस बना रहा। कांग्रेस नागरिक उड्डयन मंत्रालय अपने पास रखने की इच्छुक है।
अब्दुल्ला भी नाराज
तय फामरूले के तहत नेशनल कान्फ्रेंस के फारुक अब्दुल्ला को भी कैबिनेट में जगह नहीं मिलने की चर्चा चलती रही। इसके कारण जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला नाराज बताए जा रहे हैं। वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के मुताबिक राजद के लालू यादव के नाम पर कोई विचार नहीं हुआ है। झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन को भी कोई जिम्मेदारी न मिलने के संकेत हैं।
हो सकते हैं पंजाब से दो मंत्री
पंजाब से अब एक के बदले दो सांसदों को मंत्रिमंडल में स्थान मिल सकता है। चंडीगढ़ से लगातार जीत हासिल करने वाले पवन बंसल को इस बार कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिल सकता है। उनके अलावा मंत्रिमंडल में पटियाला से चुनी र्गई पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की पत्नी परनीत कौर और जालंधर से सांसद व पंजाब कांग्रेस के प्रधान मोहिंदर सिंह केपी को शामिल किया जा सकता है। कांग्रेस के अलग-अलग खेमों ने अपने समर्थकों को मंत्री बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया है।
क्या होगा सुशील कुमार शिंदे का?
दलित नेता सुशील कुमार शिंदे कैबिनेट का हिस्सा होंगे या नहीं? इस बात को लेकर महाराष्ट्र में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कांग्रेस का एक बड़ा तबका उन्हें लोकसभा का स्पीकर बनाने पर तुला है, परंतु महाराष्ट्र के कांग्रेस के कुछ नेताओं का मानना है कि ऐसा करना पार्टी के लिए आत्मघाती कदम साबित हो सकता है।
क्या मलाई है इन मंत्रालयों में?
बड़े बजट वाले मंत्रालयों में आर्थिक लाभ का ‘स्कोप’ तो है ही जनाधार बढ़ाने की राजनीतिक मलाई भी है।
रेल : बड़े बजट के साथ बड़ी संख्या में नौकरियां। आम जीवन से लेकर उद्योग जगत तक से व्यापक संपर्क।
दूरसंचार : तेजी से बढ़ता मंत्रालय । करोड़ों के नए प्रोजेक्ट। ऑपरेटरों को स्पेक्ट्रम वितरण और टेलीफोन लाइनों के विस्तार में पैसे का बड़ा खेल।
ग्रामीण विकास : नरेगा जैसी फ्लैगशिप योजना। ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार देने में अव्वल। जनता को सीधे प्रभावित करने का मौका।
स्वास्थ्य : ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन। छह नए एम्स बनाने का प्रस्ताव। शहरी स्वास्थ्य मिशन को लाने की योजना। जनता पर सीधा असर।
सड़क परिवहन : करोड़ों की सड़क परियोजनाएं। काम का जनता पर सीधा असर।
नाराज हुआ डीएमके
इस फामरूले से डीएमके ने नाराजगी जताते हुए बातचीत समाप्त कर दी और कहा कि वह सरकार का बाहर से समर्थन करेगा। डीएमके रेल मंत्रालय, भूतल परिवहन मंत्रालय, आई टी जैसे अहम मंत्रालय मांग रहा था। लेकिन कांग्रेस रेल, भूतल परिवहन मंत्रालय देने को राजी नहीं हुई।
मनाने की कोशिश
देर रात तक चली डीएमके को मनाने की कोशिश में दो कैबिनेट मंत्री, एक स्वतंत्र प्रभार और चार राज्य मंत्री देने का फामरूला सामने आया। लेकिन डीएमके ने अझागिरी, कोनीमोझी, दयानिधि मारन के साथ टी आर बालू और ए राजा को भी कैबिनेट मंत्री बनाने की मांग रख दी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी, गुलाम नबी आजाद, अहमद पटेल जैसे नेता डीएमको को मनाने में कामयाब नहीं हुए। करुणानिधि ने कहा है कि चेन्नई में पार्टी कार्यसमिति की बैठक में भावी रणनीति तय की जाएगी। एजेंसी के मुताबिक कांग्रेस ने कहा है कि बातचीत अभी जारी है। डीएमके पिछली सरकार की तरह सीट और विभाग मांग रहा है जो उसे स्वीकार नहीं है।
ममता राजी, मिलेगी रेल
मनमोहन के नए फामरूले के तहत ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को एक कैबिनेट मंत्रालय दिया जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस के कोटे से पांच राज्य मंत्री भी बनाए जा सकते हैं। पहले ममता डीएमके से एक ज्यादा मंत्री की मांग पर अड़ गई थीं, पर बाद में वह मान गईं।
क्यों मानी ममता?
तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी एक कैबिनेट व पांच राज्यमंत्रियों के फामरूले पर राजी।
कारण
पश्चिम बंगाल में दो साल बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। ममता को यदि मुख्यमंत्री बनना है तो यह कांग्रेस के समर्थन से ही संभव। उद्योगों के खिलाफ होने की छवि से मुक्त होने के लिए उदार आर्थिक नीतियों वाली कांग्रेस के साथ की जरूरत। तृणमूल को पश्चिम बंगाल में एकतरफा जीत हासिल नहीं हुई है। इसलिए वाम मोर्चे पर अभी से दबाव बनाने के लिए सत्ता और साथ की जरूरत।
एनसीपी नाखुश
एनसीपी कोटे के मंत्रालयों पर भी लगातार बातचीत चलती रही। सूत्रों के मुताबिक शरद पवार को केवल कृषि मंत्रालय देने की बात पर एनसीपी खेमा खुश नजर नहीं आया। प्रफुल्ल पटेल के मंत्रालय को लेकर भी असमंजस बना रहा। कांग्रेस नागरिक उड्डयन मंत्रालय अपने पास रखने की इच्छुक है।
अब्दुल्ला भी नाराज
तय फामरूले के तहत नेशनल कान्फ्रेंस के फारुक अब्दुल्ला को भी कैबिनेट में जगह नहीं मिलने की चर्चा चलती रही। इसके कारण जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला नाराज बताए जा रहे हैं। वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के मुताबिक राजद के लालू यादव के नाम पर कोई विचार नहीं हुआ है। झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन को भी कोई जिम्मेदारी न मिलने के संकेत हैं।
हो सकते हैं पंजाब से दो मंत्री
पंजाब से अब एक के बदले दो सांसदों को मंत्रिमंडल में स्थान मिल सकता है। चंडीगढ़ से लगातार जीत हासिल करने वाले पवन बंसल को इस बार कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिल सकता है। उनके अलावा मंत्रिमंडल में पटियाला से चुनी र्गई पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की पत्नी परनीत कौर और जालंधर से सांसद व पंजाब कांग्रेस के प्रधान मोहिंदर सिंह केपी को शामिल किया जा सकता है। कांग्रेस के अलग-अलग खेमों ने अपने समर्थकों को मंत्री बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया है।
क्या होगा सुशील कुमार शिंदे का?
दलित नेता सुशील कुमार शिंदे कैबिनेट का हिस्सा होंगे या नहीं? इस बात को लेकर महाराष्ट्र में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कांग्रेस का एक बड़ा तबका उन्हें लोकसभा का स्पीकर बनाने पर तुला है, परंतु महाराष्ट्र के कांग्रेस के कुछ नेताओं का मानना है कि ऐसा करना पार्टी के लिए आत्मघाती कदम साबित हो सकता है।
क्या मलाई है इन मंत्रालयों में?
बड़े बजट वाले मंत्रालयों में आर्थिक लाभ का ‘स्कोप’ तो है ही जनाधार बढ़ाने की राजनीतिक मलाई भी है।
रेल : बड़े बजट के साथ बड़ी संख्या में नौकरियां। आम जीवन से लेकर उद्योग जगत तक से व्यापक संपर्क।
दूरसंचार : तेजी से बढ़ता मंत्रालय । करोड़ों के नए प्रोजेक्ट। ऑपरेटरों को स्पेक्ट्रम वितरण और टेलीफोन लाइनों के विस्तार में पैसे का बड़ा खेल।
ग्रामीण विकास : नरेगा जैसी फ्लैगशिप योजना। ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार देने में अव्वल। जनता को सीधे प्रभावित करने का मौका।
स्वास्थ्य : ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन। छह नए एम्स बनाने का प्रस्ताव। शहरी स्वास्थ्य मिशन को लाने की योजना। जनता पर सीधा असर।
सड़क परिवहन : करोड़ों की सड़क परियोजनाएं। काम का जनता पर सीधा असर।
Monday, 18 May 2009
लेफ्ट नही राइट चलो!

योगेश गुलाटी ........
वामपंथ की ऐतिहासिक भूलों का सिलसिला थम नहीं रहा है। 1996 की बात है, प्रकाश करात के नेतृत्व में सीपीएम का पोलित ब्यूरो ज्योति बसु को भारत का प्रधानमंत्री न बनने देने को लेकर अड़ गया था। बाद में ज्योति बाबू ने इसे अपनी पार्टी की ऐतिहासिक भूल कहा था, हालांकि उस कथित वैचारिक संघर्ष से ही पाटीर् के शीर्ष पर पहुंचे करात आज भी इसे कोई भूल नहीं मानते। लेकिन 2009 के आम चुनाव में सीपीएम के सांसदों की तादाद जब 43 से घट कर 16 पर और पूरे वाम मोर्चे की 62 से घट कर 24 पर आ गई, तब भी वाम नेता इसे अपनी किसी वैचारिक गलती का नतीजा नहीं मानते तो इसका क्या अर्थ लगाया जाए? वाम नेता अगर ईमानदारी से सोचें तो उनकी पराजय में राज्य स्तरीय कारणों की भूमिका तो है ही, लेकिन उन्हें अगर भविष्य के लिए खुद को तैयार करना है तो पिछले पांच सालों की अपनी केंद्रीय राजनीति की चीरफाड़ पूरी निर्ममता से करनी होगी। यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन देते हुए जो मुद्दे उन्होंने उठाए, उनमें ज्यादातर राष्ट्रहित में थे। इसके बावजूद देश में लगातार उनकी गैर-जिम्मेदार और विघ्न-संतोषी छवि क्यों बनती गई, इस बारे में उन्हें गंभीरता से विचार करना चाहिए। खासकर चुनाव से ठीक पहले यूपीए को हराने का एकमात्र लक्ष्य लेकर जिस तरह उन्होंने मायावती, देवगौड़ा और जयललिता जैसे छंटे-छंटाए अवसरवादियों से तालमेल किया, उसका वाम राजनीति से क्या संबंध हो सकता है? इन अप्रीतिकर सवालों को छोड़ कर वाम नेता अगर खुशफहमियां गढ़ने में ही जुटे रहते हैं तो फिर मार्क्स ही उनका भला करें!
पहली प्रतिक्रिया....
आज दो महीने की चुनावी कवायद का पटाक्षेप चौंकाने वाले परिणामों के साथ हुआ है..परिणामों.. इस लिए कि एक ओऱ जनता ने गठबंधन सरकार के समर्थन में लगभग स्पष्ट फैसला दिया है वहीं निरंकुश, स्वेक्षाचारी और अतिमहात्वांकाक्षी उदंड नेताओं को पूरे मन से सबक सीखा दिया है..आज के परिणाम भले ही किसी राष्ट्रीय मु्द्दे का समर्थन नहीं है लेकिन राजनीति की राष्ट्रीय दिशा जरूर तय कर सकते हैं.ये जनादेश विकल्पहीनता के बीच में विकल्प का भी संकते देते हैं...पूरे चुनावी गहमागहमी के बीच अपने मु्द्दों को तलाशती जनता ने राजनेताओं को अपनी अहमियत का अहसास करा दिया है..जूते - चप्पल की चर्चाओं और बुढ्ढी और गुड़िया के विशेषणों के इर्द गिर्द घुमती रही चुनावी बहस ने दो महीने तक जनता को खूब बोर किया, मीडिया में प्लांटेड राय प्रसारित कर राजनीतिक दल और नेता जनता को गुमराह करने की कोशिश करते रहे लेकिन चुनाव परिणाम ने इन सभी की खुशफहमी को चंद घंटों में ही काफूर कर दिया.. इलेक्ट्रानिक मीडिया ने घंटों कपोलकल्पित सरकारें बनाई और कई ख्याली प्रधानमंत्री देश को लाखों के विज्ञापनों के बीच परोसा.आज के परिणाम ने साफ कर दिया कि देश की जनता बाजारू चकाचौंध के बीच सादगी पसंद है..वो उदंड, आक्रमक और हाईटेक नेताओं को ज्यादा सहन नहीं कर सकती..लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान, लक्ष्मण सिंह ,वाइको,मायावती, जयललीता जैसे नेताओं का हाल ये बताने को काफी है कि अकड़ और अख्खड़ रवैया जनता झेलने को अभिशप्त नहीं है. आंकड़ों की बाजीगरी कर जनता का समय जाया करने वाली मीडिया का वो भ्रम भी इस जनादेश ने एक बार फिर तोड़ दिया है कि सवा अरब की आबादी के तेवर को कमरे में बैठकर भांपा जा सकता है.बहरहाल यहाँ युवा मतदातों की यु्वा सोच को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है और यूँ कहे युवा मानसिकता को जनता ने हाथों हाथ लिया है..जनता ने कथित बूढ़ी पार्टी के युवा नेतृत्व को तमाम आशंकाओं के बावजूद स्वीकार किया वहीं पच्चीस साल की युवा पार्टी को समय से पहले बूढ़ा बना दिया. नतीजों में कोई धुंधलाहट रह नहीं गई है और बिना किसी विशेष मेहनत के अब विद्वान अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह फिर देश के सरदार बनेंगे..वैसे लोकसभा चुनाव परिणाम के ताजा आँकड़ों ने ये भी सिद्ध कर दिया है विकास के मुद्दों पर चुनाव लड़े ही नहीं जाते हैं बल्कि जनता का विश्वास भी जीता जा सकता है. बहरहाल सत्ता के गलियारों की सरगर्मी मद्धम होने लगी है ऐसे में उम्मीद की जा सकती है अब दिल्ली का चुनावी तापमान बड़ी तेजी से नीचे उतरेगा..आने वाले दिनों में अनिश्चितता की तपीश खत्म होगी..और विकास की बौछार से देश की जनता को राहत मिल सकेगी..
विकास शर्मा रायपुर 09329444278
विकास शर्मा रायपुर 09329444278
Sunday, 10 May 2009
क्यों न हमारे देश में भी अनिवार्य हो मतदान!

मौजूदा चुनाव में खासकर महानगरों में कम मतदान की खबरों के बीच लालकृष्ण आडवाणी ने मतदान को अनिवार्य करने की पैरवी की। इस पर कुछ लोगों की प्रतिक्रिया थी कि ऐसा करना लोकतंत्र विरोधी होगा। कुछ ने कहा कि मतदान के लिए बल प्रयोग अनुचित है। वामपंथियों की प्रतिक्रिया मौलिक थी। उन्होंने कहा कि यह कोई नया विचार नहीं है, पहले भी इसकी वकालत की जाती रही है।
मैं समझता हूं यह ऐसा विचार है जिस पर विचार का समय अब आ गया है। इसलिए नहीं कि यह मतदाताओं को बाहर निकालने का सबसे अच्छा तरीका है (सबसे अच्छा तरीका तो यही होगा कि वे स्वेच्छा और स्वप्रेरणा से वोट देने आएं) बल्कि इसलिए कि मतदान का प्रतिशत अगर इसी तरह गिरता रहा तो भारतीय लोकतंत्र को गहरा धक्का पहुंचेगा। भारत में आज राजनीति का स्वरूप और उसमें जनभागीदारी को देखते हुए यह एक ऐसा विचार है जो हमारी राजनीतिक प्रणाली को बदल सकता है। यह पार्टियों और जनता के बीच संवाद व रिश्तों में भी आमूलचूल परिवर्तन ला सकता है।
सबसे पहले तो इससे हमारी संसदीय प्रणाली में प्रतिनिधित्व बढ़ सकेगा। कैसे? मौजूदा प्रणाली को देखिए। मान लें कि आप 40 मतदाताओं वाले एक निर्वाचन क्षेत्र से उम्मीदवार हैं। इनमें से 22 यानी 55 प्रतिशत वोट ही नहीं देते। बाकी 18 में चार आपको वोट देते हैं, तीन किसी दूसरे उम्मीदवार को, दो-दो वोट दो अन्य उम्मीदवारों को और सात अन्य को एक-एक वोट मिलता है।
इस तरह 40 में से कुल चार यानी 10 फीसदी मतदाताओं के समर्थन से आप ‘जन प्रतिनिधि’ बन जाते हैं। 1952 में स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव से यही स्थिति रही है। मतदान को अनिवार्य बना देने से इस हालत में सुधार हो सकता है।
चूंकि ज्यादातर मतदाता वोट नहीं डालते, इसलिए किसी भी उम्मीदवार के लिए मतदाताओं के किसी एक समुदाय को लामबंद करने के लिए जाति या संप्रदाय का कार्ड खेलना आसान हो जाता है। अनिवार्य मतदान का नतीजा यह होगा कि अगर एक निर्वाचन क्षेत्र में 30 फीसदी मतदाता किसी एक समुदाय के और 70 फीसदी किसी अन्य समुदाय के हैं, तो कोई भी पार्टी या उम्मीदवार किसी संकीर्ण एजेंडे पर चुनाव नहीं जीत सकती, क्योंकि बहुसंख्यक समुदाय उसे खारिज कर देगा।
अगर मतदान अनिवार्य हो जाए राजनेताओं को सभी मतदाताओं से जुड़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। इसके चलते उन्हें अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को नए सिरे से परिभाषित करना होगा। इसके अलावा जब मतदान अनिवार्य होगा, तब मतदाता को भी यह छानबीन भी करनी होगी कि कौन-सा उम्मीदवार कैसा है।
इस कवायद से राजनीतिक प्रणाली में मतदाता की रुचि नए सिरे से जागृत हो सकती है। इसके साथ अगर मतदाता को ‘उपरोक्त में से कोई नहीं’ पर बटन दबाने का भी विकल्प मिल जाए तो सोने पर सुहागा हो जाएगा। अगर बड़ी संख्या में मतदाता सभी उम्मीदवारों को खारिज करके यह विकल्प चुनते हैं तो यह अपने आप में अहम संदेश होगा। इससे राजनीतिक पार्टियां मतदाता पर ज्यादा ध्यान देने को बाध्य होंगी और यह हमारे देश में सचमुच बड़ा बदलाव होगा।
हम अपने नेताओं को पहले ही बहुत कोस चुके हैं। सवाल यह है कि समस्या क्या सिर्फ नेता ही हैं, जनता नहीं? मौजूदा विकल्पों से बार-बार की नाराजगी से उपजा मोहभंग समझ में आता है। लेकिन आज स्थिति कुछ और भी नजर आती है। कई शहरों में मतदान के दिन को छुट्टी का दिन समझा जाता है। वोट नहीं देने वालों में संपन्न तबका सबसे आगे है।
जहां तक विरोध प्रदर्शनों में मोमबत्तियां जलाने वाले युवाओं की बात है, तो उनके बारे में हाल ही में सेवानिवृत्त मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने एक दिलचस्प बात कही थी - 18 से 25 वर्ष की उम्र के मतदाताओं में से 70 फीसदी ने अपने को मतदाता सूचियों में दर्ज ही नहीं करवाया।
लिहाजा मतदाताओं को अब बताना होगा कि वोट देना अधिकार ही नहीं, कर्तव्य और जिम्मेदारी भी है। यह अधिकार भारतीयों को आसानी से हासिल नहीं हुआ है। अलबत्ता जो लोग अनिवार्य मतदान के बाद भी वोट देने नहीं आते, उनके विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।
जिन तीस से ज्यादा देशों में मतदान अनिवार्य है, कहीं भी इस मामले में सख्त सजा का प्रावधान नहीं है। वहां ज्यादा से ज्यादा जुर्माना होता है और बीमार होने की स्थिति में वोट नहीं देने की भी छूट है। जिन देशों में अनिवार्य मतदान है, वहां न सिर्फ मतदान प्रतिशत खासा अच्छा है, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों के उल्लंघनों की भी ज्यादा चर्चा नहीं है।
भारत में भी इस पर व्यापक बहस का अब समय आ गया है। हो सकता है यह बहस ही उदासीन मतदाताओं में कुछ रुचि पैदा कर सके।
अनपढ़ मां की जिद ने बनाया आईएएस

अहमदाबाद प्रकाश कंवर को अपने अनपढ़ होने का मलाल था, लेकिन साधारण परिस्थिति में गुजर-बसर करते हुए आज अपनी बेटी डॉ. रतनकंवर गढ़वी चारण (24) को आईएएस बना देखकर वे गौरवान्वित हैं।
रतनकंवर ने पहले अपनी मेहनत से एमबीबीएस की डिग्री हासिल की और इस वर्ष यूपीएससी की परीक्षा में 124वीं रैंक हासिल करने में कामयाब रही। यहां के मणिनगर में हरिपुर इलाके की धीरज सोसायटी में रहने वाली रतनकंवर के पिता हड़मत सिंह आलू और प्याज के व्यापारी हैं।
उन्होंने बताया कि उनकी बेटी बचपन से ही पढ़ाई में होशियार रही है। दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं में उसने 91 फीसदी से ज्यादा अंक प्राप्त किए।
मां की इच्छा पूरी की
रतनकंवर के दो भाइयों भवदेव और सिद्धार्थ ने बताया कि मां ने तीनों बच्चों को उच्च शिक्षा और तरक्की के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया। इसके चलते भवदेव ने बीई-आईटी व एमबीए और सिद्धार्थ ने बीटेक किया तो रतनकंवर ने एमबीबीएस करने बाद आईएएस बनने की ठानी। भाइयों का कहना है कि आईएएस बनकर रतनकंवर ने मां की वर्षो पुरानी इच्छा पूरी कर दी है।
सफलता का श्रेय मां को रतनकंवर ने भी अपनी सफलता का श्रेय मां को देते हुए बताया, ‘डॉक्टर बनने के पहले और यूपीएससी की परीक्षा की तैयारी के दौरान ऐसा लगता था जैसे मां को ही परीक्षा देनी है। वे मेरे साथ पूरी रात जागती रहती थीं।’
मैं कभी स्कूल नहीं गई। इसका मुझे दु:ख था, लेकिन बेटी की सफलता से मुझे बहुत संतोष मिला है। लगता है जैसे मैंने ही पढ़ाई पूरी कर ली है।’
- प्रकाश कंवर (आईएएस बनने वाली रतनकंवर की मां)
Tuesday, 14 April 2009
सबसे बड़े प्रजातंत्र की लागत

विभिन्न नेताओं ने स्वीकार किया है कि एक सांसद के चुनाव पर तीन से पांच करोड़ रूपए की राशि खर्च होती है। अमूमन चुनाव प्रचार के लिए एक दिन में होने वाला खर्च करीब पांच लाख रूपए होता है जो प्रचार के अंतिम हफ्ते तक बढ़ कर दस से पन्द्रह लाख तक भी पहुंच सकता है।
विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र के लिए हो रहे चुनाव पर एक अनुमान के मुताबिक करीब 18 हजार करोड़ रूपए खर्च होंगे। इस मायने में भारत का यह आम चुनाव कुछ महीने पहले अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव के खर्च को भी पीछे छोड़ देगा। उसमें लगभग दस हजार करोड़ रूपए खर्च हुए थे।
इस संबंध में राष्ट्रीय दलों के चुनावी प्रत्याशियों और वरिष्ठ नेताओं से चर्चा की। स्वाभाविक रूप से इस संबंध में खुल कर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। नाम न जाहिर करने की शर्त पर इन नेताओं का कहना है कि एक सांसद के चुनाव में तीन से पांच करोड़ रूपए की राशि खर्च होती है।
सूत्रों का कहना है कि अगर चुनाव जद्दोजहद और खींचतान वाला हो तो यह खर्च दुगुना और तिगुना भी हो सकता है। राष्ट्रीय दलों की बात करें तो उनकी ओर से प्रत्याशियों को लगभग एक करोड़ रूपए की राशि चुनाव खर्च के लिए दी जाती है। चुनाव खर्च मोटे तौर पर प्रचार सामग्री और जनसभा के आयोजन तथा कार्यकर्ताओं को प्रतिदिन दी जाने वाली राशि के रूप में होता है।
एक कार्यकर्ता को रोज करीब 200 रूपए दिए जाते हैं। विधानसभा क्षेत्रवार तीन सौ से पांच सौ कार्यकर्ता चुनाव प्रचार के लिए जुटते हैं।
आमतौर पर एक लोकसभा क्षेत्र में छह से आठ विधानसभा क्षेत्र होते हैं।
सूत्र बताते हैं कि पहले चुनाव में वाहन आदि की व्यवस्था पर खासी रकम खर्च होती थी लेकिन चुनाव आयोग की सख्ती के मद्देनजर अब इसमें काफी कमी आई है। फिर भी चोरी छिपे बडी संख्या में वाहन अब भी चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल होते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले गाडियां किराए पर ली जाती थीं अब खुद ज्यादातर कार्यकर्ताओं के पास कार या जीप होती है जिसका इस्तेमाल प्रचार के लिए किया जाता है।
सूत्रों के अनुसार पहले चुनाव में कंबल ् कपड़े और मदिरा बंटने की बातें ही ज्यादा सामने आती थीं लेकिन पिछले कुछ वर्षो में चुनाव में एक वर्ग ऐसा भी सामने आया है जिसके लिए विशेष उपहार की व्यवस्था होती है। इन उपहारों में मल्टी यूटिलिटी व्हीकल सहित अन्य मूल्यवान वस्तुएं शामिल होती हैं। चुनाव में विशिष्ट उपहार प्राप्त करने वाला यह वर्ग राजनीतिक समीकरण की दृष्टि से खासा महत्वपूर्ण होता है। ये राजनीतिक रसूख रखने वाले लोग होते हैं जिनके कहने पर संबंधित क्षेत्रों में पांच से लेकर पचास हजार तक के वोटों का फैसला हो जाता है।
खास बात यह भी है कि राजनीतिक दलों में कुछ विशिष्ट कार्यकर्ताओं का ऐसा हुजूम भी होता है जिन्हें टास्क परफार्मर कहा जाता है। ऐसे कार्यकर्ता उन क्षेत्रों में झोंके जाते हैं जहां उम्मीदवार की हालत कमजोर होती है। अनुकूल परिणाम आने पर टास्क परफार्मर कार्यकर्ता भी मूल्यवान उपहारों से नवाजे जाते हैं।
करीब पांच महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में राष्ट्रीय स्तर के एक दल के कार्यकर्ताओं को इसी तर्ज पर एक ट्रक भर-भर मोटरसाइकिलें बांटे जाने की खासी चर्चा रही थी।
विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र के लिए हो रहे चुनाव पर एक अनुमान के मुताबिक करीब 18 हजार करोड़ रूपए खर्च होंगे। इस मायने में भारत का यह आम चुनाव कुछ महीने पहले अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव के खर्च को भी पीछे छोड़ देगा। उसमें लगभग दस हजार करोड़ रूपए खर्च हुए थे।
इस संबंध में राष्ट्रीय दलों के चुनावी प्रत्याशियों और वरिष्ठ नेताओं से चर्चा की। स्वाभाविक रूप से इस संबंध में खुल कर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। नाम न जाहिर करने की शर्त पर इन नेताओं का कहना है कि एक सांसद के चुनाव में तीन से पांच करोड़ रूपए की राशि खर्च होती है।
सूत्रों का कहना है कि अगर चुनाव जद्दोजहद और खींचतान वाला हो तो यह खर्च दुगुना और तिगुना भी हो सकता है। राष्ट्रीय दलों की बात करें तो उनकी ओर से प्रत्याशियों को लगभग एक करोड़ रूपए की राशि चुनाव खर्च के लिए दी जाती है। चुनाव खर्च मोटे तौर पर प्रचार सामग्री और जनसभा के आयोजन तथा कार्यकर्ताओं को प्रतिदिन दी जाने वाली राशि के रूप में होता है।
एक कार्यकर्ता को रोज करीब 200 रूपए दिए जाते हैं। विधानसभा क्षेत्रवार तीन सौ से पांच सौ कार्यकर्ता चुनाव प्रचार के लिए जुटते हैं।
आमतौर पर एक लोकसभा क्षेत्र में छह से आठ विधानसभा क्षेत्र होते हैं।
सूत्र बताते हैं कि पहले चुनाव में वाहन आदि की व्यवस्था पर खासी रकम खर्च होती थी लेकिन चुनाव आयोग की सख्ती के मद्देनजर अब इसमें काफी कमी आई है। फिर भी चोरी छिपे बडी संख्या में वाहन अब भी चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल होते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले गाडियां किराए पर ली जाती थीं अब खुद ज्यादातर कार्यकर्ताओं के पास कार या जीप होती है जिसका इस्तेमाल प्रचार के लिए किया जाता है।
सूत्रों के अनुसार पहले चुनाव में कंबल ् कपड़े और मदिरा बंटने की बातें ही ज्यादा सामने आती थीं लेकिन पिछले कुछ वर्षो में चुनाव में एक वर्ग ऐसा भी सामने आया है जिसके लिए विशेष उपहार की व्यवस्था होती है। इन उपहारों में मल्टी यूटिलिटी व्हीकल सहित अन्य मूल्यवान वस्तुएं शामिल होती हैं। चुनाव में विशिष्ट उपहार प्राप्त करने वाला यह वर्ग राजनीतिक समीकरण की दृष्टि से खासा महत्वपूर्ण होता है। ये राजनीतिक रसूख रखने वाले लोग होते हैं जिनके कहने पर संबंधित क्षेत्रों में पांच से लेकर पचास हजार तक के वोटों का फैसला हो जाता है।
खास बात यह भी है कि राजनीतिक दलों में कुछ विशिष्ट कार्यकर्ताओं का ऐसा हुजूम भी होता है जिन्हें टास्क परफार्मर कहा जाता है। ऐसे कार्यकर्ता उन क्षेत्रों में झोंके जाते हैं जहां उम्मीदवार की हालत कमजोर होती है। अनुकूल परिणाम आने पर टास्क परफार्मर कार्यकर्ता भी मूल्यवान उपहारों से नवाजे जाते हैं।
करीब पांच महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में राष्ट्रीय स्तर के एक दल के कार्यकर्ताओं को इसी तर्ज पर एक ट्रक भर-भर मोटरसाइकिलें बांटे जाने की खासी चर्चा रही थी।
Friday, 3 April 2009
घोषणा पत्र जारी, भाजपा फिर राम भरोसे...

भाजपा ने आज बीजेपी मुख्यालय पर एक समारोह में अपना मैनिफेस्टो जारी किया। घोषणा पत्र जारी करने के लिए आयोजित इस समारोह के दौरान मंच पर पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी और राजनाथ सिंह के साथ अटल बिहारी वाजपेयी का फोटो भी लगा था। यह माना जा रहा है कि पिछले विधानसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी को प्रचार से दूर रखने के बाद भाजपा को फिर उनका महत्व समझ आ गया है। भाजपा ने मान लिया है कि अटलजी के बिना पार्टी अधूरी है और इसी कारण उन्हें घोषणा पत्र के कवर पर भी जगह दी गई है।
माना जा रहा था कि भाजपा अपने मैनिफेस्टो में हिन्दुत्व पर लौट सकती है। पिछले चुनावों में भाजपा ने अपना घोषणा पत्र जारी नहीं किया था। एनडीए का कॉमन मिनिमम प्रोग्राम जारी कर भाजपा ने अपने गठबंधन की बात प्रमोट की थी। उम्मीद यह भी की जा रही थी की यह घोषणा पत्र कांग्रेसी मैनिफेस्टो का जवाब होगा।
घोषणा पत्र जारी करने से पहले समारोह में भाजपा का अभियान गीत सुनाया गया। इस दौरान मंच पर आडवाणी, वैंकया, जसवंत सिंह, मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह और अरूण जेटली मौजूद थे। भाजपा के वरिष्ठ नेता रविशंकर प्रसाद ने घोषणा पत्र पढ़कर सुनाया।
भाजपा के इस घोषणा पत्र की खूबियां .......
- २ रूपए गेंहूं चावल
- किसानों को ४ फीसदी पर लोन
- ६ फीसदी पर होम लोन देने का वादा
- सेंट्रल सेल्स टेक्स खत्म होगा
- रेहड़ी वालों को ४ फीसदी पर लोन
- पोटा कानून लाएंगे
- विदेश में जमा काला धन वापस लाएंगे
- एफबीटी खत्म करेंगे ( फ्रिंज बैनिफिट टैक्स )
- गांवो को पक्की सड़क
- आयकर में छूट
- रामसेतु नहीं टूटने देंगे
- पर्यटन क्षेत्रों को बढावा
- पूर्ण ऊर्जा व सड़क संपर्क स्थापित करने देंगे
- जनसुरक्षा बढ़ाई जाएगी
- भारत बांग्लादेश बाड़ लगाने का काम पूरा
- माओवादियों , आतंकवादियों के खिलाफ अभियान
- अलगवावादी, आतंकवादी समर्थित देशों पर दबाव नीति
- जय जवान सैन्य बलों अर्धसैनिक बलों को आयकर मुक्त
- सैन्य बलों के लिए पृथक वेतन आयोग का गठन
- सेनाओं और पैरामिलिट्री फोर्स को वेतन पर आयकर में छूट
- बिजली का उत्पादन निर्भरता कम
- मध्य प्रदेश की लाड़ली लक्ष्मी को पूरे देश में
- धारा 370 हटाएंगे
- सस्ती शिक्षा
- 2014 तक सभी के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं
- घर पर एम्बुलैंस की व्यवस्था, नए एम्स की स्थापना पुर्नजीवित
- ग्लोबल वॉर्मिंग को रोकने के लिए कार्यक्रम
- अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाएंगें
- वरिष्ठ नागरिकों की पेंशन कर मुक्त
भाजपा ने उन चीजों को भी अपने मैनिफेस्टो में शामिल किया है जो कांग्रेस से कहीं छूट गए थे। राजनाथ सिंह ने अंत में मैनिफेस्टो कमेटी के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी समेत सभी को धन्यवाद दिया जिन्होंने घोषणा पत्र तैयार करने में मदद की है। राजनाथ सिंह ने कहा कि उन्होंने राजनीतिक , आर्थिक, सामाजिक , सांस्कृतिक सभी पक्षों को ध्यान में रखते हुए पत्र तैयार किया है। इसमें भाजपा की दार्शनिक अवधारणा को ध्यान में रखा गया है, यह संतुलित है। उन्होंने कहा कि यह अन्य पार्टियों के घोषणा पत्र की तरह विचार शून्य नहीं है। हमने यह केवल वादे नहीं किए हम इसका अक्षरशः पालन करेंगे, हर साल इसकी समीक्षा करेंगे। इस मौके पर आडवाणी ने कहा की घोषणा पत्र के अनुसार हम यह सारे वादे पूरे करना चाहते हैं। हम देश को सुरक्षा देना चाहते हैं। उन्होंने सैन्य सेवाओं को ज्यादा से ज्यादा आर्थिक फायदा पहुंचाने का वादा किया, उन्होंने वीरता पुरस्कारों की राशी को 30000 रूपए तक बढ़ाने की बात भी कही।
माना जा रहा था कि भाजपा अपने मैनिफेस्टो में हिन्दुत्व पर लौट सकती है। पिछले चुनावों में भाजपा ने अपना घोषणा पत्र जारी नहीं किया था। एनडीए का कॉमन मिनिमम प्रोग्राम जारी कर भाजपा ने अपने गठबंधन की बात प्रमोट की थी। उम्मीद यह भी की जा रही थी की यह घोषणा पत्र कांग्रेसी मैनिफेस्टो का जवाब होगा।
घोषणा पत्र जारी करने से पहले समारोह में भाजपा का अभियान गीत सुनाया गया। इस दौरान मंच पर आडवाणी, वैंकया, जसवंत सिंह, मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह और अरूण जेटली मौजूद थे। भाजपा के वरिष्ठ नेता रविशंकर प्रसाद ने घोषणा पत्र पढ़कर सुनाया।
भाजपा के इस घोषणा पत्र की खूबियां .......
- २ रूपए गेंहूं चावल
- किसानों को ४ फीसदी पर लोन
- ६ फीसदी पर होम लोन देने का वादा
- सेंट्रल सेल्स टेक्स खत्म होगा
- रेहड़ी वालों को ४ फीसदी पर लोन
- पोटा कानून लाएंगे
- विदेश में जमा काला धन वापस लाएंगे
- एफबीटी खत्म करेंगे ( फ्रिंज बैनिफिट टैक्स )
- गांवो को पक्की सड़क
- आयकर में छूट
- रामसेतु नहीं टूटने देंगे
- पर्यटन क्षेत्रों को बढावा
- पूर्ण ऊर्जा व सड़क संपर्क स्थापित करने देंगे
- जनसुरक्षा बढ़ाई जाएगी
- भारत बांग्लादेश बाड़ लगाने का काम पूरा
- माओवादियों , आतंकवादियों के खिलाफ अभियान
- अलगवावादी, आतंकवादी समर्थित देशों पर दबाव नीति
- जय जवान सैन्य बलों अर्धसैनिक बलों को आयकर मुक्त
- सैन्य बलों के लिए पृथक वेतन आयोग का गठन
- सेनाओं और पैरामिलिट्री फोर्स को वेतन पर आयकर में छूट
- बिजली का उत्पादन निर्भरता कम
- मध्य प्रदेश की लाड़ली लक्ष्मी को पूरे देश में
- धारा 370 हटाएंगे
- सस्ती शिक्षा
- 2014 तक सभी के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं
- घर पर एम्बुलैंस की व्यवस्था, नए एम्स की स्थापना पुर्नजीवित
- ग्लोबल वॉर्मिंग को रोकने के लिए कार्यक्रम
- अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाएंगें
- वरिष्ठ नागरिकों की पेंशन कर मुक्त
भाजपा ने उन चीजों को भी अपने मैनिफेस्टो में शामिल किया है जो कांग्रेस से कहीं छूट गए थे। राजनाथ सिंह ने अंत में मैनिफेस्टो कमेटी के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी समेत सभी को धन्यवाद दिया जिन्होंने घोषणा पत्र तैयार करने में मदद की है। राजनाथ सिंह ने कहा कि उन्होंने राजनीतिक , आर्थिक, सामाजिक , सांस्कृतिक सभी पक्षों को ध्यान में रखते हुए पत्र तैयार किया है। इसमें भाजपा की दार्शनिक अवधारणा को ध्यान में रखा गया है, यह संतुलित है। उन्होंने कहा कि यह अन्य पार्टियों के घोषणा पत्र की तरह विचार शून्य नहीं है। हमने यह केवल वादे नहीं किए हम इसका अक्षरशः पालन करेंगे, हर साल इसकी समीक्षा करेंगे। इस मौके पर आडवाणी ने कहा की घोषणा पत्र के अनुसार हम यह सारे वादे पूरे करना चाहते हैं। हम देश को सुरक्षा देना चाहते हैं। उन्होंने सैन्य सेवाओं को ज्यादा से ज्यादा आर्थिक फायदा पहुंचाने का वादा किया, उन्होंने वीरता पुरस्कारों की राशी को 30000 रूपए तक बढ़ाने की बात भी कही।
क्या पार्टियों के घोषणा पत्रों का कोई महत्व है.. या यह सिर्फ वोटरों को लुभाने के खोखले वादे हैं......अपने विचार जरूर लिखें....
Thursday, 2 April 2009
जुए में पत्नी हारी, जुआरियों ने किया दुष्कर्म !

राजस्थान में एक युवक के जुए की लत की कीमत उसकी पत्नी को अपनी इज्जत से चुकानी पड़ी है। बारां के सल्लू ने जुए में 50 हजार रुपए हारकर अपनी पत्नी को दांव पर लगा दिया और हार बैठा। जीतने वाले जुआरियों ने विवाहिता को जंगल ले जाकर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। किसी तरह भागकर वह अपने पीहर पहुंची और मां को सारी व्यथा सुनाई। गुरुवार को मां-बेटी ने एसपी से मिलकर मामले की शिकायत की है। उन्होंने डीएसपी को गांव जाकर जांच करने के आदेश दिए हैं।
विवाहिता की शिकायत के मुताबिक, दस साल पहले उसकी शादी बटावदापार गांव में सल्लू के साथ हुई थी। पति को जुआ खेलने की लत थी। गत 25 मार्च को सल्लू जुए में पचास हजार रुपए हार गया। रुपए की एवज में उसने पत्नी को ही दांव पर लगा दिया। जब सल्लू रात 12 बजे घर आया तो पत्नी को बाहर जाने के लिए कहा। घर से बाहर निकलते ही गांव के परसराम ने उसे पकड़कर मुंह में रूमाल ठूंस दिया और हाथ-पैर रस्सी से बांध दिए। बाद में उसे जीप में डालकर जंगल ले जाया गया जहां तीन लोगों ने उसके साथ सामूहिक दुराचार किया।
31 मार्च की रात जब जुआरी शराब के नशे में बेसुध हो गए, तब वह मौका पाकर भाग निकली। जंगल में भटकते हुए सड़क पर आई और एक बस ड्राइवर की मदद से गुना (मप्र) चली गई। गुना से वह अपने पीहर रूठियाई गांव आई और अपनी मां को सारी दास्तान सुनाई।
भरोसा नहीं फिर भी जांच
महिला के बयान में विरोधाभास है। उसके अपने पति से संबंध ठीक नहीं हैं। 29 मार्च को उसके पति सल्लू ने खुद गुमशुदगी का मामला दर्ज कराया था। भरोसा नहीं होता, कोई पति अपनी पत्नी के साथ ऐसा कर सकता है? -ओमप्रकाश, एसपी, बारां
अपहरण नहीं
एसपी के आदेश से गांव जाकर पूछताछ की है। विवाहिता की पुत्री, पुत्र, सास और पड़ोसियों से पूछताछ में अपहरण की कोई बात सामने नहीं आई। फिर भी मामले की जांच की जा रही है। -राजेन्द्रसिंह चारण, डीएसपी, छबड़ा
एक पति के द्धारा जुएं में अपनी पत्नी को दांव पर लगा देना किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता। आपकी नजर में ऐसे पति को क्या सजा दी जानी चाहिए?
विवाहिता की शिकायत के मुताबिक, दस साल पहले उसकी शादी बटावदापार गांव में सल्लू के साथ हुई थी। पति को जुआ खेलने की लत थी। गत 25 मार्च को सल्लू जुए में पचास हजार रुपए हार गया। रुपए की एवज में उसने पत्नी को ही दांव पर लगा दिया। जब सल्लू रात 12 बजे घर आया तो पत्नी को बाहर जाने के लिए कहा। घर से बाहर निकलते ही गांव के परसराम ने उसे पकड़कर मुंह में रूमाल ठूंस दिया और हाथ-पैर रस्सी से बांध दिए। बाद में उसे जीप में डालकर जंगल ले जाया गया जहां तीन लोगों ने उसके साथ सामूहिक दुराचार किया।
31 मार्च की रात जब जुआरी शराब के नशे में बेसुध हो गए, तब वह मौका पाकर भाग निकली। जंगल में भटकते हुए सड़क पर आई और एक बस ड्राइवर की मदद से गुना (मप्र) चली गई। गुना से वह अपने पीहर रूठियाई गांव आई और अपनी मां को सारी दास्तान सुनाई।
भरोसा नहीं फिर भी जांच
महिला के बयान में विरोधाभास है। उसके अपने पति से संबंध ठीक नहीं हैं। 29 मार्च को उसके पति सल्लू ने खुद गुमशुदगी का मामला दर्ज कराया था। भरोसा नहीं होता, कोई पति अपनी पत्नी के साथ ऐसा कर सकता है? -ओमप्रकाश, एसपी, बारां
अपहरण नहीं
एसपी के आदेश से गांव जाकर पूछताछ की है। विवाहिता की पुत्री, पुत्र, सास और पड़ोसियों से पूछताछ में अपहरण की कोई बात सामने नहीं आई। फिर भी मामले की जांच की जा रही है। -राजेन्द्रसिंह चारण, डीएसपी, छबड़ा
एक पति के द्धारा जुएं में अपनी पत्नी को दांव पर लगा देना किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता। आपकी नजर में ऐसे पति को क्या सजा दी जानी चाहिए?
Monday, 30 March 2009
आडवाणी का काला धन स्विस बैंक में !

नहीं भाई ये मै नहीं कह रहा ! ये कहना है हमारे लालू जी का....! लालू जी एसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि वो ये बात अच्छी तरह जानते है ! अरे भाई भैसों का दूध बेच कर जो थोड़ा बहुत धन उन्होंने जोड़ा था वो भी तो उसी (स्विस) बैंक में जमा है ! और लालू जी के रिफरेन्स पर ही तो अडवाणी जी का खाता स्विस बैंक में खुला था ! इस बात को आडवानी जी भूल गए लेकिन हमारे मेनेजमेंट गुरु लालू की याददाश्त आडवानी जी की तरह कमजोर नहीं है ! इसीलिए उन्होंने आडवानी जी को याद दिलाया है की स्विस बैंक में आपका खाता है और उसमे से पैसा नीकलाते रहा कीजिये ! क्योंकि इन विदेशी बैंक वालों का कोई भरोसा नही कल को मुकर गए तो ? इसलिए लालू अडवानी को बस याद दिला रहे है बेलेंस चेक करते रहना अडवानी जी....! लालू ने कहा कि आडवाणी ने स्विस बैंक में किसी दूसरे के नाम से पैसा जमा करा रखा है। और ये बात सिर्फ़ लालू जी ही जानते हैं ! इसलिए किसी से कहना नही !
लालू सोमवार को बिहार के सिवान, सिताबदियारा व मांझागढ़ में सभाओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि अगर आडवाणी को प्रधानमंत्री की कुर्सी मिली तो मैं राजनीति से संन्यास ले लूंगा। भाजपा देश में राममंदिर का राग अलाप कर एक बार फिर दंगा कराना चाहती है। वह अल्पसंख्यकों को यहां से भगाना चाहती है, जो हम नहीं होने देंगे। वरुण गांधी प्रकरण में उन्होंने आरएसएस और भाजपा पर गलत तरीके से फायदा उठाने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा कि साधु यादव को शामिल कर कांग्रेस गलतफहमी का शिकार हो गई है। उसे मालूम नहीं कि जब तक लालू हैं, तभी तक कोई लाल है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार किसी का भी भला करने वाले नहीं हैं।
लालू सोमवार को बिहार के सिवान, सिताबदियारा व मांझागढ़ में सभाओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि अगर आडवाणी को प्रधानमंत्री की कुर्सी मिली तो मैं राजनीति से संन्यास ले लूंगा। भाजपा देश में राममंदिर का राग अलाप कर एक बार फिर दंगा कराना चाहती है। वह अल्पसंख्यकों को यहां से भगाना चाहती है, जो हम नहीं होने देंगे। वरुण गांधी प्रकरण में उन्होंने आरएसएस और भाजपा पर गलत तरीके से फायदा उठाने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा कि साधु यादव को शामिल कर कांग्रेस गलतफहमी का शिकार हो गई है। उसे मालूम नहीं कि जब तक लालू हैं, तभी तक कोई लाल है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार किसी का भी भला करने वाले नहीं हैं।
दिल्ली, तेरी गलियों का वो इश्क याद आता है................

बीते हुए लम्हे....
गुजरे हुए पल.....
बिखरी हुई यादें.....
थोडी-सी कसक....।
थोडी सी-सी महक....
डूबी हुई कोई सिसकी....
कोई खुशनुमा-सी शाम.....
या दर्द में डूबा संगीत..........
सुरमई से कुछ भीने-भीने रंग.....
यादों से विभोर होता हुआ मन.......
मचलती हुई कई धड़कनें....
फड़कती हुई शरीर की कुछ नसें.....
जाने क्या कहता तो है मन....
जाने क्या बुनता हुआ-सा रहता है तन....
बहुत दिनों पहले की तो ये बातें थीं......
आज तक ये क्यूँ जलती हुई-सी रहती है....
ये आग मचलती हुई-सी क्यूँ रहती है.....
अगर प्यार कुछ नहीं तो बुझ ही जाए ना....
और अगर कुछ है तो आग लगाये ना...
बरसों पहले बुझ चुकी जो आग है....
वो अब तलक दिखायी कैसे देती है....
और हमारी तन्हाईयों में उसकी सायं-सायं की गूँज सुनाई क्यूँ देती है....!!
प्यार अमर है तो पास आए ना....
और क्षणिक है तो मिट जाए ना......
मगर इस तरह आ-आकर हमें रुलाये ना....!!
शर्मिंदा होने का एक और अवसर!

लीजिये अगर आप फ़िल्म स्लम डॉग देख कर शर्मिंदा नही हुए तो ये ख़बर आपको ज़रूर शर्मिंदा कर देगी ! हॉलीवुड अभिनेत्री ऎजिलीना जोली और अभिनेता बै्रड पिट लेगें भारतीय बच्चाा गोद लेने वाले है। यह जोडी पहले ही अलग-अलग देशों के कई बच्चाों को गोद ले चुकी है, लेकिन उन्हे भारत से बच्चाा गोद लेने की प्रेरणा मिली है स्लमडॉग मिलिनेयर के दस वर्षीय अजहरूदीन से । बताया जाता है कि उसने जोली से पूछा था कि उन्होने अब तक भारत से कोई बच्चाा गोद क्यों नहीं लिया। इस पर जोली का जवाब था, मैं तुम्हे एक राज की बात बता रही हंू। हमलोग जल्द ही एक भारतीय बच्चाा गोद लेने जा रहे है। तो बहाइये भारत की गरीबी पर आसूं और जोली को दीजिये नोबल पुरुस्कार ! सच जोली को कितनी चिंता है हिंदुस्तान की?
अडवाणी की जिद !

बीजेपी के पीएम कैंडिडेट लालकृष्ण आडवाणी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ टीवी पर बहस करना चाहते हैं, मनमोहन ने इंकार कर दिया तो उन्होंने सोनिया को न्योता दे दिया! आडवानी ज़िद पर हैं...! उनका कहना है बहस तो होनी ही चाहिए वो भी ठीक उसी तरह जिस तरह अमेरिका में प्रेजिडंट पद के उम्मीदवार बहस करते हैं। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि संसदीय जनतंत्र में इस तरह की बहस का कोई रिवाज नहीं है। लेकिन मान लीजिए कि यह अमेरिकी परंपरा अपने देश में भी शुरू हो जाए तो नजारा कैसा होगा? हो सकता है तब शरद पवार, मायावती, रामविलास पासवान और यहां तक कि लालू प्रसाद भी मैदान में कूद पड़ें। इनका सवाल यह होगा कि आखिर डिबेट आडवाणी जी और मनमोहन सिंह ही क्यों करेंगे? इन्होंने यह कैसे मान लिया कि सिर्फ उन्हीं की पार्टियां प्रधानमंत्री का उम्मीदवार तय करेंगी? यदि बहस की नौबत आती तो पता चलता कि शरद पवार ने मनमोहन सिंह को चुनौती दे डाली और लालू प्रसाद आडवाणी से बहस करने के लिए ताल ठोंककर खड़े हो गए। लालू प्रसाद तो बहस की शुरुआत में ही यह कह देते कि उन्होंने आडवाणी जी की कुंडली देख ली है, उसमें उनके प्रधानमंत्री बनने का कोई योग ही नहीं है। आडवाणी के लिए इसका जवाब देना आसान नहीं होता। कल्पना कीजिए कि ऐसी ही बहस के लिए फर्स्ट राउंड में मायावती और मुलायम सिंह आमने-सामने खड़े हो गए, तब किस तरह की बहस होगी। उधर दक्षिण में जयललिता, देवगौड़ा और चंद्रबाबू नायडू इसी उम्मीद में बहस में उतर सकते थे कि उनके दावे पर पुनर्विचार हो सकता है। लोग टीवी खोलते और हर एक घंटे के बाद उन्हें प्रधानमंत्री पद के 2 संभावित उम्मीदवार बहस करते हुए नजर आते। यहां जब क्षेत्रीय पार्टियां विधानसभा चुनाव में एक-दूसरे को सांपनाथ, नागनाथ बताने से नहीं चूकतीं तो राष्ट्रीय बहस का स्तर तो और ऊंचा हो जाता। हर नेता बेहतर परफॉर्म करने की कोशिश करता। लेकिन उन नेताओं का क्या होता, जो चतुर वक्ता नहीं होते? तब चुनाव आयोग से इस बात की मांग की जाती कि पीएम कैंडिडेट को बहस में अपना वक्ता लाने की छूट दी जाए। अगर आयोग यह छूट दे देता तो मनमोहन सिंह की ओर से कपिल सिब्बल और मुलायम सिंह यादव की जगह अमर सिंह भेजे जाते। वैसे बहस का प्रस्ताव रखते हुए आडवाणी ने क्षण भर के लिए यह जरूर सोचा होगा कि काश! टीवी डिबेट से ही पीएम का फैसला हो जाता। लेकिन टीवी या मंच पर बोलने से यह कैसे पता चलेगा कि कौन सचमुच 'लौह पुरुष' है और कौन 'कमजोर पुरुष।'
Sunday, 29 March 2009
नफ़रत की राजनीति!

गुजरात हाई कोर्ट ने राज्य की महिला तथा बाल विकास राज्य मंत्री मायाबेन कोडनानी की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर यह संदेश दिया है कि भारतीय राष्ट्र-राज्य के मूलभूत सिद्धांतों और संवैधानिक मूल्यों से खिलवाड़ करने वाले लोग कानून को कुछ दिनों तक धोखा देने में भले ही कामयाब हो जाएं पर वे उसके शिकंजे से बच नहीं सकते। अदालत ने यह निर्णय देते हुए कहा कि धर्मांध लोग आतंकवादियों से कम नहीं हैं। इस निर्णय के बाद कोडनानी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और विशेष जांच दल (एसआईटी) के कार्यालय में सरेंडर कर दिया। हाई कोर्ट के इस फैसले ने नरेंद्र मोदी सरकार को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। राज्य के अनेक सामाजिक संगठन शुरू से ही यह कहते रहे हैं कि वर्ष 2002 के दंगों के लिए राज्य का नेतृत्व वर्ग और पुलिस-प्रशासन का एक तबका भी जवाबदेह रहा है, लेकिन मोदी ने इसे मानने से हमेशा इनकार किया। कोडनानी के मामले में अब वह क्या कहेंगे? कोडनानी ने एक जन प्रतिनिधि होकर भी संवैधानिक ही नहीं मानवीय मूल्यों की भी धज्जियां उड़ाईं। उन पर नरोदा पाटिया में दंगाइयों की भीड़ को उकसाने और हथियार बांटने का आरोप है। इतना ही नहीं, जब उनके खिलाफ जांच शुरू हुई तो उन्होंने कानून की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की। इसके बावजूद नरेंद्र मोदी ने उन्हें मंत्रिमंडल में रखा और परोक्ष रूप से उनका बचाव भी किया। वह तो यह भी मानने से इनकार करते रहे हैं कि तत्कालीन पुलिस अधिकारियों ने दंगों को रोकने में कोई ढिलाई बरती। लेकिन उनके दावे की कलई पिछले महीने तब खुल गई जब एसआईटी ने एक डीएसपी को ड्यूटी में लापरवाही बरतने और सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने के आरोप में गिरफ्तार किया। एसआईटी ने कुछ और अफसरों की संदिग्ध भूमिका की ओर भी इशारा किया है, जिनमें एक सेवानिवृत्त अडिशनल डीजीपी भी हैं। आश्चर्य तो यह है कि गुजरात दंगे को लेकर राज्य सरकार की ओर उंगली उठने के बाद भी बीजेपी शर्मसार नहीं हुई, बल्कि पार्टी में नरेंद्र मोदी का कद और बढ़ गया। उन्हें प्रधानमंत्री बनाए जाने तक की मांग उठी। उन्हें विकास पुरुष के रूप में प्रॉजेक्ट करके पार्टी ने उनके दामन पर लगे दाग को धोने की कोशिश की। लेकिन समाज में नफरत फैलाकर, संवैधानिक मूल्यों को ताक पर रखकर विकास का कोई भी कदम व्यर्थ है। कई देशों में तानाशाही की व्यवस्था में जबर्दस्त आर्थिक तरक्की हुई है, लेकिन जनता ने कभी उस व्यवस्था को पसंद नहीं किया। यह दुर्भाग्य है कि बीजेपी जनतंत्र और विकास की बात करते हुए भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती। एक तरफ तो वह देश में सच्चा सेक्युलरिज्म लाने की बात करती है, लेकिन दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय के खिलाफ वरुण गांधी के उत्तेजक भाषण का समर्थन करती है और उनके बचाव में चुनाव आयोग तक पर निशाना साधती है। कोडनानी पर गुजरात हाई कोर्ट के फैसले से बीजेपी को सबक लेना चाहिए कि नफरत की राजनीति इस देश में कभी कामयाब नहीं हो सकती।
कब तक रहेंगे पीछे?

आईटी में भारत के विश्व महाशक्ति बन जाने की बात पिछले कई सालों से कमोबेश उसी तरह कही जा रही है, जैसे कुछ समय पहले तक भारत एक कृषि प्रधान देश है जैसे जुमले बोले जाते थे। लेकिन हमारे नेताओं को अगर चुनावी गहमागहमी के बीच कुछ वक्त मिले तो उन्हें वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की सालाना इन्फर्मेशन ऐंड कम्यूनिकेशन टेक्नॉलजी की रिपोर्ट देख लेनी चाहिए। नेटवर्क रेडिनेस इंडेक्स (एनआरआई) के पैमाने पर दुनिया के 134 देशों में भारत की जगह पिछले 3 सालों में 44वीं से खिसक कर 50वीं और अब 54वीं हो गई है। इस एनआरआई की गणना सूचना और संचार के उपकरणों की बिक्री, इससे जुड़े कानूनी तथा आधारभूत ढांचे; इस संबंध में व्यक्तियों, व्यापारिक घरानों और सरकार की तैयारी तथा सूचना तथा संचार प्रौद्योगिकी की नवीनतम तकनीकों के जमीनी इस्तेमाल के आधार पर की जाती है। इनके आधार पर भारत का एनआरआई अब से छह साल पहले 4.03 का निकाला गया था और तब से लेकर आज तक यह वहीं का वहीं पड़ा है। इस ठहराव का नतीजा यह है कि आईटी के क्षेत्र में हमसे काफी बाद में आए देश तेजी से हमसे आगे निकलते जा रहे हैं। एक सी आबादी और आजादी के एक से समय को ध्यान में रखते हुए भारत की तुलना अक्सर चीन से की जाती है। आईटी के मामले में हम अभी तक ताल ठोक कर चीन को खुद से काफी पीछे साबित करते आए हैं। पिछले साल एनआरआई की नाप पर दुनिया में चीन का मुकाम 57वां और भारत का 50वां था, यानी भारत चीन से सात स्थान आगे था। लेकिन सिर्फ एक साल में पासा ऐसा पलटा कि चीन 46वें स्थान पर आ गया जबकि हम 54वें पर, यानी उससे आठ स्थान पीछे चले गए। ऐसा क्यों हुआ, इसका अध्ययन पूरी गंभीरता से और तत्काल किया जाना चाहिए, वरना औद्योगिक टेक्नॉलजी में अपने पिछड़ेपन की भरपाई सूचना टेक्नॉलजी से कर लेने का हमारा सपना इस बार की चूक के बाद सपना ही रह जाएगा। कुछ बातें साफ हैं और बिना किसी विशेष अध्ययन के ही रेखांकित की जा सकती हैं। सूचना और संचार हमारे यहां खुद में भले ही एक कामयाब धंधा समझा जा रहा हो, लेकिन आम लोगों की रोजी-रोटी से इसका जैसा जुड़ाव बनना चाहिए, वह बन नहीं पा रहा है। आखिर क्यों ब्रॉडबैंड इंटरनेट भारत में एक उच्च-मध्यवर्गीय सुविधा बन कर रह गया है? मोबाइल फोन का इस्तेमाल जिस तरह हम सब्जी और कबाड़ तक के खुदरा कारोबार में होते देख रहे हैं, वैसी कोई भूमिका कंप्यूटर और इंटरनेट के लिए भी क्यों नहीं खोजी जा पा रही है? जिन देशों में यह काम हो रहा है वहां ब्रॉडबैंड विशेषाधिकार के दायरों से निकल कर नियमित घरेलू इस्तेमाल की चीज बनता जा रहा है। जाहिर है, यह दृष्टि की, विजन की समस्या है, जिसे हल करने की जिम्मेदारी देश के राजनीतिक और व्यापारिक नेतृत्व की है। इसे अजंडा पर लाए बगैर आईटी में अपनी काबलियत के गुण गाने का कोई अर्थ नहीं है।
Saturday, 28 March 2009
कल थीं कांग्रेस की एमएलए, आज मजदूरी को मजबूर

आंध्र प्रदेश की दलित महिला सुक्का पगदालु की कहानी चुनावी माहौल में खास दिलचस्पी के साथ सुनी - पढ़ी जा रही है। 1972 में वह आंध्र विधानसभा की सदस्य चुनी गईं और बतौर एमएलए अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। बाद में बतौर सरपंच एक बार फिर उन्हें जन प्रतिनिधि के रूप में काम करने का मौका मिला। उनके पास थोड़ी सी जमीन है , जिससे कुछ अनाज वह पैदा कर लेती हैं , लेकिन साल भर का खर्च पूरा करने और गाढ़े वक्त के लिए दो पैसे जुटा कर रखने के लिए उन्हें और उनके पति को मजदूरी करनी पड़ती है। इस कथा को सुन कर कुछ लोगों में करुणा का संचार हो सकता है , तो कुछ उस पार्टी के प्रति सात्विक क्रोध से भर सकते हैं , जिसने अपने टिकट पर चुनी गई जन प्रतिनिधि को मजदूरी करने के लिए छोड़ दिया है। इस करुणा और क्रोध के मूल में यह धारणा है कि जन प्रतिनिधि बनते ही किसी भारतीय जन का जीवन इतना बदल जाता है कि उसके दोबारा मजदूरी या किसानी के कष्टों में वापस लौट जाने की बात भी नहीं सोची जा सकती। राजनीति और राजनेताओं की जो तस्वीर हमारे मन में बसी हुई है , उससे यह धारणा बनना स्वाभाविक है , हालांकि आम भारतीय जनजीवन को लेकर इसमें मौजूद हिकारत पर अलग से गौर किया जाना चाहिए। पेशे से मूंगफली किसान जिमी कार्टर अमेरिका के राष्ट्रपति बने और दूसरे कार्यकाल के लिए रोनाल्ड रीगन से चुनाव हारने के बाद खेती - किसानी में वापस लौट गए। इसमें किसी को कोई अजीब बात नहीं लगी तो क्या इसलिए कि कार्टर के खेतों का आकार औसत हिंदुस्तानी किसान के कुल रकबे का करीब हजार गुना था ? कोई प्रोफेसर राजनीति से हटने के बाद अपनी प्रोफेसरी जारी रख सकता है तो कोई मजदूर विधानसभा या संसद से विदा होने के बाद अपने मजदूरी के संसार में वापस क्यों नहीं लौट सकता ? इस पर करुण या क्रुद्ध होने की जरूरत हमें शायद इसलिए भी महसूस होती हो , क्योंकि अपने देश में किसानी या मजदूरी की कोई गरिमा नहीं रह गई है। बहरहाल , इससे एक ज्यादा बड़ी बीमारी का भी संकेत मिलता है। बेईमान राजनेताओं से नफरत करते हुए हम इस नतीजे पर पहुंच गए हैं कि किसी ईमानदार व्यक्ति का राजनीति से कोई रिश्ता हो ही नहीं सकता। इसका दूसरा पहलू यह है कि कोई ईमानदार व्यक्ति यदि राजनीति में आ भी आ जाए तो उससे इतनी ज्यादा तड़क - भड़क की अपेक्षा की जाती है कि जल्दी से जल्दी ईमानदारी से पीछा छुड़ा लेने के अलावा उसके पास और कोई चारा ही नहीं बचता। इसलिए इस चुनावी परिवेश में सिर पर मिट्टी की टोकरी उठाए सुक्का पगदालु की तस्वीर देख कर कृपया दुखी न हों। कोशिश करें कि उनके जैसे लोग आगे भी एमपी - एमएलए बनें ताकि राजनीति में थोड़ी शर्म बाकी रहे।
Monday, 23 March 2009
लो आ गई नैनो !

सपना जब साकार होता है तो उद्गार खुद ब खुद निकलते है। रतन टाटा के साथ भी सोमवार को ऐसा ही हुआ, जब अमूमन गंभीरता की चादर ओढ़े रहने वाले देश के इस प्रमुख उद्योगपति ने गुड आफ्टरनून कहते हुए तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी की चुटकी ली।
नैनो की लांचिंग से पहले सोमवार को आयोजित प्रेस कांफ्रेंस की शुरुआत में ही जब एक पत्रकार ने टाटा से यह सवाल दागा कि वह ममता को क्या संदेश देना चाहेंगे, तो इस धीर-गंभीर उद्योगपति ने जो उत्तर दिया, उससे पूरे सभागार में हंसी गूंज उठी। चिढ़ाने वाले अंदाज में टाटा ने कहा कि मैं उन्हें सिर्फ गुड आफ्टरनून कहना चाहूंगा। पश्चिम बंगाल के सिंगुर में भूमि अधिग्रहण के विरोध में ममता द्वारा चलाए गए आंदोलन के चलते टाटा को अपनी परियोजना हटाकर गुजरात के साणंद में लगानी पड़ी है।
नैनो परियोजना को टाटा का ड्रीम प्रोजेक्ट माना जाता है। सोमवार को इसके सफल होने की खुशी टाटा के चेहरे पर झलक रही थी। उन्होंने कहा कि नैनो परंपराओं को तोड़ने की भावना का परिचय देती है। ड्राइंग बोर्ड पर इसका डिजाइन बनने से लेकर इसके व्यावसायिक लांच तक इसने
काफी उतार-चढ़ाव एवं चुनौतियां देखी हैं। नैनो को बनाने वाली टीम को बधाई देते हुए टाटा ने कहा कि जो कार कभी असंभव मानी जाती थी, इस टीम की बदौलत अब वास्तविकता बन चुकी है।
टाटा ने खुलासा किया कि इस कार को यूरोप एवं अमेरिकी बाजारों में भी पेश किए जाने की योजना है, लेकिन फिलहाल इसको चीन ले जाने का कंपनी का कोई इरादा नहीं है। कुछ दिन पहले जेनेवा में आयोजित आटो शो में टाटा मोटर्स ने नैनो का यूरोप में उतारा जाने वाला वैरियंट नैनो यूरोपा पेश किया है।
नैनो का सफर
-मार्च 2003 : रतन टाटा ने जेनेवा मोटर शो में एक लाख रुपये की सस्ती कार पेश करने का ऐलान किया।
-मई 2006 : टाटा मोटर्स ने सिंगुर [पश्चिम बंगाल] में 1500 करोड़ रुपये के निवेश से नैनो प्लांट लगाने की घोषणा की।
-अक्टूबर 2006 : तृणमूल कांग्रेस ने सिंगुर में कारखाना लगाने के विरोध में राज्य स्तरीय बंद का आह्वान किया।
-दिसंबर 2006 : सिंगुर में हिंसा, तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी ने भूख हड़ताल शुरू की। यह 25 दिन चली।
-जनवरी 2007 : सिंगुर में कार परियोजना के लिए भूमि पूजन।
-फरवरी 2007 : सिंगुर में पुलिस व आंदोलकारियों में झड़प हुई।
-जनवरी 2008 : रतन टाटा ने दिल्ली आटो एक्सपो में नैनो को पेश किया।
-मार्च 2008 : लखटकिया कार जेनेवा मोटर शो में भी पेश की गई।
-अगस्त 2008 : पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य व ममता बनर्जी में बातचीत।
-सितंबर 2008 : राज्यपाल के हस्तक्षेप से सरकार व तृणमूल कांग्रेस में समझौता, जो ज्यादा देर नहीं चला।
-अक्टूबर 2008 : रतन टाटा ने नैनो परियोजना को सिंगुर से साणंद [गुजरात] ले जाने का ऐलान किया।
-फरवरी 2009 : टाटा मोटर्स ने 23 मार्च को पेश नैनो को पेश करने की घोषणा की।
-मार्च 2009 : नैनो का यूरोपीय वर्जन जेनेवा मोटर शो में पेश। तीन साल में यूरोप में उतारी जाएगी।
Sunday, 22 March 2009
कोई भी रोक नहीं पाया फांसी..
इतिहासकारों के बीच आज भी इस बात को लेकर विवाद है कि क्या भगत सिंह को बचाया जा सकता था? क्या उन्हें गांधी ने मार डाला? क्या वाकई बापू और अन्य बड़े नेता भगत सिंह के इंकलाबी तेवर और लोकप्रियता से डर गए थे? दरअसल शहीदे आजम की मौत अपने पीछे एक ऐसा सवाल छोड़ गई है जिसे सुलझाया नहीं जा सका है। और शायद जिसे कभी सुलझाया जा भी नहीं सकेगा।
लाहौर षड्यंत्र केस में 23 मार्च 1931 को जब 23 वर्षीय भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को सूली पर लटकाया गया तो इसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनी गई। ब्रिटिश हुकूमत के इस कुकृत्य की जहां तत्कालीन भारतीय नेताओं ने जमकर आलोचना की, वहीं देश-विदेश के तमाम अखबारों ने भी इसे सुर्खियां बनाया। फांसी 24 मार्च को दी जानी थी। लेकिन जनविद्रोह के डर से ब्रिटिश हुक्मरानों ने तिथि चुपके से बदलकर 23 मार्च कर दी।
बिपिन चंद्र द्वारा लिखी गई भगत सिंह की जीवनी 'मैं नास्तिक क्यों हूं' में इस घटना पर तत्कालीन नेताओं और अखबारों द्वारा व्यक्त की गई तीखी टिप्पणियां सिलसिलेवार ढंग से दर्ज हैं।
-'..यह काफी दुखद और आश्चर्यजनक घटना है कि भगत सिंह और उसके साथियों को समय से एक दिन पूर्व ही फांसी दे दी गई। 24 मार्च को कलकत्ता से कराची जाते हुए रास्ते में हमें यह दुखद समाचार मिला। भगत सिंह युवाओं में नई जागरूकता का प्रतीक बन गया है।' [सुभाष चंद्र बोस]
-'मैंने भगत सिंह को कई बार लाहौर में एक विद्यार्थी के रूप में देखा। मैं उसकी विशेषताओं को शब्दों में बयां नहीं कर सकता। उसकी देशभक्ति और भारत के लिए उसका अगाध प्रेम अतुलनीय है। लेकिन इस युवक ने अपने असाधारण साहस का दुरुपयोग किया। मैं भगत और उसके साथी देशभक्तों को पूरा सम्मान देता हूं। साथ ही देश के युवाओं को आगाह करता हूं कि वे उसके मार्ग पर न चलें।' [महात्मा गांधी]
-'हम सबके लाड़ले भगत सिंह को नहीं बचा सके। उसका साहस और बलिदान भारत के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।' [जवाहर लाल नेहरू]
-'अंग्रेजी कानून के अनुसार भगत सिंह को सांडर्स हत्याकांड में दोषी नहीं ठहराया जा सकता था। फिर भी उसे फांसी दे दी गई।' [वल्लभ भाई पटेल]
-'भगत सिंह ऐसे किसी अपराध का आरोपी नहीं था जिसके लिए उसे फांसी दे दी जाती। हम इस घटना की कड़ी निंदा करते हैं।' [प्रसिद्ध वकील और केंद्रीय विधानसभा सदस्य डीबी रंगाचेरियार]
-'भगत सिंह एक किंवदंती बन गया है। देश के सबसे अच्छे फूल के चले जाने से हर कोई दुखी है। हालांकि भगत सिंह नहीं रहा लेकिन 'क्रांति अमर रहे' और 'भगत सिंह अमर रहे' जैसे नारे अब भी हर कहीं सुनाई देते हैं।' [अंग्रेजी अखबार द पीपुल]
-'पूरे देश के दिल में हमेशा भगत सिंह की मौत का दर्द रहेगा।' [उर्दू अखबार रियासत]
-'राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह की मौत से पूरे देश पर दुख का काला साया छा गया है।' [आनंद बाजार पत्रिका]
-'जिस व्यक्ति ने वायसराय को इन नौजवानों को फांसी पर लटकाने की सलाह दी, वह देश का गद्दार और शैतान था।' [पंजाब केसरी]
लाहौर षड्यंत्र केस में 23 मार्च 1931 को जब 23 वर्षीय भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को सूली पर लटकाया गया तो इसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनी गई। ब्रिटिश हुकूमत के इस कुकृत्य की जहां तत्कालीन भारतीय नेताओं ने जमकर आलोचना की, वहीं देश-विदेश के तमाम अखबारों ने भी इसे सुर्खियां बनाया। फांसी 24 मार्च को दी जानी थी। लेकिन जनविद्रोह के डर से ब्रिटिश हुक्मरानों ने तिथि चुपके से बदलकर 23 मार्च कर दी।
बिपिन चंद्र द्वारा लिखी गई भगत सिंह की जीवनी 'मैं नास्तिक क्यों हूं' में इस घटना पर तत्कालीन नेताओं और अखबारों द्वारा व्यक्त की गई तीखी टिप्पणियां सिलसिलेवार ढंग से दर्ज हैं।
-'..यह काफी दुखद और आश्चर्यजनक घटना है कि भगत सिंह और उसके साथियों को समय से एक दिन पूर्व ही फांसी दे दी गई। 24 मार्च को कलकत्ता से कराची जाते हुए रास्ते में हमें यह दुखद समाचार मिला। भगत सिंह युवाओं में नई जागरूकता का प्रतीक बन गया है।' [सुभाष चंद्र बोस]
-'मैंने भगत सिंह को कई बार लाहौर में एक विद्यार्थी के रूप में देखा। मैं उसकी विशेषताओं को शब्दों में बयां नहीं कर सकता। उसकी देशभक्ति और भारत के लिए उसका अगाध प्रेम अतुलनीय है। लेकिन इस युवक ने अपने असाधारण साहस का दुरुपयोग किया। मैं भगत और उसके साथी देशभक्तों को पूरा सम्मान देता हूं। साथ ही देश के युवाओं को आगाह करता हूं कि वे उसके मार्ग पर न चलें।' [महात्मा गांधी]
-'हम सबके लाड़ले भगत सिंह को नहीं बचा सके। उसका साहस और बलिदान भारत के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।' [जवाहर लाल नेहरू]
-'अंग्रेजी कानून के अनुसार भगत सिंह को सांडर्स हत्याकांड में दोषी नहीं ठहराया जा सकता था। फिर भी उसे फांसी दे दी गई।' [वल्लभ भाई पटेल]
-'भगत सिंह ऐसे किसी अपराध का आरोपी नहीं था जिसके लिए उसे फांसी दे दी जाती। हम इस घटना की कड़ी निंदा करते हैं।' [प्रसिद्ध वकील और केंद्रीय विधानसभा सदस्य डीबी रंगाचेरियार]
-'भगत सिंह एक किंवदंती बन गया है। देश के सबसे अच्छे फूल के चले जाने से हर कोई दुखी है। हालांकि भगत सिंह नहीं रहा लेकिन 'क्रांति अमर रहे' और 'भगत सिंह अमर रहे' जैसे नारे अब भी हर कहीं सुनाई देते हैं।' [अंग्रेजी अखबार द पीपुल]
-'पूरे देश के दिल में हमेशा भगत सिंह की मौत का दर्द रहेगा।' [उर्दू अखबार रियासत]
-'राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह की मौत से पूरे देश पर दुख का काला साया छा गया है।' [आनंद बाजार पत्रिका]
-'जिस व्यक्ति ने वायसराय को इन नौजवानों को फांसी पर लटकाने की सलाह दी, वह देश का गद्दार और शैतान था।' [पंजाब केसरी]
Sunday, 15 March 2009
गाँव बसा नहीं, लुटेरे पहले आ गए !

हमारा देश वाकई खुश किस्मत है ! क्योंकि हमारे यहाँ प्रधानमंत्री चुनने के लिए किसी चुनाव की ज़रूरत नहीं है ! हमारे यहाँ तो डिनर पार्टियों में ही पीएम तय कर लिए जाते है ! रही बात जनता की तो जनता का क्या है ! भाई पीएम बनने के लिए जनता की मर्ज़ी पूछने का तो हमारे संविधान में कही ज़िक्र ही नहीं है ! जनता जाए **** में ! तो भला जनता को क्यों बीच में लाकर उसका कीमती वक्त जाया किया जाए ? बेचारी जनता दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में ही इतना व्यस्त रहती है की उसे वोट डालने की भी फुरसत नहीं है ! malavi men एक kahavat है ....गाँव बसा नही, लुटेरे पहले आ गए ! चुनाव aayog ने अभी chunavon की ghoshana की ही थी की एक साथ प्रधानमंत्री के कई davedar maidan में ताल thok कर खड़े है ! ये vo लोग है जिनका janadhar ना के barabar है ! जो देश की दस pratishat जनता का pratinidhtv भी नहीं करते...! फ़िर भी पीएम बनने के sapane देखा रहे हैं ! देखे भी क्यों न क्योंकि ये जानते है की इस देश में पीएम बाई chans ही बनते है ! gathabandhan की इस blekmail वाली rajaniti में कुछ भी हो sakata है! जब vp singh, dev gauda, और gujaral बिना janadhar के पीएम बन skate है तो ये क्यों नही? चलिए jyada बात न करते हुए ख़बर आपके सामने .... आप ही बताये iname से किसे banana chaahiye पीएम?
बीएसपी सुप्रीमो मायावती फिलहाल तीसरे मोर्चे के किसी दल के साथ सीटों के तालमेल के लिए राजी नहीं हैं। उनका कहना है कि बीएसपी अपने बलबूते पर चुनाव लड़ेगी। हां , प्रधानमंत्री के सवाल पर वे इतना जरूर मान गईं कि इसका फैसला चुनाव के बाद होगा। उन्होंने कहा कि चुनावों से पहले नाम तय करने की कोई जरूरत नहीं है। गौरतलब है कि तीसरे मोर्चे की तुमकुर रैली के दौरान मायावती के प्रतिनिधि सतीश मिश्रा ने कहा था कि अगर मायावती को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित नहीं किया गया तो बीएसपी तीसरे मोर्चे में शामिल नहीं होगी। इस पर लेफ्ट दलों के विरोध के बाद मायावती ने अपना स्टैंड बदल लिया। रविवार को मायावती ने यहां प्रेस कॉन्फ्रंस की तो बीएसपी महासचिव सतीश मिश्रा भी उनके साथ थे। मायावती ने कहा कि बीएसपी इस बार किसी भी कीमत पर कांग्रेस और बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधनों की सरकार बनने से रोकेगी। लेकिन सहयोगी के रूप में मायावती ने लेफ्ट के अलावा किसी और दल का नाम लेने से परहेज किया। उन्होंने कहा, 'इस काम में हमारे साथ वामपंथी दल और कुछ अन्य दल भी जी-जान से लगे हैं।' मायावती ने यह खुलासा नहीं किया कि बीएसपी कितने सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। मगर यह कहा कि कांग्रेस और बीजेपी को परखने के बाद देश की जनता को इस बार बीएसपी को केंद्र में सरकार बनाने का मौका देना चाहिए। मायावती ने जहां राष्ट्रीय दलों कांग्रेस और बीजेपी पर जमकर हमले किए, वहीं, यूपी की अपनी पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी का जिक्र भी नहीं किया। मायावती ने शायद पहली बार एक साथ इतने राष्ट्रीय मुद्दों को छुआ होगा। उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक नीतियों, महंगाई, बेरोजगारी, सीमाओं की सुरक्षा और आतंकवाद का जिक्र किया। मायावती ने कहा कि तीसरे मोर्चे की बढ़ रही ताकत से कांग्रेस और बीजेपी बौखला गई हैं। पिछले दो-तीन दिन से इन दोनों पार्टियों के नेता मोर्चे और उसके नेताओं के बारे में फिजूल बयानबाजी कर रहे हैं। इससे जाहिर होता है कि इन्हें अपना भविष्य अंधकारमय लग रहा है। मायावती के गुरुद्वारा रकाबगंज रोड स्थित नए सरकारी आवास में रविवार को डिनर का आयोजन किया गया। इसमें तीसरे मोर्चे के नेताओं ने यूपीए और एनडीए के घटक दलों को अपने खेमे में खींचने के तरीकों पर विचार किया। इस डिनर से पहले सीपीएम के मुख्यालय ए. के. गोपालन भवन में लेफ्ट दलों ने बीएसपी को छोड़कर बाकी सहयोगी दलों के साथ बैठक की और तीसरे मोर्चे की राजनीतिक ताकत की समीक्षा की। बैठक के बाद सभी लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष ताकतों से गैर-कांग्रेसी और गैर-बीजेपी सरकार बनाने के लिए एकजुट होने को कहा गया। बैठक में बीजेडी ने भी भाग लिया। डिनर से पहले सीपीएम के पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी ने जनता दल युनाइटेड के अध्यक्ष शरद यादव से मुलाकात की। फिलहाल दोनों ने मुलाकात के बारे में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया, मगर समझा जा रहा है कि येचुरी ने यादव को तीसरे मोर्चे के अस्तित्व में आने और उसकी संभावनाओं के बारे में बताया है।
Saturday, 14 March 2009
तेरा क्या होगा पाकिस्तान?

जनरल परवेज मुशर्रफ की हुकूमत के खिलाफ वकीलों ने 2007 में जैसा माहौल बनाया था, आज दो साल बाद पाकिस्तान के सड़कों-बाजारों में दृश्य दोबारा वैसा ही है। जजों की बहाली के लिए वैसा ही लांग मार्च, वैसी ही नजरबंदियां और गिरफ्तारियां, उसी तरह अमेरिका का रुख बदलने का इंतजार। फर्क सिर्फ इतना है कि राष्ट्रपति की कुर्सी पर आज मुशर्रफ की जगह आसिफ अली जरदारी बैठे हैं और पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था चू-चूं के मुरब्बे जैसी लगने के बजाय कमोबेश लोकतंत्र जैसी नजर आने लगी है। बवाल शुरू हुआ है नवाज शरीफ और उनके भाई शहबाज शरीफ को अदालती फैसले के तहत चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित किए जाने और केंद्र के आदेश पर पंजाब में उनकी पार्टी की सरकार बर्खास्त किए जाने से। इस फैसले पर शरीफ बंधुओं का एतराज बिल्कुल वाजिब है। इसमें कोई शक नहीं कि परवेज मुशर्रफ को सत्ता से हटाने में केंद्रीय भूमिका नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन की ही थी। मुशर्रफ की सरकार ने जिन आरोपों के तहत नवाज शरीफ को देश निकाला दिया था, उन्हीं पर फैसला सुनाते हुए पाकिस्तान के सवोर्च्च न्यायालय ने उन्हें पाकिस्तान में चुनाव लड़ने के अयोग्य करार दिया है। सवाल यह है कि ये आरोप अगर इतने ही सच्चे हैं तो नवाज शरीफ से काफी पहले यह सजा जरदारी को सुनाई जानी चाहिए थी, जिनके घपलों के बारे में पाकिस्तान में काफी पहले से आम राय बनी हुई है। लेकिन मुशर्रफ के साथ गुपचुप समझौता करके पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता तो मलाई काट रहे हैं जबकि मुशर्रफ द्वारा ही नियुक्त जजों के फैसले से नवाज और शहबाज शरीफ का राजनीतिक करिअर खत्म किया जा रहा है। जिन चीफ जस्टिस इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी को परवेज मुशर्रफ ने बर्खास्त किया था, वे बेचारे आज भी वनवास झेल रहे हैं, जबकि उनकी बहाली के लिए चले आंदोलन में खुद पीपीपी के नेता अगली पांत में रहा करते थे। ले-देकर मामला कुछ सत्ता गुटों के बीच लड़ाई का है। कयानी और मुशर्रफ के चेहरों वाला एक गुट फौज का, गिलानी और जरदारी के दो अलग-अलग चेहरों वाला एक गुट पीपीपी का, एक गुट नवाज और शहबाज की अगुआई वाली पीएमएल-एन का और दोनों बड़ी पार्टियों के बीच अपने लिए रास्ता तलाशता एक गुट पीएमएल-क्यू का। सत्ता के इतने दावेदार, और सत्ता की औकात इतनी कि कट्टरपंथी आतंकवादी कभी उसे अपने सामने घुटने टेक कर शरियत लागू करने पर मजबूर करते हैं तो कभी दिन-दहाड़े एक विदेशी क्रिकेट टीम को निशाना बना कर साफ निकल जाते हैं।
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