Friday, 14 May 2010

मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ फतवा जारी


मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ देश की सबसे बड़ी मुस्लिम संस्था दारुल उलूम, देवबंद
ने फतवा जारी कर दिया है। इसके मुताबिक मुस्लिम महिलाओं का पुरुषों के साथ काम करना इस्लाम धर्म के खिलाफ है। एक टीवी चैनल की वेबसाइट के मुताबिक, इस फतवे में कहा गया है कि मुस्लिम महिलाओं का ऐसी कोई भी सरकारी या प्राइवेट नौकरी करना गैरइस्लामी है, जिसमें महिला और पुरुष एकसाथ काम करते हों और महिलाओं को पुरुषों से बिना पर्दे के बात करनी पड़ती हो। देवबंद के धार्मिक नेताओं का कहना है कि शरियत में साफ साफ कहा गया है कि मुस्लिम महिलाएं ऑफिस में बुरका पहनकर जाएं और पुरुष कॉलीग्स के साथ बातचीत न करें। इस फतवे का दूसरे मुस्लिम संप्रदायों ने भी समर्थन किया है। सुन्नी मुस्लिम नेता मौलाना अबुल इरफान ने कहा कि जो औरतें करियर बना रही हैं, उन्हें जीते जी तो बहुत कामयाबी मिल सकती है, लेकिन मौत के बाद उन्हें ऊपर वाले को जवाब देना होगा। तब उन्हें अपने करियर के फैसले पर अफसोस होगा।

Thursday, 13 May 2010

गरीबी हटाओ, लेकिन गरीबों को बख्श दो: दिल्ली से योगेश गुलाटी

दो भारत बसते हैं यारों मेरे हिन्दुस्तान में....इक रहता सोने की बस्ती,एक रहता कब्रिस्तान में!!हां वो बिल्कुल ऎसा ही लग रहा था....मानो वो किसी कब्रिस्तान से ही उठ कर आया हो! वो किसी ज़िन्दा भूत से कम नहीं लग रहा था! उसका जिस्म लगभग नंगा था...! मांस पर उभरी हड्डीयों का कंकाल उसकी बेबसी और गरीबी की कहानी बयां कर रहा था! उसका वो चेहरा अब भी मेरी आंखों के सामने घूम रहा है! गरीबी का वो ज़िंदा भूत मुझे सोने नहीं दे रहा! नहीं मैं भूत से बिल्कुल नहीं डरता, क्या भूत इंसान नहीं होते? होते हैं वो भी इंसान होते हैं.....अज नहीं कभी तो होते थे? लेकिन मुझे तो डर उनसे लगता है जो इंसान होकर भी इंसान नहीं! जो महलों में रहते हैं लेकिन झोंपडी में रहने वालों का दर्द नहीं समझते! जो एसी में रहते हैं लेकिन तपती दुपहरी में उनके आलीशान बंगलों की नींवें भरने वालों की पीड वो नहीं समझते! वो अंग्रेज़ी में बतियाते हैं लेकिन हिंदुस्तानी आत्मा की तकलीफ को नहीं समझते! जिन गरीबों की मेहनत से वो अपना साम्राज्य खडा करते हैं, उन गरीबों को दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम भी नहीं करते!चारों तरफ से चमक रहा दिल्ली का कनाट प्लेस! इस इलाके की तस्वीर बदलने का काम अब भी पूरे ज़ोर शोर से होरहा है! पुराने हो चले कनाट प्लेस को बिल्कुल आधुनिक बना दिया गया है! सफेद रंग में रंगी इसकी इमारतें संगेमरमर को भी शर्मिंदा कर रही हैं! हर-तरफ चका-चौंध, सुंदरता, और अइश्वर्य बिखरा है! इसे देख कर एक विकसित भारत की तस्वीर बनने लगती है! चारों और विदेशी सैलानीयों का जमावडा और चमचमाती गाडियों का शोर....इन सब की बीच कनाट प्लेस सर्कल पर बने मेट्रो स्टेशन की सीढीयों से नीचे उतरते हुए मेरे पैर अचानक थम गये! हां गरीबी का वो ज़िंदा भूत वहीं बैठा था! मैंने देखा लोग उसे हिकारत भरी नज़रों से देखते हुए दूर से निकल रहे हैं.....शायद सराकार की ही तरह उन्हें भी दिल्ली की शान में गरीबी का वो धब्बा सुहा नहीं रहा था! कुछ दिन पहले कनाट प्लेस से गरीबों और भिखारियों को हटाने की मुहीम सरकार ने चलाई थी! जिसमें सारे गरीबों को उस इलाके से हटा दिया गया था! लेकिन आश्चर्य गरीबी का वो ज़िंदा भूत वैभव की प्रतीक मेट्रो की सीढीयों पर बैठा...सरकार की उस मुहीम को मुंह छिढा रहा था! उसकी हालत वाकई में दयनीय थी! तपती दुपहरी मेँ उसके तन पर एक कपडा ना था! गरीबों की जान बडी सख्त होती है.....वो इतनी आसानी से नहीं निकलती! शायद इसीलिये वो ज़िंदा था! लेकिन उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं था! हां मैं भी नहीं! मुझे लगा वो भूखा है! मैं जानता हूं दस रुपये में दिल्ली में खाना नहीं मिलता, फिर भी मैंने दस का एक नोट उसके हाथ में थमा दिया! लेकिन मैं जानता था ये काफी नहीं है....! उसे कपडों की ज़रूरत थी! उसे दवाओं और इलाज की ज़रूरत थी! इन सबके बाद उसे काम की ज़रूरत थी! मैं ये सोछ ही रहा था कि पीछे से एक रौबदार आवाज़ आई...."तू फिर यहां आकर बैठ गया?" तुझे भी ठिकाने लगाना पडेगा! मैंने पीछे मुड कर देखा, वो दिल्ली पुलिस का सिपाही था! उसे भी सरकार की ही तरह वो गरीबी का ज़िंदा भूत शायद अच्छा नहीं लग रहा था! सिपाही की बात सुनकर वो डर गया! उसकी उम्र 25-30 की रही होगी! लेकिन वो इतना कमज़ोर था कि उठ नहीं पा रहा था! लेकिन जब वो उठ कर खडा हुआ तो....लोग उससे कट कर गुज़रने लगे...मानो इन्सान नहीं वाकई में कोई भूत हो! हां गरीबी का वो ज़िंदा भूत खडा हो गया था! लेकिन उसने किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया! वो अपने लिये वो जगह तलाशने लगा, जहां अमीर ना हों! लेकिन मैं जानता था कि कम से कम कनाट प्लेस में तो ऎसी कोई जगह नहीं थी!

गरीबी हटाओ, लेकिन गरीबों को बख्श दो: दिल्ली से योगेश गुलाटी



दो भारत बसते हैं यारों मेरे हिन्दुस्तान में....
इक रहता सोने की बस्ती,एक रहता कब्रिस्तान में!!
हां वो बिल्कुल ऎसा ही लग रहा था....मानो वो किसी कब्रिस्तान से ही उठ कर आया हो! वो किसी ज़िन्दा भूत से कम नहीं लग रहा था! उसका जिस्म लगभग नंगा था...! मांस पर उभरी हड्डीयों का कंकाल उसकी बेबसी और गरीबी की कहानी बयां कर रहा था! उसका वो चेहरा अब भी मेरी आंखों के सामने घूम रहा है! गरीबी का वो ज़िंदा भूत मुझे सोने नहीं दे रहा! नहीं मैं भूत से बिल्कुल नहीं डरता, क्या भूत इंसान नहीं होते? होते हैं वो भी इंसान होते हैं.....अज नहीं कभी तो होते थे? लेकिन मुझे तो डर उनसे लगता है जो इंसान होकर भी इंसान नहीं! जो महलों में रहते हैं लेकिन झोंपडी में रहने वालों का दर्द नहीं समझते! जो एसी में रहते हैं लेकिन तपती दुपहरी में उनके आलीशान बंगलों की नींवें भरने वालों की पीड वो नहीं समझते! वो अंग्रेज़ी में बतियाते हैं लेकिन हिंदुस्तानी आत्मा की तकलीफ को नहीं समझते! जिन गरीबों की मेहनत से वो अपना साम्राज्य खडा करते हैं, उन गरीबों को दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम भी नहीं करते!
चारों तरफ से चमक रहा दिल्ली का कनाट प्लेस! इस इलाके की तस्वीर बदलने का काम अब भी पूरे ज़ोर शोर से होरहा है! पुराने हो चले कनाट प्लेस को बिल्कुल आधुनिक बना दिया गया है! सफेद रंग में रंगी इसकी इमारतें संगेमरमर को भी शर्मिंदा कर रही हैं! हर-तरफ चका-चौंध, सुंदरता, और अइश्वर्य बिखरा है! इसे देख कर एक विकसित भारत की तस्वीर बनने लगती है! चारों और विदेशी सैलानीयों का जमावडा और चमचमाती गाडियों का शोर....इन सब की बीच कनाट प्लेस सर्कल पर बने मेट्रो स्टेशन की सीढीयों से नीचे उतरते हुए मेरे पैर अचानक थम गये! हां गरीबी का वो ज़िंदा भूत वहीं बैठा था! मैंने देखा लोग उसे हिकारत भरी नज़रों से देखते हुए दूर से निकल रहे हैं.....शायद सराकार की ही तरह उन्हें भी दिल्ली की शान में गरीबी का वो धब्बा सुहा नहीं रहा था! कुछ दिन पहले कनाट प्लेस से गरीबों और भिखारियों को हटाने की मुहीम सरकार ने चलाई थी! जिसमें सारे गरीबों को उस इलाके से हटा दिया गया था! लेकिन आश्चर्य गरीबी का वो ज़िंदा भूत वैभव की प्रतीक मेट्रो की सीढीयों पर बैठा...सरकार की उस मुहीम को मुंह छिढा रहा था! उसकी हालत वाकई में दयनीय थी! तपती दुपहरी मेँ उसके तन पर एक कपडा ना था! गरीबों की जान बडी सख्त होती है.....वो इतनी आसानी से नहीं निकलती! शायद इसीलिये वो ज़िंदा था! लेकिन उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं था! हां मैं भी नहीं! मुझे लगा वो भूखा है! मैं जानता हूं दस रुपये में दिल्ली में खाना नहीं मिलता, फिर भी मैंने दस का एक नोट उसके हाथ में थमा दिया! लेकिन मैं जानता था ये काफी नहीं है....! उसे कपडों की ज़रूरत थी! उसे दवाओं और इलाज की ज़रूरत थी! इन सबके बाद उसे काम की ज़रूरत थी! मैं ये सोछ ही रहा था कि पीछे से एक रौबदार आवाज़ आई...."तू फिर यहां आकर बैठ गया?" तुझे भी ठिकाने लगाना पडेगा! मैंने पीछे मुड कर देखा, वो दिल्ली पुलिस का सिपाही था! उसे भी सरकार की ही तरह वो गरीबी का ज़िंदा भूत शायद अच्छा नहीं लग रहा था! सिपाही की बात सुनकर वो डर गया! उसकी उम्र 25-30 की रही होगी! लेकिन वो इतना कमज़ोर था कि उठ नहीं पा रहा था! लेकिन जब वो उठ कर खडा हुआ तो....लोग उससे कट कर गुज़रने लगे...मानो इन्सान नहीं वाकई में कोई भूत हो! हां गरीबी का वो ज़िंदा भूत खडा हो गया था! लेकिन उसने किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया! वो अपने लिये वो जगह तलाशने लगा, जहां अमीर ना हों! लेकिन मैं जानता था कि कम से कम कनाट प्लेस में तो ऎसी कोई जगह नहीं थी!

Wednesday, 12 May 2010

खाप पंचायतों का बढ़ता खौफ

इंडियन नेशनल लोक दल के प्रधान ओम प्रकाश चौटाला और काग्रेस के युवा सासद नवीन जिंदल में क्या समानता ढूंढ़ी जा सकती है? अगर राजनीतिक प्रतिबद्धताओं को देखें या उम्र का फासला देखें तो कुछ भी एक जैसा नहीं है। अलबत्ता खाप पंचायतों को लेकर दिए अपने ताजे बयान के बाद दोनों एक ही तरफ खड़े दिखाई देते हैं।

पिछले कुछ समय से खाप पंचायतों की तरफ से एक मुहिम चल रही है, जिसके अंतर्गत हिंदू विवाह अधिनियम की धारा-5 को बदलने की माग उठी है। कहा जा रहा है कि चूंकि इसके अंतर्गत सगोत्र शादियों की इजाजत है, इसलिए इसे समाप्त किया जाए या परिवर्तित किया जाए।

देखा जा सकता है कि मनोज-बबली हत्याकांड में आए अदालती फैसले के बाद [जिसमें अपनी इच्छा से शादी किए इस युवा जोड़े को मारने के आदेश इलाके की खाप पंचायत ने जारी किए थे], जिसमें हत्या में शामिल कातिलों को सजा सुनाई गई है, इस मुहिम ने जोर पकड़ा है।

पिछले दिनों पाई नामक स्थान पर हुई ऐसी ही सर्वखाप पंचायत में अपने आधार को बढ़ाने की फिराक में खाप पंचायत की महिला विंग और युवा विंग का भी गठन किया गया था। लोगों को याद होगा कि सर्वखाप पंचायतों के ऐसे ही एक सम्मेलन में यह ऐलान किया गया था कि वह आगे की रणनीति के तौर पर नवीन जिंदल के घर को घेरेगा ताकि उन पर तथा बाकी संसद सदस्यों पर दबाव बनाया जा सके।

सभी जानते हैं कि दलित अत्याचारों का मसला हो या 'इज्जत' की रक्षा के नाम पर की जाने वाली हत्याओं का मामला, खाप पंचायतों ने हमेशा मानवीय तर्क प्रणाली को नकारने की कोशिश की है। राज्य, कानून और अधिकारों के स्थान पर बैठे लोगों द्वारा प्रदत्त 'संरक्षण' के बिना खापों के लिए यह संभव नहीं होता कि वह देश के कानूनों को चुनौती देने वाले निर्णय लें। हिसार जिले में घटित मिर्चपुर काड ने भी इस हकीकत को उजागर किया था कि दलितों की बस्ती पर हमला करने के पहले बाकायदा खाप पंचायत बिठाई गई थी, जिसने इसे अंजाम देने के आदेश दिए थे।

हरियाणा के प्रख्यात युवा उद्योगपति नवीन जिंदल ने इस बात का इंतजार किए बिना कि उनकी पार्टी की इस मसले पर आधिकारिक पोजिशन क्या है, पिछले दिनों बयान दिया कि वह सगोत्र विवाह के खिलाफ खाप पंचायतों की मुहिम के साथ हैं और वह संसद में इस माग को रखेंगें।

ध्यान देने योग्य है कि कैथल जिले में सर्व जाति सर्व खाप पंचायत के जलसे में पहुंचकर जनाब नवीन जिंदल ने बाकायदा इस बात का ऐलान किया।

खाप पंचायतों द्वारा ऐसे मामलों को लेकर बरपाए जाते कहर के इस माहौल में कुछ ऐसी खबरें भी छन-छनकर आती हैं, जो बताती हैं कि उम्मीद महज एक शब्द नहीं है। अपनी मर्जी से शादी करनेवाले तमाम लोगों का जीना मुश्किल कर देने वाले खाप पंचायतों के फरमानों को चुनौती देता एक गाव उसी हरियाणा में ही मौजूद है- सिरसा जिले का चौटाला गाव।

इसकी सबसे ताजी मिसाल उसी गाव के रहने वाले 21 वर्षीय राकेश गौरिया और उसकी पत्नी सरोज हैं, जो परीकथाओं की तर्ज पर इन दिनों 'खुशी से अपनी जिंदगी बीता रहे हैं।' राकेश की बहन मंजू ने भी अपने पड़ोस के युवक से शादी की है, यहा तक कि राकेश की 65 वर्षीय दादी रामप्यारी ने भी अपने पड़ोसी से ब्याह रचाया था।

दिलचस्प है कि इस गाव में दो सौ से अधिक ऐसे जोड़े यानी 400 से अधिक ऐसे लोग हैं, जिन्होंने उसी गाव में अपना बचपन बिताया है और जिन्होंने उसी गाव में अपने लिए जीवनसाथी भी तलाशा है। साफ है कि ये लोग अगर कहीं बाहर रह रहे होते तो तमाम प्रताड़नाओं के शिकार हो जाते।

अपने गाव में अपनी ही मर्जी से शादी कर रह रहे सबसे बुजुर्ग लोगों में 71 वर्षीय राम परताप को शुमार किया जा सकता है, जिन्होंने अपनी पड़ोसन लिछमा से चालीस साल पहले शादी की थी। अपने वैवाहिक जीवन से बेहद प्रसन्न लिछमा कहती हैं कि अपने गाव में ही शादी करना अपराध कैसे हो गया। मुझे देखिए, जब चाहे मैं अपने माता-पिता से मिल सकती हूं। बेहद सहिष्णु और प्रगतिशील जान पड़ने वाला चौटाला गाव अकेला नहीं है। इसके बगल में स्थित भारू खेड़ा में भी जब 21 साल के राकेश रतिवाल ने गाव की ही 18 वर्षीय अलका से शादी करने की इच्छा जाहिर की, तब उसका जोरदार समर्थन राकेश के पिता बलराज ने किया। समूचा गाव इस शादी में शरीक हुआ।

इन दिनों हरियाणा प्रशासकीय सुधार आयोग के सदस्य डीआर चौधरी, जिन्होंने 1948 में अपने ही गाव में शादी की थी, बताते हैं कि सिरसा, हिसार और फतेहाबाद जिलों में या राजस्थान के बाड़मेर या जैसलमेर जिलों में ऐसे कई गाव हैं, जिन्होंने ऐसे मध्ययुगीन कानूनों को चुनौती दी है।

माल और देसी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तरों के लिए मशहूर गुड़गांव से कुछ वक्त पहले स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत बढ़ती शादियों की खबर आई थी। मालूम हो कि यह वही कानून है, जिसके तहत अंतरजातीय यहा तक कि अंतरधर्मीय विवाह भी संभव है। अगर पारंपारिक शादी एक सामाजिक शादी है तो इसके अंतर्गत की जाने वाली शादी एक वैधानिक प्रक्रिया है, जिसके लिए महज मूल जन्म प्रमाणपत्र और चंद गवाहों की जरूरत होती है। वैसे यह अधिनियम 1954 में ही बना था, लेकिन बनने के साढ़े चार दशक बाद भी नतीजे सिफर ही साबित हो रहे थे, लेकिन इधर बीच इनमें तेजी आ रही है।

अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने के मामले में समाज के समर्थन की एक नायाब मिसाल महाराष्ट्र के जिला चंद्रपूर का छोटा-सा गाव करंजी है। मुश्किल से दो हजार आबादी वाले इस गाव में बीते पाच साल में 38 प्रेम विवाह हुए हैं, जिनमें से 20 अंतरजातीय विवाह हैं तो 18 जाति के भीतर प्रेम विवाह हैं। नंदा-रामभाऊ जितार, नलेश्वर गजभे-वंदना, छब्बुताई-प्रेमचंद, राकेश थेरकर-सुनंदा, वनिता चापले, बाली भडके, संदेश पचारे, वत्सला वानोडे, छोटी खोब्रागडे, सतीश बावणे, सुरमुखसिंग डागी आदि कुछ नाम हैं, जिन्होंने अंतरजातीय शादी की है।

ऐसा नहीं कि यह सिलसिला बहुत सुनियोजित था। यह वर्ष 2005 की बात थी, जब पास के एक गाव से एक जोड़ा करंजी पहुंचा। अशोक गरपल्लीवार जहा कुम्भार जाति से संबधित था तो मीनाक्षी देउलमाले तेली जाति से संबधित थी। वे दरअसल अपने परिवार वालों के डर से भागते हुए करंजी पहुंचे थे और गाव के ही मंदिर में रुके थे। उनके आने की खबर पंचायत को लगी और उन दोनों को पंचायत कार्यालय बुलाया गया। सरपंच प्रभाताई खोब्रागडे और पंचायत के बाकी सदस्यों ने उनसे लंबी बातचीत की। उन्होंने महसूस किया कि अगर इन दोनों की शादी नहीं कराई गई तो वे आत्महत्या भी कर सकते हैं। प्रभाताई की पहल पर दोनों के माता-पिता को बुलाया गया और समझाया गया। वे मन मारकर इस रिश्ते के लिए राजी हो गए। प्रभाताई आखों में चमक लिए बताती हैं कि इस युगल की दोनों बेटिया गाव के ही स्कूल में जाती हैं। धीरे-धीरे पंचायत के इस अनूठे हस्तक्षेप की खबर दूर-दूर तक फैली और कई प्रेमी युगल वहा पहुंचने लगे। अगल-बगल के गाव के ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश से भी कुछ युगल यहा पहुंचे।

प्रश्न उठता है कि क्या करंजी पहले से ही ऐसा था। बिल्कुल नहीं! महज सात साल पहले गाव में विभिन्न जातियों में आपस में भी काफी तनाव था। दलितों के अपने अलग कुएं थे, पिछड़ी जातियों के अपने अलग। अब बहुत कुछ बदल गया है। यह अकारण नहीं कि महाराष्ट्र की सरकार ने इस गाव को 'तंटामुक्त' यानी झगड़ों से मुक्त गाव होने के नाते विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया है।

छोटे-से ग्राम करंजी में नजर आ रहे इस बड़े करिश्मे के पीछे किसी संगठित सामाजिक समूह का हाथ भले न हो, लेकिन अपने आप में यह खबर विलक्षण है कि आज की तारीख में यह छोटा-सा गाव समूचे जिले के लिए ही नहीं, पूरे सूबे के लिए एक नजीर बना है।

भारत के उज्वल भविष्य की कामना रखने वाले हर शख्स को अब यह तय करना है कि क्या खापों के कुहासे में इस मंजिल को पाया जा सकता है या करंजी के उजास में!

उदारवादी सोच रखें खाप पांचायतें

डा. एमएस मलिक। चिंता की बात है कि सम्मानित खाप और सर्वखाप पंचायतों का प्रचाीन गौरवपूर्ण इतिहास आज विवादास्पद, विरोधाभाष व आलोचना का केंद्र बनता जा रहा है। इन सम्मानित खाप पंचायतों की ऐतिहासिक पृष्टिभूमि का अध्ययन करने से पता चलता है कि खाप पंचायतों ने शुरू से ही ग्रामीण समाज में सद्भावना, भाईचारा व शांति का माहौल बनाए रखने के लिए अहम निर्णायक कार्य किए हैं, जिस कारण इनका फैसला हर व्यक्ति सिर-माथे पर स्वीकार कर लेता था और इन्हें सम्मान से पंच-परमेश्वर के खिताब से जाना जाता था। खाप पंचायतों द्वारा सूझबूझ से लिए गए निर्णय पूरे राष्ट्र के लिए न्याय के स्रोत साबित हुए हैं।

सर्वखाप पंचायतों के गौरवपूर्ण इतिहास व सम्मानजनक छवि के ठीक विपरीत आज सर्वखाप पंचायतों का मौलिक स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। मेरा मानना है कि आज सर्वखाप पंचायतों के अंदर शरारती एवं राजनैतिक तत्व अपने निजी स्वार्थो की पूर्ति के लिए प्रवेश कर रहे हैं, जिस कारण इनके वास्तविक मुद्दे धूमिल होते जा रहे हैं और सदियों पुरानी यह सम्मानित व्यवस्था नुक्ताचीनी व विरोधाभास का विषय बन गई है। आज कुछेक खाप पंचायतें दिशाहीन व नेतृत्वविहीन संगठनों की तरह कार्य कर रही हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि खाप पंचायतों का न तो कोई सामूहिक नेतृत्व है और न ही कोई एकछत्र नेतृत्व। शायद इसीलिए खाप पंचायतें स्वार्थपूर्ण व विभाजित नेतृत्व का शिकार हो रही हैं, जिस कारण इन खाप पंचायतों द्वारा दिए जा रहे बिना सूझबूझ व तर्कहीन फैसलों विशेषकर सगोत्र व अंतरजातीय विवाह से उत्पन्न विवादों के संदर्भ में दिए जा रहे मानमाने फैसलों की हर जगह आलोचना हो रही है। ये निर्णय सामाजिक भाईचारे और आपसी मेल-मिलाप के लिए बहुत नुकसानदायक सिद्ध हो रहे हैं।

इसके अलावा युवा वर्ग में निरंतर बढ़ती बेरोजगारी तथा भविष्य की अनिश्चितता के कारण उत्पन्न गंभीर उदासीनता भी खाप पंचायतों की प्राचीन परंपराओं तथा रूढि़वादी विचारधारा के साथ टकराव का कारण बनती जा रही है। यही कारण कि आज की युवा पीढ़ी का शादी-विवाह के मामलों में परंपराओं व रीति-रिवाजों का उल्लंघन करने के कारण खाप पंचायतों से निरंतर टकराव बढ़ रहा है। अनेक युवा दंपती खाप पंचायतों के सामाजिक बहिष्कार, गांव छोड़ने तथा पवित्र बंधन का त्याग करके भाई-बहन का रिश्ता कायम करने तक के बेतुकी फरमानों से दुखी होकर कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहे हैं।

खाप पंचायतों के प्रतिनिधियों द्वारा कई बार भावनाओं से वशीभूत होकर उत्तेजित भाषण दिए जाते हैं, जिसे मीडिया द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। इससे खाप पंचायतों की भूमिका का समाज में गलत संदेश जाता है।

आज कुछेक विभाजित खाप प्रतिनिधि अपने निजी स्वार्थो के कारण सामाजिक विवादों को हल निकालने की बजाए सत्ताधारी दलों के राजनेताओं व अपने राजनैतिक आकाओं के सामने उपस्थिति दर्ज कराने में ज्यादा रुचि रखते हैं। पिछले पांच-छह सालों के अंदर ग्रामीण समाज में हुई हिंसक घटनाएं विशेषकर कमजोर नेतृत्व वाली जातियों में हुए विवादों को सुलझाने में भी खाप पंचायतों की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगे हैं। हरियाणा में कैथल, करनाल, झज्जर, गोहाना तथा मिर्चपुर जिला हिसार में हुई पलायन, आगजनी व हत्या की घटनाएं जिनके अंदर सवर्ण जाति के लोगों को मुख्य रूप से दोषी माना गया है, को सुलझाने में भी खाप पंचायतों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं। इन विवादों को सुलझाने व प्रभावित वर्गो में शांति व सुरक्षा का माहौल स्थापित करने में खाप पंचायतें विफल रहीं हैं।

मेरा मानना है कि आज सगोत्र व गोत्र विवाह संबंधी विवाद केवल हरियाणा में नहीं, बल्कि समस्त उत्तरी भारत की एक गंभीर सामाजिक समस्या बन चुकी है और यह जाट वर्ग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अन्य जातियों व वर्गो में भी इस तरह के विवाद उत्पन्न हो रहे हैं।

प्राचीन सामाजिक परंपराएं हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं, जिनका अनुशरण किया जाना बहुत जरूरी है और इन परंपराओं को तोड़ना व उल्लघंन करना सामाजिक अपराध के क्षेत्र में आता है। यह सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुसार दंडनीय है। हमें हर हालत में दूध व खून के रिश्ते का खयाल रखना है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी मानव शरीर में जींस के संतुलन को कायम रखने तथा वंश के विकास व अनुवांशिक बीमारियों से बचने के लिए सगोत्र शादी वर्जित है। मेरा सुझाव है कि सर्वखाप पंचातयों को भी समय के साथ-साथ अपनी कार्यव्यवस्था व आचार संहिता में जरूरी बदलवाव लाना चाहिए। आज समय तेजी के साथ बदल रहा है। अत: खाप प्रतिनिधियों को भी उदारवादी सोच अपनानी चाहिए।

Sunday, 9 May 2010

जाति भारतीय समाज की सच्चाई है: दिल्ली से योगेश गुलाटी

जाति आधारित जनगणना ना कराने पर अडी सरकार आखिर जातिगत जनगणना के लिये राजी हो ही गई! इसके पहले हमारे देश में इस तरह की जनगणना तीस के दशक में अंग्रेज़ों ने कराई थी! ज़ाहिर है उस वक्त उनका मकसद जातिगत आधार पर देश की एकता को खंडित करने के रास्ते तलाशने का ही रहा था! लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक देश में जाति और धर्म के आधार पर विभाजन लोकतन्त्र को असफल बनाता है! जाहिर सी बात है कि यदि जनता का जाति और धर्म के आधार पर विभाजन हो जायेगा तो लोकतन्त्र कभी भी अपने लक्ष्य को पा नहीं सकेगा! ये विभाजन जितना गहरा होगा लोकतन्त्र उतना ही बीमार होगा! लेकिन हमारे देश में ये कडवी सच्चाई है कि जाति और धर्म हमारी राजनीति का यथार्थ बन चुके हैं! और जाति आधारित जनगणना ना करा कर हम केवल उस यथार्थ से आंखें चुराने का ही काम कर रहे हैं! क्योंकि दुनिया के इस सबसे बडे लोकतन्त्र में जाति और धर्म की खाई को और गहरा करने का काम तो हमारी राजनीति आज़ादी के बाद से ही कर रही है! लेकिन जाति आधारित जनगणना के बाद सही आकडे सामने आ जाने से सही मायनों में वंचित वर्गों की पहचान की जा सकेगी! इसके बाद उस वंचित वर्ग के कल्याण के लिये सरकार क्या करती है ये तो उस वर्ग की संख्याबल पर ही निर्भर करेगा ! लेकिन इससे काफी हद तक परिदृ्श्य स्पष्ट हो जायेगा कि कौन कितने पानी में है? और आज़ादी के बाद से अब तक सरकारी योजनाओं ने पिछडों का वाकई में कितना कल्याण किया है? ये आकडे इस मायने में भी खास होंगे कि ये देश की भावी राजनीति की दिशा निर्धारित करेंगे! वीपी सिंह् ने जब मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए पिछडों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की थी, तब कांग्रेस्-बीजेपी समेत तमाम राजनीतिक पार्टियां इसका व्यापक राजनीतिक निहितार्थ समझ नहीं पाई थीं! और इसके खिलाफ उठ खडी हुई थीं! इस राजनीतिक लडाई में वीपी सिंह ने अपनी कुर्सी खो दी थी! इस लिहाज़ से वो भले ही हारे हुए लगें, लेकिन उनकी राजनीति जीत गई थी! जाति चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है! और कास्ट फेक्टर के आधार पर ही हमारे देश में सरकारें बनती और गिरती हैं! इस हकीकत को सभी राजनीतिक दल बखूबी जानते हैं! और इसका फायदा भी उठाते रहे हैं! जबकि होना तो ये चाहिये था कि लोकतन्त्र को मजबूत बनाने के लिये तमाम राजनीतिक दल मिल कर चुनावों में कास्ट फेक्टर को डाईल्यूट कर धीरे-धीरे खत्म कर देते! लेकिन हुआ इसका ठीक उलट यानि ये फेक्टर उतरोत्तर मजबूत होता गया! और जाति से मुक्ति के बजाये हमारे देश में जाति की जडें गहरी होती गईं! निश्चित तौर पर जाति आधारित जनगणना के आकडों के आधार पर ही राजनैतिक दल आगामी चुनावों की रणनीति तय करेंगे! यानि इस जनगणना के पीछे सत्य का सामना करने का साहस नहीं बल्कि इसके पीछे का स्वार्थ ही अधिक नज़र आ रहा है!

Saturday, 8 May 2010

ANY REMEDY FOR JUDICIAL TORTURE?: दिल्ली से योगेश गुलाटी

जी हां मैं न्यायिक उपचारों की ही बात कर रहा हूँ! हमारे संविधान में प्रदत्त क़ानून के समक्ष समानता आज़ादी के दशकों बाद भी सच्चाई नहीं बन पाई है! आलम ये है कि न्याय पाने की पूरी प्रक्रिया इतनी कष्टप्रद है कि उससे कहीं बेहतर सज़ा भुगतना लगता है! यहां पीड़ित दो तरफा सज़ा भुगता है! पहला तो वो अन्याय को भोगता है! और दूसरा उस पीड़ा से शायद अधिक पीडादायक कानूनी प्रक्रिया के चक्रव्यू में ऐसा फंसता है कि उसकी ज़िंदगी कब इस उलझन में ही बीत जाती है उसे खुद पता नहीं चलता! न्याय की आस में वो बूढा हो जाता है! और मरने से पहले उसे न्याय मिल भी जाए तो ये उसके ज़ख्मो पर नमक का ही काम करता है! इसके ठीक उलट अपराधी हमारी अदालातोम की इस कमजोरी का बखूबी फ़ायदा उठा रहे हैं! वो आसानी से जमानत पर छूट जाते हैं! ह्त्या के मामलों में भी कमजोर जांच और सबूतों का अभाव उन्हें बरी कर देता है! हम इस सिध्दाम्त पर यकीन रखते हैं कि चाहे सौ अपराधी छूट जायें लेकिन एक निर्दोष को सज़ा नहीं होनी चाहिए! निर्दोष तो न्याय की गुहार और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान ही पर्याप्त सज़ा भुगत चुका होता है! क्योंकि अपराध को साबित करने का भार भी उसी के कंधों पर होता है, जिसके साथ अन्याय हुआ है! ऐसे में हमारी जांच एजेंसिया और पुलिस कितनी मददगार साबित होती हैं ये किसी से छुपा नहीं है! जांच में घोर लापरवाही और सबूतों को नष्ट हो जाने देना हमारे यहां जांच एजेसियों के लिए नई बात नहीं है! ऐसे में अदालत में आरोपों को साबित करना लोहे के चने चबाने जैसा है! कहते हैं "डिले डिनाय दी जस्टिस" ! क़ानून की किताब का ये पहला सबक हमारे यहां लागू नहीं होता! और हो भी नहीं सकता! क्योंकि हमारी अदालतों में केसों के अम्बार लगे हैं! हमारे २१ उच्च न्यायालयों में तीन करोड़ से ज्यादा केस पेंडिंग है! और अधीनस्थ न्यायालयों में करीब दो करोड़ से ज्यादा केस विचाराधीन है! देश की विभिन्न जेलों में करीब ढाई लाख लोग अंदर ट्रायल है! और दो हज़ार से ज़्यादा लोग पांच सालो से जेल में बंद है जबकि उनका अपराध साबित नहीं हुआ है! पेंडिंग केसों के मामले में यूपी नंबर एक पर है! अकेले इलाहबाद हाईकोर्ट में एक करोड़ से भी ज्यादा पेंडिंग केस हैं! जबकि सिक्किम महज़ ५१ विचाराधीन मामलों के साथ इस लिस्ट में सबसे नीचे है! यूपी के बाद नंबर आता है महाराष्ट्रा(४१ लाख), गुजरात (३९ लाख), पश्चिम बंगाल(20 लाख), बिहार(१२ लाख), कर्नाटका( १० लाख), राजस्थान( १० लाख), ओडिशा (१० लाख), आंध्र प्रदेश (९ लाख)!
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सी मामले पर अपनी चिंता जाहिर की है! इसके पहले सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन भी कई बार इस मुद्दे पर चिंता जता चुके हैं! लेकिन यहां सवाल ये है कि क्या सिर्फ चिंता जाहिर करना ही पर्याप्त है? सवाल ये भी है कि संविधान की आत्मा यानी क़ानून के समक्ष समानता को लागू करने के लिए क्या कदम उठाये जा रहे हैं? हम अभी तक लोकतंत्र के पहले लक्ष्य को भी नहीं पा सके है! क्योकि हमारी अदालते विचाराधीन मामलों से भरी है! न्याय महँगा ही नहीं आम आदमी की पहुच से बाहर की बात है! और पूरी न्यायिक प्रक्रिया कितनी कष्टप्रद है इसका अंदाज़ तो कोई भुक्तभोगी ही बाया कर सकता है! हमारे देश में १० लाख लोगो पर औसतन १४ जज है! और १५०० लोगो पर एक एडवोकेट! हमारे विश्विद्यालयो में क़ानून की शिक्षा का क्या आलम है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हमारे वकील कानूनी धाराओं से नहीं जुगाड़ से केस जीतने की कोशिश करते है! और ज्यादातर केस इस लिए नहीं सुलझ पाते क्योकि वकील नहीं चाहते कि उनका फैसला हो! सवाल ये भी है कि जब प्रधानमंत्री और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्याधीश इस मुद्दे पर गंभीर है तो फिर क्यों नहीं हो रहा कायाकल्प हमारी न्याय व्यवस्था का? विकसित देशों की न्याय व्यवस्था का माडल अपना कर हम इस दोष को दूर कर सकते है!
दिल्ली से योगेश गुलाटी की रिपोर्ट!

Friday, 7 May 2010

कसाब को फांसी पर, जश्न किसलिये?

हिंदुस्तान के लिए एक ऐतिहासिक मुक़दमा ! आज़ाद हिन्दुस्तान के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था कि एक मुकदमे के फैसले का सारा मुल्क दिल थामे इंतज़ार कर रहा था! पूरे मुल्क को कसाब के लिए मौत की सजा का इंतज़ार था! और अदालत ने आखिर वो फैसला सुना ही दिया! अदालत ने कसाब से कहा कि तुम्हे मरते दम तक फांसी दी जायेगी! क्योंकि तुमने जो किया है, उसके एवज़ में इससे कम कोई सज़ा नहीं है! वाकई हमने इतिहास रच दिया! हम इस बात पर खुश हो सकते है कि हमने महज़ एक साल में एक बड़े आतंकी मुकदमे का फैसला कर दिया! क्योंकि हमारी अदालते साधारण विवादों का फैसला करने में भी दशको का समय लेती है! हम इस बात पर भी खुश हो सकते हैं कि इस संवेदनशील मामले में दो भारतीय आरोपीयों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया ! हमारे विद्वान इसे न्यायालय की निष्पक्षता से जोड़ कर देख रहे हैं! और वो कसाब को मिली फांसी की सज़ा पर जश्न मना रहे हैं! लेकिन जश्न किस बात का? आतंक की इस शतरंज में कसाब महज़ एक प्यादा है! इस खेल के असली खिलाड़ी तो हमारी पहुंच से बाहर हैं! क्या हम अमेरिका की तर्ज़ पर पकिस्तान और पाक- कश्मीर में चल रही आतंक की फेक्त्रीयो को ख़त्म करने की हिम्मत रखते हैं अगर नहीं ...तो एक कसाब को फांसी पर लटकाने से कुछ नहीं होने वाला! क्योंकि महज़ चंद लाख रुपयों के लालच में भारत पर हमला करने को कितने ही कसाब तैयार बैठे है! हमारे पड़ोसी मुल्कों में इतनी गरीबी है कि वहां भारत पर हमला करने के लिए मानव बम तैयार करना कोइ मुश्किल काम नहीं है! और दुर्भाग्य से हमने अब तक आतंक के खिलाफ अमेरिका जैसी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है जिसे देख कर ये लगता हो कि हम आतंक के खिलाफ वाकई में सख्त हैं! और हममे ऐसी किसी हरकत का मुह तोड़ जवाब देने की ताकत है! कसाब तो मरने के लिए भारत आया था....शायद वो खुश होगा कि अदालत में उसकी उम्र बढ़ गयी! क्योंकि अब उसके पास हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और फिर राष्ट्रपति के पास दया के लिए गुहार लगाने का रास्ता बचता है! इसके बाद भी कसाब के ज़िंदा रहने की पूरी उम्मीदें हैं! क्योंकि अकेले महाराष्ट्र में ५८ अपराधी फांसी की सज़ा का इंतजार कर रहे हैं! कसाब का नंबर ५९वां है! और अभी तो संसद पर हमले के दोषी अफ़ज़ल की दया याचिका भी विचाराधीन है! ऐसे में ये कैसे मान लिया जाए कि हामारी सरकारें आतंकवाद पर वाकई में सख्त हैं? लेकिनं २६/११ के हमले में मारे गए लोग इतने खुशकिस्मत नहीं थे! मज़हबी उन्माद ने उन्हें उसी दिन मौत की नींद सुला दिया था! लेकिन इससे भी बड़ा सवाल आतंक की इस साजिश को रचाने वाले वो असली आतंकी कहां हैं? क्या आतंक के असली आकाओं के गिरेबां तक पहुंचने की हिम्मत हमारी सरकारों में है? कहां हैं २६/११ के असली सूत्रधार जो सरहद के पार बैठे इस हमले को अंजाम दे रहे थे? शायद वो इस वक्त अगले हमले की तैय्यारी कर रहे हो? और हम कसाब की फांसी पर जश्न मना रहे हैं? हमें नहीं भूलना चाहिए अमेरिका पर हुए एक आतंकी हमले के बाद उसने दो मुल्क तबाह कर दिए थे! तब से अब तक वहां कोई आतंकी हमला नहीं हुआ! और हम हर महीने औसतन एक आतंकी हमले का गवाह बन रहे हैं! क्योंकि हम हर बार यही कहते हैं कि अगले हमले का मुंह तोड़ जवाब देंगे!

Monday, 26 April 2010

महंगाई के विरोध में देशव्यापी बंद कल

महंगाई के खिलाफ वाम मोर्चा और सपा, राजद, अन्नाद्रमुक, तेदेपा, बीजद सहित 13 राजनीतिक दल मंगलवार को भारत बंद करेंगे।

संसद में पेट्रोल, डीजल और खाद की कीमतों में बढोतरी के खिलाफ इन दलों के साथ कटौती प्रस्ताव पेश करने वाली भाजपा हालांकि इस बंद का हिस्सा नहीं बनेगी।

मा‌र्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की पहल पर इन 13 दलों के नेताओं ने पिछले दिनों राष्ट्रीय राजधानी में दो दौर की बैठकें कीं, जिसके बाद तय किया गया था कि महंगाई के खिलाफ 27 अप्रैल को देशव्यापी हड़ताल की जाएगी और पेट्रोल, डीजल तथा खाद की कीमतों में वृद्धि के खिलाफ लोकसभा में कटौती प्रस्ताव पेश किया जाएगा।

इन दलों के नेताओं ने संसद परिसर में आयोजित संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में ऐलान किया है कि महंगाई के खिलाफ सरकार से उनकी जंग की शुरूआत हो चुकी है और यह लडाई सड़क से संसद तक लड़ी जाएगी।

माकपा ने सरकार के खिलाफ मोर्चाबंदी में बसपा को भी शामिल करने का प्रयास किया था लेकिन बात बन नहीं सकी और बसपा ने अब संकेत दे दिए हैं कि वह कटौती प्रस्तावों का समर्थन नहीं करेगी।

इन 13 दलों के नेता देश भर में होने वाले प्रदर्शनों की अगुवाई करेंगे जबकि मुख्य प्रदर्शन दिल्ली में होगा। मुख्य विपक्षी दल भाजपा महंगाई के खिलाफ 21 अप्रैल को ही महारैली कर चुकी है।

मोदी का मायाजाल...

पिछले कुछ साल में भारतीय क्रिकेट की सबसे कद्दावर हस्ती बने ललित मोदी का पतन भी कम नाटकीय नहीं रहा और उन्हें उसी साम्राज्य से नेस्तनाबूद कर दिया गया जो उन्होंने खुद खड़ा किया था।
इंडियन प्रीमियर लीग [आईपीएल] के फाइनल के कुछ देर बाद ही मोदी को निलंबित कर दिया गया जिससे आईपीएल कमिश्नर और चेयरमैन के रूप में उनका सफर समय से पहले थम गया। पांच बरस पहले बीसीसीआई के सबसे युवा उपाध्यक्ष बने मोदी की अक्खड़ कार्यशैली ने उनके विरोधियों की जमात खड़ी कर दी। यही वजह है कि आईपीएल में वित्तीय अनियमितताओं की बात सामने आते ही उन्हें हटाने के लिए लोग लामबंद हो गए। इंडियन प्रीमियर लीग के जन्मदाता मोदी भारतीय क्रिकेट के सबसे प्रभावशाली शख्स बनने से पहले महज एक व्यवसायी थे। आईपीएल बीसीसीआई के लिए ऐसी दुधारू गाय साबित हुआ जिसने पिछले तीन साल में उसके वारे-न्यारे कर दिए।
मोदी के 46 बरस के जीवन पर दृष्टिपात करें तो काफी उतार-चढ़ाव नजर आते हैं। सबसे पहले विवादों से उनका साबका कालेज के दिनों में पड़ा जब वह 1985 में अमेरिका की ड्यूक यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे। उन्हें ड्रग्स की कथित तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया गया।
भारत लौटने पर मोदी ने कई व्यवसायों में हाथ आजमाए और बाद में क्रिकेट में पदार्पण किया। बीसीसीआई में प्रवेश का उनका प्रयास आखिरकार 2004 में सफल हुआ। राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की तथाकथित सरपरस्ती में वह राजस्थान क्रिकेट संघ के अध्यक्ष बने। ऐसा आरोप है कि राजे सरकार ने खेल अधिनियम में संशोधन करके मोदी को 40 साल बाद हुए आरसीए चुनाव में मदद की। मोदी की जीत से कइयों के अहम को ठेस पहुंची जिसमें पूर्व अध्यक्ष किशोर रूंगटा शामिल थे। रूंगटा ने मोदी पर धोखेबाजी का आरोप लगाया। मोदी की कामयाबी का सिलसिला यहां से शुरू हुआ तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अगले साल वह बीसीसीआई के उपाध्यक्ष बने।
शरद पवार जब जगमोहन डालमिया को हराकर बीसीसीआई अध्यक्ष बने तब मोदी उनके साथ थे। यही वजह है कि इस धुरंधर राजनीतिज्ञ ने समूचे घटनाक्रम में मोदी का साथ दिया।
आईपीएल की अवधारणा के साथ मोदी मीलों आगे निकल आए। उन्होंने कारपोरेट समूहों और बालीवुड को जोड़कर क्रिकेट का ऐसा तमाशा तैयार किया जो 2008 में पहली गेंद फेंके जाने से पहले ही सुपरहिट हो गया।
क्रिकेट और फिल्मों के दीवाने भारत में इन दोनों का मिलन दर्शकों के लिए वरदान से कम नहीं रहा। शहर पर आधारित फ्रेंचाइजी टीमों के मुकाबले देखने के लिए दर्शक मैदान पर टूट पड़े। ऐसा आरोप है कि राजे सरकार ने खेल अधिनियम में संशोधन करके मोदी को 40 साल बाद हुए आरसीए चुनाव में मदद की।
ऐसी खबरें थी कि मोदी का कोलकाता नाइट राइडर्स, राजस्थान रायल्स और किंग्स इलेवन पंजाब में हिस्सा है लेकिन पहले साल में ये अटकलें बेदम साबित हुई। दूसरे सत्र में आईपीएल और मोदी फिर विवादों से घिर गए। भारत में आम चुनावों से इसकी तारीखें टकराने के कारण सरकार ने आईपीएल से तारीखों में बदलाव के लिए कहा।
लेकिन अक्खड़ मोदी सुनने के मूड में ही नहीं थे। उन्होंने गृहमंत्री की सुने बिना टूर्नामेंट दक्षिण अफ्रीका में कराया। अब ऐसा संदेह है कि उनमें से कई मैच फिक्स थे और मोदी खुद इसमें शामिल थे।
तीसरे सत्र में विवादों की इंतहा हो गई जब नए सत्र के लिए दो नई टीमों की बोली लगी। बोली लगने से पहले मोदी को पहला झटका लगा जब वह आरसीए का चुनाव हार गए। नई आईपीएल टीमों की नीलामी पहले रद्द हो गई क्योंकि बीसीसीआई का मानना था कि मोदी की रखी शर्ते काफी कड़ी थी। नीलामी होने पर कोच्चि को फ्रेंचाइजी मिलने से सभी को हैरानी हुई।
रेंदेवू स्पो‌र्ट्स व‌र्ल्ड जैसे गुमनाम ग्रुप ने अडानी समूह और वीडियोकान को हराकर फ्रेंचाइजी हासिल की। इसके बाद मोदी ने टीम के मालिकाना हक का ब्यौरा उजागर करके भानुमति का पिटारा खोल दिया। इसके चलते केंद्रीय मंत्री शशि थरूर को इस्तीफा देना पड़ा और उनकी करीबी दोस्त सुनंदा पुष्कर को 70 करोड़ की स्वैट इक्विटी। इसके बाद आईपीएल और फ्रेंचाइजी टीमों के दफ्तरों पर आयकर विभाग के छापे पड़े जिससे इस टी20 लीग में वित्तीय अनियमितताओं का खुलासा हुआ।
बीसीसीआई ने सारे मसलों पर बातचीत के लिए आईपीएल गवर्निंग काउंसिल की बैठक बुलाई लेकिन मोदी ने इसे अवैध करार देते हुए कहा कि वह ऐसी किसी बैठक में भाग नहीं लेंगे। बाद में उन्होंने मन बदलकर बैठक की अध्यक्षता करने का ऐलान किया लेकिन बोर्ड ने इससे पहले ही उन्हें निलंबित कर दिया।

Monday, 15 February 2010

ताकि भारत को सबक सिखाया जा सके.....!

जिस वक्त शिवसेना और शाहरुख की महाभारत का धारावाहिक चल रहा था....राहुल के मुँबई दौरे का चँदबरदई स्टाईल मेँ गुणगान किया जा रहा था! ठीक उसी वक्त पाक अधिकृत कश्मीर मेँ भारत पर अगले हमले की घोषणा की जा रही थी! उस वक्त जब सरहद के पार भारत के खिलाफ जिहादी नारे लग रहे थे....हमारे यहाँ कथित बुध्दिजीवी एक अनोखी बहस मेँ उलझे थे! हमारी सरकार को उन जिहादी नारोँ की कोई फिक्र नहीँ थी! क्योँकि उसे तो एक फिल्म को रीलीज़ कराना था! लश्कर से जुडे जमात-उद-दावा के नेता मक्की ने पीओके मेँ चार फरवरी को कश्मीर सम्मेलन मेँ कहा था कि पुणे समेत तीन भारतीय शहरोँ पर जिहादी हमला करेँगे, ताकि भारत को सबक सिखाया जा सके! हालाकि हमारे गृह मँत्री को इस बार भी खूफिया तँत्र की नाकामी से इनकार है! सही है जब खुले-आम घोषणा करके हमले किये जा रहे हैँ तो इसे खूफिया तँत्र की नाकामी से जोड कर नहीँ देखा जाना चाहिये! वैसे भी हमारे खूफिया अधिकारियोँ का उपयोग विरोधियोँ की जासूसी कराने मेँ होने लगे, तो देश की सुरक्षा की जानकारी की उम्मीद करना बेमानी ही होगा! हमने एक बार फिर ये साबित कर दिया है कि हमारा सिस्टम एक फिल्म को रीलीज़ करवा कर हिट बनाने मेँ तो योगदान दे सकता है लेकिन घोषणा कर के किये गये आतँकी हमलोँ को रोकने मेँ कामयाब नहीँ हो सकता! बहरहाल हम कश्मीर मेँ आतँकवादियोँ के पुनर्वास की योजना पर जश्न मना सकते हैँ! केन्द्र सरकार ने पीओके से लौटने की इच्छा रखने वाले आतँकीयोँ का स्वागत करने की योजना बनाई है! इस योजना की सिफारिश जम्मू-कश्मीर के मुख्यमँत्री उमर अब्दुल्ला और प्रधानमँत्री द्वारा गठित एक कार्यसमूह ने की थी! सरकार का मानना है कि इस योजना से जम्मू-कश्मीर के उन हज़ारोँ परिवारोँ मेँ खुशी लौट सकेगी, जिनके पुरुष सदस्य आतँकी सँगठनोँ के बहकावे पर हथियारोँ की ट्रेनिँग लेने पीओके चले गये थे! लेकिन अब जिन्होँने हथियार डालने की इच्छा जताई है! सरकार का ये भी मनना है कि इस तरह वो पीओके मेँ आतँक की फेक्ट्रीयोँ का नेटवर्क खत्म कर सकती है! यानि एक तरफ सुरक्षा बल अपनी जान पर खेल कर सीमा की चौकसी कर रहे हैँ और दूसरी तरफ हमारी सरकारेँ आतँकीयोँ को पीओके से कश्मीर मेँ लाकर उनका पुनर्वास कर रही है! ऐसे मेँ ये सवाल उठना लाज़मी है कि नक्सलवाद को आतँकवाद से बडा खतरा मानने वाली हमारी सरकारोँ के पास क्या नक्सलियोँ के पुनर्वास की कोई योजना है? वो गरीब आदिवासियोँ के पुनर्वास के लिये भी क्या उतनी ही नरम है? और कश्मीरी पँडित....? उनके सवाल पर हमारी सरकार मौन क्योँ हो जाती है? क्योँ नहीँ दिखाई देता हमारी सरकारोँ को कश्मीरी पँडितोँ का दर्द? जो हिँसा का रास्ता अख्तियार कर भारत की अखँडता को चुनौती देते हैँ, सरकार को उनके पुनर्वास की चिँता सता रही है! और जो अपने ही देश मेँ रिफ्यूज़ी का जीवन बिता रहे हैँ उनकी कोई चिँता किसी को नहीँ है!
अपनी इस अनोखी योजना के बल पर शायद कश्मीर के मुख्यमँत्री उमर अब्दुल्ला को अगला नोबल शाँति पुरुस्कार भी मिल जाये..! लेकिन उनहेँ नहीँ भूलना चाहिये कि नोबल शाँति पुरस्कार से सम्मानित अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने इराक और अफगानिस्ताअन पर अपनी नीतियोँ के सँदर्भ मेँ कहा था कि मैँ महात्मा गाँधी का अनुयायी ज़रूर हूँ लेकिन मैँ गाँधी नहीँ बन सकता!

Saturday, 13 February 2010

वेलेँटाईन ने हिँदुस्तानियोँ को प्रेम करना सिखा दिया!

आज के दिन सँत वेलेँटाईन को मेरा प्रणाम! भगवन आपने हिँदुस्तानियोँ को प्रेम करना सिखा दिया! ये आप ही की कृपा का परिणाम है कि आज हमारे बाग बगीचे गुलज़ार रहेँगे! हालाकि गुलज़ार तो वो पहले भी थे लेकिन आज तो समा कुछ और ही होगा! आज प्यार करने वाले अपने प्यार का खुल्लम-खुल्ला प्रदर्शन करेँगे! और प्यार के कथित दुश्मन उनकी खुल्लम खुल्ला पिटाई! हे वेलेँटाईन देवता हम हिँदुस्तानी इस बात के लिये आपके सदा आभारी रहेँगे कि आपने हमेँ खुले मेँ प्यार करना सिखाया! चार दिवारियोँ के भीतर प्यार मेँ वो मज़ा नही जो खुले मेँ है! हालाकि प्रेम का त्यौहार तो हमारी सँस्कृति मेँ भी है! होली और बसँतोत्सव प्रेम के ही तो प्रतीक हैँ! लेकिन अपनी सँस्कृति हमेँ अब अच्छी नहीँ लगती! हमेँ तो आपकी पाश्चात्य सभ्यता से प्रेम हो चला है! इसीलिये तो अब हम हिँदुस्तानी युवा पूरी तरह पाश्चात्य सभ्यता मेँ डूब गये हैँ! हम अब ऐसा कोई कारण नहीँ छोडना चाहते जिससे हम पिछडे कहलायेँ! क्योँकि हमेँ अपनी कोई चीज़ नहीँ भाती! आपकी उन्मुक्त सँस्कृति के हम दीवाने हैँ! इसी लिये आपकी भाषा आपकी सँस्कृति और आपके तरीकोँ को हम तेज़ी के साथ अपना रहे हैँ! पहले जन्मदिन पर हम दीप जलाते थे अब मोमबत्तीयाँ बुझाते हैँ! गरीबोँ को भोजन कराते थे, अब केक काट कर उसे मुँह पर लगाते हैँ! माँ अब मोम हो गई है....और पिता डैड! पहले माता-पिता के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लेते थे अब गले मिलते हैँ! इतने पर भी खुद को नई पहचान दी है! कर्ज़ लेकर घी पीने वाली कहावत को हम शब्दश: चरितार्थ कर रहे हैँ! कर्ज़ लेकर ही हम पढाई करते हैँ! और फिर हमारे देश को कर्ज़े मेँ डुबोने वाली विदेशी कँपनीयोँ मेँ काम करते हैँ! होम लोन, कार लोन, सब कुछ लोन पर! पहले हमारे पुरखे साहूकारोँ के कर्ज़ मेँ डूबे होते थे! और आज जब हमारा देश भी कर्ज़े से चल रहा है! तो ऐसे मेँ लोन लेने की ये परँपरा हम कैसे तोड सकते हैँ! हमारी दकियानूसी सँस्कृति से मुक्ति दिलाने मेँ आपने जो योगदान दिया है उसके लिये हम हमेँशा आपके आभारी रहेँगे! हम तो बस उस दिन की आस मेँ जी रहे हैँ अब हमारे देश की सडकोँ पर भी इटली और जर्मनी जैसे नज़ारे दिखाई देँगे! जब हम हर दिन को वेलेँटाईन डे की तरह मना सकेँगे! और बाज़ार हमारा बखूबी इस्तेमाल कर सकेगा! महँगे विदेशी कार्ड्स और विदेशी गिफ्ट खरीद कर आज हम आपको अपने श्रध्दा सुमन अर्पित करेँगे! पबोँ मेँ जाकर जम कर महँगी विदेशी शराब पीयेँगे! पाश्चात्य सँगीत पर जम कर ठुमके लगायेँगे! जमकर जश्न मनायेँगे क्योँकि हम आज़ाद हैँ! जश्न इसलिये भी क्योँकि आज हमारे प्रेरणास्त्रोत महान सँत वेलेँटाइन को याद करने का दिन है!

Thursday, 11 February 2010

सभी गुमनाम हैँ सर!

रोज़ आफिस आफिस जाते वक्त उसे देखता था! तो उसके ज़िन्दा होने पर मुझे आश्चर्य होता था! वो जिसके शरीर पर हड्डियोँ का ढाँचा नज़र आये वो शख्स ज़िँदा हो तो आश्चर्य तो होगा ही! गुमनाम था वो शख्स! इसलिये नहीँ कि उसका कोई नाम नहीँ था! उसका भी कोई नाम तो रहा होगा! लेकिन किसी को जब उसके होने या ना होने से ही कोई फर्क नहीँ पडता था, तो फिर उसके नाम के होने का भी क्या मतलब रह जाता था! शायद इसी लिये आस-पास के लोग उसे गुमनाम कहते थे! उम्र कोई तीस से पैँतीस के बीच! हर आने-जाने वाले को वो बस देखता था! बोलता कुछ नहीँ था! लेकिन जाने क्योँ मुझे लगता था कि उसकी आँखेँ बहुत कुछ कह रही हैँ! पूरी एक दास्तान थी उसकी आँखोँ मेँ इस बात का यकीन है मुझे! कुछ तो कहानी रही होगी उसकी भी! यही सोच कर मैँने आस-पास के लोगोँ से उसके बारे मेँ जानना चाहा..! लेकिन दिलवालोँ की इस दिल्ली मेँ किसी के पास इतना वक्त नहीँ था कि वो एक गुमनाम शख्स के बारे मेँ मुझसे बात कर सके!
सर्दी अपना कहर ढहा रही थी ! और हम सर्दी को जम कर कोस रहे थे! सुबह के शिफ्ट मेँ न्यूज़ बुलेटिँस की ज़िम्मेदारी मुझ पर थी इसलिये सबेरा होने के पहले ही ड्राइवर मुझे लेने पहुँच जाता था! लेकिन गिरते पारे और कहर बरसाते कोहरे से सारी दिल्ली परेशान थी! ना तो पारा चढने का नाम ले रहा था ना ही कोहरा कम होने का! सुबह आफिस से फोन आया, “ सर दस मिनिट मेँ ड्राईवर आपके पास पहुँच जायेगा!” तैयार होकर जब मैँ नीचे पहुँचा तो मुझे अपनी इस जल्दबाजी पर अफसोस हुआ! क्योँकि सर्दी इतनी ज्यादा थी कि खुले मेँ एक मिनिट भी पहाड जैसा लग रहा था! जबकि मैँने गर्म कपडे पहने थे! कुछ ही देर मेँ गाडी आ गई, तो ड्राईवर ने भी मुझसे वही सवाल किया जिस बेवकूफी पर मैँ खुद को कोस रहा था! उसने कहा,- इतनी सर्दी मेँ आप पहले से ही बाहर क्योँ आ गये? मैँ जल्दी से गाडी मेँ बैठा,और ड्राईवर ने गाडी बढाई! आगे कुछ दूर मोड पर पहुँच कर मेरी नज़र शीशे से बाहर गई तो मैँ हैरान रह गया! फुटपाथ पर एक शख्स खुद को समेट कर सर्दी से बचने की नाकाम कोशिश कर रहा था! उसके पास एक चादर भी नहीँ थी! और उसके कपडे फटे हुए थे! ये जानने के लिये कि वो कौन है और इतनी सर्दी मेँ फुटपाथ पर क्या कर रहा है? मैँने ड्राईवर से गाडी रोकने को कहा! गाडी से उतर कर मैँ उसके पास पहुँचा तो देखा ये तो वोही शख्स है जिसे लोग गुमनाम कहते हैँ! तभी ड्राईवर चिल्लाया, “सर दिल्ली के फुटपाथ पर हज़ारोँ लोग ऐसे ही रात गुज़ारते हैँ! जल्दी कीजिये आफिस के लिये लेट हो रहा है!” मेरे कदम पीछे मुडे और ड्राएवर ने सुनसान सडक पर गाडी दौडा दी! दिन भर आफिस मेँ खबरोँ के शोर मेँ उलझा रहा! लेकिंन खबरोँ के इस शोर मेँ मुझे उस “गुमनाम” की खामोश दास्तान सुनाई दे रही थी इसलिये मैँने इनपुट से कहा कि इस कडाके की सर्दी मेँ दिल्ली के फुटपाथोँ पर सोने वाले बेघर लोगोँ पर एक स्टोरी करो!
शाम को आफिस से लौटते वक्त मैँ गर्म कपडोँ की एक दुकान मेँ पहुँचा! मैँने एक कँबल खरीदा और सोचने लगा जब ये कँबल “गुमनाम” को दूँगा तो वो कितना खुश होगा? कँबल लेकर जब उस चौक के करीब पहुँचा तो देखा गुमनाम वहाँ नहीँ है! मैँने उसे आस-पास देखा, लेकिन वो मुझे कहीँ दिखाई नहीँ दिया! मुझे कँबल लिये घूमते देख एक दुकानदार ने मुझसे सवाल किया, किसे ढूँढ रहे हैँ आप? गुमनाम को.....यही बुलाते हैँ ना आप उसे? मैँने कहा! देर कर दी आपने! एमसीडीए वाले ले गये हैँ उसे! सुबह सर्दी से उसकी मौत हो गई! उसके इन शब्दोँ ने मुझे निशब्द कर दिया!
दूसरे दिन रिपोर्टर ने सर्दी मेँ फुटपाथ पर सोने वाले बेघर लोगोँ पर वो स्टोरी फाईल की जो मैँने करने को कहा था! वो मेरे पास आया और उसने कल सर्दी से हुई मौतोँ का आकडा बताया...24. उसने कहा स्टोरी कैसी लगी सर? मैँने कहा इसमेँ एक “गुमनाम” भी है! रिपोर्टर बोला ठँड से मरने वालोँ का कोई नाम नहीँ है, सभी गुमनाम हैँ सर !

माई नेम इज़ “कामन मेन”

कोई कहता है माई नेम इज़ खान...तो कोई कहता है माई नेम इज़ ठाकरे! तो सोचा आज मैँ भी बता ही दूँ कि माई नेम इज़ कामन मेन! शाहरुख की फिल्म की रिलीज़ के ठीक पहले ये बात बताना इसलिये भी मुझे ज़रूरी लगा कि ठाकरे और खान की इस महाभारत मेँ सरकार ने मुझे भुला दिया है! मेरी जान की कोई कीमत नहीँ है! मेरी ज़िँदगी और मौत बस एक आँकडा है! सरकारी आँकडा! मेरे साथ कभी भी कुछ भी हो सकता है! गुँडे-बदमाश, अँडरवर्ल्ड और आतँकवादी सभी मेरी जान के पीछे पडे हैँ! लेकिन सरकार को मेरी कतई चिँता नहीँ है! उसे चिँता है तो इस बात की कि शाहरुख की फिल्म रीलीज़ हो जाये! और आईपीएल वक्त पर हो जाये! इसीलिये तो मेरी प्यारी सरकार ने मुँबइ को छावनी मेँ तब्दील कर दिया है! ऐसा उसने पहले कभी नहीँ किया! तब भी नहीँ जब मुँबई की लोकल ट्रेनोँ मेँ हुए आतँकी हमलोँ मेँ मैँ मारा जा रहा था! आजकल कोई मराठी मानुष की बात कर रहा है तो किसी को उत्तर भारतीयोँ की चिँता सता रही है! लेकिन मुझे भूल गये...... मुम्बई का डिब्बेवाला और बिहार का रिक्शे वाला..... वो मैँ ही तो हूँ! एक आम भारतीय! खान भी मैँ ही हूँ और ठाकरे भी तो मैँ ही हूँ! वैसे सरकार ने ये पहली बार नहीँ किया है! वो तो मुझे आज़ादी के बाद से ही भूलती आई है! मैँ एक आम आदमी हूँ जिसे “आम” समझ कर जिसने चाहा चूमा और जम कर चूसा! ये सिलसिला आज भी जारी है ! अब तो मुझमेँ गुठलियोँ के सिवाय कुछ बचा ही नहीँ है! लेकिन फिर भी सरकार की सारी कल्याणकारी योजनाओँ का केन्द्र मैँ ही हूँ! हाँ वो मैँ ही हूँ जिसके कल्याण लिये पास होती हैँ कईँ योजनाएँ और बटता है अरबोँ का फँड ! फिर भी मैँ भूख से मर रहा हूँ! ना मेरा कोई भविष्य है ना ही मेरे बच्चोँ का! मेरे बच्चे खैराती स्कूलोँ मेँ तालीम के नाम पर अपना वक्त बरबाद कर रहे हैँ! उन्हेँ हिँदी मेँ शिक्षा दी जा रही है! जबकि सरकार ये जानती है कि सरकारी दफ्तर हो या मल्टी नेशनल कँपनी अँग्रेज़ी के बिना कहीँ नौकरी नहीँ मिलती! डाक्टरी, इँजीनियरिँग, कानून, एमबीए, सारी बडी डिग्रीयाँ कानवेँट मेँ पढे अमीरोँ के बच्चोँ को ही बाटी जा रही हैँ! ऐसे मेँ अगर मेरा बच्चा सरकारी बिजली के खँबे के नीचे पढ कर अँग्रेज़ी सीख भी जाता है तो, उसे लाखोँ रुपये खर्च कर महँगी डिग्रीयाँ दिलाना मेरी औकात के बाहर की बात है! मेरे पास तो दो वक्त की रोटी का भी जुगाड नहीँ! तो फीस के लिये लाखोँ रुपये कहाँ से लाउँगा? क्योँकि मैँ एक आम आदमी हूँ! और मेरे बच्चे आम ही बनने के लिये मजबूर हैँ! खास तो ठाकरे साहब हैँ....! खास तो किँग खान हैँ.....! क्योँकि ठाकरे साहब ये जानते हैँ कि राजनीति के लिये ताकत का इस्तेमाल कब और कहाँ करना चाहिये! किँग खान भी इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैँ, कि विवादोँ से फिल्मोँ को फायदा ही नहीँ पहुँचता बल्कि अवार्ड भी मिलते हैँ! विदेशोँ मेँ जाकर अब वो ये बता सकते हैँ कि अपने ही देश मेँ उनकी फिल्म का कितना विरोध हुआ! खास है हमारी पुलिस जो अँडरवर्ल्ड और आतँकीयोँ से लडॅने मेँ कभी इतनी तैयार नहीँ दिखी जितनी इस फिल्म को रिलीज़ कराने के लिये मुस्तैद है! खास है हमारी सरकार जो आम आदमी यानि मेरे लिये साठ सालोँ से सोच-सोच कर बूढी हो गई है! मेरा क्या है मैँ तो आम आदमी हूँ! मैँ महँगाई के बोझ तले दबा जा रहा हूँ! लेकिन किसी को इसकी कोई फिक्र नहीँ! उल्टा सरकार कीमतेँ बढाने की तैय्यारी कर रही है! आटा-दाल मेरी पहुँच से बाहर की बात हो गये हैँ! चीनी खाना तो मैँ शरद पँवार साहब के सुझाव देने के पहले ही छोड चुका था! क्योँकि मैँ जानता हूँ कि ज़्यादा चीनी से डयबटीज़ हो जाता है! पर क्या पँवार साहब ने चीनी खाना छोड दिया? वो तो पोरबँदर के एक साधारण दीवान का बेटा था जो कहने के पहले खुद उस पर अमल करता था! पँवार साहब तो बडे उद्योगपति हैँ! और भारत सरकार के इतने बडे मँत्री हैँ! उनहेँ भला चीनी छोडने की क्या ज़रूरत? बीते सालोँ मेँ जब मुझे गन्ने के दाम नहीँ मिल रहे थे...मैँ यूपी के चौराहोँ पर मेहनत से उपजाई गन्ने की फसल जला रहा था....तब भी तो चीनी मिलोँ के मालिक सरकार से मिलकर मिठाईयाँ खा रहे थे! उस वक्त भी सरकार मेरी आत्महत्याओँ से बेफिक्र थी! विदर्भ मेँ भी तो मैँ ही मर रहा था! उत्तर भारतीय और मराठी किसान दोनोँ के दुख-दर्द बाँटने वाला कोई नहीँ था! क्योँकि दोनोँ ही रूपोँ मेँ वो मैँ ही तो था आम आदमी! और आज भी जब महँगाई और बेरोज़गारी मुझे निगल रही है...मुझे बचाने वाला कोई नहीँ है! क्योँकि माई नेम इस कामन मेन! ए पूअर कामन मेन ओफ इँडिया! मेरे दर्द और भी हैँ क्या आपके पास सुनने का वक्त है?

Monday, 8 February 2010

भ्रष्टाचार अनँत...भ्रष्टाचार कथा अनँता!

आयकर विभाग इन दिनोँ देश भर मेँ छापेमारी कर रहा है! मध्यप्रदेश के बाद अब छत्तीसगढ के आला अधिकारी भी आयकर विभाग के निशाने पर आ गये हैँ! आईएस अधिकारियोँ और नेताओँ के गद्दोँ और बाथरूमोँ मेँ कुबेर के खजाने मिले होँ ये कोई पहली बार नहीँ हुआ है! लेकिन मीडिया मेँ इन खबरोँ के आने के बाद काफी लोगोँ ने अपने बेडरूम और बाथरूम की सफाई करवा दी है! कम से कम मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ के बडे अधिकारी अब कोई रिस्क लेने के मूड मेँ नहीँ हैँ! ये बात दीगर है कि इन भ्रष्ट अधिकारियोँ का सूचना तँत्र इतना व्यापक है कि छापे-मारी की कार्रवाई से पहले ही इनहेँ सूचना मिल जाती है! लेकिन फिर भी सावधानी मेँ ही समझदारी है ये बात हमारे जीनियस अधिकारी अच्छी तरह जानते हैँ!
लेकिन शिवसेना, शाहरुख और राहुल गाँधी की महाभारत के बीच इस मुद्दे की चर्चा कोई करना नहीँ चाहता! हालाकि चर्चा तो राहुल के मुँबई दौरे के वक्त पाकिस्तान मेँ मनाये गये काशिमीर डे की भी नहीँ हुई! जहाँ बडे पैमाने पर भारत विरोधी नारे लगाये गये थे! और भारत मेँ आतँकवाद फैलाने के लिये लश्कर की जम कर पीठ थपथपायी गई थी! कश्मीर के एक अलगाववादी नेता ने इस सभा को फोन पर एड्रेस भी किया था! पाकिस्तान की सरकार ने भी प्रदर्शनोँ का समर्थन किया! इस सभा मेँ भारत पर आतँकी हमले करने वाले मोहममद हामिद सईद सहित कईँ आतँकी भी शामिल हुए थे! लेकिन हमारी सरकार ने पाकिस्तान से इसका कोई जवाब नहीँ माँगा! उससे भी चकित कर देने वाली बात ये कि उसी दिन हमारी सरकार ने पाकिस्तान के सामने बातचीत की पेशकश की! पाकिस्तान मेँ खुलेआम भारत पर हमले करने वाले आतँकी भारत के खिलाफ जिहाद यानि युध्द करने के लिये वहाँ की आवाम को उकसा रहे हैँ! पाकिस्तानी सरकार उनहेँ गिरफ्तार करने की बजाय उनके समर्थन मेँ बयान दे रही है ( पाकिस्तान के प्रधानमँत्री ने उसी दिन कश्मीर की आज़ादी के समर्थन मेँ बयान दिया था!)!....... हमारी सरकार उसी दिन पाकिस्तान से बातचीत की पेशकश करती है! और.......... हमारा मीडिया राहुल के मुँबई दौरे का चँदबरदई स्टाईल मेँ गुणगान करते नहीँ थकता! ये भ्रष्टाचार का कौन सा प्रकर है इसका फैसला आप ही कीजिये! फिलहाल मैँ बात कर रहा हूँ बिहार की!
बिहार मेँ इन दिनोँ मुख्यमँत्री नितिश कुमार आपरेशन क्लीन बिहार चला रहे हैँ! ( इसकी चर्चा भी मीडिया मेँ कहीँ नहीँ है!) नितीश खुश हैँ कि बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम 2009 को मँजूरी देने के लिये केन्द्र सरकार सहमत हो गई है! अब उनकी नज़र भ्रष्टाचार की कमाई से बनी आलीशान इमारतोँ पर है! इस कानून के लागू होने के बाद इन इमारतोँ को जब्त कर नितीश इनमेँ गरीब बच्चोँ के लिये सरकारी स्कूल खोल देँगे!
अपराधोँ के कुछ वर्गोँ के जल्द निपटारे और भ्रष्टाचार से जुडी सँपत्ति के अधिग्रहण को आसान बनाने के लिये विशेष न्यायलयोँ का गठन इस विधेयक के माध्यम से किया जायेगा! विधेयक की प्रस्तावना मेँ कहा गया है कि चूँकि सरकार के पास ऐसा मानने के पर्याप्त कारण मौजूद हैँ कि सार्वजनिक पदोँ पर कार्य या कार्य कर चुके व्यक्तियोँ, जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 2ग के तहत लोकसेवक भी हैँ, ने बडी सँख्या मेँ अकूत धन अर्जित किया है, जो उनकी आय के ज्ञात स्त्रोतोँ से मेल नहीँ खाता है! इसलिये अब राज्य सरकार अधिसूचना जारी कर पर्याप्त सँख्या मेँ विशेष न्यायालयोँ की स्थापना करेगी! इन विशेष न्यायलयोँ की अध्यक्षता पटना उच्च न्यायाल की सहमति और राज्य सरकार की और से निर्दिष्ट न्यायाधीश करेँगे! बिहार मेँ सता मेँ आने के बाद मुख्यमँत्री नितीश कुमार के सामने हर स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार पर विराम लगाने की चुनौती मुँह बाँये खडी थी! सच तो यही है कि आज़ादी के बाद से ही बिहार मेँ घोटालोँ की बुनियाद पड गई थी! छोआ घोटाले से शुरु हुआ ये सिलसिला 2004 के बाढ राहत घोटाले तक जारी रहा! देर आये, दुरुस्त आये वाली कहावत यहाँ चरितार्थ होती दिखती है! क्योँकि बिहार नहीँ ये तो पूरे देश मेँ पहले ही हो जाना चाहिये था! आपरेशन क्लीन बिहार की शुरुआत कर नितिश ने बाकी राज्योँ को भी एक राह दिखाई है! अब देखना ये है कि बाकी राज्य पाटॅलिपुत्र से शिक्षा लेते हैँ या नहीँ

Sunday, 7 February 2010

नक्सलवाद को आतँकवाद के चश्मेँ से ना देँखे!

केन्द्र सरकार ने ये स्पष्ट कर दिया है कि नक्सलवाद और आतँकवाद से सख्ती से निपटा जायेगा! गृहमँत्री ने इन दोनोँ को ही आँतरिक सुरक्षा के लिये बडा खतरा बताया है! गौर करने वाली बात ये है कि दोनोँ समस्याओँ को एक ही चश्मेँ से देखा जा रहा है! जानकार ये जानते हैँ कि इस बयान मेँ कुछ भी नया नहीँ है! इस तरह के बयान आये दिन जारी हो रहे हैँ! हमारे नीति निर्माता ये बात क्योँ नहीँ समझते कि बयानोँ से समस्याएँ खत्म नहीँ होती! सँसद पर हमले से लेकर 26/11 तक आतँकवाद से सख्ती से निपटने के कितने बयान जारी हुए? लेकिन यहाँ मैँ बात सिर्फ नक्सलवाद की करना चाहूँगाँ! कभी हमारे नीति निर्माताओँ ने इस बात पर विचार नहीँ किया कि बँगाल के नक्सलवाडी से शुरु हुआ एक छोटा सा आँदोलन देश की आँतरिक सुरक्षा के लिये इतना बडा खतरा कैसे बन गया कि आज सरकार आतँकवाद से भी पहले नक्सलवाद के सफाये की बात कर रही है! इससे भी बडा सवाल ये है कि क्या नक्सलवाद को ताकत के बल पर खत्म किया जा सकता है? नक्सलवाद को चँबल के दस्यु समस्या की तर्ज़ पर खत्म करने को तैयार बैठी हमारी सरकार ये नहीँ समझ पा रही कि नक्सली चँबल के डाकू नहीँ हैँ जो एक बार खत्म हो गये तो हमेशा के लिये आतँक का खात्मा हो जायेगा! दरासल ये एक विचारधारा है! आपने दस नक्सली मारे तो व्यवस्था से आक्रोशित सौ नौजवान नक्सलवाद की राह पकड लेँगे! तब आप क्या करेँगे? कितनोँ को मारेँगे? कितना खून बहायेँगे? लेकिन अगर आपने नक्सली विचारधारा को खत्म कर दिया तो कोई नौजवान सुनहरा भविष्य छोड कर क्योँ बँदूक उठायेगा भला? ये बात सौ फीसदी सच है कि आदिवसियोँ के साथ लँबे समय से अन्याय होता आया है! आदिवासी समाज बहुत ही भोला और सीधा होता है! लेकिन पूँजीपतियोँ ने इनके इस भोलेपन का फायदा उठाया है! मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ के आदिवासी गाँवोँ की दुर्दशा देख कर कोई भी इस बात का सहज ही अँदाजा लगा सकता है कि आदिवासियोँ के साथ किस हद तक छ्ल हुआ है! आदिवासियोँ के कल्याण के लिये सरकार की तरफ से अरबोँ रुपयोँ की योजनायेँ सिर्फ कागज़ोँ पर ही कार्याँवित हुई हैँ! यानि गरीब आदिवासियोँ का हक भ्रष्ट व्यवस्था की बलि चढ गया! यहाँ तक कि उनकी ज़मीनेँ भी हडॅप ली गई! जँगल पर उनहेँ अधिकार की बात आज़ादी के पाँच दशकोँ तक नहीँ हुई! इसी व्यवस्था के प्रति आक्रोश ने ही नक्सलवाद को जन्म दिया है! दरअसल हम हर चीज़ का इलाज एलोपौथी से करना चाहते हैँ! हम बीमारी को मिटाना चाहते हैँ उसके कारण तक पहुँचने की कोशिश ही नहीँ करते! नक्सलवाद का इलाज एलोपैथी नहीँ होम्योपैथी है! इस समस्या के कारण को समझ कर उन कारणोँ का इलाज करना होगा जो इस समस्या को बढावा दे रहे हैँ! सतही बातेँ करने से कुछ नहीँ होगा! ना दोषारोपण करने से कुछ होने वाला है! हम कश्मीर मेँ होम्योपैथिक इलाज कर रहे हैँ! जहाँ एलोपैथिक ट्रीतमेँट की ज़रुरत है! आदिवासी हमारे अपने हैँ! हमेँ नहीँ भूलना चाहिये “आदिवासी विद्रोह” जिसने उस वक्त अँग्रेजोँ को चुनौती दी थी जब सारा देश उनकी ताकत के आगे हथियार डाल चुका था!
वोट बैँक की राजनीति मेँ आदिवासी वर्ग कहीँ पीछे रह गया! आज झूठे एसटी सर्टिफिकेट के दम पर कईँ लोग उँचे सरकारी ओहदोँ पर बैठे हैँ! इससे अँदाज़ा लगायाअ जा सकता है कि हमारी व्यवस्था ने आदिवासियोँ को किस हद तक छ्ला है! सच्चे आदिवासी तो दो वक्त की रोटी को मोहताज हैँ! वो अपने जँगलोँ से और अपनी ज़मीनोँ से बेदखल कर दिये गये हैँ! आप रेलवे की पटरियोँ की मरमत्त का काम करते आदिवासी परिवारोँ को अकसर देखते होँगे! पिताजी की पोस्टिँग आदिवासी इलाकोँ मेँ होने के कारण उन लोगोँ की दुख तकलीफोँ को नज़दीक से देखा है मैँने! इसके बाद जब टीवी पत्रकारिता की शुरुआत की तो आँध्र प्रदेश मेँ काम करने का मौका मिला! जो आदिवासी बहुल इलाका है! हैदराबाद मेँ रह कर छत्तीसगढ के लिये जब बुलेटिन बनाये तो समझ आया छत्तीसगढ मेँ क्योँ पनप रहा है नक्सलवाद ? सलवा-जुडुम के नाम पर गरीब आदिवासियोँ का लहू बहते देखा! तो दिमाग मेँ बिजली सी कौँध गई! जब नक्सलियोँ से निपटने मेँ राज्य की पुलिस ने हाथ खडे कर दिये तो सरकार ने भोले-भाले आदिवासियोँ के हाथोँ मेँ ही बँदूक थमा दी! इसके बाद आये दिन आदिवासियोँ के साथ खूनी सँगर्ष की खबरेँ आने लगी! सलवा जुडुम कार्यकर्ताओँ को नक्सली चुन-चुन कर निशाना बना रहे थे! किसी को हाथ पैर बाँध कर गोली मार दी जाती थी, तो किसी को गाँव की चौपाल पर लटका दिया जाता था! सरकार और पुलिस मूक दर्शक बनी सब देख रही थी! आदिवासियोँ की सुरक्षा करने के बजाये उसने आदिवासियोँ के हाथोँ मेँ बँदूकेँ थमा दी थीँ! हमारे चैनल यानि ईटीवी के सिवाय कोई मीडिया इसकी रिपोर्टिँग नहीँ कर रहा था! क्योँकि दँतेवाडा, बस्तर, के ये इलाके नक्सलियोँ का गढ थे! और इतने इँटीरियर मेँ थे कि किसी भी राष्ट्रीय चैनल का नेटॅवर्क वहाँ तक नहीँ था! आपको ये जान कर हैरानी होगी कि बहुसँख्यक आदिवासी नक्सलियोँ के खिलाफ थे! इसीलिये वे सलवाजुडुम का समर्थन कर रहे थे! जबकि इस आँदोलन मेँ निर्दोष आदिवासी अकारण ही मारे जा रहे थे! अब भी वो विज़वल आँखोँ के सामने घूम रहे हैँ जब आये दिन दँतेवाडा और बस्तर के जँगलोँ मेँ हज़ारोँ आदिवासी स्वप्रेरणा से जुटते थे और नक्सलवाद के खिलाफ एकजुट होने का सँकल्प लेते थे! इनमेँ बच्चे बूढे और जवान सभी लोग थे! सलवा जुडुम और छत्तीसगढ के विकास को लेकर जब मैँने छत्तीसगढ के मुख्यमँत्री रमन सिँह से सवाल किये थे तो मुख्यमँत्री नहीँ बता पाये कि आदिवासियोँ के कल्याण के नाम पर बना आदिवासी राज्य छत्तीसगढ नक्सलवाद का गढ क्योँ बन गया? कमोबेश यही स्थिति झारखँड की भी है! आदिवासियोँ के कल्याण के नाम पर अलग राज्य बना कर भी अगर आप उनहेँ मूलभूत सुविधायेँ भी नहीँ दे सकते तो इसका सीधा सा मतलब ये है कि आपकी मँशा सही नहीँ है! शोषण से ही आक्रोष पांपता है आप शोषण रोक दीजिये आक्रोष स्वत: खत्म हो जायेगा! सलवाजुडुम का समर्थन करने वाला आदिवासी समाज कभी व्यवस्था का विरोधी था ही नहीँ! लेकिन व्यवस्था ने कभी उसकी मदद करने की इमानदार कोशिश नहीँ की! अब यदि उससे नाराज़ होकर कुछ लोगोँ ने हथियार उठा लिये तो उनसे मुकाबला करने के लिये गरीब आदिवासियोँ को हथियार देकर किनारा कर लेना और फिर उनकी मौत का तमाशा देखना क्या सही ठहराया जा सकता है? क्योँ नहीँ हमारी सरकारेँ आदिवासी इलाकोँ मेँ विकास कार्योँ पर ज़ोर देती है? क्योँ नहीँ वहाँ बिजली, पानी, सडक, स्कूल, अस्पताल जैसी मूलभूत सुविधायेँ मुहैया करवाती है? क्योँ नहीँ वहाँ ग्राम न्यायालय स्थापित किये जाते और आदिवासियोँ का शोषण करने वालोँ को कडे दण्ड दिये जांते ? सच है आज लोकतँत्र से ज्यादा जरुरत गुड गवर्नेँस की है!

Saturday, 6 February 2010

क्या युवराज करेँगे लोकतँत्र का इलाज?

अगर सरकार खुद ये स्वीकार कर रही है कि आज़ादी के छ्ह दशक के बाद चालीस करोड हिँदुस्तानी गरीबी की रेखा के नीचे बसर कर रहे हैँ तो ये लोकतँत्र किसके लिये हैँ इस बात का अँदाज़ा लगाया जा सकता है! ज़्यादा दिन नहीँ हुए जब दिल्ली की सरकार को कोर्ट ने कामनवेल्थ गेम्स के नाम पर हाड कपा देने वाली सर्दी मेँ गरीबोँ के आशियाने तोडने पर फटकार लगाई थी! मतलब साफ है कि लोकतँत्र की आड मेँ पूँजीवादी ताकतेँ अपना हित साध रही हैँ! मध्य प्रदेश मेँ एक आईएस दम्पत्ति के गद्दोँ से करोडोँ रुपये बरामद हुए! लेकिन सरकार कार्रवाई के लिये जाँच रिपोर्ट का इँतज़ार कर रही है! यानी हमारा सिस्टम भी ताकतवर का साथ देता है! और कमज़ोर को सज़ा देता है! ये वही मुख्यमँत्री शिवराज हैँ जो थोडी सी अनियमितता पर कर्मचारियोँ को कडी सज़ा देते हैँ! लेकिन इस बार मामला आईएएस साहब का है! ऐसे मेँ राहुल सिस्टम को कैसे बदलेँगे ये तो राहुल ही जानेँ! क्योँकि उनके पिता राजीव गाँधी भी इन मुद्दोँ पर कुछ ऐसी ही क्राँतिकारी सोच रखते थे! ये बात दीगर है कि उनके रहते काँग्रेस नेताओँ पर भ्रष्टाचार और घोटालोँ के कम आरोप नहीँ लगे! नेहरु भी देश मेँ समाजवाद लाना चाहते थे! इँदिरा भी गरीबी हटाना चाहती थी! राजीव भ्रष्टाचार को खत्म करना चाहते थे! इसीलिये एक बार उनहोँने कह दिया था कि गरीबोँ के लिये उपर से चलने वाला एक रुपया जब गरीबोँ तक पहुँचता है तो वह दस पैसे रह जाता है! उस वक्त इस बयान के लिये राजीव गाँधी की खूब वाह वाही हुई थी! मैँ छोटा था! स्कूल मेँ पढता था..! ज्यादा समझ नहीँ थी तब! लेकिन इस बात पर तब मुझे आश्चर्य हुआ था कि देश के प्रधानमँत्री खुद इतने बडे पैमाने पर भ्रष्टाचार को स्वीकार रहे हैँ तो इसके लिये ज़िम्मेदार कौन है? क्या भ्रष्टाचार ना रोक पाने के लिये सरकार की कोई ज़िम्मेदारी नहीँ बनती? अगर सरकार मेँ शामिल मँत्री ही घोटालोँ मेँ लिप्त पाये जायेँ तो क्या प्रधानमँत्री ऐसे भ्रष्ट्र मँत्रीयोँ को नियुक्त करने के लिये दोषी नहीँ है? कहने की ज़रुरत नहीँ है कि राजीव और नरसिँहा राव सरकार मेँ रिकार्ड दागी मँत्री थे! कुछ दिनोँ पहले जब राहुल गाँधी ने कहा कि नरेगा के लिये केँद्र से चला पैसा गरीबोँ तक पूरी तरह नहीँ पहुँच रहा तो मुझे राजीव गाँधी का वो पुराना बयान याद आ गया! मतलब साफ है नेहरु समाजवाद लाना चाहते थे! लेकिन समाजवाद पीढीयाँ के बीत जाने के बाद भी नहीँ आया! इँदिरा गरीबी मिटाना चाहती थीँ! लेकिन इँदिरा के बाद भी गरीबी नहीँ मिटी! राजीव भ्रष्टाचार मिटाना चाहते थे! राजीव के बाद अब वही बात राहुल दोहरा रहे हैँ! ये बात दीगर है कि राहुल गरीबी और समाजवाद की भी बात कर रहे हैँ! नेहरु से लेकर राहुल के युग तक जो बडा परिवर्तन हुआ वो ये कि समाजवाद तो नहीँ आया, लेकिन पूँजीवाद मजबूत हुआ! गरीबी तो नहीँ हटी लेकिन गरीब बढ गये! भ्रष्टाचार नहीँ मिटा उल्टा उसका पोषण हुआ! अब अपने नाज़ुक काँधोँ पर तीन पीढीयोँ का बोझ लिये काँग्रेस के युवराक क्या कमाल कर पायेँगे ये देखना दिलचस्प होगा!

बीमार है हमारा लोकतँत्र!

राहुल गाँधी की तारीफ करनी होगी! क्योँकि काँग्रेस के युवराज इन दिनोँ वो सवाल उठा रहे हैँ जिसे कहने की हिम्मत किसी नेता ने आज तक नहीँ दिखाई! राहुल खुले-आम ये कहते हैँ कि काँग्रेस सहित देश के किसी भी दल मेँ आँतरिक लोकतँत्र नहीँ है! राहुल ये कहने से भी नहीँ चूकते कि राजनीति मेँ परिवारवाद हावी है!
अगर काँग्रेस का इतिहास उठा कर देखेँ तो आज़ादी के बाद से काँग्रेस मेँ परिरवाद का ही बोल-बाला रहा! आज़ादी के बाद काँग्रेस मेँ आँतरिक लोकतँत्र खत्म सा हो गया था! जो थोडा बहुत बचा था वो इँदिरा गाँधी ने खत्म कर दिया! राहुल गाँधी कहते हैँ कि राजनीति मेँ इसलिये हैँ क्योँकि वो एक राजनैतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैँ! उनके मुताबिक राजनीति मेँ आने के चार रास्ते हैँ, पहला परिवारवाद, दूसरा पैसा, तीसरा शक्ति, और चौथा सँघर्ष! वो ये भी बताते हैँ कि चौथा रास्ता सबसे मुश्किल है! और उसमेँ बहुत वक्त भी लगता है! यानी काँग्रेस के युवराज देश मेँ लोकतँत्र का सच जानते हैँ! ये उतना चौकाने वाला नहीँ है जितना ये कि वो इस सच को बताने से नहीँ चूक रहे! राहुल काँग्रेस मेँ आँतरिक लोकतँत्र की वकालत कर रहे हैँ इसी लिये अब पार्टी मेँ पदाधिकारियोँ के लोकताँत्रिक तरीके से चुनाव की बात हो रही है! लेकिन सवाल ये है कि ये बात राहुल के कहने के बाद ही क्योँ हुई? उससे भी बडा सवाल अगर काँग्रेस सहित तमाम राजनैतिक दलोँ मेँ आँतरिक लोकतँत्र ही नहीँ है तो देश मेँ लोकतँत्र कहाँ बचता है! राहुल ने व्यवस्था की उस नस को पकडा है जिसकी वजह से देश मेँ लोकतँत्र बीमार है! जी हाँ अगर हमारे राजनीतिक दलोँ मेँ ही आँतरिक लोकतँत्र नहीँ है तो फिर देश मेँ लोकताँत्रिक व्यस्था की बात करना आईने से मुँह चुराने की तरह है! सच्चाई ये है कि देश मेँ ऐसा कोई राजनैतिक दल नहीँ है जो जो परिवारवाद की जकड से मुक्त हो! सबसे दुखद पहलू ये है कि तमाम राजनैतिक दल प्राईवेट लिमिटेड कँपनीयोँ की तरह किसी एक परिवार की जागीर बन कर रह गये हैँ! मायावती बीएसपी की मालकिन हैँ तो मुलायम सपा के मालिक! आरजेडी मेँ लालू का सिक्का चलता है! तो डीएमके के लिये करुणानिधी भगवान हैँ! एआईडीएमके की मालकिन हैँ जयललिता! बाला साहब ठाकरे शिवसेना के लिये सब कुछ हैँ तो टीडीपी सहित दक्षिण की भी सभी पार्टीयाँ परिवारवाद की जकड मेँ हैँ1 ये सिर्फ चँद नाम हैँ लेकिन अछूता कोई नहीँ! कहने की ज़रूरत नहीँ कि देश के दोनोँ प्रमुख राजनैतिक दलोँ मेँ भी आँतरिक लोकतँत्र ना के बराबर है! जहाँ बीजेपी सँघ के इशारोँ पर चलती है तो वहीँ काँग्रेस मेँ सोनिया का कद पीएम और राष्ट्रपति से भी उँचा है!
ऐसे मेँ अगर काँग्रेस के युवराज भारतीय राकनीति की बबसे पुरानी बिमारी के बारे मेँ खुल कर बात कर रहे हैँ तो इसका स्वागत होना चाहिये! क्योँकि जब तक इस बीमारी का इलाज नहीँ होगा भरतीय राजनीति मेँ अच्छे नेताओँ का पदार्पण नहीँ हो सकता! कहने की ज़रूरत नहीँ है कि हमारे देश मेँ एक इमानदार व्यक्ति को कोई राजनैतिक दल टिकट तक देना पसँद नहीँ करता ! जबकि अपराधियोँ को धडल्ले से सँसद पहुँचाया जा रहा है! भारतीय राजनीति के बढते अपराधिकरण का केवल एक ही इलाज है! और वो है पार्टियोँ मेँ आँतरिक लोकतँत्र की स्थापना! हमेँ आज अच्छे नेताओँ की सख्त ज़रूरत है! लेकिन सवाल ये है कि अच्छे नेता आयेँगे कहाँ से? क्या हमारा सिस्टम ऐसा है जो अच्छे नेता पैदा कर सके? इस बात का जवाब काँग्रेस के युवराज राहुल गाँधी दे रहे हैँ! अगर हमारा सिस्टम राजनीति मेँ मधु कोडा जैसे नेता पैदा कर रहा है......अगर हमारा सिस्टम बटवारे की राजनीति को बढावा दे रहा है......अगर हमारा सिस्टम सँसद मेँ चालीस फीसदी से भी ज़्यादा खूँखार अपराधियोँ को पहुँचा रहा है....... अगर हमारा सिस्टम राजनीति मेँ परिवारवाद को पोषित कर रहा है......अगर हमारे सिस्टम ने देश को चलाने वाले राजनैतिक दलोँ को प्राईवेट लिमैटेड कँपनीयोँ मेँ तब्दील कर दिया है........अगर हमारे सिस्टम ने देश से आँतरिक लोकतँत्र को खत्म कर दिया है तो इस सिस्टम को हमेँ खत्म कर देना चाहिये! और जन्म देना चाहिये एक नई व्यस्था को ...एक ऐसी व्यवस्था जो सच्चे अर्थोँ मेँ लोकताँत्रिक हो! ये आवाज़ जनता की तरफ से ही उठनी चाहिये कि काँग्रेस ही नहीँ देश की सभी राजनैतिक पार्टियोँ मेँ आँतरिक लोकतँत्र की स्थापना की जाये! चुनावोँ के वक्त टिकिट वितरण पूरी तरह से पारदर्शी बनाया जाये! और किसी भी स्थिति मेँ अपराधियोँ को टिकिट ना दिया जाये! भारत मेँ बीमार पडी लोकताँत्रिक व्यवस्था के उपचार की शुरुआत राजनैतिक दलोँ मेँ आँतरिक लोकतँत्र की स्थापना से की जा सकती है! अब देखना है राहुल अपने ही दल मेँ लोकतँत्र की स्थापना मेँ कितने कामयाब हो पाते हैँ?

Thursday, 4 February 2010

शिवसेना और शाहरुख की महाभारत का सच...!

एक अजीबो गरीब स्थिति देख रहा हूँ इन दिनोँ! समझ नहीँ आता क्या करूँ? अमर प्रेम कथा अभी खत्म भी नहीँ हुई कि शाहरुख पर महाभारत शुरु हो गई? हिँदुस्तान मेँ जिस तरह मीडिया का दुरुपयोग हो रहा है वैसा शायद ही दुनिया के किसी देश मेँ होता होगा! सारा देश जब महँगाई की मार से कराह रहा है उस वक्त हमारे मीडिया मेँ शाहरुख और शिव सेना का डेली सोप चल रहा है! कल किसने क्या कहा था? आज किसने क्या कहा और अगले दिन कौन क्या कहने वाला है? बचकाने बयान...और उनसे भी बचकाना उन बयानोँ का प्रसारण! क्या इस वक्त देश मेँ कोई खबर नहीँ? महँगाई, गरीबी, अशिक्षा, बेरोज़गारी और उससे भी बढकर भ्रष्टाचार! जी हाँ भोपाल मेँ आईएस दम्पत्ति के गद्दोँ से करोडोँ रुपये बरामद हुए हैँ! लेकिन ये कोई खबर ही नहीँ बनी! ये कोई मुद्दा नहीँ बना! बाला साहब ने सामना मेँ क्या लिखा? शाहरुख ने क्या कहा? ये मुद्दा बन गया! राष्ट्रीय मुद्दा? क्या मज़ाक नहीँ हो रहा इस देश की जनता के साथ! कौन नहीँ जानता कि ठाकरे और शाहरुख दोनोँ ही अपना मतलब साध रहे हैँ? क्या शाहरुख पानी मेँ रह कर मगरमच्छ से बैर ले सकते हैँ? क्या ठाकरे नहीँ जानते कि वो जो कर रहे हैँ या जो लिख रहे हैँ वो मर्यादित है या नहीँ! जानते हैँ सब जानते हैँ.....ठाकरे भी....शाहरुख भी और मीडिया भी! शिवसेना अपनी राजनीति चमका रही है! शाहरुख अपनी फिल्म चमका रहे हैँ मीडिया टीआरपी चमका रही है! और बेचारी जनता बेवकुफ बन रही है! ठाकरे सोनिया को ताना दे रहे हैँ...राहुल को भी नहीँ बख्श रहे! महाराष्ट्र मेँ काँग्रेस की सरकार है! लेकिन काँग्रेस चुप है! चुप ही नहीँ वो खुश भी है! कुछ दिन पहले महँगाई के मुद्दे पर केन्द्र सरकार के हाथ पाँव फूल रहे थे! उससे जवाब देते नहीँ बन रहा था! लेकिन अब शाहरुख पर मची इस महाभारत का फायदा उठा कर चुपके से तेल और डीज़ल की कीमतेँ बढाने की तैयारी हो रही है! क्योँकि जनता का ध्यान तो अब शिवसेना और शहरुख पर है! महँगाई को तो वो भूल गई है! इसीलिये हमारे विद्वान गृह मँत्री भी शाहरुख-शिवसेना विवाद मेँ कूद पडे हैँ! वो खुल कर शाहरुख का समर्थन कर रहे हैँ! ये बात अलग है कि महँगाई पर वो कुछ नहीँ बोलते! किसानोँ की आत्म हत्या पर कुछ कहने के लिये उनके पास वक्त नहीँ होता!
कैसी विडम्बना है? गँगा का प्रदूषण कोइ मुद्दा नहीँ है! कालाहाँडी की भुखमरी कोई मुद्दा नहीँ है! खत्म होते बाघ कोई मुद्दा नहीँ है! बढती जनसँख्या कोई मुद्दा नहीँ है! बढते अपराध कोई मुद्दा नहीँ है! भ्रष्टाचार मेँ डूबे नेता और अफसर ,कोई मुद्दा नहीँ है! न्याय की आस मेँ दम तोडते गरीब....कोई मुद्दा नहीँ है! चरमाराई कानून व्यस्था कोई मुद्दा नहीँ है! गाँवोँ मेँ चिकित्सा के अभाव मेँ दम तोडते मरीज़ कोई मुद्दा नहीँ है! सडकेँ राशन, स्कूल, खेती, तरक्की.....! क्या करेँगे इन सब की बात करके? लेकिन बाटला हाउस......? मुद्दा है.......! बहुत बडा मुद्दा है! क्या अँतर रह जाता है काँग्रेस और शिव सेना मेँ? दोनोँ ही तो बटवारे की राजनीति कर रहे हैँ! बाटला हाउस मुटभेड के वक्त केन्द्र और राज्य दोनोँ जगह काँग्रेस की ही सरकार थी तो क्या काँग्रेस के चाणक्य दिग्विजय सिँह जवाबदारी लेँगेँ? कौन नहीँ जानता कि ये बयान बिहार चुनावोँ के मद्देनज़र दिया गया है! पहले दिग्विजय का आज़मगढ जाना, फिर मुटभेड मेँ मारे गये आरोपीयोँ के घर जाकर वहाँ से बयान जारी करना....क्या साबित करता है? चुनावोँ के वक्त हमारे नेता साम्प्रादायिकता से जुडी बातोँ को ही क्योँ हवा देते हैँ? क्या लोकतँत्र मेँ नेताओँ का मकसद सिर्फ और सिर्फ चुनाव जीतना ही रह गया है? मुझे लगता है अब वक्त आ गया है न्यायपालिका को इसमेँ दखल देना चाहिये! मीडिया इन बयानोँ को प्रमुखता के साथ दिखाता है? अच्छी खबरोँ को दबाना और बुरी खबरोँ को बार-बार दिखाना....! क्या सच मेँ हम पत्रकारिता कर रहे हैँ? ज़रा सोचिये!

Saturday, 5 December 2009

भारत को क्या चाहिये....मँदिर या मस्जिद?

लो फिर आ गया छह दिसम्बर! किसी के लिये ये काला दिन है तो किसी के लिये विजय दिवस? लेकिन अयोध्या...? उसके लिये ये कौन सा दिन है? कोई जा कर पूछे अयोध्या से! उस अयोध्या से जहाँ जन्मेँ थे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम! वो राम जो भारत की आत्मा मेँ बसते हैँ! वही राम घर-घर मेँ पूजे जाते हैँ! वो तुलसी के राम हैँ....वो अहिल्या के राम हैँ,,,वो केवट के भी राम हैँ....हाँ वही राम जिनका नाम लेकर हसते हुए गाँधी ने अपने सीने पर गोलीयाँ खाई थी! ताकी इस देश की एकता और सँस्कृति को बचाया जा सके! तो क्या गाँधी का बलिदान काम आया?
मातम मनाने वाले आज मातम मनायेँगे...! उनके लिये ये बरसी है! बरसी जो हर बरस आती है! उनहेँ रोने और बिलखने का मौका देकर जाती है! उनहेँ मौका देती है इस बात का कि वो बता सकेँ इस देश मेँ अल्पसँख्यकोँ पर कितने अत्याचार हो रहे हैँ! उनके धार्मिक स्थलोँ को तोडा जा रहा है! वो कितने असुरक्षित हैँ! ये दिन उनहेँ राजनीति करने का एक अहम मौका देता है इसलिये इस दिन को तो कभी भुला ही नहीँ सकते! लेकिन हैरानी की बात ये है कि आस्ट्रेलिया महाद्वीप के बराबर जनसँख्या वाले वर्ग को अल्पसँख्यक बता कर उसे राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग करने का दुस्साहस करते हैँ और कोई उनहेँ कुछ नहीँ कहता! यही तो भारत की विशेषता है कि यहाँ निर्माण और विनाश करने वाली ताकतेँ एक साथ रहती हैँ!
राम थे तो रावण भी था! कृष्ण थे तो कँस भी था! गाँधी थे तो जिन्ना भी था! गाँधी ने प्रेम का सँदेश दिया तो जिन्ना ने नफरत को फैलाया! गाँधी ने अहिँसा को पूजा तो जिन्ना ने प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस मनाया! राम ने रावण का वध किया तो कृष्ण ने कँस का! लेकिन गाँधी, जिन्ना की नफरत का वध नहीँ कर पाये! कह सकते हैँ कि राम और कृष्ण तो अवतार थे लेकिन गाँधी कोई अवतार नहीँ थे... इसलिये गाँधी की अहिँसा जिन्ना की नफरत के आगे जीत नहीँ पाई! लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीँ है कि जिन्ना सही थे! जिस नफरत को हथियार बना कर जिन्ना ने पाकिस्तान लिया था आज आधी शताब्दी बीत जाने के बाद भी पूरा पाकिस्तान उसी नफरत की आग मेँ जल रहा है! शायद ये उन मासूमोँ की आहेँ हैँ जो बँटवारे की आग मेँ अपना सब कुछ लुटा बैठे!
भारत की स्वतंत्रता का इतिहास पढाने से ज्यादा ज़रूरी है कि इस देश की नई पीढी को बँटवारे का इतिहास पढाया जाये! उसे कभी ये क्योँ नहीँ बताया जाता कि क्योँ हुआ था देश का बटवारा? और क्या हुआ था बटवारे के बाद? मुझे अपने स्कूल के एक शिक्षक की वो बात याद आती है जो हमेँ इतिहास पढाया करते थे....वो कहा करते थे कि “इतिहास की अच्छी बातोँ को चाहे भुला दो.... लेकिन उसकी बुरी बातोँ को कभी नहीँ भुलाना! क्योँकि इतिहास खुद को दोहराता है!”
हाँ अयोध्या का इतिहास गुजरात मेँ दोहराया गया! लेकिन सवाल ये है कि ये इतिहास कब तक खुद को दोहरायेगा? आखिर हम कब इतिहास से सबक लेकर अपनी पुरानी गलतियॉ को दोहराना बँद करेँगे? कब तक हम अल्पसँख्यक - बहुसँख्यक, अगडे –पिछडे का रोना रोते रहेँगे? किसी को मँदिर चाहिये तो किसी को मस्जिद..! आज़ादी के वक्त हमारी जनसँख्या तीस करोड थी और आज चालीस करोड हिँदुस्तानी गरीबी की रेखा के नीचे बसर कर रहे हैँ! क्या सच मेँ हम विकास की तरफ बढ रहे हैँ! अगर ये विकास है तो ये कैसा विकास है जो सिर्फ एक वर्ग विशेष का ही भला कर रहा है और दूसरा वर्ग मूल्भूत सुविधाओँ के लिये भी तरस रहा है! हम आखिर ये क्योँ नहीँ समझ पा रहे कि आज हमारे सामने असली मुद्दे और असली चुनौतियाँ क्या हैँ?
द्वितीय विश्व युध्द के बाद बरबाद हो चुके देश जर्मनी और जापान थोडे ही समय मेँ फिर से दुनिया की महा शक्ति बन बैठे हैँ! और हम......? हम आठ नौ फीसदी की ग्रोथ रेट पर फूले नहीँ समा रहे! जबकि हमारे बच्चे इँडिया गेट और लाल किले पर भीख माँगते देखे जा सकते हैँ! कामनवेल्थ के मद्देनज़र सरकार दिल्ली से झुग्गीयोँ और भिखारियोँ को हटा रही है ताकि विदेशी मेहमानोँ को असली भारत की तस्वीर ना दिखे! गरीबी हटाओ के नारे के साथ इँदिरा गाँधी सत्ता मेँ आई थीँ! इस बात को अरसा बीत चुका! लेकिन गरीबी नहीँ हटी...अब हमारी सरकार गरीबोँ को हटा कर विदेशी मेहमानोँ के सामने भारत की साख बचाने की कोशिश कर रही है! सुरसा के मुह की तरह बढती गरीबी... और विस्फोटक होती हमारी जनसँख्या.....क्या आपको लगता है कि मँदिर-मस्जिद इस देश के लिये कोई मुद्दा है? कभी गये हैँ हमारे गावोँ मेँ...? कभी देखा है गाँवोँ मेँ बसने वाला हमारा भारत किस दयनीय स्थिति मेँ है? देश की इकोनामी तेज़ी के साथ ग्रोथ कर रही है! और उसी तेज़ी के साथ ग्रोथ कर रही है महँगाई और बेरोज़गारी! तेज़ी से बधती इस कागज़ी इकोनामी का फायदा आखिर किसे मिल रहा है? आम हिँदुस्तानी तो आज भी बेहाल है! घर उसके लिये एक सपना बन कर रह गया है! उच्च शिक्षा उसकी पहुँच से बाहर की बात हो गई है! रोज़गार उसे मिलता नहीँ! उस पर आसमान छूती कीमतेँ...! आखिर वो जाये तो जाये कहाँ? करे तो करे क्या? गरीबोँ के लिये बडी- बडी योजनाएँ बनाने वाली हमारी सरकारोँ को कडाके की सर्दी मेँ फुटपाथोँ पर सोते लाखोँ स्त्री-पुरुष क्या दिखाई नहीँ देते? या वो माटी की सँतान नहीँ! तो फिर क्योँ हैँ वो भूखे और बेघर? कौन दूर करेगा उनके कष्टोँ को? और कब अँत होगा उनके कष्टोँ का? क्या गरीब की झोपडी मेँ रात बिता देने से गरीबोँ के कष्टोँ का अँत हो जायेगा? ये वोट की राजनीति भी कमाल चीज़ है गरीबोँ को भी ज़िँदा रखेगी और गरीबी को मरने भी नहीँ देगी!
कोई सामान्य बुध्दि का मानुष भी इस बात को अच्छी तरह समझ सकता है कि इस देश मेँ गरीबी हटाने और जनसँख्या नियँत्रण के लिये जितना धन-बल खर्च किया गया है यदि उसका दस प्रतिशत भी सही रूप मेँ इस्तेमाल किया जाता तो आज हमारे सामने एक सशक्त और खुशहाल भारत की तस्वीर होती! जो सही मायने मेँ विश्व शक्ति के रुप मेँ स्थापित होने की दावेदारी कर रहा होता! भला हो नार्मन बारलोग का जिनकी बदौलत भारत मेँ हरित क्राँति आयी और भला हो इस देश के अन्न्दाता (किसान ) का जिसने अपने पसीने से खेतोँ को सीँचा और खुद भूखा रह कर इस देश की विशाल जनसँख्या का पेट भरा! हमारे यहाँ विदेशोँ से पढ कर आये कुछ विद्वान ये दावा करते नहीँ थकते कि कुछ समय के बाद हमारी इकोनामी ग्रोथ चीन को भी पीछे छोड देगी! अति- अति उत्साह मेँ वो कागज़ी हकीकत और ज़मीनी हकीकत के अँतर को भुला देते हैँ! वो ये भूल जाते हैँ कि हमारी अर्थ व्यस्था आत्म निर्भरता से अब भी कोसोँ दूर है! गाँधी का ग्राम स्वराज का सपना अब भी अधूरा है! और जब तक वो पूरा नहीँ हो जाता इस देश मेँ राम राज्य नहीँ आ सकता! फिर आप अयोध्या मेँ मँदिर बनाने मेँ चाहे कामयाब क्योँ ना हो जायेँ?

Saturday, 28 November 2009

एक अनोखी मुलाकात...!

कहते हैँ कि अगर आप किसी को सच्चे मन से याद करते हैँ तो प्रकृति खुद आपको उस शख्स से मिलवाने की कोशिश मेँ जुट जाती है! जी नहीँ प्रेम सँबँधोँ की नहीँ मानवीय सँबँधोँ की बात कर रहा हुँ..! अगर आप ये सोच रहे हैँ कि मैँ कोई रोमाँटिक किस्सा सुनाने जा रहा हूँ तो आपको निराशा हाथ लग सकती है! अपने एक मित्र के साथ दिल्ली के कनाट प्लेस इलाके मेँ टहलते हुए मेरे कदम अचानक गाँधी खादी भवन की और मुड गये! रीगल टाकिज के पास स्थित ये खादी भवन खासा फेमस है! मित्र ने कहा,- तुम्हेँ बीस पच्चीस साल बाद यहाँ जाने के बारे मेँ सोचना चाहिये! “तुम्हेँ ये किसने कहा कि आदमी उम्र से ही बूढा होता है!” मेरे इस जवाब पर वो खिल-खिला कर हस पडा! और बोला “ठीक है मै चला घर की तरफ! तुम खादी भवन मेँ गाँधी को याद करो! मित्र को विदा कर मैने खादी भवन मेँ प्रवेश किया! वहाँ की चीज़े वाकई लाजवाब थीँ! खादी के कपडे, हाथ से बने घरेलू सामान, लकडी की मूर्तियाँ, कोट- सूट, साडियाँ, दुपट्टे, खादी के कुर्ते, हर चीज़ मेँ कुछ खास बात थी! और कीमत भी वाजिब ही थी! निचले तल मेँ सामने की तरफ दुर्लभ आयुर्वेदिक दवायेँ रखी थीँ! तो हर्बल साबुन और हर्बल क्रीम भी थी! हर्बल प्रोडक्ट्स की तो भरमार थी! मन कर रहा था सब कुछ खरीद लूँ! लेकिन जेब इसकी इजाजत नहीँ देती थी! इसलिये क्या ना खरीदूँ इसकी लिस्ट बनाने लगा!

वातावरण मेँ एक अजीब सी सुगँध घुल रही थी! ऐसा लग रहा था मानो कुछ होने वाला है! लेकिन क्या ये मै नहीँ जानता था! तभी पीछे मुड कर देखा! लिफ्ट खुली और उसमेँ एक बूढा आदमी दिखाई दिया! उसके हाध मेँ लाठी थी! सिर पर मफलर बँधा था! खादी का कुर्ता उसपर उनी स्वेटर, सफेद पजामा और सादी चप्पल! एक अधेड उम्र का व्यक्ति उसे बाजूओँ से थामे हुए था! साथ मेँ थे दो खादी धारी शख्स! जो शकल से नेता दिखाई दे रहे थे! और आगे थे सादी वर्दी मेँ दो अधिकारी! लिफ्ट का दरवाज़ा खुलते ही उस बूढे व्यक्ति को थामे वो लोग बाजू मेँ बने एक कैबिन की तरफ बढने लगे! छोटे- छोटे कदमोँ से चलते हुए वो लोग कैबिन तक पहुँचे! खादी भवन का स्टाफ अभी तक ये जान नहीँ पाया था कि वो व्यक्ति कौन है? जैसे ही वो लोग मेरे करीब से होकर गुज़रे सामने खडे स्टाफ मेँ से एक ने मुझसे पूछा, “कौन हैँ ये”? मेरे मुँह से निकला;- “जार्ज फर्नाँडिस” ! ज़बान ने कह तो दिया लेकिन मेरा दिमाग इस बात पर यकीन नहीँ कर रहा था! लेकिन ये सुनते ही वहाँ खडे स्टाफ मेँ हलचल मच गई! तत्काल स्वागत के लिये सीनियर स्टाफ वहाँ पहुँचा! चाय और नाश्ता मँगवाया गया! जार्ज फर्नाँडिस के लिये खादी के कुछ कुर्ते लेकर स्टाफ की एक महिला कर्मचारी वहाँ पहुँची! फर्नाँडिस के साथ बैठे उनके मित्र खरीदारी मेँ उनकी मदद कर रहे थे! वो उनहेँ खादी के कुर्ते दिखा रहे थे और जार्ज फर्नाँडिस आँख के इशारे से उनमेँ से कुछ को पसँद कर रहे थे!
पास खडा मैँ एक-टक भारत के पूर्व रक्षा मँत्री को देख रहा था! दुनिया के सबसे उँचे लडाई के मैदान सियाचीन ग्लेशियर पर जा कर जवानोँ की मुश्किलोँ का जायज़ा लेने और उनहेँ दूर करने वाले जोर्ज फर्नॅँडिस देश के पहले रक्षा मँत्री थे, जिनहोँने सत्रह बार सियाचीन ग्लेशियर का दौरा किया था! मुझे यकीन नहीँ हो रहा था वो शख्स जो लँबी फर्लाँगोँ मेँ सँसद भवन की दूरी नाप देता था, आज छोटे कदमोँ से चलने को मजबूर था!
जार्ज फर्नाँडिस दूर दृष्टि के नेता रहे हैँ! चीन के नापाक इरादोँ को वो पहले ही भाँप चुके थे! शायद इसीलिये जब वो देश के रक्षा मँत्री थे तो उन्होँने चीन को दुश्मन नँबर एक कहा था! उनका ये बयान खासा चर्चित हुआ था! उनहोँने चीन को पाकिस्तन को हथियार सप्लाय करने पर भी झिडकी लगाई थी! हिमालयी क्षेत्र मेँ चीनी सेना की बढती गतिविधियोँ पर उनहोँने देश को चेताया था! और ड्रेगन के नापाक इरादोँ से सावधान रहने की हिदायत सेना को दी थी! मैँ देख रहा था मजबूत इरादोँ वाले फर्नाँडिस को...आज वो शरीर से कितने कमज़ोर नज़र आ रहे थे?
मेरी आँखोँ मेँ सँसद का वो मँजर घूमने लगा! जब विपक्ष तहलका मामले मेँ नाम आने पर उनके इस्तीफे की माँग पर अडा था! और सँसद की कार्यवाही नहीँ चलने दे रहा था! लेकिन ज़िद्दी फर्नाँडिस अडे हुए थे! वो कह रहे थे मैँ निर्दोष हूँ! लेकिन विपक्ष भी इतनी आसानी उनहेँ छोडने के मूड मेँ नहीँ था! सँसद मेँ घमासान मचा था! फर्नाँडिस इस्तीफा देने को तैयार नहीँ हुए तो विपक्ष ने उनका बहिष्कार कर दिया! अब सदन मेँ जब भी फर्नाँडिस बोलने खडे होते तो विपक्ष जम कर हँगामा करता! फुल्कन कमिटी की रिपोर्ट मेँ जार्ज फर्नाँडिस को क्लीन चिट दे दी गई थी! लेकिन एनडीए के बाद आई यूपीए सरकार ने फुल्कन कमिटी की रिपोर्ट को खारिज करते हुए जस्टिस के वेँकटास्वामी की अध्यक्षता मेँ एक नई कमिटी का गठन किया! लँबी जाँच प्रक्रिया के बाद इस इस समिती ने भी जार्ज फर्नाँडिस को दोषी नहीँ पाया! तहलका मामले ने तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष बँगारू लक्षमण की बलि ले ली थी! लेकिन फर्नाँडिस अपनी मिस्टर क्लीन छबि बचाने मेँ कामयाब रहे थे! हालाकि उनहीँ की पार्टी की तत्कालीन जनरल सेक्रेटरी जया जेटली को स्टिँग आपरेशन मेँ दिखाया गया था!! जिसके बद फर्नाँडिस के लिये अग्नि परीक्षा शुरु हो गई थी! ताबूत घोटाले मेँ भी उनका नाम उछाला गया था! तो बराक एँटी मिसाइल स्केम मेँ भी सीबीआई ने उनके खिलाफ साल 2006 मेँ मामला दर्ज किया था! लेकिन हर बार अपनी मिस्टर क्लीन की छबि को बचाने मेँ वो कामयांब हुए थे!
जार्ज फर्नाँडिस एनडीए के सँयोजक ही नहीँ एनडीए के तारणहार भी थे! हर बार एनडीए की नैया को बीच भँवर से उनहोँने निकाला था! एनडीए की पहली सरकार मेँ जब जयललिता नाराज़ हो जाती थीँ तो जोर्ज उन्हेँ मनाने पोएस गार्डन ( तमिलनाडु मेँ जयललिता का घर) जाते थे! और हर बार उनहेँ मना लेते थे! 1999 मेँ जब 24 पर्टीयोँ का गठबँधन एनडीए पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता मेँ आया तो जार्ज फर्नाँडिस को रक्षा मँत्री बनाया गया! इधर कारगिल की पहाडियोँ पर पाकिस्तानी सेना ने कब्ज़ा कर लिया! जिसके बाद एलओसी को पार ना करने के विवादित निर्णय के साथ भारत ने घुसपैठियोँ को खदेडने के लिये आपरेशन सर्प विनाश की घोषणा कर दी! यानि शुरु हो गया था कारगिल का युध्द ! विपक्ष और मीडिया ने घुसपैठ के लिये खुफिया तँत्र की विफलता को दोषी ठहराया! तो तत्कालीन रक्षा मँत्री जार्ज फर्नाँडिस ने इसे सिरे से खारिज कर दिया! और कहा कि कारगिल मामले मेँ खूफियातँत्र विफल नहीँ हुआ था! बाद मेँ कारगिल मामले पर बने के सुब्रमण्यम कमिशन ने भी फर्नाँडिस के दावे की पुष्टि की!
जार्ज फर्नाँडिस मेरे सामने बैठे थे! अपने भाषण से विरोधियोँ की बोलती बँद कर देने वाले जोर्ज (जोशीले) फर्नाँडिस आज बिल्कुल मौन थे! उनके साथ आये कुछ नेता फर्नाँडिस से अपनी नजदीकियोँ के किस्से सुना रहे थे! इसी दौरान इमेरजेँसी की यादेँ ताज़ा हो रही थीँ! बिहार का एक पूर्व विधायक झारखँड से बिहार के अलग होने का दर्द बँया करते हुए बोला,- “हमसे अलग होकर झारखँड को क्या मिला? झारखँड की खादानोँ पर तो अब भी हमारा ही कब्ज़ा है!” मुँह मेँ चबाते पान को निगलने की कोशिश करते हुए उसने कहा,- “इमर्जेँसी के वक्त जब इँदिरागाँधी ने बरोडा डायनामाइट काँसपरेसी मेँ फर्नाँडिस को जेल भेजा था, उस वक्त उंनके साथ पुलिस ने मुझे भी पकड लिया था! लेकिन आज.... वो मुझे पहचानते ही नहीँ!”
“हाँ जबसे बाथरूम से गिरे हैँ याद्दाश्त कमज़ोर सी हो गई है!” साथ आये दूसरे नेता ने बीच मेँ टोका! तभी मेरी नज़रेँ जार्ज फर्नाँडिस से जा मिलीँ! मैँने देखा फर्नाँडिस मेरी तरफ एक टक देख रहे हैँ! मैँ हैरान था! जिसकी एक नज़र पाने के लिये कभी नेताओँ और अफसरोँ की पूरी फौज बिछी होती थी, वो एक टक मेरी तरफ देख रहा था! मैँने झुक कर अभिवादन किया! फर्नाँडिस और मेरे बीच शीशे की एक दीवार थी! जिसके दूसरी तरफ कुर्सी पर फर्नाँडिस बैठे थे! मेरी खुशी का ठिकाना नहीँ रहा जब फर्नाँडिस ने मेँरे अभिवादन का जवाब दिया! मुझे एक टक निहारती उनकी आँखेँ कुछ कह् रही थीँ..! क्या? ये मैँ अब तक नहीँ समझ पाया! लेकिन मेरी आँखोँ के सामने इमेरजेँसी की वो कहानी तैर रही थी जिसने भारत मेँ लोकतँत्र की दिशा ही बदल दी थी!
3जून 1930 को मैँगलोर मेँ जन्मेँ जार्ज फर्नाँडिस ने एक ट्रेड यूनियन नेता के रुप मेँ अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत मुँबई से की थी! 1967 के आम चुनाव मेँ मुँबई के लोकप्रिय नेता एस के पाटिल को हरा कर उनहोँने राजनीतिक पँडितोँ को चकित कर दिया था! इस हार के बाद एस के पाटिल का राजनीतिक कैरियर खत्म हो गया था! 1975 की इमरजेँसी का विरोध करने पर फर्नाँडिस के खिलाफ वारँट जारी हो गया था! लेकिन जार्ज फर्नाँडिस भूमिगत हो गये! काफी मशक्कत के बाद भी जब वो पुलिस के हाथ नहीँ लगे तो पुलिस उनके भाई फ्लोरेँस फर्नाँडिस को पकड कर ले गई! इमरजेँसी के बाद जब जनता पार्टी की सरकार मेँ उद्योग मँत्री बने तो कोका कोला और आइबीएम जैसी बहुराष्ट्रीय कँपनीयोँ को फेरा के तहत देश से बाहर जाने का फरमान जारी कर दिया!

फर्नाँडिस के साथ बैठे उनके मित्र उनहेँ कईँ तरह के खादी के कुर्ते दिखा रहे थे! लेकिन जोर्ज फर्नाँडिस एक टक मुझे देख रहे थे! ये देख उनके मित्र ने मुझे पास आने का इशारा किया! जार्ज फर्नाँडिस के पास पहुँच कर मैँने एक बार फिर हाथ जोड कर उनका अभिवादन किया! अपना परिचय देते हुए मैँने कहा; “आपसे मुलाकात का बहुत मन था! लेकिन कभी सोचा ना था कि आपसे इस तरह अचानक भेँट होगी!” मेरी इस बात पर वो मुस्कुरा दिये! और चुप्पी साध ली! मेरी हैरानी को भाँप कर उनके मित्र बोले’-
”अस्सी साल के हो गये हैँ! जब हम इनकी उम्र मेँ आयेँगे तो शायद चल भी ना पायेँगे!”
लेकिन जोशीले फर्नाँडिस खुद के लिये खादी के कपडे लेने आये थे! मैँने भी खादी के कुर्ते चुनने मेँ उनकी मदद की! इसके बाद हम लोग लिफ्ट से नीचे उतरे! देश के मजबूत रक्षामँत्री रहे जार्ज फर्नाँडिस छोटे-छोटे कदमोँ चल रहे थे! और हम उनका सहारा बनेँ उनके साथ चल रहे थे! खादी भवन के सामने ही कुछ दूरी पर तीन गाडियाँ पार्क की गईँ थीँ! नीली बत्ती की बीच वाली गाडी मेँ फर्नाँडैस जब बैठे तो उनहेँ पुन: प्रणाम कर मैँने उनसे विदा ली! लेकिन मुझे अब भी यकीन नहीँ हो रहा था.....मैँ मन ही मन प्रणाम कर रहा था उस समाजवादी की सादगी को!