Saturday, 14 March 2009

तेरा क्या होगा पाकिस्तान?


जनरल परवेज मुशर्रफ की हुकूमत के खिलाफ वकीलों ने 2007 में जैसा माहौल बनाया था, आज दो साल बाद पाकिस्तान के सड़कों-बाजारों में दृश्य दोबारा वैसा ही है। जजों की बहाली के लिए वैसा ही लांग मार्च, वैसी ही नजरबंदियां और गिरफ्तारियां, उसी तरह अमेरिका का रुख बदलने का इंतजार। फर्क सिर्फ इतना है कि राष्ट्रपति की कुर्सी पर आज मुशर्रफ की जगह आसिफ अली जरदारी बैठे हैं और पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था चू-चूं के मुरब्बे जैसी लगने के बजाय कमोबेश लोकतंत्र जैसी नजर आने लगी है। बवाल शुरू हुआ है नवाज शरीफ और उनके भाई शहबाज शरीफ को अदालती फैसले के तहत चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित किए जाने और केंद्र के आदेश पर पंजाब में उनकी पार्टी की सरकार बर्खास्त किए जाने से। इस फैसले पर शरीफ बंधुओं का एतराज बिल्कुल वाजिब है। इसमें कोई शक नहीं कि परवेज मुशर्रफ को सत्ता से हटाने में केंद्रीय भूमिका नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन की ही थी। मुशर्रफ की सरकार ने जिन आरोपों के तहत नवाज शरीफ को देश निकाला दिया था, उन्हीं पर फैसला सुनाते हुए पाकिस्तान के सवोर्च्च न्यायालय ने उन्हें पाकिस्तान में चुनाव लड़ने के अयोग्य करार दिया है। सवाल यह है कि ये आरोप अगर इतने ही सच्चे हैं तो नवाज शरीफ से काफी पहले यह सजा जरदारी को सुनाई जानी चाहिए थी, जिनके घपलों के बारे में पाकिस्तान में काफी पहले से आम राय बनी हुई है। लेकिन मुशर्रफ के साथ गुपचुप समझौता करके पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता तो मलाई काट रहे हैं जबकि मुशर्रफ द्वारा ही नियुक्त जजों के फैसले से नवाज और शहबाज शरीफ का राजनीतिक करिअर खत्म किया जा रहा है। जिन चीफ जस्टिस इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी को परवेज मुशर्रफ ने बर्खास्त किया था, वे बेचारे आज भी वनवास झेल रहे हैं, जबकि उनकी बहाली के लिए चले आंदोलन में खुद पीपीपी के नेता अगली पांत में रहा करते थे। ले-देकर मामला कुछ सत्ता गुटों के बीच लड़ाई का है। कयानी और मुशर्रफ के चेहरों वाला एक गुट फौज का, गिलानी और जरदारी के दो अलग-अलग चेहरों वाला एक गुट पीपीपी का, एक गुट नवाज और शहबाज की अगुआई वाली पीएमएल-एन का और दोनों बड़ी पार्टियों के बीच अपने लिए रास्ता तलाशता एक गुट पीएमएल-क्यू का। सत्ता के इतने दावेदार, और सत्ता की औकात इतनी कि कट्टरपंथी आतंकवादी कभी उसे अपने सामने घुटने टेक कर शरियत लागू करने पर मजबूर करते हैं तो कभी दिन-दहाड़े एक विदेशी क्रिकेट टीम को निशाना बना कर साफ निकल जाते हैं।

Thursday, 12 March 2009

मेरा शहर बदल गया है?

कल मुंबई फोन पर अपने एक पुराने मित्र से बात कर रहा था ! उसे होली की शुभकामना दी! उसे नहीं पता था कि महिदपुर में इस साल की होली कर्फ्यू के साये में मनाई जा रही थी ! जब मैंने उसे बताया कि महिदपुर में कर्फ्यू है तो उसकी आवाज़ में दर्द झलक उठा! बिल्कुल वैसे ही जैसे मेरी आवाज़ में झलका था जब मुझे अपने न्यूज़ रूम में ये ख़बर मिली कि मेरे शहर में कर्फ्यू लग गया है ! गंगा जमुना संस्कृति वाला मेरा शहर अचानक कर्फ्यू के साए में जीने को मजबूर कैसे हो गया? मै सोच में डूब गया क्या मेरा शहर बदल गया है? लेकिन पिछले महीने तो मै अपने घर गया था तब तो वहा ऐसा कुछ नही था....! सब कुछ वैसा ही तो था....! वही क्षिप्रा का किनारा... वही गन्गावादी का मेला....वही गलिया.....वही लोग ! वही महिदपुर फ़िर क्या बदल गया कि कर्फ्यू के साए मे होली मनाई जा रही थी !

Wednesday, 4 March 2009

गरीबी पश्चिम में खूब बिकती है।




फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनेर' का इतना हल्ला मचा हुआ है कि मुझ जैसे साधारण पत्रकार को भी यह देखनी पड़ी। मैं इस फिल्म की कलात्मक उत्कृष्टता, म्यूजिक या सॉन्ग पर टिप्पणी करने की पात्रता नहीं रखता, लेकिन एक बात निश्चय ही पूरे आत्म विश्वास के साथ कर सकता हूं और वह यह कि ब्रिटेन, अमेरिका और कई पश्चिमी देशों की भारत को देखने की जो पुरानी और पूर्वाग्रहपूर्ण दृष्टि रही है, उसमें कोई खास बदलाव नहीं आया है। भारत को एक गरीब, आपस में लड़नेवाला, भ्रष्ट और कमजोर देश माना जाता रहा है। एक ऐसा देश जहां गरीब मनुष्य होकर भी समाज में आधे-पौने मनुष्य का दर्जा रखते हैं। जिनकी अपनी कोई कीमत नहीं लेकिन जिनकी गरीबी पश्चिम में खूब बिकती है। भारत में गरीब होना चूंकि कमतर मनुष्य होना है, इसलिए कम से कम हमारे शहरों में तो कोई गरीब भी यह नहीं चाहता कि उसकी गरीबी दिखाई जाए। यही कारण है कि इस फिल्म के ब्रिटिश निर्देशक डैनी ब्वॉयल जब फिल्मांकन के सिलसिले में स्लम बस्तियों में गए तो वहां उनके साथ काम करने को तैयार हुए लोगों ने पूछा : 'आप हमें गरीबों के रूप में तो दर्शाने नहीं जा रहे?' उन्होंने क्या उत्तर दिया यह तो मालूम नहीं है लेकिन 'टाइम' पत्रिका में '10 क्वेश्चन्स' कॉलम के अंतर्गत उनसे पूछे गए एक सवाल का उत्तर यहां दृष्टव्य है। उनसे पूछा गया था कि भारत में गरीबी का रोमानीकरण करने के आरोपों के बारे में आपका क्या उत्तर है तो उन्होंने कहा 'लोगों ने जो स्लम बस्तियों में हमारे साथ काम कर रहे थे, हमसे पूछा कि आप (फिल्म में)हमें गरीबों के रूप में तो चित्रित नहीं करेंगे? या करेंगे? क्योंकि पश्चिमी लोग हमेशा ऐसा ही करते हैं। मगर मैंने फिल्म को एक ऐसी ऊर्जा के साथ बनाने की कोशिश की है ताकि यह प्रतिबिम्बित हो कि यह जगह कैसी है (जहां ये लोग रहते हैं) कि गरीबी के बावजूद यहां एक जीवंतता-जिजीविषा है।' लेकिन गरीबी दिखाने के पश्चिमी पूर्वाग्रह के चलते उन्हें स्लम के अपने सहयोगियों की संवेदनशीलता का जरा भी ध्यान नहीं रहा। कुरूप यथार्थ का जैसा वीभत्सीकरण यहां दिखाई देता है, उसे देखकर रुह तक कंपा देनेवाली जुगुप्सा पैदा होती है। एक दृश्य में स्लम का बच्चा संडास में बैठा है। उसे पता चलता है कि वहीं कहीं अमिताभ बच्चन आया है। अमिताभ बच्चन के ऑटग्राफ लेने के लिए वह बच्चा संडास से मल के कुण्ड में नाक दबाकर कूद जाता है और शायद सामने से तत्काल हटाने के लिए मजबूर कर देनेवाली स्थिति में ऑटग्राफ भी पा लेता है। कलाओं में यथार्थ का अतिकरण कई बार भाव-भंगिमाओं के साधारणीकरण और संप्रेषण के लिहाज से किया जाता है। लेकिन ऐसी वीभत्स अति? मैं पूछना चाहूंगा कि मल से सने बल्कि नहाये बच्चे को कल यदि खुद फिल्म निर्देशक डैनी बॉयल को ऑटग्राफ देना पड़े तो क्या वह कुछ सेकंड भी वहां ठहरना सह सकेंगे? ठीक है कि सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा आज भी भारत में जारी है, लेकिन गरीब बच्चे के अमिताभ-आकर्षण के एक प्रतीक को इस सीमा तक खींचना किस कलागत औचित्य को दर्शाता है? डैनी बॉयल इसके लिए अपनी ब्रिटेन में हुई परविश या संस्कार को जिम्मेदार मानते हैं। तो यह संस्कार या पूर्वाग्रह क्या है? कि भारतीय गंदे होते हैं? उनके घरों से मैला उठाने के लिए एक अलग जाति के लोग आते हैं? कि वे गंदा पानी पीते हैं और गंदे हाथों से खाना खाते है? आदि-आदि। जो लोग इस फिल्म को भारतीय फिल्म सिद्ध करने के लिए शीर्षासन कर रहे है, और कह रहे है कि इसकी कहानी भारतीय है और एक भारतीय द्वारा ही लिखी गई है, इसके पात्र भारतीय हैं, संगीत और संगीतकार भारतीय है, इसका फिल्मांकन भारत में हुआ है, वे लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि इसका निर्देशक और उसकी टीम विदेशी है। और उसने माना है कि यह फिल्म एक हाइब्रिड फिल्म है। देशी और विदेशी टीमों का एक संयुक्त उपक्रम। फिल्म निर्देशक और पटकथा दोनों सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं और ये दोनों विदेशी हैं। इसलिए यह भारतीय फिल्म नहीं मानी जा सकती। आप चाहें तो खुद निर्देशक से सत्र लेकर इसे वर्णसंकर कह सकते हैं। फिल्म का नजरिया पश्चिमी है, संवेदनशीलता पश्चिमी है और बम्बइया फिल्मों के लटके-झटकों के बावजूद इसमें वही दिखाया गया है, जो पश्चिमी दर्शक देखना चाहता है। पिछले एक दशक में यूरोप और अमेरिका में भारत की पुरानी गरीब और पिछड़े देश की इमेज पर एक उभरती हुई आर्थिक और सैन्य ताकत की इमेज हावी है। यह धारणा बनी है कि भारत और चीन कुछ दशकों में दुनिया की महाशक्तियों में होंगे। भारतीय या भारतीय मूल के उद्योगपति विदेशी कंपनियां खरीद रहे है और अरबपतियों की विश्व कतार में खड़े होने वाले भारतीयों या भारतवंशियों की संख्या बढ़ रही है। भारत को जी-8 जैसे अमीर देशों की बैठकों में बुलाया जाने लगा है। अपनी प्रतिभा और परिश्रम से अमेरिका और अन्य देशों में भारतीय छा गए हैं। भारत अंतरिक्ष की भी एक ताकत बन चुका है और उसके पास करीब-करीब इतनी आबादी वाला मध्यवर्ग है, जो अमेरिका की पूरी आबादी है। यह एक तरह का कल्चरल शॉक जैसा है। इसलिए दो छवियों के बीच इस पृष्ठभूमि में द्वंद्व में संतुलन बैठाने का रास्ता यह निकाला गया है कि भारत की इस नई इमेज को तोड़ो। उसे पुरानी गरीब, पिछड़ी और जाहिल की इमेज पर हावी मत होने दो। भारत को उसके अंधेरे में, उसकी दरारों में पकड़ो, जहां सीलन है, बदबू है, गंदगी है और जहां लोग नहीं मानों कॉकरोच रहते हैं। ऐसे कॉकरोच जिन्हें करीब 60 सालों में न तो मिटाया जा सका है और न मिटाया जा सकेगा। भारत की इस कटु सचाई से मैं मुंह नहीं मोड़ रहा। भारत निश्चय ही गरीब और पिछड़ा देश है। देश की 77 प्रतिशत आबादी प्रतिदिन एक डॉलर (करीब 50 रु.)भी नहीं कमा पाती। करोड़ों लोगों को दिन में एक बार ही मुश्किल से खाना मिल पाता है। बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। रहने के लिए झोपड़ी और पीने के लिए साफ पानी नहीं है। हिन्दू-मुस्लिम दंगे होते हैं (फिल्म में ऐसे ही एक दंगे में बचपन में ही नायक की माँ मारी जाती है), अल्पसंख्यक जुल्मों का शिकार होते हैं और जमाल जैसा बच्चा अगर एक दिन अमीर बन भी सकता है तो यह कौन बनेगा करोड़पति जैसे टीवी कार्यक्रमों से निकला एक चमत्कार ही है। भारत में ज्ञान की कद्र है और ज्ञान से धन भी अर्जित किया जा सकता है, लेकिन गरीब मुसलमानों के बच्चे शिक्षा से नहीं, अंडरवर्ल्ड के फंदे में फंसकर वह ज्ञान अर्जित करते हैं जो एक दिन टीवी कार्यक्रमों के जरिए उन्हें लॉटरी तक पहुंचाता है। फिल्म में नायक एक जगह चैनल के स्टूडियो में बैठा अनिल कपूर के प्रश्नों के उत्तर दे रहा है तो फ्लैशबैक में दो पुलिसकमिर्यों की ज्यादतियों के बीच उन यातनाओं को बयान कर रहा है, जिनसे गुजरते हुए उसे क्विज के उत्तर प्राप्त हुए। तो फिल्म का असली पक्ष वह नहीं है जो स्टूडियो की चमक-दमक में दिखाया गया है, असली पक्ष फ्लैशबैक में है, जहां दंगों में अल्पसंख्यकों का मारा जाना है, भिक्षा कराने वाले गिरोहों द्वारा अबोध बच्चों का पकड़ा जाना और फिर हाथ-पैर तुड़वाना या आंख फुड़वाना है, ताकि लोगों को दया आए और वे ज्यादा भीख दें। बड़ी बारीक तरह से फिल्म में उग्र हिन्दूवाद को भी उठाया गया है और जैसे संकेत किया गया है कि भिखारी बच्चा हिन्दू हो या मुसलमान पर भीख मांगते हुए वह हिन्दू प्रार्थना ही गाता है। स्लम की बच्चियां देह शोषण की शिकार हैं और लोग अपना जीवन या तो अमिताभ बच्चन की एक झलक पाने की चाह में या फिर कौन बनेगा करोड़पति जैसे कार्यक्रमों के जरिए भाग्य उदय होने की आशा में जीते हैं। अगर फिल्म में कोई मन को छूनेवाली बात है तो जमाल और लतिका का प्रेम है, जो आश्रयहीन और अनाथ बच्चों में भी उतना ही मौलिक और निश्छल हो सकता है, जैसा सामान्य तौर पर होता है। रहमान बड़े संगीतकार है लेकिन उनके जिस गीत का शोर है, उसे भी उनका उत्कृष्ट या प्रतिनिधि गीत नहीं माना जा सकता। जरा सोचिए कि अगर यही फिल्म किसी भारतीय ने बनाई होती तो क्या उसे 8 ऑस्कर मिलते। एक साधारण दर्शक के नाते मैं सत्यजित राय की पथेर पांचाली जैसी उत्कृष्ट फिल्म से इस फिल्म की तुलना करना चाहता जिसकी गरीबी के आधार पर की जा रही है ना ही किसी को करनी चाहिए। वहां गरीबी गौण हो जाती है और मानवीय प्रश्न ही अंतत: आपका पीछा करता रहता है। उन्हें सम्मान भी बहुत बाद में मिला। इस फिल्म को मिल रहे सम्मान कोई भी अवहेलना नहीं कर सकता, लेकिन कृपया इस फिल्म को इस संदर्भ के साथ भी मिलाकर देखिए कि एक उभरते भारत का धीरे-धीरे पश्चिमी दृष्टि से ओझल हो रहा पुराना सच इस रूप में आखिर क्यों याद दिलाया जा रहा है? क्या इस मनोरंजन-सरोकार के पीछे वही पुरानी श्रेष्ठता ग्रन्थि काम नहीं कर रही है? लेकिन क्रोध करने की बजाय आप भी इस फिल्म को जरूर देखिए और सोचिए कि क्या नाराज होकर हम भारत को देखने वाली इस पुरानी पश्चिमी दृष्टि को बदलवा सकते हैं या हमें ही अपने यहां व्यापक पटल पर बदलाव लाने की जरूरत है? तो उत्तर इस वाक्य के अन्त में है लेकिन मैं नहीं जानता कि यह कैसे होगा।

Monday, 2 February 2009

न्यायपालिका बनाम लोकतंत्र


आपको मध्य प्रदेश के प्रोफेसर सब्बरवाल की हत्या का मामला याद होगा। वे कॉलिज चुनाव के दौरान आचार संहिता लागू करना चाहते थे, जिसमें एबीवीपी के कुछ छात्र उग्र हो उठे और उन्होंने प्रोफेसर सब्बरवाल की इतनी पिटाई की कि उनकी जान चली गई। उस समय मध्य प्रदेश में बीजेपी की सरकार थी और जल्दी ही यह स्पष्ट हो गया कि वह दोषी छात्रों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं कर सकेगी। वहां की स्थानीय अदालत में पीडि़त पक्ष के लिए न्याय पाना संभव नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य को रेखांकित किया और वह केस उज्जैन (म.प्र.) से नागपुर (महाराष्ट्र) स्थानांतरित कर दिया। यहां हम व्यक्तिगत अपराधों की सुनवाई (जैसे जयललिता या अमरमणि त्रिपाठी के मामले) दूसरे राज्य में ट्रांसफर करने की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन मामलों की बात कर रहे हैं, जिनमें ऐसी भीड़ ने कोई अपराध किया, जिसे उस पार्टी का समर्थन प्राप्त हो जो लोकतांत्रिक पद्धति से चुनी गई हो, सत्ता में हो और जिसमें अपराधियों को दंडित करने की इच्छा या नैतिक साहस नहीं हो। ऐसी नजीरों में गुजरात के दंगों को भी शामिल किया जा सकता है। उस समय भी जाहिरा शेख और बिलकिस बानो के मामले गुजरात से मुंबई ट्रांसफर किए गए। इतना ही नहीं, जब राज्य पुलिस ने दंगों से संबंधित दो हजार मामले यह कह कर बंद किए कि वह दोषियों को ढूंढने में असमर्थ है, तब सुप्रीम कोर्ट ने लगाम कसते हुए राज्य सरकार को यह निर्देश दिया कि वह एक नई हाई लेवल टीम बनाए, जो यह देखे कि क्या उनमें से किसी भी केस को दोबारा खोलने की कोई संभावना हो सकती है, कहीं पुलिस ने उन्हें यूं ही रफादफा करने की कोशिश तो नहीं की है। उस समय मुसलमानों के खिलाफ दंगे हुए थे, राज्य में बीजेपी की सरकार थी और केंद्र में एनडीए की, जिसे अल्पसंख्यकों की पिटाई और हिंदुओं की हिंसा की संतुष्टि चुनावी नजरिए से लाभ पहुंचा सकती थी। आप बहस के लिए कह सकते हैं कि जो गलत है, सो गलत है। या नियम-कानून भी कोई चीज है। पर डिमॉक्रसी में सिद्धांत और संविधान जमीन पर किस तरह अपना रूप बदल लेते हैं, यह हम सब जानते हैं। दार्शनिक प्लेटो ने 'रिपब्लिक' में इस स्थिति की कल्पना की थी। उसने लिखा कि इसमें संदेह नहीं कि डिमॉक्रसी दूसरी शासन व्यवस्थाओं से बेहतर होती है, लेकिन उसका भी क्षरण और पराभव होता है और वह भीड़तंत्र (मॉबोक्रेसी) में बदल जाती है। तब संख्या बल से सही और गलत की परिभाषा निर्धारित होने लगती है और बहुसंख्यक अपने हिसाब से चीजों को तोड़-मरोड़ लेते हैं। ऐसी स्थितियों में हमारी स्वतंत्र न्यायपालिका की भूमिका किसी उद्धारक या रक्षक की तरह नजर आती है। हायर जुडिशरी को चोरी, घूसखोरी और जमीन जायदाद के मामलों में उलझने के बदले, अपनी इस नई भूमिका में आगे बढ़ना चाहिए।

Sunday, 1 February 2009

राहुल की राह


योगेश गुलाटी


पिछले कुछ समय से राजनीतिक गलियारे से छन-छनकर यह खबर आई (या आने दी गई) कि सरकार के कुछ हालिया फैसले राहुल गांधी के प्रभाव में लिए गए। मसलन मुंबई हादसे को लेकर पाकिस्तान के प्रति कड़े रुख का इजहार और जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्ला की ताजपोशी। लेकिन कांग्रेस सीधे-सीधे यह नहीं कह सकती कि वह मनमोहन सिंह के नेतृत्व को खारिज कर रही है। ऐसा करना यूपीए सरकार की उपलब्धियों पर खुद ही पानी फेर देना होगा, फिर वह कौन सा मुंह लेकर जनता के बीच वोट मांगने जाएगी?इसीलिए जो नेता राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाए जाने की बात कर रहे हैं, वे मनमोहन सिंह के कामकाज की प्रशंसा करना भी नहीं भूलते, लेकिन वे साफ तौर पर यह भी नहीं कहते कि कांग्रेस मनमोहन सिंह को भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश करके चुनाव मैदान में उतरेगी कि नहीं। चुनाव के पहले कांग्रेस नेतृत्व के सवाल को अनसुलझा रखना चाहती है लेकिन राहुल की इमेज चमकाने का अभियान भी चलता रहेगा।राहुल गांधी के मामले में सोनिया गांधी ने बहुत ही फूंक-फूंक कर कदम उठाए हैं। कुछ उसी तरह, जैसे राजीव गांधी के मामले में इंदिरा गांधी ने उठाए थे। पहले कहा गया कि राहुल राजनीति में नहीं आएंगे। फिर धीरे-धीरे वे सियासत में आए और उसके बाद सांसद बने। उसके बाद उन्हें पार्टी संगठन में अहम जिम्मेदारी दी गई। अपने चुनाव क्षेत्र और देश के दूसरे हिस्सों में राहुल लगातार दौरे कर रहे हैं। पार्टी चाहती है कि राहुल समाज से परिचित हों और जनता भी उन्हें जान जाए। शुरू-शुरू में राहुल ने कुछ अपरिपक्वता दिखाई थी। बांग्लादेश और बाबरी मस्जिद के संबंध में उनके दिए बयान से विवाद हुआ, पर अब वह बहुत संभलकर बोल रहे हैं। संसद में भी उनके भाषणों में परिपक्वता दिखने लगी है। सवाल है कि क्या देश की जनता राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार करने को तैयार है? राहुल के व्यक्तित्व में कोई करिश्मा नहीं है, लेकिन युवा होना उनकी सबसे बड़ी ताकत है। यह ठीक है कि उन्हें अपने पिता की तरह किसी तरह की सहानुभूति लहर का लाभ नहीं मिल रहा है, लेकिन उनके लिए सकारात्मक बात यह है कि विपक्षी दलों के पास कोई युवा नेता नहीं है। यह नहीं भूलना चाहिए कि आज देश की 70 फीसदी आबादी 35 वर्ष से कम उम्र के युवाओं की है। यह वर्ग अब राजनीति पर निर्णायक असर डालने की स्थिति में आ गया है। आज की यह युवा पीढ़ी स्वतंत्रता के बाद पैदा हुई है। यह कई पुराने आग्रहों और रूढि़यों से मुक्त है। यह सूचना क्रांति और ग्लोबलाइजेशन के दौर में जवान हुई है, इसलिए उसके सोचने का ढंग अलग है। यह पॉलिटिक्स और लीडरशिप के बारे में पुरानी पीढ़ी से भिन्न राय रखती है। इसे ऐसा नेता चाहिए जो ठोस काम करे, जो डिवेलपमंट सुनिश्चित कर सके ताकि इस पीढ़ी के सपने साकार हों। हाल के विधानसभा चुनावों के परिणाम में इस नजरिए की झलक मिली है। यह पीढ़ी अस्सी पार कर चुके लालकृष्ण आडवाणी की बजाय युवा राहुल गांधी को ज्यादा उम्मीद से देख रही है। राहुल के विरोध में यह तर्क दिया जाता है कि वह अनुभवहीन हैं। लेकिन आज के दौर में विजन ज्यादा महत्वपूर्ण है, अनुभव नहीं। नई पीढ़ी नया नजरिया चाहती है। रही वंशवाद की बात, तो यह मामला कमजोर पड़ता जा रहा है क्योंकि आज हर पार्टी इसका शिकार हो चुकी है। ऐसे में राहुल गांधी के लिए स्थितियां निश्चय ही अनुकूल होती जा रही हैं, लेकिन यह सवाल तो फिर भी बचता ही है कि क्या कांग्रेस राहुल गांधी को महज एक युवा प्रतीक की तरह इस्तेमाल करेगी या नई आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सत्ता में रहकर या उसके बाहर गंभीरता से प्रयास भी करेगी?

Friday, 23 January 2009

आइए, भारत की गरीबी का जश्न मनाएं!



योगेश गुलाटी


पिछले कुछ बरसों से पश्चिमी मीडिया में (खासकर अमेरिका में) भारत की आर्थिक प्रगति के बारे में इतना कुछ कहा जा चुका है कि यहां के जनमानस में इस मुल्क (भारत) की खास तस्वीर बन गई। जहां कभी शहरों में सड़कों पर गाएं, सपेरे और हाथी घूमा करते थे, ऐसे गरीब देश में हजारों-लाखों आईटी एक्सपर्ट्स का होना किसी चमत्कार से कम नहीं समझा गया। दो महीने पहले जब मुंबई की शानदार इमारतों पर आतंकी हमले की आंखोंदेखी छवियां अमेरिकी लोगों ने टीवी और इंटरनेट पर देखीं तो उनका दिल भारत के प्रति सहानुभूति से भर आया। यह वही देश था, जिसे थोडे़ दिनों पहले प्रेज़िडंट बुश और अमेरिकी कांग्रेस ने न्यूक्लिअर डील का तोहफा दिया था। मुंबई ने अमेरिकी दिलों में एक महत्वपूर्ण जगह बना ली। मुंबई हमले के कुछ ही दिनों बाद झोपड़पट्टी की जिंदगी में गरीबी और बदहाली की नई परिभाषाएं दर्शाती हुई चमक-दमक वाली फिल्म स्लमडॉग मिलिनेअर अमेरिका के कई शहरों में रिलीस हुई। जब इस फिल्म को हॉलिवुड में चार-चार गोल्डन ग्लोब पुरस्कारों से सम्मानित किया गया तो लगा जैसे अमेरिकी दिलों में इंडिया की हर चीज के लिए प्यार उमड़ आया है, उसकी गरीबी और बदहाली के लिए भी। हॉलिवुड स्थिति अंतरराष्ट्रीय फिल्म पत्रकारों का संगठन चुनी हुई फिल्मों और टीवी सीरियलों को 'गोल्डन ग्लोब' से पुरस्कृत करता है। स्लमडॉग मिलिनेअर को हॉलिवुड में मिली अभूतपूर्व सफलता के बाद इसे ऑस्कर में सम्मानित करने का रास्ता खुल गया है। सचमुच संगीतकार ए. आर. रहमान में कामयाबी के उस मुकाम पर पहुंच गए हैं, जहां कभी पंडित रविशंकर भी नहीं पहुंच सके। इस फिल्म के ब्रिटिश डाइरेक्टर डैनी बॉयल बवर्ले हिल्स और न्यू यॉर्क में अपनी प्रसिद्धि का जश्न मनाने के बाद अब इंडिया में स्लमडॉग... के रिलीस को लेकर उत्साहित नजर आ रहे हैं। आखिर इस फिल्म में ऐसी कौन-सी बात है, जिसने पश्चिमी दर्शकों और समीक्षकों का मन मोह लिया स्लमडॉग... कहानी है गरीबी और अमीरी के भेदभाव की। यह कहानी है गरीबी और आपराधिक दुनिया के बीच संबंधों की। यह कहानी है भाई-भाई के बीच धोखेबाजी की। लेकिन यह कहानी एक अनाथ बच्चे की मेहनत या प्रतिभा की उतनी नहीं है, जितनी कि एक संयोग। जिसके कारण वह कौन बनेगा करोड़पति प्रोग्रैम के सभी सवालों का उत्तर दे पाता है। यह उस जीवट या आत्मविश्वास की कहानी नहीं है, जैसा अमिताभ बच्चन जंजीर, कुली और दीवार जैसी फिल्मों में भारतीय दर्शकों को दिखाते रहे। जूते पॉलिश करनेवाले एक अनाथ के यह कहने पर कि 'मैं जमीन पर फेंके हुए पैसे नहीं उठाता' सिनेमा हॉल में तालियां गूंज उठती थीं। स्लमडॉग... एक निष्ठुर फिल्म है, जिसका निर्देशक गरीब के सपनों का मजाक उड़ाते हुए अनाथ बालक को पाखाने से भरे कुंड (वेल) में डुबकी मारते दिखाता है। फिल्म के एक दृश्य में अमिताभ बच्चन के स्लम कॉलोनी में हेलिकॉप्टर से उतरने की खबर बस्ती में आंधी की तरह फैल जाती है। लोग पागलों की तरह हेलिकॉप्टर की तरफ दौड़ते हैं। उसी वक्त बालक जमाल को उसके दोस्त एक शौचालय में बंद कर देते हैं। जमाल करे तो क्या करे! वह नीचे पाखाने के गहरे कुंड की तरफ देखता है, नाक दबाकर डुबकी लगा देता है और दूसरी तरफ से बाहर निकलता है, सिर से पांव तक पाखाने (शिट) से लिपटा हुआ। उसी गंदगी में सना वह अमिताभ की तरफ जाता है ऑटोग्राफ मांगने। जरा सोचिए, यह कैसी कल्पना है! बॉलिवुड के पलायनवादी डाइरेक्टर मनमोहन देसाई ने भी ऐसे सीन की कभी कल्पना नहीं की होगी। अपनी चमक-दमक और तेज रफ्तार के कारण स्लमडॉग... दर्शक को कुछ सोचने का मौका नहीं देती और घटनाओं को संजोग की डोर में जल्दी-जल्दी पिरोते हुए आगे बढ़ जाती है, जैसे कि ट्रेन छूटने के पहले आप फास्ट फूड रेस्तरां में खाना झपट रहे हों। अपुर संसार में सत्यजित राय ने, मेघे ढाका तारा में ऋत्विक घटक ने और अंकुर में श्याम बेनेगल ने अपनी कलात्मक और तीखी शैली में गरीबी और सामाजिक अन्याय का गहरा रिश्ता दिखाया था, लेकिन सत्यजीत रॉय को उनकी मृत्यु शैया पर पहुंचने के बाद ही हॉलिवुड ने ऑस्कर के योग्य समझा जबकि घटक, विमल रॉय या बेनेगल को पहचानने से भी इनकार किया। ब्रिटिश राज के दौरान सामान्य भारतीयों का स्वाभिमान दिखानेवाली बॉलिवुड फिल्म लगान भी ऑस्कर के शामियाने में न पहुंच सकी। शीशे की तरह पारदर्शी और हृदयहीन फिल्म स्लमडॉग... हमें यह याद दिलाती है कि भारत में अनाथ बच्चों के लिए एक ही जगह है, जहां से उन्हें अंधा बनाकर भीख मांगने के लिए मजबूर किया जाता है। ताजमहल के गाइड चोर और फरेबी होते हैं। स्लमडॉग... से हमने यह भी जाना कि वहां पले-बढ़े बच्चे के लिए करोड़पति बनना एक संजोग ही हो सकता है। स्लमडॉग... में जमाल सभी सवालों का जवाब इसलिए जानता था कि उन सवालों का उसकी बीती जिंदगी से सीधा नाता था। लेकिन गरीबी में पलकर भी प्रतिभाशाली बनने के अनेक उदाहरण भारत में मिल जाएंगे, जोकि फिल्मों के विषय बन सकते हैं। भारतीय कलाकार और टेक्नीशियनों को लेकर पश्चिम तर्ज पर मुंबई की स्लम जिंदगी का चित्रण करने वाली फिल्म 'गोल्डन ग्लोब' या 'ऑस्कर' पुरस्कार जीत सकती है और हॉलिवुड भारत की उस पुरानी तस्वीर पर मुहर लगा सकता है कि आर्थिक रूप से प्रगतिशील यह देश असल में हाथी, सपेरे और स्लमडॉग का देश है। आइए, हॉलिवुड के साथ मिलकर हम सभी इस गरीबी के जश्न में शामिल हो जाएं।

Wednesday, 5 November 2008

कौन सा सपना मचल रहा है


कौन सा सपना मचल रहा है
ये कौन सा सपना मचल रहा है

ये खून किसका उबल रहा है

ये किसकी सांसों में आग सी है

ये कौन गिर के संभल रहा है

ये किसके सुर हैं सिके सिके से

ये किसकी धड़कन चटक रही है

ये किसके कदमों में फौज सी है

ये कौन करवट बदल रहा है

ये कौन दरिया को पी रहा है

ये कौन सच कह के जी रहा है

ये किसके घाव में है तरन्नुम

ये कौन लोहा पिघल रहा है

ये किसका साया है धूप जैसा

ये किसका लहू है ‘सूप’ जैसा

ये किसके होठों में हड्डियां हैं

ये कौन नीदों में चल रहा है

चलो टटोलूं मैं आज खुद को

कहीं ये गुस्ताख मैं तो नहीं

ये हलचलें हैं मुझी में शायद

यकीं मुझे खुद पे मिल रहा है.

Friday, 26 September 2008

मैं गीत ग़मों के गाता हूँ!


योगेश gulati

रास रंग की महफ़िल में,

मैं गीत ग़मों के गता हूँ,

महलों की जो नीवें भरते,

मैं उनकी व्यथा सुनाता हूँ,

उसका बच्चा रोता है,

वो पुरी रात ना सोता है!

वो दिन भर मेहनत करता है,

पर..उसका पेट ना भरता है!

उसकी माँ बीमार है,

लेकिन वो लाचार है,

दावा वो लाए कहाँ से,

डॉक्टर का खर्च उठाए कहाँ से?

क्योंकि जितना वो कमाता है,

उससे तो बस टा-नमक ही आता है!

नई नहीं ये बात कोई,

मै बात वो ही बतलाता हूँ,

महलों की जो नीवें भरते,

मैं उनकी व्यथा सुनाता हूँ!

गन्दी भद्दी बस्ती में,

एक खद्दर वाला आया है,

बड़ी-बड़ी बातें वो करता,

कितने सपने लाया है!

बदलेगी तस्वीर ये कहता,

फ़िर से चुनाव जो आया है!

वो गर्मी में मेहनत करता है,

बारिश में फांके करता है!

ठण्ड में सुकुड कर सोता,

अकसर रातों में रोता है!

नयी नहीं ये बात कोई,

मैं बात वो ही बतलाता हूँ,

महलों की जो नीवें भरते,

मैं उनकी व्यथा सुनाता हूँ!


Thursday, 25 September 2008

मेरी अधूरी कविता....


इक बस्ती उजियारी सी,
इक में अँधियारा क्यूँ रहता है?

माँ तू तो कहती......

हम सब एक इश्वर की है संताने,

फ़िर , इक सोता फुटपाथों पर,
इक महलों में क्यूँ रहता है?

इक बस्ती में रोज़ हैं मेले,

इक में सन्नाटा क्यूँ रहता है?

मेघा देता है पानी,

नया सृजन फ़िर करता है,

सूरज देता है रोशनी,

नहीं भेदभाव वो करता है,

फ़िर ऊंच-नीच में बटा ये मानव,

आपस में क्यों लड़ता है?

इक बस्ती उजियारी सी,

इक में अँधियारा क्यों रहता है?


ये कविता अधूरी है....लेकिन आप चाहे तो इसे पुरी कर सकते हैं ....तो लिख भेजिए मुझे, अपने नाम और एक फोटो के साथ yogesh_gulatius@yahoo.co.in पर और कर दीजिये इसे पुरा! प्रकाशित होगी ये आपके नाम और फोटो के साथ!


आतंकवाद के विरुद्ध


दबाव में ही सही केंद्र सरकार आतंकवाद से निपटने के अपने तौर-तरीकों पर फिर से विचार करने लगी है। संभवत: पहली बार प्रधानमंत्री ने यह स्वीकार किया है कि हमारे खुफिया तंत्र में कमजोरी है, जिसे जल्दी ही दूर करने की जरूरत है। वह मान रहे हैं कि मौजूदा कानूनों से काम नहीं चलने वाला है इसलिए सख्त कानून चाहिए। अब तक तो वह बेहद औपचारिक तरीके से रस्म अदायगी की तरह आश्वासन दिया करते थे, लेकिन दिल्ली धमाकों के बाद उन्होंने आतंकवाद के एक-एक पहलू को सामने रखते हुए उसकी चुनौतियों की चर्चा की है। उन्होंने आतंकवाद के लोकल फैक्टर पर गौर किया है और आतंकवादियों को स्थानीय लोगों से मिलने वाली मदद पर भी चिंता व्यक्त की है। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के वक्तव्य में भी सरकार की यह चिंता झलकती है। उन्होंने मेट्रो टेररिज्म के बढ़ते खतरों की ओर इशारा किया है। ज्यादा दिन नहीं हुए जब सरकार आतंकवाद से निपटने के लिए नए कानून बनाने की मांग को सिरे से खारिज करती थी। वह अपनी रणनीति पर ठहरकर सोचने की जरूरत तक महसूस नहीं करती थी। जाहिर है सरकार का स्टैंड बदल रहा है। यह मंत्रियों की बदलती भाषा से भी स्पष्ट है। गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने भी सख्त कानून की बात कही है। लेकिन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम ने एक अलग पहलू की ओर ध्यान खींचा है जिस पर गौर करना होगा। उन्होंने कहा है कि समाज में अल्पसंख्यक अपने को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं। यह अलगाव ही उन्हें आतंकवाद के रास्ते पर धकेल रहा है। इस संदर्भ में चिदम्बरम ने सवाल उठाया है कि आखिर क्यों डॉक्टरी और इंजीनियरिंग जैसी शिक्षा पाने वाले युवक आतंक के रास्ते पर बढ़ रहे हैं। इन सारी बातों को मिलाकर देखें तो आतंकवाद जैसी समस्या की गहराई को जानने-समझने और उसकी चुनौतियों से लड़ने की एक चाहत दिखती है, पर इसकी सार्थकता तभी है जब गंभीरता से संगठित रूप में प्रयास किए जाएं। ऐसा न हो कि समय बीतने के साथ सरकार इस मामले में सुस्त पड़ जाए। आमतौर पर यही होता आया है। आतंकवाद से निपटने के लिए प्रशासनिक तंत्र में सुधार की जरूरत तो है ही लेकिन जैसा कि चिदंबरम कह रहे हैं समाज में भी सकारात्मक माहौल बनाने की आवश्यकता है। सरकार जो करना चाहती है उस पर दृढ़ रहे और अपने सहयोगी दलों तथा विपक्ष को विश्वास में लेकर कार्य करे। विपक्ष को भी जिम्मेदारी का परिचय देना होगा। बीजेपी ने वीरप्पा मोइली के प्रस्ताव पर उंगली उठाई है और उसे अपर्याप्त बताया है। सरकार के हर निर्णय पर सवाल उठाने की बजाय कोई ऐसा सुसंगत रास्ता खोजा जाए जो सभी पक्षों को मंजूर हो। आतंकवाद को लेकर अब किसी भी स्तर पर ढीलेपन को जनता बर्दाश्त नहीं करेगी।

गरीबी का जाल


योगेश गुलाटी
सरकार भले ही यह दावा करे कि अपनी नीतियों में वह देश के पिछड़े क्षेत्रों और निर्धनों पर विशेष ध्यान देती है, लेकिन अभी तक उसकी योजनाओं का कोई ऐसा ठोस नतीजा देखने में नहीं आया है, जिसकी मिसाल देकर कहा जा सके कि उसने हमारे गांवों की सूरत बदल दी है। उलटे देश के किसी न किसी हिस्से से अक्सर ऐसी ही खबरें आती हैं, जो तमाम योजनाओं और दावों पर सवालिया निशान खड़े कर देती हैं। मध्य प्रदेश में पिछले चार महीने में 160 से भी ज्यादा बच्चों की कुपोषण के कारण मौत हो चुकी है। जनजातीय जिलों-सतना और खंडवा में हालात बेहद खराब हैं। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस भेजकर इस बारे में जानकारी मांगी है। लेकिन दूसरे राज्यों की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। आमतौर पर सरकारी अमला भूख से मौत की बात को स्वीकार नहीं करता। वह मौत के लिए बीमारी को जिम्मेदार ठहराता है। लेकिन सच तो यह है कि जन्म के बाद जिन पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, वे बच्चों को मिल नहीं पाते, जिससे उनमें कई तरह की बीमारियां पनपती हैं। यानी मूल कारण सही भोजन की कमी ही है। आज भी देश का एक बड़ा हिस्सा पर्याप्त भोजन से वंचित है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े के मुताबिक देश के 20 करोड़ लोगों को ढंग का खाना मयस्सर नहीं है। पचास फीसदी से भी ज्यादा बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, इनमें से 20 प्रतिशत की स्थिति गंभीर है। गांवों या आदिवासी इलाकों में महिलाओं को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं है। दुनिया में शायद ही इतनी महिलाएं प्रसव के दौरान जान गंवाती होंगी। भारत में हर साल करीब पांच लाख महिलाओं की मौत प्रसव के दौरान हो जाती है। गरीबी के कारण लोग अपने बच्चों को बुनियादी भोजन भी उपलब्ध नहीं करा पाते, इसलिए बच्चे बीमार हो जाते हैं। दूसरी तरफ बेहतर स्वास्थ्य सेवा न होने के कारण न तो बच्चों का ढंग से टीकाकरण हो पाता है, न ही उनकी बीमारियों का समुचित इलाज। यानी समस्या दो स्तरों पर है। एक तो खाद्यान्न संकट है और दूसरा है सक्षम सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र का अभाव। सार्वजनिक वितरण प्रणाली(पीडीएस) जैसी व्यवस्था निर्धनों के लिए ही शुरू की गई थी पर आज इसमें भ्रष्टाचार का घुन लग गया है। वित्त मंत्री पी. चिदंबरम तक स्वीकार कर रहे है कि पीडीएस को नए सिरे से व्यवस्थित करना जरूरी है। यूपीए सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम की घोषणा भी बड़े जोर-शोर से शुरू की थी, लेकिन इसे भी ढंग से अमल में नहीं लाया जा सका है। मिड-डे मील की योजना भी कारगर ढंग से नहीं चल रही है। हर जगह यही रोना है कि ग्रामीण योजनाओं के लिए केंद्र से जारी राशि की स्थानीय स्तर पर बंदरबांट हो जाती है। ग्रामीण भारत का यथार्थ शायद उससे भी ज्यादा भयावह है, जितना हम सोचते या जानते हैं। गरीबों के लिए वादे करने और योजना बना देने भर से काम नहीं चलेगा, इस बात पर लगातार नजर रखनी होगी कि उनका लाभ सही जगह पहुंच रहा है या नहीं।

Tuesday, 23 September 2008

भ्रष्टाचार को आप ही मिटा सकते हें


योगेश गुलाटी
' स्थिति तनावपूर्ण लेकिन सामान्य है' यह वाक्य सरकारी बयानों में अक्सर दिखाई दे जाता है और जब भी कहीं यह वाक्य दिखता है, शब्द 'सामान्य' के अर्थ के बारे में मन में शंका उठने लगती है। जब तनावपूर्ण स्थिति सामान्य बताई जाए, तो इसका केवल एक ही अर्थ हो सकता है कि तनावपूर्ण स्थिति को हमने सामान्य मान लिया है। यानी स्वीकार कर लिया है इस स्थिति को। यह बात आम तौर पर कानून-व्यवस्था के संदर्भ में कही जाती है लेकिन असामान्य को सामान्य मान लेने का किस्सा काफी गहरे और काफी दूर तक फैला हुआ है। यह कहावत भी कि 'दर्द का हद से गुजर जाना दवा हो जाता है' इसी संदर्भ में समझी-समझाई जा सकती है। गलत स्थितियों को इस तरह स्वीकारते जाना कोई अच्छी स्थिति नहीं है- वस्तुत: यह हमारी विफलता का ही उदाहरण है। आज महंगाई को विश्वव्यापी समस्या बताकर हमें समझाया जा रहा है कि जरूरी वस्तुओं के आकाश छूते भावों से घबराने की आवश्यकता नहीं है, जब दुनिया में भाव कम होंगे, हमारे यहां भी हो जाएंगे। इसी तरह कभी भ्रष्टाचार के बारे में कहा गया था। जब देश में भ्रष्टाचार हर तरफ सिर उठाने लगा था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसे विश्वव्यापी समस्या बताकर एक तरह से स्वीकार्य स्थिति के रूप में समझाने की कोशिश की थी। ऐसा ही कुछ अब किया जा रहा है। हाल ही में भ्रष्टाचार के बारे में एक रिपोर्ट जारी हुई है। यह रिपोर्ट ट्रांसपेरेंसी इंटरनैशनल और सेंटर फॉर मैनेजमंेट स्ट्डीज द्वारा तैयार की गई है। समाचारों के अनुसार रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश, बिहार और असम सहित देश के सात राज्यों में भ्रष्टाचार का स्तर खतरनाक है। इस श्रेणी में आने वाले अन्य राज्य हैं- जम्मू-कश्मीर, गोवा और नगालैंड। रिपोर्ट में कहा गया है कि कर्नाटक, राजस्थान, तमिलनाडु, मेघालय और सिक्किम में भ्रष्टाचार का स्तर बहुत ऊंचा है। इसके बाद छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, झारखंड, केरल, उड़ीसा, अरुणाचल और मणिपुर का नाम लिया गया है। इस राज्यों में भ्रष्टाचार का स्तर ऊंचा बताया गया है। खतरनाक स्तर से लेकर ऊंचे स्तर तक की यह कहानी भ्रष्टाचार की जड़ों की गहराई का संकेत दे रही है और इस बात का भी कि रोग कितना फैल गया है। लेकिन इस महत्वपूर्ण रिपोर्ट का अगला हिस्सा कहीं ज्यादा चौंकाने वाला है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आंध्र प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, चंडीगढ़, मिजोरम, पांडिचेरी और त्रिपुरा में भ्रष्टाचार सामान्य है। भ्रष्टाचार सामान्य होने का क्या मतलब है? मतलब यह है कि इन राज्यों में भ्रष्टाचार का स्तर उतना ही है जितना आम तौर पर होता है। यानी यह मान लिया गया है कि भ्रष्टाचार है, लेकिन इतना तो चलता है। कानून और व्यवस्था के संदर्भ में स्थिति को तनावपूर्ण, लेकिन सामान्य कहने के पीछे जो मानसिकता होती है, वही भ्रष्टाचार की स्थिति को सामान्य घोषित करने के पीछे भी है। जैसे किसी तनावपूर्ण स्थिति को सामान्य मानना-कहना गलत है, वैसे ही समाज में फैले भ्रष्टाचार को सामान्य मान लेना भी सही नहीं है। भ्रष्टाचार का खतरनाक स्तर जितना खतरनाक हो सकता है, उससे कहीं अधिक खतरनाक स्थिति भ्रष्टाचार के स्तर को सामान्य मान लेने की है। यह स्वीकारोक्ति समाज और व्यवस्था की सकारात्मक प्रवृत्तियों की पराजय का ही संकेत नहीं है, वरन यह भी बताती है कि स्थितियों को समझने और उनके मूल्यांकन के हमारे पैमाने सही नहीं हैं। ऐसा लगता है कि हमने भ्रष्टाचार के आगे घुटने टेक दिए हैं। कुछ अर्सा पहले सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड चीफ जस्टिस ने यह कहा था कि हमारी न्यायपालिका में लगभग 20 फीसदी जज भ्रष्ट हैं। यह सुनकर देश चौंका था- इसलिए नहीं कि न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार है, बल्कि इसलिए कि एक जस्टिस ऐसी बात कह रहा है। यहां स्वीकारना होगा कि आज भी कुल मिलाकर जनता का विश्वास अभी न्यायपालिका से टूटा नहीं है। विधायिका और कार्यपालिका की तुलना में न्यायपालिका में जनता का विश्वास निश्चित रूप से अधिक है, लेकिन 20 फीसदी वाली स्वीकारोक्ति के बाद भी इस विश्वास का बने रहना यही बताता है कि कम से कम उस स्तर तक भ्रष्टाचार को हमने स्वीकार कर लिया है। आप कह सकते हैं कि इस स्थिति को हमने सामान्य मान लिया है। जैसे ट्रांसपेरेंसी इंटरनैशनल वाली रिपोर्ट देश के ग्यारह राज्यों में भ्रष्टाचार की स्थिति को सामान्य कह रही है। सामान्य के प्रति यह भ्रामक दृष्टिकोण और उसकी स्वीकार्यता हमारे सोच और व्यवस्था दोनों पर एक गंभीर सवाल है। जैसे तनावपूर्ण स्थिति सामान्य नहीं होती, वैसे ही भ्रष्टाचार का कोई भी स्तर सामान्य नहीं हो सकता। ऐसा होना भी गलत है, ऐसा मानना भी। भ्रष्टाचार एक कैंसर है और अब यह कैंसर सारे शरीर में फैल रहा है। जैसे कैंसर को पराजित करने के लिए दवाओं के साथ-साथ मनोबल की जरूरत होती है, वैसे ही भ्रष्टाचार की इस बीमारी से लड़ने के लिए पहले यह अहसास जरूरी है कि भले ही भ्रष्टाचार विश्वव्यापी हो, और भले ही यह लगने लगा हो कि इसे एक जीवन पद्धति की तरह स्वीकारा जा रहा हैं, लेकिन भ्रष्टाचार जीवन की सामान्य स्थिति नहीं है। इसके किसी भी स्तर को सामान्य कहकर हम एक अपराध को ही स्वीकृति देते हैं। हालांकि कहा जाता है अपराध से घृणा करनी चाहिए अपराधी से नहीं, लेकिन भ्रष्टाचार के मामले में तो अब यह जरूरी लगने लगा है कि भ्रष्टाचारी की पहचान ही नहीं की जाए, बल्कि घोषित भी किया जाए कि वह समाज और व्यवस्था पर कलंक है। हमारी विडम्बना यह है कि हम भ्रष्टाचार को अपराध तो मानते हैं, लेकिन इसके अपराधी को सामान्य स्थिति का लेबल लगाकर छोड़ देते हैं। इसीलिए यह अपराध भी पल रहा है और अपराधी भी। पहली बात तो यह कि बहुत कम भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई हो पाती है और जिनके खिलाफ होती है उन्हें भी सामाजिक अस्वीकृति का डर नहीं रहता। अफसर भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है तो उसे कभी-कभी नौकरी से भी निकाल देते हैं, लेकिन समाज में निंदित नहीं होता वह। भ्रष्टाचारी नेता तो हमेशा यह कहकर बच निकलते हैं कि उनके विरोधी उन्हें बदनाम कर रहे हैं। रंगे हाथों पकडे़ गए नेता भी नेता बने रहते हैं। यह शर्मनाक है। इसे सिर्फ सामान्य नहीं कहा जाना चाहिए, तभी हम इस स्थिति को बदलने के बारे में सोच सकेंगे।