Sunday, 22 March 2009
कोई भी रोक नहीं पाया फांसी..
लाहौर षड्यंत्र केस में 23 मार्च 1931 को जब 23 वर्षीय भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को सूली पर लटकाया गया तो इसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनी गई। ब्रिटिश हुकूमत के इस कुकृत्य की जहां तत्कालीन भारतीय नेताओं ने जमकर आलोचना की, वहीं देश-विदेश के तमाम अखबारों ने भी इसे सुर्खियां बनाया। फांसी 24 मार्च को दी जानी थी। लेकिन जनविद्रोह के डर से ब्रिटिश हुक्मरानों ने तिथि चुपके से बदलकर 23 मार्च कर दी।
बिपिन चंद्र द्वारा लिखी गई भगत सिंह की जीवनी 'मैं नास्तिक क्यों हूं' में इस घटना पर तत्कालीन नेताओं और अखबारों द्वारा व्यक्त की गई तीखी टिप्पणियां सिलसिलेवार ढंग से दर्ज हैं।
-'..यह काफी दुखद और आश्चर्यजनक घटना है कि भगत सिंह और उसके साथियों को समय से एक दिन पूर्व ही फांसी दे दी गई। 24 मार्च को कलकत्ता से कराची जाते हुए रास्ते में हमें यह दुखद समाचार मिला। भगत सिंह युवाओं में नई जागरूकता का प्रतीक बन गया है।' [सुभाष चंद्र बोस]
-'मैंने भगत सिंह को कई बार लाहौर में एक विद्यार्थी के रूप में देखा। मैं उसकी विशेषताओं को शब्दों में बयां नहीं कर सकता। उसकी देशभक्ति और भारत के लिए उसका अगाध प्रेम अतुलनीय है। लेकिन इस युवक ने अपने असाधारण साहस का दुरुपयोग किया। मैं भगत और उसके साथी देशभक्तों को पूरा सम्मान देता हूं। साथ ही देश के युवाओं को आगाह करता हूं कि वे उसके मार्ग पर न चलें।' [महात्मा गांधी]
-'हम सबके लाड़ले भगत सिंह को नहीं बचा सके। उसका साहस और बलिदान भारत के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।' [जवाहर लाल नेहरू]
-'अंग्रेजी कानून के अनुसार भगत सिंह को सांडर्स हत्याकांड में दोषी नहीं ठहराया जा सकता था। फिर भी उसे फांसी दे दी गई।' [वल्लभ भाई पटेल]
-'भगत सिंह ऐसे किसी अपराध का आरोपी नहीं था जिसके लिए उसे फांसी दे दी जाती। हम इस घटना की कड़ी निंदा करते हैं।' [प्रसिद्ध वकील और केंद्रीय विधानसभा सदस्य डीबी रंगाचेरियार]
-'भगत सिंह एक किंवदंती बन गया है। देश के सबसे अच्छे फूल के चले जाने से हर कोई दुखी है। हालांकि भगत सिंह नहीं रहा लेकिन 'क्रांति अमर रहे' और 'भगत सिंह अमर रहे' जैसे नारे अब भी हर कहीं सुनाई देते हैं।' [अंग्रेजी अखबार द पीपुल]
-'पूरे देश के दिल में हमेशा भगत सिंह की मौत का दर्द रहेगा।' [उर्दू अखबार रियासत]
-'राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह की मौत से पूरे देश पर दुख का काला साया छा गया है।' [आनंद बाजार पत्रिका]
-'जिस व्यक्ति ने वायसराय को इन नौजवानों को फांसी पर लटकाने की सलाह दी, वह देश का गद्दार और शैतान था।' [पंजाब केसरी]
Sunday, 15 March 2009
गाँव बसा नहीं, लुटेरे पहले आ गए !

Saturday, 14 March 2009
तेरा क्या होगा पाकिस्तान?

Thursday, 12 March 2009
मेरा शहर बदल गया है?
Wednesday, 4 March 2009
गरीबी पश्चिम में खूब बिकती है।

फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनेर' का इतना हल्ला मचा हुआ है कि मुझ जैसे साधारण पत्रकार को भी यह देखनी पड़ी। मैं इस फिल्म की कलात्मक उत्कृष्टता, म्यूजिक या सॉन्ग पर टिप्पणी करने की पात्रता नहीं रखता, लेकिन एक बात निश्चय ही पूरे आत्म विश्वास के साथ कर सकता हूं और वह यह कि ब्रिटेन, अमेरिका और कई पश्चिमी देशों की भारत को देखने की जो पुरानी और पूर्वाग्रहपूर्ण दृष्टि रही है, उसमें कोई खास बदलाव नहीं आया है। भारत को एक गरीब, आपस में लड़नेवाला, भ्रष्ट और कमजोर देश माना जाता रहा है। एक ऐसा देश जहां गरीब मनुष्य होकर भी समाज में आधे-पौने मनुष्य का दर्जा रखते हैं। जिनकी अपनी कोई कीमत नहीं लेकिन जिनकी गरीबी पश्चिम में खूब बिकती है। भारत में गरीब होना चूंकि कमतर मनुष्य होना है, इसलिए कम से कम हमारे शहरों में तो कोई गरीब भी यह नहीं चाहता कि उसकी गरीबी दिखाई जाए। यही कारण है कि इस फिल्म के ब्रिटिश निर्देशक डैनी ब्वॉयल जब फिल्मांकन के सिलसिले में स्लम बस्तियों में गए तो वहां उनके साथ काम करने को तैयार हुए लोगों ने पूछा : 'आप हमें गरीबों के रूप में तो दर्शाने नहीं जा रहे?' उन्होंने क्या उत्तर दिया यह तो मालूम नहीं है लेकिन 'टाइम' पत्रिका में '10 क्वेश्चन्स' कॉलम के अंतर्गत उनसे पूछे गए एक सवाल का उत्तर यहां दृष्टव्य है। उनसे पूछा गया था कि भारत में गरीबी का रोमानीकरण करने के आरोपों के बारे में आपका क्या उत्तर है तो उन्होंने कहा 'लोगों ने जो स्लम बस्तियों में हमारे साथ काम कर रहे थे, हमसे पूछा कि आप (फिल्म में)हमें गरीबों के रूप में तो चित्रित नहीं करेंगे? या करेंगे? क्योंकि पश्चिमी लोग हमेशा ऐसा ही करते हैं। मगर मैंने फिल्म को एक ऐसी ऊर्जा के साथ बनाने की कोशिश की है ताकि यह प्रतिबिम्बित हो कि यह जगह कैसी है (जहां ये लोग रहते हैं) कि गरीबी के बावजूद यहां एक जीवंतता-जिजीविषा है।' लेकिन गरीबी दिखाने के पश्चिमी पूर्वाग्रह के चलते उन्हें स्लम के अपने सहयोगियों की संवेदनशीलता का जरा भी ध्यान नहीं रहा। कुरूप यथार्थ का जैसा वीभत्सीकरण यहां दिखाई देता है, उसे देखकर रुह तक कंपा देनेवाली जुगुप्सा पैदा होती है। एक दृश्य में स्लम का बच्चा संडास में बैठा है। उसे पता चलता है कि वहीं कहीं अमिताभ बच्चन आया है। अमिताभ बच्चन के ऑटग्राफ लेने के लिए वह बच्चा संडास से मल के कुण्ड में नाक दबाकर कूद जाता है और शायद सामने से तत्काल हटाने के लिए मजबूर कर देनेवाली स्थिति में ऑटग्राफ भी पा लेता है। कलाओं में यथार्थ का अतिकरण कई बार भाव-भंगिमाओं के साधारणीकरण और संप्रेषण के लिहाज से किया जाता है। लेकिन ऐसी वीभत्स अति? मैं पूछना चाहूंगा कि मल से सने बल्कि नहाये बच्चे को कल यदि खुद फिल्म निर्देशक डैनी बॉयल को ऑटग्राफ देना पड़े तो क्या वह कुछ सेकंड भी वहां ठहरना सह सकेंगे? ठीक है कि सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा आज भी भारत में जारी है, लेकिन गरीब बच्चे के अमिताभ-आकर्षण के एक प्रतीक को इस सीमा तक खींचना किस कलागत औचित्य को दर्शाता है? डैनी बॉयल इसके लिए अपनी ब्रिटेन में हुई परविश या संस्कार को जिम्मेदार मानते हैं। तो यह संस्कार या पूर्वाग्रह क्या है? कि भारतीय गंदे होते हैं? उनके घरों से मैला उठाने के लिए एक अलग जाति के लोग आते हैं? कि वे गंदा पानी पीते हैं और गंदे हाथों से खाना खाते है? आदि-आदि। जो लोग इस फिल्म को भारतीय फिल्म सिद्ध करने के लिए शीर्षासन कर रहे है, और कह रहे है कि इसकी कहानी भारतीय है और एक भारतीय द्वारा ही लिखी गई है, इसके पात्र भारतीय हैं, संगीत और संगीतकार भारतीय है, इसका फिल्मांकन भारत में हुआ है, वे लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि इसका निर्देशक और उसकी टीम विदेशी है। और उसने माना है कि यह फिल्म एक हाइब्रिड फिल्म है। देशी और विदेशी टीमों का एक संयुक्त उपक्रम। फिल्म निर्देशक और पटकथा दोनों सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं और ये दोनों विदेशी हैं। इसलिए यह भारतीय फिल्म नहीं मानी जा सकती। आप चाहें तो खुद निर्देशक से सत्र लेकर इसे वर्णसंकर कह सकते हैं। फिल्म का नजरिया पश्चिमी है, संवेदनशीलता पश्चिमी है और बम्बइया फिल्मों के लटके-झटकों के बावजूद इसमें वही दिखाया गया है, जो पश्चिमी दर्शक देखना चाहता है। पिछले एक दशक में यूरोप और अमेरिका में भारत की पुरानी गरीब और पिछड़े देश की इमेज पर एक उभरती हुई आर्थिक और सैन्य ताकत की इमेज हावी है। यह धारणा बनी है कि भारत और चीन कुछ दशकों में दुनिया की महाशक्तियों में होंगे। भारतीय या भारतीय मूल के उद्योगपति विदेशी कंपनियां खरीद रहे है और अरबपतियों की विश्व कतार में खड़े होने वाले भारतीयों या भारतवंशियों की संख्या बढ़ रही है। भारत को जी-8 जैसे अमीर देशों की बैठकों में बुलाया जाने लगा है। अपनी प्रतिभा और परिश्रम से अमेरिका और अन्य देशों में भारतीय छा गए हैं। भारत अंतरिक्ष की भी एक ताकत बन चुका है और उसके पास करीब-करीब इतनी आबादी वाला मध्यवर्ग है, जो अमेरिका की पूरी आबादी है। यह एक तरह का कल्चरल शॉक जैसा है। इसलिए दो छवियों के बीच इस पृष्ठभूमि में द्वंद्व में संतुलन बैठाने का रास्ता यह निकाला गया है कि भारत की इस नई इमेज को तोड़ो। उसे पुरानी गरीब, पिछड़ी और जाहिल की इमेज पर हावी मत होने दो। भारत को उसके अंधेरे में, उसकी दरारों में पकड़ो, जहां सीलन है, बदबू है, गंदगी है और जहां लोग नहीं मानों कॉकरोच रहते हैं। ऐसे कॉकरोच जिन्हें करीब 60 सालों में न तो मिटाया जा सका है और न मिटाया जा सकेगा। भारत की इस कटु सचाई से मैं मुंह नहीं मोड़ रहा। भारत निश्चय ही गरीब और पिछड़ा देश है। देश की 77 प्रतिशत आबादी प्रतिदिन एक डॉलर (करीब 50 रु.)भी नहीं कमा पाती। करोड़ों लोगों को दिन में एक बार ही मुश्किल से खाना मिल पाता है। बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। रहने के लिए झोपड़ी और पीने के लिए साफ पानी नहीं है। हिन्दू-मुस्लिम दंगे होते हैं (फिल्म में ऐसे ही एक दंगे में बचपन में ही नायक की माँ मारी जाती है), अल्पसंख्यक जुल्मों का शिकार होते हैं और जमाल जैसा बच्चा अगर एक दिन अमीर बन भी सकता है तो यह कौन बनेगा करोड़पति जैसे टीवी कार्यक्रमों से निकला एक चमत्कार ही है। भारत में ज्ञान की कद्र है और ज्ञान से धन भी अर्जित किया जा सकता है, लेकिन गरीब मुसलमानों के बच्चे शिक्षा से नहीं, अंडरवर्ल्ड के फंदे में फंसकर वह ज्ञान अर्जित करते हैं जो एक दिन टीवी कार्यक्रमों के जरिए उन्हें लॉटरी तक पहुंचाता है। फिल्म में नायक एक जगह चैनल के स्टूडियो में बैठा अनिल कपूर के प्रश्नों के उत्तर दे रहा है तो फ्लैशबैक में दो पुलिसकमिर्यों की ज्यादतियों के बीच उन यातनाओं को बयान कर रहा है, जिनसे गुजरते हुए उसे क्विज के उत्तर प्राप्त हुए। तो फिल्म का असली पक्ष वह नहीं है जो स्टूडियो की चमक-दमक में दिखाया गया है, असली पक्ष फ्लैशबैक में है, जहां दंगों में अल्पसंख्यकों का मारा जाना है, भिक्षा कराने वाले गिरोहों द्वारा अबोध बच्चों का पकड़ा जाना और फिर हाथ-पैर तुड़वाना या आंख फुड़वाना है, ताकि लोगों को दया आए और वे ज्यादा भीख दें। बड़ी बारीक तरह से फिल्म में उग्र हिन्दूवाद को भी उठाया गया है और जैसे संकेत किया गया है कि भिखारी बच्चा हिन्दू हो या मुसलमान पर भीख मांगते हुए वह हिन्दू प्रार्थना ही गाता है। स्लम की बच्चियां देह शोषण की शिकार हैं और लोग अपना जीवन या तो अमिताभ बच्चन की एक झलक पाने की चाह में या फिर कौन बनेगा करोड़पति जैसे कार्यक्रमों के जरिए भाग्य उदय होने की आशा में जीते हैं। अगर फिल्म में कोई मन को छूनेवाली बात है तो जमाल और लतिका का प्रेम है, जो आश्रयहीन और अनाथ बच्चों में भी उतना ही मौलिक और निश्छल हो सकता है, जैसा सामान्य तौर पर होता है। रहमान बड़े संगीतकार है लेकिन उनके जिस गीत का शोर है, उसे भी उनका उत्कृष्ट या प्रतिनिधि गीत नहीं माना जा सकता। जरा सोचिए कि अगर यही फिल्म किसी भारतीय ने बनाई होती तो क्या उसे 8 ऑस्कर मिलते। एक साधारण दर्शक के नाते मैं सत्यजित राय की पथेर पांचाली जैसी उत्कृष्ट फिल्म से इस फिल्म की तुलना करना चाहता जिसकी गरीबी के आधार पर की जा रही है ना ही किसी को करनी चाहिए। वहां गरीबी गौण हो जाती है और मानवीय प्रश्न ही अंतत: आपका पीछा करता रहता है। उन्हें सम्मान भी बहुत बाद में मिला। इस फिल्म को मिल रहे सम्मान कोई भी अवहेलना नहीं कर सकता, लेकिन कृपया इस फिल्म को इस संदर्भ के साथ भी मिलाकर देखिए कि एक उभरते भारत का धीरे-धीरे पश्चिमी दृष्टि से ओझल हो रहा पुराना सच इस रूप में आखिर क्यों याद दिलाया जा रहा है? क्या इस मनोरंजन-सरोकार के पीछे वही पुरानी श्रेष्ठता ग्रन्थि काम नहीं कर रही है? लेकिन क्रोध करने की बजाय आप भी इस फिल्म को जरूर देखिए और सोचिए कि क्या नाराज होकर हम भारत को देखने वाली इस पुरानी पश्चिमी दृष्टि को बदलवा सकते हैं या हमें ही अपने यहां व्यापक पटल पर बदलाव लाने की जरूरत है? तो उत्तर इस वाक्य के अन्त में है लेकिन मैं नहीं जानता कि यह कैसे होगा।
Monday, 2 February 2009
न्यायपालिका बनाम लोकतंत्र

आपको मध्य प्रदेश के प्रोफेसर सब्बरवाल की हत्या का मामला याद होगा। वे कॉलिज चुनाव के दौरान आचार संहिता लागू करना चाहते थे, जिसमें एबीवीपी के कुछ छात्र उग्र हो उठे और उन्होंने प्रोफेसर सब्बरवाल की इतनी पिटाई की कि उनकी जान चली गई। उस समय मध्य प्रदेश में बीजेपी की सरकार थी और जल्दी ही यह स्पष्ट हो गया कि वह दोषी छात्रों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं कर सकेगी। वहां की स्थानीय अदालत में पीडि़त पक्ष के लिए न्याय पाना संभव नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य को रेखांकित किया और वह केस उज्जैन (म.प्र.) से नागपुर (महाराष्ट्र) स्थानांतरित कर दिया। यहां हम व्यक्तिगत अपराधों की सुनवाई (जैसे जयललिता या अमरमणि त्रिपाठी के मामले) दूसरे राज्य में ट्रांसफर करने की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन मामलों की बात कर रहे हैं, जिनमें ऐसी भीड़ ने कोई अपराध किया, जिसे उस पार्टी का समर्थन प्राप्त हो जो लोकतांत्रिक पद्धति से चुनी गई हो, सत्ता में हो और जिसमें अपराधियों को दंडित करने की इच्छा या नैतिक साहस नहीं हो। ऐसी नजीरों में गुजरात के दंगों को भी शामिल किया जा सकता है। उस समय भी जाहिरा शेख और बिलकिस बानो के मामले गुजरात से मुंबई ट्रांसफर किए गए। इतना ही नहीं, जब राज्य पुलिस ने दंगों से संबंधित दो हजार मामले यह कह कर बंद किए कि वह दोषियों को ढूंढने में असमर्थ है, तब सुप्रीम कोर्ट ने लगाम कसते हुए राज्य सरकार को यह निर्देश दिया कि वह एक नई हाई लेवल टीम बनाए, जो यह देखे कि क्या उनमें से किसी भी केस को दोबारा खोलने की कोई संभावना हो सकती है, कहीं पुलिस ने उन्हें यूं ही रफादफा करने की कोशिश तो नहीं की है। उस समय मुसलमानों के खिलाफ दंगे हुए थे, राज्य में बीजेपी की सरकार थी और केंद्र में एनडीए की, जिसे अल्पसंख्यकों की पिटाई और हिंदुओं की हिंसा की संतुष्टि चुनावी नजरिए से लाभ पहुंचा सकती थी। आप बहस के लिए कह सकते हैं कि जो गलत है, सो गलत है। या नियम-कानून भी कोई चीज है। पर डिमॉक्रसी में सिद्धांत और संविधान जमीन पर किस तरह अपना रूप बदल लेते हैं, यह हम सब जानते हैं। दार्शनिक प्लेटो ने 'रिपब्लिक' में इस स्थिति की कल्पना की थी। उसने लिखा कि इसमें संदेह नहीं कि डिमॉक्रसी दूसरी शासन व्यवस्थाओं से बेहतर होती है, लेकिन उसका भी क्षरण और पराभव होता है और वह भीड़तंत्र (मॉबोक्रेसी) में बदल जाती है। तब संख्या बल से सही और गलत की परिभाषा निर्धारित होने लगती है और बहुसंख्यक अपने हिसाब से चीजों को तोड़-मरोड़ लेते हैं। ऐसी स्थितियों में हमारी स्वतंत्र न्यायपालिका की भूमिका किसी उद्धारक या रक्षक की तरह नजर आती है। हायर जुडिशरी को चोरी, घूसखोरी और जमीन जायदाद के मामलों में उलझने के बदले, अपनी इस नई भूमिका में आगे बढ़ना चाहिए।
Sunday, 1 February 2009
राहुल की राह

Friday, 23 January 2009
आइए, भारत की गरीबी का जश्न मनाएं!

Wednesday, 5 November 2008
कौन सा सपना मचल रहा है

ये कौन सा सपना मचल रहा है
ये खून किसका उबल रहा है
ये किसकी सांसों में आग सी है
ये कौन गिर के संभल रहा है
ये किसके सुर हैं सिके सिके से
ये किसकी धड़कन चटक रही है
ये किसके कदमों में फौज सी है
ये कौन करवट बदल रहा है
ये कौन दरिया को पी रहा है
ये कौन सच कह के जी रहा है
ये किसके घाव में है तरन्नुम
ये कौन लोहा पिघल रहा है
ये किसका साया है धूप जैसा
ये किसका लहू है ‘सूप’ जैसा
ये किसके होठों में हड्डियां हैं
ये कौन नीदों में चल रहा है
चलो टटोलूं मैं आज खुद को
कहीं ये गुस्ताख मैं तो नहीं
ये हलचलें हैं मुझी में शायद
यकीं मुझे खुद पे मिल रहा है.
Friday, 26 September 2008
मैं गीत ग़मों के गाता हूँ!

Thursday, 25 September 2008
मेरी अधूरी कविता....

माँ तू तो कहती......
हम सब एक इश्वर की है संताने,
फ़िर , इक सोता फुटपाथों पर,
आतंकवाद के विरुद्ध

गरीबी का जाल

सरकार भले ही यह दावा करे कि अपनी नीतियों में वह देश के पिछड़े क्षेत्रों और निर्धनों पर विशेष ध्यान देती है, लेकिन अभी तक उसकी योजनाओं का कोई ऐसा ठोस नतीजा देखने में नहीं आया है, जिसकी मिसाल देकर कहा जा सके कि उसने हमारे गांवों की सूरत बदल दी है। उलटे देश के किसी न किसी हिस्से से अक्सर ऐसी ही खबरें आती हैं, जो तमाम योजनाओं और दावों पर सवालिया निशान खड़े कर देती हैं। मध्य प्रदेश में पिछले चार महीने में 160 से भी ज्यादा बच्चों की कुपोषण के कारण मौत हो चुकी है। जनजातीय जिलों-सतना और खंडवा में हालात बेहद खराब हैं। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस भेजकर इस बारे में जानकारी मांगी है। लेकिन दूसरे राज्यों की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। आमतौर पर सरकारी अमला भूख से मौत की बात को स्वीकार नहीं करता। वह मौत के लिए बीमारी को जिम्मेदार ठहराता है। लेकिन सच तो यह है कि जन्म के बाद जिन पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, वे बच्चों को मिल नहीं पाते, जिससे उनमें कई तरह की बीमारियां पनपती हैं। यानी मूल कारण सही भोजन की कमी ही है। आज भी देश का एक बड़ा हिस्सा पर्याप्त भोजन से वंचित है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े के मुताबिक देश के 20 करोड़ लोगों को ढंग का खाना मयस्सर नहीं है। पचास फीसदी से भी ज्यादा बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, इनमें से 20 प्रतिशत की स्थिति गंभीर है। गांवों या आदिवासी इलाकों में महिलाओं को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं है। दुनिया में शायद ही इतनी महिलाएं प्रसव के दौरान जान गंवाती होंगी। भारत में हर साल करीब पांच लाख महिलाओं की मौत प्रसव के दौरान हो जाती है। गरीबी के कारण लोग अपने बच्चों को बुनियादी भोजन भी उपलब्ध नहीं करा पाते, इसलिए बच्चे बीमार हो जाते हैं। दूसरी तरफ बेहतर स्वास्थ्य सेवा न होने के कारण न तो बच्चों का ढंग से टीकाकरण हो पाता है, न ही उनकी बीमारियों का समुचित इलाज। यानी समस्या दो स्तरों पर है। एक तो खाद्यान्न संकट है और दूसरा है सक्षम सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र का अभाव। सार्वजनिक वितरण प्रणाली(पीडीएस) जैसी व्यवस्था निर्धनों के लिए ही शुरू की गई थी पर आज इसमें भ्रष्टाचार का घुन लग गया है। वित्त मंत्री पी. चिदंबरम तक स्वीकार कर रहे है कि पीडीएस को नए सिरे से व्यवस्थित करना जरूरी है। यूपीए सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम की घोषणा भी बड़े जोर-शोर से शुरू की थी, लेकिन इसे भी ढंग से अमल में नहीं लाया जा सका है। मिड-डे मील की योजना भी कारगर ढंग से नहीं चल रही है। हर जगह यही रोना है कि ग्रामीण योजनाओं के लिए केंद्र से जारी राशि की स्थानीय स्तर पर बंदरबांट हो जाती है। ग्रामीण भारत का यथार्थ शायद उससे भी ज्यादा भयावह है, जितना हम सोचते या जानते हैं। गरीबों के लिए वादे करने और योजना बना देने भर से काम नहीं चलेगा, इस बात पर लगातार नजर रखनी होगी कि उनका लाभ सही जगह पहुंच रहा है या नहीं।
Tuesday, 23 September 2008
भ्रष्टाचार को आप ही मिटा सकते हें

' स्थिति तनावपूर्ण लेकिन सामान्य है' यह वाक्य सरकारी बयानों में अक्सर दिखाई दे जाता है और जब भी कहीं यह वाक्य दिखता है, शब्द 'सामान्य' के अर्थ के बारे में मन में शंका उठने लगती है। जब तनावपूर्ण स्थिति सामान्य बताई जाए, तो इसका केवल एक ही अर्थ हो सकता है कि तनावपूर्ण स्थिति को हमने सामान्य मान लिया है। यानी स्वीकार कर लिया है इस स्थिति को। यह बात आम तौर पर कानून-व्यवस्था के संदर्भ में कही जाती है लेकिन असामान्य को सामान्य मान लेने का किस्सा काफी गहरे और काफी दूर तक फैला हुआ है। यह कहावत भी कि 'दर्द का हद से गुजर जाना दवा हो जाता है' इसी संदर्भ में समझी-समझाई जा सकती है। गलत स्थितियों को इस तरह स्वीकारते जाना कोई अच्छी स्थिति नहीं है- वस्तुत: यह हमारी विफलता का ही उदाहरण है। आज महंगाई को विश्वव्यापी समस्या बताकर हमें समझाया जा रहा है कि जरूरी वस्तुओं के आकाश छूते भावों से घबराने की आवश्यकता नहीं है, जब दुनिया में भाव कम होंगे, हमारे यहां भी हो जाएंगे। इसी तरह कभी भ्रष्टाचार के बारे में कहा गया था। जब देश में भ्रष्टाचार हर तरफ सिर उठाने लगा था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसे विश्वव्यापी समस्या बताकर एक तरह से स्वीकार्य स्थिति के रूप में समझाने की कोशिश की थी। ऐसा ही कुछ अब किया जा रहा है। हाल ही में भ्रष्टाचार के बारे में एक रिपोर्ट जारी हुई है। यह रिपोर्ट ट्रांसपेरेंसी इंटरनैशनल और सेंटर फॉर मैनेजमंेट स्ट्डीज द्वारा तैयार की गई है। समाचारों के अनुसार रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश, बिहार और असम सहित देश के सात राज्यों में भ्रष्टाचार का स्तर खतरनाक है। इस श्रेणी में आने वाले अन्य राज्य हैं- जम्मू-कश्मीर, गोवा और नगालैंड। रिपोर्ट में कहा गया है कि कर्नाटक, राजस्थान, तमिलनाडु, मेघालय और सिक्किम में भ्रष्टाचार का स्तर बहुत ऊंचा है। इसके बाद छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, झारखंड, केरल, उड़ीसा, अरुणाचल और मणिपुर का नाम लिया गया है। इस राज्यों में भ्रष्टाचार का स्तर ऊंचा बताया गया है। खतरनाक स्तर से लेकर ऊंचे स्तर तक की यह कहानी भ्रष्टाचार की जड़ों की गहराई का संकेत दे रही है और इस बात का भी कि रोग कितना फैल गया है। लेकिन इस महत्वपूर्ण रिपोर्ट का अगला हिस्सा कहीं ज्यादा चौंकाने वाला है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आंध्र प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, चंडीगढ़, मिजोरम, पांडिचेरी और त्रिपुरा में भ्रष्टाचार सामान्य है। भ्रष्टाचार सामान्य होने का क्या मतलब है? मतलब यह है कि इन राज्यों में भ्रष्टाचार का स्तर उतना ही है जितना आम तौर पर होता है। यानी यह मान लिया गया है कि भ्रष्टाचार है, लेकिन इतना तो चलता है। कानून और व्यवस्था के संदर्भ में स्थिति को तनावपूर्ण, लेकिन सामान्य कहने के पीछे जो मानसिकता होती है, वही भ्रष्टाचार की स्थिति को सामान्य घोषित करने के पीछे भी है। जैसे किसी तनावपूर्ण स्थिति को सामान्य मानना-कहना गलत है, वैसे ही समाज में फैले भ्रष्टाचार को सामान्य मान लेना भी सही नहीं है। भ्रष्टाचार का खतरनाक स्तर जितना खतरनाक हो सकता है, उससे कहीं अधिक खतरनाक स्थिति भ्रष्टाचार के स्तर को सामान्य मान लेने की है। यह स्वीकारोक्ति समाज और व्यवस्था की सकारात्मक प्रवृत्तियों की पराजय का ही संकेत नहीं है, वरन यह भी बताती है कि स्थितियों को समझने और उनके मूल्यांकन के हमारे पैमाने सही नहीं हैं। ऐसा लगता है कि हमने भ्रष्टाचार के आगे घुटने टेक दिए हैं। कुछ अर्सा पहले सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड चीफ जस्टिस ने यह कहा था कि हमारी न्यायपालिका में लगभग 20 फीसदी जज भ्रष्ट हैं। यह सुनकर देश चौंका था- इसलिए नहीं कि न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार है, बल्कि इसलिए कि एक जस्टिस ऐसी बात कह रहा है। यहां स्वीकारना होगा कि आज भी कुल मिलाकर जनता का विश्वास अभी न्यायपालिका से टूटा नहीं है। विधायिका और कार्यपालिका की तुलना में न्यायपालिका में जनता का विश्वास निश्चित रूप से अधिक है, लेकिन 20 फीसदी वाली स्वीकारोक्ति के बाद भी इस विश्वास का बने रहना यही बताता है कि कम से कम उस स्तर तक भ्रष्टाचार को हमने स्वीकार कर लिया है। आप कह सकते हैं कि इस स्थिति को हमने सामान्य मान लिया है। जैसे ट्रांसपेरेंसी इंटरनैशनल वाली रिपोर्ट देश के ग्यारह राज्यों में भ्रष्टाचार की स्थिति को सामान्य कह रही है। सामान्य के प्रति यह भ्रामक दृष्टिकोण और उसकी स्वीकार्यता हमारे सोच और व्यवस्था दोनों पर एक गंभीर सवाल है। जैसे तनावपूर्ण स्थिति सामान्य नहीं होती, वैसे ही भ्रष्टाचार का कोई भी स्तर सामान्य नहीं हो सकता। ऐसा होना भी गलत है, ऐसा मानना भी। भ्रष्टाचार एक कैंसर है और अब यह कैंसर सारे शरीर में फैल रहा है। जैसे कैंसर को पराजित करने के लिए दवाओं के साथ-साथ मनोबल की जरूरत होती है, वैसे ही भ्रष्टाचार की इस बीमारी से लड़ने के लिए पहले यह अहसास जरूरी है कि भले ही भ्रष्टाचार विश्वव्यापी हो, और भले ही यह लगने लगा हो कि इसे एक जीवन पद्धति की तरह स्वीकारा जा रहा हैं, लेकिन भ्रष्टाचार जीवन की सामान्य स्थिति नहीं है। इसके किसी भी स्तर को सामान्य कहकर हम एक अपराध को ही स्वीकृति देते हैं। हालांकि कहा जाता है अपराध से घृणा करनी चाहिए अपराधी से नहीं, लेकिन भ्रष्टाचार के मामले में तो अब यह जरूरी लगने लगा है कि भ्रष्टाचारी की पहचान ही नहीं की जाए, बल्कि घोषित भी किया जाए कि वह समाज और व्यवस्था पर कलंक है। हमारी विडम्बना यह है कि हम भ्रष्टाचार को अपराध तो मानते हैं, लेकिन इसके अपराधी को सामान्य स्थिति का लेबल लगाकर छोड़ देते हैं। इसीलिए यह अपराध भी पल रहा है और अपराधी भी। पहली बात तो यह कि बहुत कम भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई हो पाती है और जिनके खिलाफ होती है उन्हें भी सामाजिक अस्वीकृति का डर नहीं रहता। अफसर भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है तो उसे कभी-कभी नौकरी से भी निकाल देते हैं, लेकिन समाज में निंदित नहीं होता वह। भ्रष्टाचारी नेता तो हमेशा यह कहकर बच निकलते हैं कि उनके विरोधी उन्हें बदनाम कर रहे हैं। रंगे हाथों पकडे़ गए नेता भी नेता बने रहते हैं। यह शर्मनाक है। इसे सिर्फ सामान्य नहीं कहा जाना चाहिए, तभी हम इस स्थिति को बदलने के बारे में सोच सकेंगे।