Thursday, 2 April 2009

जुए में पत्नी हारी, जुआरियों ने किया दुष्कर्म !


राजस्थान में एक युवक के जुए की लत की कीमत उसकी पत्नी को अपनी इज्जत से चुकानी पड़ी है। बारां के सल्लू ने जुए में 50 हजार रुपए हारकर अपनी पत्नी को दांव पर लगा दिया और हार बैठा। जीतने वाले जुआरियों ने विवाहिता को जंगल ले जाकर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। किसी तरह भागकर वह अपने पीहर पहुंची और मां को सारी व्यथा सुनाई। गुरुवार को मां-बेटी ने एसपी से मिलकर मामले की शिकायत की है। उन्होंने डीएसपी को गांव जाकर जांच करने के आदेश दिए हैं।
विवाहिता की शिकायत के मुताबिक, दस साल पहले उसकी शादी बटावदापार गांव में सल्लू के साथ हुई थी। पति को जुआ खेलने की लत थी। गत 25 मार्च को सल्लू जुए में पचास हजार रुपए हार गया। रुपए की एवज में उसने पत्नी को ही दांव पर लगा दिया। जब सल्लू रात 12 बजे घर आया तो पत्नी को बाहर जाने के लिए कहा। घर से बाहर निकलते ही गांव के परसराम ने उसे पकड़कर मुंह में रूमाल ठूंस दिया और हाथ-पैर रस्सी से बांध दिए। बाद में उसे जीप में डालकर जंगल ले जाया गया जहां तीन लोगों ने उसके साथ सामूहिक दुराचार किया।
31 मार्च की रात जब जुआरी शराब के नशे में बेसुध हो गए, तब वह मौका पाकर भाग निकली। जंगल में भटकते हुए सड़क पर आई और एक बस ड्राइवर की मदद से गुना (मप्र) चली गई। गुना से वह अपने पीहर रूठियाई गांव आई और अपनी मां को सारी दास्तान सुनाई।
भरोसा नहीं फिर भी जांच
महिला के बयान में विरोधाभास है। उसके अपने पति से संबंध ठीक नहीं हैं। 29 मार्च को उसके पति सल्लू ने खुद गुमशुदगी का मामला दर्ज कराया था। भरोसा नहीं होता, कोई पति अपनी पत्नी के साथ ऐसा कर सकता है? -ओमप्रकाश, एसपी, बारां
अपहरण नहीं
एसपी के आदेश से गांव जाकर पूछताछ की है। विवाहिता की पुत्री, पुत्र, सास और पड़ोसियों से पूछताछ में अपहरण की कोई बात सामने नहीं आई। फिर भी मामले की जांच की जा रही है। -राजेन्द्रसिंह चारण, डीएसपी, छबड़ा
एक पति के द्धारा जुएं में अपनी पत्नी को दांव पर लगा देना किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता। आपकी नजर में ऐसे पति को क्या सजा दी जानी चाहिए?

Monday, 30 March 2009

आडवाणी का काला धन स्विस बैंक में !


नहीं भाई ये मै नहीं कह रहा ! ये कहना है हमारे लालू जी का....! लालू जी एसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि वो ये बात अच्छी तरह जानते है ! अरे भाई भैसों का दूध बेच कर जो थोड़ा बहुत धन उन्होंने जोड़ा था वो भी तो उसी (स्विस) बैंक में जमा है ! और लालू जी के रिफरेन्स पर ही तो अडवाणी जी का खाता स्विस बैंक में खुला था ! इस बात को आडवानी जी भूल गए लेकिन हमारे मेनेजमेंट गुरु लालू की याददाश्त आडवानी जी की तरह कमजोर नहीं है ! इसीलिए उन्होंने आडवानी जी को याद दिलाया है की स्विस बैंक में आपका खाता है और उसमे से पैसा नीकलाते रहा कीजिये ! क्योंकि इन विदेशी बैंक वालों का कोई भरोसा नही कल को मुकर गए तो ? इसलिए लालू अडवानी को बस याद दिला रहे है बेलेंस चेक करते रहना अडवानी जी....! लालू ने कहा कि आडवाणी ने स्विस बैंक में किसी दूसरे के नाम से पैसा जमा करा रखा है। और ये बात सिर्फ़ लालू जी ही जानते हैं ! इसलिए किसी से कहना नही !
लालू सोमवार को बिहार के सिवान, सिताबदियारा व मांझागढ़ में सभाओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि अगर आडवाणी को प्रधानमंत्री की कुर्सी मिली तो मैं राजनीति से संन्यास ले लूंगा। भाजपा देश में राममंदिर का राग अलाप कर एक बार फिर दंगा कराना चाहती है। वह अल्पसंख्यकों को यहां से भगाना चाहती है, जो हम नहीं होने देंगे। वरुण गांधी प्रकरण में उन्होंने आरएसएस और भाजपा पर गलत तरीके से फायदा उठाने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा कि साधु यादव को शामिल कर कांग्रेस गलतफहमी का शिकार हो गई है। उसे मालूम नहीं कि जब तक लालू हैं, तभी तक कोई लाल है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार किसी का भी भला करने वाले नहीं हैं।

दिल्ली, तेरी गलियों का वो इश्क याद आता है................


बीते हुए लम्हे....

गुजरे हुए पल.....

बिखरी हुई यादें.....

थोडी-सी कसक....।

थोडी सी-सी महक....

डूबी हुई कोई सिसकी....

कोई खुशनुमा-सी शाम.....

या दर्द में डूबा संगीत..........

सुरमई से कुछ भीने-भीने रंग.....

यादों से विभोर होता हुआ मन.......

मचलती हुई कई धड़कनें....

फड़कती हुई शरीर की कुछ नसें.....

जाने क्या कहता तो है मन....

जाने क्या बुनता हुआ-सा रहता है तन....

बहुत दिनों पहले की तो ये बातें थीं......

आज तक ये क्यूँ जलती हुई-सी रहती है....

ये आग मचलती हुई-सी क्यूँ रहती है.....

अगर प्यार कुछ नहीं तो बुझ ही जाए ना....

और अगर कुछ है तो आग लगाये ना...

बरसों पहले बुझ चुकी जो आग है....

वो अब तलक दिखायी कैसे देती है....

और हमारी तन्हाईयों में उसकी सायं-सायं की गूँज सुनाई क्यूँ देती है....!!

प्यार अमर है तो पास आए ना....

और क्षणिक है तो मिट जाए ना......

मगर इस तरह आ-आकर हमें रुलाये ना....!!



शर्मिंदा होने का एक और अवसर!


लीजिये अगर आप फ़िल्म स्लम डॉग देख कर शर्मिंदा नही हुए तो ये ख़बर आपको ज़रूर शर्मिंदा कर देगी ! हॉलीवुड अभिनेत्री ऎजिलीना जोली और अभिनेता बै्रड पिट लेगें भारतीय बच्चाा गोद लेने वाले है। यह जोडी पहले ही अलग-अलग देशों के कई बच्चाों को गोद ले चुकी है, लेकिन उन्हे भारत से बच्चाा गोद लेने की प्रेरणा मिली है स्लमडॉग मिलिनेयर के दस वर्षीय अजहरूदीन से । बताया जाता है कि उसने जोली से पूछा था कि उन्होने अब तक भारत से कोई बच्चाा गोद क्यों नहीं लिया। इस पर जोली का जवाब था, मैं तुम्हे एक राज की बात बता रही हंू। हमलोग जल्द ही एक भारतीय बच्चाा गोद लेने जा रहे है। तो बहाइये भारत की गरीबी पर आसूं और जोली को दीजिये नोबल पुरुस्कार ! सच जोली को कितनी चिंता है हिंदुस्तान की?

अडवाणी की जिद !



बीजेपी के पीएम कैंडिडेट लालकृष्ण आडवाणी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ टीवी पर बहस करना चाहते हैं, मनमोहन ने इंकार कर दिया तो उन्होंने सोनिया को न्योता दे दिया! आडवानी ज़िद पर हैं...! उनका कहना है बहस तो होनी ही चाहिए वो भी ठीक उसी तरह जिस तरह अमेरिका में प्रेजिडंट पद के उम्मीदवार बहस करते हैं। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि संसदीय जनतंत्र में इस तरह की बहस का कोई रिवाज नहीं है। लेकिन मान लीजिए कि यह अमेरिकी परंपरा अपने देश में भी शुरू हो जाए तो नजारा कैसा होगा? हो सकता है तब शरद पवार, मायावती, रामविलास पासवान और यहां तक कि लालू प्रसाद भी मैदान में कूद पड़ें। इनका सवाल यह होगा कि आखिर डिबेट आडवाणी जी और मनमोहन सिंह ही क्यों करेंगे? इन्होंने यह कैसे मान लिया कि सिर्फ उन्हीं की पार्टियां प्रधानमंत्री का उम्मीदवार तय करेंगी? यदि बहस की नौबत आती तो पता चलता कि शरद पवार ने मनमोहन सिंह को चुनौती दे डाली और लालू प्रसाद आडवाणी से बहस करने के लिए ताल ठोंककर खड़े हो गए। लालू प्रसाद तो बहस की शुरुआत में ही यह कह देते कि उन्होंने आडवाणी जी की कुंडली देख ली है, उसमें उनके प्रधानमंत्री बनने का कोई योग ही नहीं है। आडवाणी के लिए इसका जवाब देना आसान नहीं होता। कल्पना कीजिए कि ऐसी ही बहस के लिए फर्स्ट राउंड में मायावती और मुलायम सिंह आमने-सामने खड़े हो गए, तब किस तरह की बहस होगी। उधर दक्षिण में जयललिता, देवगौड़ा और चंद्रबाबू नायडू इसी उम्मीद में बहस में उतर सकते थे कि उनके दावे पर पुनर्विचार हो सकता है। लोग टीवी खोलते और हर एक घंटे के बाद उन्हें प्रधानमंत्री पद के 2 संभावित उम्मीदवार बहस करते हुए नजर आते। यहां जब क्षेत्रीय पार्टियां विधानसभा चुनाव में एक-दूसरे को सांपनाथ, नागनाथ बताने से नहीं चूकतीं तो राष्ट्रीय बहस का स्तर तो और ऊंचा हो जाता। हर नेता बेहतर परफॉर्म करने की कोशिश करता। लेकिन उन नेताओं का क्या होता, जो चतुर वक्ता नहीं होते? तब चुनाव आयोग से इस बात की मांग की जाती कि पीएम कैंडिडेट को बहस में अपना वक्ता लाने की छूट दी जाए। अगर आयोग यह छूट दे देता तो मनमोहन सिंह की ओर से कपिल सिब्बल और मुलायम सिंह यादव की जगह अमर सिंह भेजे जाते। वैसे बहस का प्रस्ताव रखते हुए आडवाणी ने क्षण भर के लिए यह जरूर सोचा होगा कि काश! टीवी डिबेट से ही पीएम का फैसला हो जाता। लेकिन टीवी या मंच पर बोलने से यह कैसे पता चलेगा कि कौन सचमुच 'लौह पुरुष' है और कौन 'कमजोर पुरुष।'

Sunday, 29 March 2009

नफ़रत की राजनीति!




गुजरात हाई कोर्ट ने राज्य की महिला तथा बाल विकास राज्य मंत्री मायाबेन कोडनानी की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर यह संदेश दिया है कि भारतीय राष्ट्र-राज्य के मूलभूत सिद्धांतों और संवैधानिक मूल्यों से खिलवाड़ करने वाले लोग कानून को कुछ दिनों तक धोखा देने में भले ही कामयाब हो जाएं पर वे उसके शिकंजे से बच नहीं सकते। अदालत ने यह निर्णय देते हुए कहा कि धर्मांध लोग आतंकवादियों से कम नहीं हैं। इस निर्णय के बाद कोडनानी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और विशेष जांच दल (एसआईटी) के कार्यालय में सरेंडर कर दिया। हाई कोर्ट के इस फैसले ने नरेंद्र मोदी सरकार को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। राज्य के अनेक सामाजिक संगठन शुरू से ही यह कहते रहे हैं कि वर्ष 2002 के दंगों के लिए राज्य का नेतृत्व वर्ग और पुलिस-प्रशासन का एक तबका भी जवाबदेह रहा है, लेकिन मोदी ने इसे मानने से हमेशा इनकार किया। कोडनानी के मामले में अब वह क्या कहेंगे? कोडनानी ने एक जन प्रतिनिधि होकर भी संवैधानिक ही नहीं मानवीय मूल्यों की भी धज्जियां उड़ाईं। उन पर नरोदा पाटिया में दंगाइयों की भीड़ को उकसाने और हथियार बांटने का आरोप है। इतना ही नहीं, जब उनके खिलाफ जांच शुरू हुई तो उन्होंने कानून की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की। इसके बावजूद नरेंद्र मोदी ने उन्हें मंत्रिमंडल में रखा और परोक्ष रूप से उनका बचाव भी किया। वह तो यह भी मानने से इनकार करते रहे हैं कि तत्कालीन पुलिस अधिकारियों ने दंगों को रोकने में कोई ढिलाई बरती। लेकिन उनके दावे की कलई पिछले महीने तब खुल गई जब एसआईटी ने एक डीएसपी को ड्यूटी में लापरवाही बरतने और सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने के आरोप में गिरफ्तार किया। एसआईटी ने कुछ और अफसरों की संदिग्ध भूमिका की ओर भी इशारा किया है, जिनमें एक सेवानिवृत्त अडिशनल डीजीपी भी हैं। आश्चर्य तो यह है कि गुजरात दंगे को लेकर राज्य सरकार की ओर उंगली उठने के बाद भी बीजेपी शर्मसार नहीं हुई, बल्कि पार्टी में नरेंद्र मोदी का कद और बढ़ गया। उन्हें प्रधानमंत्री बनाए जाने तक की मांग उठी। उन्हें विकास पुरुष के रूप में प्रॉजेक्ट करके पार्टी ने उनके दामन पर लगे दाग को धोने की कोशिश की। लेकिन समाज में नफरत फैलाकर, संवैधानिक मूल्यों को ताक पर रखकर विकास का कोई भी कदम व्यर्थ है। कई देशों में तानाशाही की व्यवस्था में जबर्दस्त आर्थिक तरक्की हुई है, लेकिन जनता ने कभी उस व्यवस्था को पसंद नहीं किया। यह दुर्भाग्य है कि बीजेपी जनतंत्र और विकास की बात करते हुए भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती। एक तरफ तो वह देश में सच्चा सेक्युलरिज्म लाने की बात करती है, लेकिन दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय के खिलाफ वरुण गांधी के उत्तेजक भाषण का समर्थन करती है और उनके बचाव में चुनाव आयोग तक पर निशाना साधती है। कोडनानी पर गुजरात हाई कोर्ट के फैसले से बीजेपी को सबक लेना चाहिए कि नफरत की राजनीति इस देश में कभी कामयाब नहीं हो सकती।


कब तक रहेंगे पीछे?


आईटी में भारत के विश्व महाशक्ति बन जाने की बात पिछले कई सालों से कमोबेश उसी तरह कही जा रही है, जैसे कुछ समय पहले तक भारत एक कृषि प्रधान देश है जैसे जुमले बोले जाते थे। लेकिन हमारे नेताओं को अगर चुनावी गहमागहमी के बीच कुछ वक्त मिले तो उन्हें वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की सालाना इन्फर्मेशन ऐंड कम्यूनिकेशन टेक्नॉलजी की रिपोर्ट देख लेनी चाहिए। नेटवर्क रेडिनेस इंडेक्स (एनआरआई) के पैमाने पर दुनिया के 134 देशों में भारत की जगह पिछले 3 सालों में 44वीं से खिसक कर 50वीं और अब 54वीं हो गई है। इस एनआरआई की गणना सूचना और संचार के उपकरणों की बिक्री, इससे जुड़े कानूनी तथा आधारभूत ढांचे; इस संबंध में व्यक्तियों, व्यापारिक घरानों और सरकार की तैयारी तथा सूचना तथा संचार प्रौद्योगिकी की नवीनतम तकनीकों के जमीनी इस्तेमाल के आधार पर की जाती है। इनके आधार पर भारत का एनआरआई अब से छह साल पहले 4.03 का निकाला गया था और तब से लेकर आज तक यह वहीं का वहीं पड़ा है। इस ठहराव का नतीजा यह है कि आईटी के क्षेत्र में हमसे काफी बाद में आए देश तेजी से हमसे आगे निकलते जा रहे हैं। एक सी आबादी और आजादी के एक से समय को ध्यान में रखते हुए भारत की तुलना अक्सर चीन से की जाती है। आईटी के मामले में हम अभी तक ताल ठोक कर चीन को खुद से काफी पीछे साबित करते आए हैं। पिछले साल एनआरआई की नाप पर दुनिया में चीन का मुकाम 57वां और भारत का 50वां था, यानी भारत चीन से सात स्थान आगे था। लेकिन सिर्फ एक साल में पासा ऐसा पलटा कि चीन 46वें स्थान पर आ गया जबकि हम 54वें पर, यानी उससे आठ स्थान पीछे चले गए। ऐसा क्यों हुआ, इसका अध्ययन पूरी गंभीरता से और तत्काल किया जाना चाहिए, वरना औद्योगिक टेक्नॉलजी में अपने पिछड़ेपन की भरपाई सूचना टेक्नॉलजी से कर लेने का हमारा सपना इस बार की चूक के बाद सपना ही रह जाएगा। कुछ बातें साफ हैं और बिना किसी विशेष अध्ययन के ही रेखांकित की जा सकती हैं। सूचना और संचार हमारे यहां खुद में भले ही एक कामयाब धंधा समझा जा रहा हो, लेकिन आम लोगों की रोजी-रोटी से इसका जैसा जुड़ाव बनना चाहिए, वह बन नहीं पा रहा है। आखिर क्यों ब्रॉडबैंड इंटरनेट भारत में एक उच्च-मध्यवर्गीय सुविधा बन कर रह गया है? मोबाइल फोन का इस्तेमाल जिस तरह हम सब्जी और कबाड़ तक के खुदरा कारोबार में होते देख रहे हैं, वैसी कोई भूमिका कंप्यूटर और इंटरनेट के लिए भी क्यों नहीं खोजी जा पा रही है? जिन देशों में यह काम हो रहा है वहां ब्रॉडबैंड विशेषाधिकार के दायरों से निकल कर नियमित घरेलू इस्तेमाल की चीज बनता जा रहा है। जाहिर है, यह दृष्टि की, विजन की समस्या है, जिसे हल करने की जिम्मेदारी देश के राजनीतिक और व्यापारिक नेतृत्व की है। इसे अजंडा पर लाए बगैर आईटी में अपनी काबलियत के गुण गाने का कोई अर्थ नहीं है।


Saturday, 28 March 2009

कल थीं कांग्रेस की एमएलए, आज मजदूरी को मजबूर


आंध्र प्रदेश की दलित महिला सुक्का पगदालु की कहानी चुनावी माहौल में खास दिलचस्पी के साथ सुनी - पढ़ी जा रही है। 1972 में वह आंध्र विधानसभा की सदस्य चुनी गईं और बतौर एमएलए अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। बाद में बतौर सरपंच एक बार फिर उन्हें जन प्रतिनिधि के रूप में काम करने का मौका मिला। उनके पास थोड़ी सी जमीन है , जिससे कुछ अनाज वह पैदा कर लेती हैं , लेकिन साल भर का खर्च पूरा करने और गाढ़े वक्त के लिए दो पैसे जुटा कर रखने के लिए उन्हें और उनके पति को मजदूरी करनी पड़ती है। इस कथा को सुन कर कुछ लोगों में करुणा का संचार हो सकता है , तो कुछ उस पार्टी के प्रति सात्विक क्रोध से भर सकते हैं , जिसने अपने टिकट पर चुनी गई जन प्रतिनिधि को मजदूरी करने के लिए छोड़ दिया है। इस करुणा और क्रोध के मूल में यह धारणा है कि जन प्रतिनिधि बनते ही किसी भारतीय जन का जीवन इतना बदल जाता है कि उसके दोबारा मजदूरी या किसानी के कष्टों में वापस लौट जाने की बात भी नहीं सोची जा सकती। राजनीति और राजनेताओं की जो तस्वीर हमारे मन में बसी हुई है , उससे यह धारणा बनना स्वाभाविक है , हालांकि आम भारतीय जनजीवन को लेकर इसमें मौजूद हिकारत पर अलग से गौर किया जाना चाहिए। पेशे से मूंगफली किसान जिमी कार्टर अमेरिका के राष्ट्रपति बने और दूसरे कार्यकाल के लिए रोनाल्ड रीगन से चुनाव हारने के बाद खेती - किसानी में वापस लौट गए। इसमें किसी को कोई अजीब बात नहीं लगी तो क्या इसलिए कि कार्टर के खेतों का आकार औसत हिंदुस्तानी किसान के कुल रकबे का करीब हजार गुना था ? कोई प्रोफेसर राजनीति से हटने के बाद अपनी प्रोफेसरी जारी रख सकता है तो कोई मजदूर विधानसभा या संसद से विदा होने के बाद अपने मजदूरी के संसार में वापस क्यों नहीं लौट सकता ? इस पर करुण या क्रुद्ध होने की जरूरत हमें शायद इसलिए भी महसूस होती हो , क्योंकि अपने देश में किसानी या मजदूरी की कोई गरिमा नहीं रह गई है। बहरहाल , इससे एक ज्यादा बड़ी बीमारी का भी संकेत मिलता है। बेईमान राजनेताओं से नफरत करते हुए हम इस नतीजे पर पहुंच गए हैं कि किसी ईमानदार व्यक्ति का राजनीति से कोई रिश्ता हो ही नहीं सकता। इसका दूसरा पहलू यह है कि कोई ईमानदार व्यक्ति यदि राजनीति में आ भी आ जाए तो उससे इतनी ज्यादा तड़क - भड़क की अपेक्षा की जाती है कि जल्दी से जल्दी ईमानदारी से पीछा छुड़ा लेने के अलावा उसके पास और कोई चारा ही नहीं बचता। इसलिए इस चुनावी परिवेश में सिर पर मिट्टी की टोकरी उठाए सुक्का पगदालु की तस्वीर देख कर कृपया दुखी न हों। कोशिश करें कि उनके जैसे लोग आगे भी एमपी - एमएलए बनें ताकि राजनीति में थोड़ी शर्म बाकी रहे।

Monday, 23 March 2009

लो आ गई नैनो !


सपना जब साकार होता है तो उद्गार खुद ब खुद निकलते है। रतन टाटा के साथ भी सोमवार को ऐसा ही हुआ, जब अमूमन गंभीरता की चादर ओढ़े रहने वाले देश के इस प्रमुख उद्योगपति ने गुड आफ्टरनून कहते हुए तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी की चुटकी ली।
नैनो की लांचिंग से पहले सोमवार को आयोजित प्रेस कांफ्रेंस की शुरुआत में ही जब एक पत्रकार ने टाटा से यह सवाल दागा कि वह ममता को क्या संदेश देना चाहेंगे, तो इस धीर-गंभीर उद्योगपति ने जो उत्तर दिया, उससे पूरे सभागार में हंसी गूंज उठी। चिढ़ाने वाले अंदाज में टाटा ने कहा कि मैं उन्हें सिर्फ गुड आफ्टरनून कहना चाहूंगा। पश्चिम बंगाल के सिंगुर में भूमि अधिग्रहण के विरोध में ममता द्वारा चलाए गए आंदोलन के चलते टाटा को अपनी परियोजना हटाकर गुजरात के साणंद में लगानी पड़ी है।
नैनो परियोजना को टाटा का ड्रीम प्रोजेक्ट माना जाता है। सोमवार को इसके सफल होने की खुशी टाटा के चेहरे पर झलक रही थी। उन्होंने कहा कि नैनो परंपराओं को तोड़ने की भावना का परिचय देती है। ड्राइंग बोर्ड पर इसका डिजाइन बनने से लेकर इसके व्यावसायिक लांच तक इसने
काफी उतार-चढ़ाव एवं चुनौतियां देखी हैं। नैनो को बनाने वाली टीम को बधाई देते हुए टाटा ने कहा कि जो कार कभी असंभव मानी जाती थी, इस टीम की बदौलत अब वास्तविकता बन चुकी है।
टाटा ने खुलासा किया कि इस कार को यूरोप एवं अमेरिकी बाजारों में भी पेश किए जाने की योजना है, लेकिन फिलहाल इसको चीन ले जाने का कंपनी का कोई इरादा नहीं है। कुछ दिन पहले जेनेवा में आयोजित आटो शो में टाटा मोटर्स ने नैनो का यूरोप में उतारा जाने वाला वैरियंट नैनो यूरोपा पेश किया है।
नैनो का सफर
-मार्च 2003 : रतन टाटा ने जेनेवा मोटर शो में एक लाख रुपये की सस्ती कार पेश करने का ऐलान किया।
-मई 2006 : टाटा मोटर्स ने सिंगुर [पश्चिम बंगाल] में 1500 करोड़ रुपये के निवेश से नैनो प्लांट लगाने की घोषणा की।
-अक्टूबर 2006 : तृणमूल कांग्रेस ने सिंगुर में कारखाना लगाने के विरोध में राज्य स्तरीय बंद का आह्वान किया।
-दिसंबर 2006 : सिंगुर में हिंसा, तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी ने भूख हड़ताल शुरू की। यह 25 दिन चली।
-जनवरी 2007 : सिंगुर में कार परियोजना के लिए भूमि पूजन।
-फरवरी 2007 : सिंगुर में पुलिस व आंदोलकारियों में झड़प हुई।
-जनवरी 2008 : रतन टाटा ने दिल्ली आटो एक्सपो में नैनो को पेश किया।
-मार्च 2008 : लखटकिया कार जेनेवा मोटर शो में भी पेश की गई।
-अगस्त 2008 : पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य व ममता बनर्जी में बातचीत।
-सितंबर 2008 : राज्यपाल के हस्तक्षेप से सरकार व तृणमूल कांग्रेस में समझौता, जो ज्यादा देर नहीं चला।
-अक्टूबर 2008 : रतन टाटा ने नैनो परियोजना को सिंगुर से साणंद [गुजरात] ले जाने का ऐलान किया।
-फरवरी 2009 : टाटा मोटर्स ने 23 मार्च को पेश नैनो को पेश करने की घोषणा की।
-मार्च 2009 : नैनो का यूरोपीय वर्जन जेनेवा मोटर शो में पेश। तीन साल में यूरोप में उतारी जाएगी।

Sunday, 22 March 2009

कोई भी रोक नहीं पाया फांसी..

इतिहासकारों के बीच आज भी इस बात को लेकर विवाद है कि क्या भगत सिंह को बचाया जा सकता था? क्या उन्हें गांधी ने मार डाला? क्या वाकई बापू और अन्य बड़े नेता भगत सिंह के इंकलाबी तेवर और लोकप्रियता से डर गए थे? दरअसल शहीदे आजम की मौत अपने पीछे एक ऐसा सवाल छोड़ गई है जिसे सुलझाया नहीं जा सका है। और शायद जिसे कभी सुलझाया जा भी नहीं सकेगा।

लाहौर षड्यंत्र केस में 23 मार्च 1931 को जब 23 वर्षीय भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को सूली पर लटकाया गया तो इसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनी गई। ब्रिटिश हुकूमत के इस कुकृत्य की जहां तत्कालीन भारतीय नेताओं ने जमकर आलोचना की, वहीं देश-विदेश के तमाम अखबारों ने भी इसे सुर्खियां बनाया। फांसी 24 मार्च को दी जानी थी। लेकिन जनविद्रोह के डर से ब्रिटिश हुक्मरानों ने तिथि चुपके से बदलकर 23 मार्च कर दी।

बिपिन चंद्र द्वारा लिखी गई भगत सिंह की जीवनी 'मैं नास्तिक क्यों हूं' में इस घटना पर तत्कालीन नेताओं और अखबारों द्वारा व्यक्त की गई तीखी टिप्पणियां सिलसिलेवार ढंग से दर्ज हैं।

-'..यह काफी दुखद और आश्चर्यजनक घटना है कि भगत सिंह और उसके साथियों को समय से एक दिन पूर्व ही फांसी दे दी गई। 24 मार्च को कलकत्ता से कराची जाते हुए रास्ते में हमें यह दुखद समाचार मिला। भगत सिंह युवाओं में नई जागरूकता का प्रतीक बन गया है।' [सुभाष चंद्र बोस]

-'मैंने भगत सिंह को कई बार लाहौर में एक विद्यार्थी के रूप में देखा। मैं उसकी विशेषताओं को शब्दों में बयां नहीं कर सकता। उसकी देशभक्ति और भारत के लिए उसका अगाध प्रेम अतुलनीय है। लेकिन इस युवक ने अपने असाधारण साहस का दुरुपयोग किया। मैं भगत और उसके साथी देशभक्तों को पूरा सम्मान देता हूं। साथ ही देश के युवाओं को आगाह करता हूं कि वे उसके मार्ग पर न चलें।' [महात्मा गांधी]

-'हम सबके लाड़ले भगत सिंह को नहीं बचा सके। उसका साहस और बलिदान भारत के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।' [जवाहर लाल नेहरू]

-'अंग्रेजी कानून के अनुसार भगत सिंह को सांडर्स हत्याकांड में दोषी नहीं ठहराया जा सकता था। फिर भी उसे फांसी दे दी गई।' [वल्लभ भाई पटेल]

-'भगत सिंह ऐसे किसी अपराध का आरोपी नहीं था जिसके लिए उसे फांसी दे दी जाती। हम इस घटना की कड़ी निंदा करते हैं।' [प्रसिद्ध वकील और केंद्रीय विधानसभा सदस्य डीबी रंगाचेरियार]

-'भगत सिंह एक किंवदंती बन गया है। देश के सबसे अच्छे फूल के चले जाने से हर कोई दुखी है। हालांकि भगत सिंह नहीं रहा लेकिन 'क्रांति अमर रहे' और 'भगत सिंह अमर रहे' जैसे नारे अब भी हर कहीं सुनाई देते हैं।' [अंग्रेजी अखबार द पीपुल]

-'पूरे देश के दिल में हमेशा भगत सिंह की मौत का दर्द रहेगा।' [उर्दू अखबार रियासत]

-'राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह की मौत से पूरे देश पर दुख का काला साया छा गया है।' [आनंद बाजार पत्रिका]

-'जिस व्यक्ति ने वायसराय को इन नौजवानों को फांसी पर लटकाने की सलाह दी, वह देश का गद्दार और शैतान था।' [पंजाब केसरी]

Sunday, 15 March 2009

गाँव बसा नहीं, लुटेरे पहले आ गए !


हमारा देश वाकई खुश किस्मत है ! क्योंकि हमारे यहाँ प्रधानमंत्री चुनने के लिए किसी चुनाव की ज़रूरत नहीं है ! हमारे यहाँ तो डिनर पार्टियों में ही पीएम तय कर लिए जाते है ! रही बात जनता की तो जनता का क्या है ! भाई पीएम बनने के लिए जनता की मर्ज़ी पूछने का तो हमारे संविधान में कही ज़िक्र ही नहीं है ! जनता जाए **** में ! तो भला जनता को क्यों बीच में लाकर उसका कीमती वक्त जाया किया जाए ? बेचारी जनता दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में ही इतना व्यस्त रहती है की उसे वोट डालने की भी फुरसत नहीं है ! malavi men एक kahavat है ....गाँव बसा नही, लुटेरे पहले आ गए ! चुनाव aayog ने अभी chunavon की ghoshana की ही थी की एक साथ प्रधानमंत्री के कई davedar maidan में ताल thok कर खड़े है ! ये vo लोग है जिनका janadhar ना के barabar है ! जो देश की दस pratishat जनता का pratinidhtv भी नहीं करते...! फ़िर भी पीएम बनने के sapane देखा रहे हैं ! देखे भी क्यों न क्योंकि ये जानते है की इस देश में पीएम बाई chans ही बनते है ! gathabandhan की इस blekmail वाली rajaniti में कुछ भी हो sakata है! जब vp singh, dev gauda, और gujaral बिना janadhar के पीएम बन skate है तो ये क्यों नही? चलिए jyada बात न करते हुए ख़बर आपके सामने .... आप ही बताये iname से किसे banana chaahiye पीएम?

बीएसपी सुप्रीमो मायावती फिलहाल तीसरे मोर्चे के किसी दल के साथ सीटों के तालमेल के लिए राजी नहीं हैं। उनका कहना है कि बीएसपी अपने बलबूते पर चुनाव लड़ेगी। हां , प्रधानमंत्री के सवाल पर वे इतना जरूर मान गईं कि इसका फैसला चुनाव के बाद होगा। उन्होंने कहा कि चुनावों से पहले नाम तय करने की कोई जरूरत नहीं है। गौरतलब है कि तीसरे मोर्चे की तुमकुर रैली के दौरान मायावती के प्रतिनिधि सतीश मिश्रा ने कहा था कि अगर मायावती को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित नहीं किया गया तो बीएसपी तीसरे मोर्चे में शामिल नहीं होगी। इस पर लेफ्ट दलों के विरोध के बाद मायावती ने अपना स्टैंड बदल लिया। रविवार को मायावती ने यहां प्रेस कॉन्फ्रंस की तो बीएसपी महासचिव सतीश मिश्रा भी उनके साथ थे। मायावती ने कहा कि बीएसपी इस बार किसी भी कीमत पर कांग्रेस और बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधनों की सरकार बनने से रोकेगी। लेकिन सहयोगी के रूप में मायावती ने लेफ्ट के अलावा किसी और दल का नाम लेने से परहेज किया। उन्होंने कहा, 'इस काम में हमारे साथ वामपंथी दल और कुछ अन्य दल भी जी-जान से लगे हैं।' मायावती ने यह खुलासा नहीं किया कि बीएसपी कितने सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। मगर यह कहा कि कांग्रेस और बीजेपी को परखने के बाद देश की जनता को इस बार बीएसपी को केंद्र में सरकार बनाने का मौका देना चाहिए। मायावती ने जहां राष्ट्रीय दलों कांग्रेस और बीजेपी पर जमकर हमले किए, वहीं, यूपी की अपनी पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी का जिक्र भी नहीं किया। मायावती ने शायद पहली बार एक साथ इतने राष्ट्रीय मुद्दों को छुआ होगा। उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक नीतियों, महंगाई, बेरोजगारी, सीमाओं की सुरक्षा और आतंकवाद का जिक्र किया। मायावती ने कहा कि तीसरे मोर्चे की बढ़ रही ताकत से कांग्रेस और बीजेपी बौखला गई हैं। पिछले दो-तीन दिन से इन दोनों पार्टियों के नेता मोर्चे और उसके नेताओं के बारे में फिजूल बयानबाजी कर रहे हैं। इससे जाहिर होता है कि इन्हें अपना भविष्य अंधकारमय लग रहा है। मायावती के गुरुद्वारा रकाबगंज रोड स्थित नए सरकारी आवास में रविवार को डिनर का आयोजन किया गया। इसमें तीसरे मोर्चे के नेताओं ने यूपीए और एनडीए के घटक दलों को अपने खेमे में खींचने के तरीकों पर विचार किया। इस डिनर से पहले सीपीएम के मुख्यालय ए. के. गोपालन भवन में लेफ्ट दलों ने बीएसपी को छोड़कर बाकी सहयोगी दलों के साथ बैठक की और तीसरे मोर्चे की राजनीतिक ताकत की समीक्षा की। बैठक के बाद सभी लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष ताकतों से गैर-कांग्रेसी और गैर-बीजेपी सरकार बनाने के लिए एकजुट होने को कहा गया। बैठक में बीजेडी ने भी भाग लिया। डिनर से पहले सीपीएम के पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी ने जनता दल युनाइटेड के अध्यक्ष शरद यादव से मुलाकात की। फिलहाल दोनों ने मुलाकात के बारे में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया, मगर समझा जा रहा है कि येचुरी ने यादव को तीसरे मोर्चे के अस्तित्व में आने और उसकी संभावनाओं के बारे में बताया है।

Saturday, 14 March 2009

तेरा क्या होगा पाकिस्तान?


जनरल परवेज मुशर्रफ की हुकूमत के खिलाफ वकीलों ने 2007 में जैसा माहौल बनाया था, आज दो साल बाद पाकिस्तान के सड़कों-बाजारों में दृश्य दोबारा वैसा ही है। जजों की बहाली के लिए वैसा ही लांग मार्च, वैसी ही नजरबंदियां और गिरफ्तारियां, उसी तरह अमेरिका का रुख बदलने का इंतजार। फर्क सिर्फ इतना है कि राष्ट्रपति की कुर्सी पर आज मुशर्रफ की जगह आसिफ अली जरदारी बैठे हैं और पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था चू-चूं के मुरब्बे जैसी लगने के बजाय कमोबेश लोकतंत्र जैसी नजर आने लगी है। बवाल शुरू हुआ है नवाज शरीफ और उनके भाई शहबाज शरीफ को अदालती फैसले के तहत चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित किए जाने और केंद्र के आदेश पर पंजाब में उनकी पार्टी की सरकार बर्खास्त किए जाने से। इस फैसले पर शरीफ बंधुओं का एतराज बिल्कुल वाजिब है। इसमें कोई शक नहीं कि परवेज मुशर्रफ को सत्ता से हटाने में केंद्रीय भूमिका नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन की ही थी। मुशर्रफ की सरकार ने जिन आरोपों के तहत नवाज शरीफ को देश निकाला दिया था, उन्हीं पर फैसला सुनाते हुए पाकिस्तान के सवोर्च्च न्यायालय ने उन्हें पाकिस्तान में चुनाव लड़ने के अयोग्य करार दिया है। सवाल यह है कि ये आरोप अगर इतने ही सच्चे हैं तो नवाज शरीफ से काफी पहले यह सजा जरदारी को सुनाई जानी चाहिए थी, जिनके घपलों के बारे में पाकिस्तान में काफी पहले से आम राय बनी हुई है। लेकिन मुशर्रफ के साथ गुपचुप समझौता करके पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता तो मलाई काट रहे हैं जबकि मुशर्रफ द्वारा ही नियुक्त जजों के फैसले से नवाज और शहबाज शरीफ का राजनीतिक करिअर खत्म किया जा रहा है। जिन चीफ जस्टिस इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी को परवेज मुशर्रफ ने बर्खास्त किया था, वे बेचारे आज भी वनवास झेल रहे हैं, जबकि उनकी बहाली के लिए चले आंदोलन में खुद पीपीपी के नेता अगली पांत में रहा करते थे। ले-देकर मामला कुछ सत्ता गुटों के बीच लड़ाई का है। कयानी और मुशर्रफ के चेहरों वाला एक गुट फौज का, गिलानी और जरदारी के दो अलग-अलग चेहरों वाला एक गुट पीपीपी का, एक गुट नवाज और शहबाज की अगुआई वाली पीएमएल-एन का और दोनों बड़ी पार्टियों के बीच अपने लिए रास्ता तलाशता एक गुट पीएमएल-क्यू का। सत्ता के इतने दावेदार, और सत्ता की औकात इतनी कि कट्टरपंथी आतंकवादी कभी उसे अपने सामने घुटने टेक कर शरियत लागू करने पर मजबूर करते हैं तो कभी दिन-दहाड़े एक विदेशी क्रिकेट टीम को निशाना बना कर साफ निकल जाते हैं।

Thursday, 12 March 2009

मेरा शहर बदल गया है?

कल मुंबई फोन पर अपने एक पुराने मित्र से बात कर रहा था ! उसे होली की शुभकामना दी! उसे नहीं पता था कि महिदपुर में इस साल की होली कर्फ्यू के साये में मनाई जा रही थी ! जब मैंने उसे बताया कि महिदपुर में कर्फ्यू है तो उसकी आवाज़ में दर्द झलक उठा! बिल्कुल वैसे ही जैसे मेरी आवाज़ में झलका था जब मुझे अपने न्यूज़ रूम में ये ख़बर मिली कि मेरे शहर में कर्फ्यू लग गया है ! गंगा जमुना संस्कृति वाला मेरा शहर अचानक कर्फ्यू के साए में जीने को मजबूर कैसे हो गया? मै सोच में डूब गया क्या मेरा शहर बदल गया है? लेकिन पिछले महीने तो मै अपने घर गया था तब तो वहा ऐसा कुछ नही था....! सब कुछ वैसा ही तो था....! वही क्षिप्रा का किनारा... वही गन्गावादी का मेला....वही गलिया.....वही लोग ! वही महिदपुर फ़िर क्या बदल गया कि कर्फ्यू के साए मे होली मनाई जा रही थी !

Wednesday, 4 March 2009

गरीबी पश्चिम में खूब बिकती है।




फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनेर' का इतना हल्ला मचा हुआ है कि मुझ जैसे साधारण पत्रकार को भी यह देखनी पड़ी। मैं इस फिल्म की कलात्मक उत्कृष्टता, म्यूजिक या सॉन्ग पर टिप्पणी करने की पात्रता नहीं रखता, लेकिन एक बात निश्चय ही पूरे आत्म विश्वास के साथ कर सकता हूं और वह यह कि ब्रिटेन, अमेरिका और कई पश्चिमी देशों की भारत को देखने की जो पुरानी और पूर्वाग्रहपूर्ण दृष्टि रही है, उसमें कोई खास बदलाव नहीं आया है। भारत को एक गरीब, आपस में लड़नेवाला, भ्रष्ट और कमजोर देश माना जाता रहा है। एक ऐसा देश जहां गरीब मनुष्य होकर भी समाज में आधे-पौने मनुष्य का दर्जा रखते हैं। जिनकी अपनी कोई कीमत नहीं लेकिन जिनकी गरीबी पश्चिम में खूब बिकती है। भारत में गरीब होना चूंकि कमतर मनुष्य होना है, इसलिए कम से कम हमारे शहरों में तो कोई गरीब भी यह नहीं चाहता कि उसकी गरीबी दिखाई जाए। यही कारण है कि इस फिल्म के ब्रिटिश निर्देशक डैनी ब्वॉयल जब फिल्मांकन के सिलसिले में स्लम बस्तियों में गए तो वहां उनके साथ काम करने को तैयार हुए लोगों ने पूछा : 'आप हमें गरीबों के रूप में तो दर्शाने नहीं जा रहे?' उन्होंने क्या उत्तर दिया यह तो मालूम नहीं है लेकिन 'टाइम' पत्रिका में '10 क्वेश्चन्स' कॉलम के अंतर्गत उनसे पूछे गए एक सवाल का उत्तर यहां दृष्टव्य है। उनसे पूछा गया था कि भारत में गरीबी का रोमानीकरण करने के आरोपों के बारे में आपका क्या उत्तर है तो उन्होंने कहा 'लोगों ने जो स्लम बस्तियों में हमारे साथ काम कर रहे थे, हमसे पूछा कि आप (फिल्म में)हमें गरीबों के रूप में तो चित्रित नहीं करेंगे? या करेंगे? क्योंकि पश्चिमी लोग हमेशा ऐसा ही करते हैं। मगर मैंने फिल्म को एक ऐसी ऊर्जा के साथ बनाने की कोशिश की है ताकि यह प्रतिबिम्बित हो कि यह जगह कैसी है (जहां ये लोग रहते हैं) कि गरीबी के बावजूद यहां एक जीवंतता-जिजीविषा है।' लेकिन गरीबी दिखाने के पश्चिमी पूर्वाग्रह के चलते उन्हें स्लम के अपने सहयोगियों की संवेदनशीलता का जरा भी ध्यान नहीं रहा। कुरूप यथार्थ का जैसा वीभत्सीकरण यहां दिखाई देता है, उसे देखकर रुह तक कंपा देनेवाली जुगुप्सा पैदा होती है। एक दृश्य में स्लम का बच्चा संडास में बैठा है। उसे पता चलता है कि वहीं कहीं अमिताभ बच्चन आया है। अमिताभ बच्चन के ऑटग्राफ लेने के लिए वह बच्चा संडास से मल के कुण्ड में नाक दबाकर कूद जाता है और शायद सामने से तत्काल हटाने के लिए मजबूर कर देनेवाली स्थिति में ऑटग्राफ भी पा लेता है। कलाओं में यथार्थ का अतिकरण कई बार भाव-भंगिमाओं के साधारणीकरण और संप्रेषण के लिहाज से किया जाता है। लेकिन ऐसी वीभत्स अति? मैं पूछना चाहूंगा कि मल से सने बल्कि नहाये बच्चे को कल यदि खुद फिल्म निर्देशक डैनी बॉयल को ऑटग्राफ देना पड़े तो क्या वह कुछ सेकंड भी वहां ठहरना सह सकेंगे? ठीक है कि सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा आज भी भारत में जारी है, लेकिन गरीब बच्चे के अमिताभ-आकर्षण के एक प्रतीक को इस सीमा तक खींचना किस कलागत औचित्य को दर्शाता है? डैनी बॉयल इसके लिए अपनी ब्रिटेन में हुई परविश या संस्कार को जिम्मेदार मानते हैं। तो यह संस्कार या पूर्वाग्रह क्या है? कि भारतीय गंदे होते हैं? उनके घरों से मैला उठाने के लिए एक अलग जाति के लोग आते हैं? कि वे गंदा पानी पीते हैं और गंदे हाथों से खाना खाते है? आदि-आदि। जो लोग इस फिल्म को भारतीय फिल्म सिद्ध करने के लिए शीर्षासन कर रहे है, और कह रहे है कि इसकी कहानी भारतीय है और एक भारतीय द्वारा ही लिखी गई है, इसके पात्र भारतीय हैं, संगीत और संगीतकार भारतीय है, इसका फिल्मांकन भारत में हुआ है, वे लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि इसका निर्देशक और उसकी टीम विदेशी है। और उसने माना है कि यह फिल्म एक हाइब्रिड फिल्म है। देशी और विदेशी टीमों का एक संयुक्त उपक्रम। फिल्म निर्देशक और पटकथा दोनों सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं और ये दोनों विदेशी हैं। इसलिए यह भारतीय फिल्म नहीं मानी जा सकती। आप चाहें तो खुद निर्देशक से सत्र लेकर इसे वर्णसंकर कह सकते हैं। फिल्म का नजरिया पश्चिमी है, संवेदनशीलता पश्चिमी है और बम्बइया फिल्मों के लटके-झटकों के बावजूद इसमें वही दिखाया गया है, जो पश्चिमी दर्शक देखना चाहता है। पिछले एक दशक में यूरोप और अमेरिका में भारत की पुरानी गरीब और पिछड़े देश की इमेज पर एक उभरती हुई आर्थिक और सैन्य ताकत की इमेज हावी है। यह धारणा बनी है कि भारत और चीन कुछ दशकों में दुनिया की महाशक्तियों में होंगे। भारतीय या भारतीय मूल के उद्योगपति विदेशी कंपनियां खरीद रहे है और अरबपतियों की विश्व कतार में खड़े होने वाले भारतीयों या भारतवंशियों की संख्या बढ़ रही है। भारत को जी-8 जैसे अमीर देशों की बैठकों में बुलाया जाने लगा है। अपनी प्रतिभा और परिश्रम से अमेरिका और अन्य देशों में भारतीय छा गए हैं। भारत अंतरिक्ष की भी एक ताकत बन चुका है और उसके पास करीब-करीब इतनी आबादी वाला मध्यवर्ग है, जो अमेरिका की पूरी आबादी है। यह एक तरह का कल्चरल शॉक जैसा है। इसलिए दो छवियों के बीच इस पृष्ठभूमि में द्वंद्व में संतुलन बैठाने का रास्ता यह निकाला गया है कि भारत की इस नई इमेज को तोड़ो। उसे पुरानी गरीब, पिछड़ी और जाहिल की इमेज पर हावी मत होने दो। भारत को उसके अंधेरे में, उसकी दरारों में पकड़ो, जहां सीलन है, बदबू है, गंदगी है और जहां लोग नहीं मानों कॉकरोच रहते हैं। ऐसे कॉकरोच जिन्हें करीब 60 सालों में न तो मिटाया जा सका है और न मिटाया जा सकेगा। भारत की इस कटु सचाई से मैं मुंह नहीं मोड़ रहा। भारत निश्चय ही गरीब और पिछड़ा देश है। देश की 77 प्रतिशत आबादी प्रतिदिन एक डॉलर (करीब 50 रु.)भी नहीं कमा पाती। करोड़ों लोगों को दिन में एक बार ही मुश्किल से खाना मिल पाता है। बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। रहने के लिए झोपड़ी और पीने के लिए साफ पानी नहीं है। हिन्दू-मुस्लिम दंगे होते हैं (फिल्म में ऐसे ही एक दंगे में बचपन में ही नायक की माँ मारी जाती है), अल्पसंख्यक जुल्मों का शिकार होते हैं और जमाल जैसा बच्चा अगर एक दिन अमीर बन भी सकता है तो यह कौन बनेगा करोड़पति जैसे टीवी कार्यक्रमों से निकला एक चमत्कार ही है। भारत में ज्ञान की कद्र है और ज्ञान से धन भी अर्जित किया जा सकता है, लेकिन गरीब मुसलमानों के बच्चे शिक्षा से नहीं, अंडरवर्ल्ड के फंदे में फंसकर वह ज्ञान अर्जित करते हैं जो एक दिन टीवी कार्यक्रमों के जरिए उन्हें लॉटरी तक पहुंचाता है। फिल्म में नायक एक जगह चैनल के स्टूडियो में बैठा अनिल कपूर के प्रश्नों के उत्तर दे रहा है तो फ्लैशबैक में दो पुलिसकमिर्यों की ज्यादतियों के बीच उन यातनाओं को बयान कर रहा है, जिनसे गुजरते हुए उसे क्विज के उत्तर प्राप्त हुए। तो फिल्म का असली पक्ष वह नहीं है जो स्टूडियो की चमक-दमक में दिखाया गया है, असली पक्ष फ्लैशबैक में है, जहां दंगों में अल्पसंख्यकों का मारा जाना है, भिक्षा कराने वाले गिरोहों द्वारा अबोध बच्चों का पकड़ा जाना और फिर हाथ-पैर तुड़वाना या आंख फुड़वाना है, ताकि लोगों को दया आए और वे ज्यादा भीख दें। बड़ी बारीक तरह से फिल्म में उग्र हिन्दूवाद को भी उठाया गया है और जैसे संकेत किया गया है कि भिखारी बच्चा हिन्दू हो या मुसलमान पर भीख मांगते हुए वह हिन्दू प्रार्थना ही गाता है। स्लम की बच्चियां देह शोषण की शिकार हैं और लोग अपना जीवन या तो अमिताभ बच्चन की एक झलक पाने की चाह में या फिर कौन बनेगा करोड़पति जैसे कार्यक्रमों के जरिए भाग्य उदय होने की आशा में जीते हैं। अगर फिल्म में कोई मन को छूनेवाली बात है तो जमाल और लतिका का प्रेम है, जो आश्रयहीन और अनाथ बच्चों में भी उतना ही मौलिक और निश्छल हो सकता है, जैसा सामान्य तौर पर होता है। रहमान बड़े संगीतकार है लेकिन उनके जिस गीत का शोर है, उसे भी उनका उत्कृष्ट या प्रतिनिधि गीत नहीं माना जा सकता। जरा सोचिए कि अगर यही फिल्म किसी भारतीय ने बनाई होती तो क्या उसे 8 ऑस्कर मिलते। एक साधारण दर्शक के नाते मैं सत्यजित राय की पथेर पांचाली जैसी उत्कृष्ट फिल्म से इस फिल्म की तुलना करना चाहता जिसकी गरीबी के आधार पर की जा रही है ना ही किसी को करनी चाहिए। वहां गरीबी गौण हो जाती है और मानवीय प्रश्न ही अंतत: आपका पीछा करता रहता है। उन्हें सम्मान भी बहुत बाद में मिला। इस फिल्म को मिल रहे सम्मान कोई भी अवहेलना नहीं कर सकता, लेकिन कृपया इस फिल्म को इस संदर्भ के साथ भी मिलाकर देखिए कि एक उभरते भारत का धीरे-धीरे पश्चिमी दृष्टि से ओझल हो रहा पुराना सच इस रूप में आखिर क्यों याद दिलाया जा रहा है? क्या इस मनोरंजन-सरोकार के पीछे वही पुरानी श्रेष्ठता ग्रन्थि काम नहीं कर रही है? लेकिन क्रोध करने की बजाय आप भी इस फिल्म को जरूर देखिए और सोचिए कि क्या नाराज होकर हम भारत को देखने वाली इस पुरानी पश्चिमी दृष्टि को बदलवा सकते हैं या हमें ही अपने यहां व्यापक पटल पर बदलाव लाने की जरूरत है? तो उत्तर इस वाक्य के अन्त में है लेकिन मैं नहीं जानता कि यह कैसे होगा।

Monday, 2 February 2009

न्यायपालिका बनाम लोकतंत्र


आपको मध्य प्रदेश के प्रोफेसर सब्बरवाल की हत्या का मामला याद होगा। वे कॉलिज चुनाव के दौरान आचार संहिता लागू करना चाहते थे, जिसमें एबीवीपी के कुछ छात्र उग्र हो उठे और उन्होंने प्रोफेसर सब्बरवाल की इतनी पिटाई की कि उनकी जान चली गई। उस समय मध्य प्रदेश में बीजेपी की सरकार थी और जल्दी ही यह स्पष्ट हो गया कि वह दोषी छात्रों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं कर सकेगी। वहां की स्थानीय अदालत में पीडि़त पक्ष के लिए न्याय पाना संभव नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य को रेखांकित किया और वह केस उज्जैन (म.प्र.) से नागपुर (महाराष्ट्र) स्थानांतरित कर दिया। यहां हम व्यक्तिगत अपराधों की सुनवाई (जैसे जयललिता या अमरमणि त्रिपाठी के मामले) दूसरे राज्य में ट्रांसफर करने की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन मामलों की बात कर रहे हैं, जिनमें ऐसी भीड़ ने कोई अपराध किया, जिसे उस पार्टी का समर्थन प्राप्त हो जो लोकतांत्रिक पद्धति से चुनी गई हो, सत्ता में हो और जिसमें अपराधियों को दंडित करने की इच्छा या नैतिक साहस नहीं हो। ऐसी नजीरों में गुजरात के दंगों को भी शामिल किया जा सकता है। उस समय भी जाहिरा शेख और बिलकिस बानो के मामले गुजरात से मुंबई ट्रांसफर किए गए। इतना ही नहीं, जब राज्य पुलिस ने दंगों से संबंधित दो हजार मामले यह कह कर बंद किए कि वह दोषियों को ढूंढने में असमर्थ है, तब सुप्रीम कोर्ट ने लगाम कसते हुए राज्य सरकार को यह निर्देश दिया कि वह एक नई हाई लेवल टीम बनाए, जो यह देखे कि क्या उनमें से किसी भी केस को दोबारा खोलने की कोई संभावना हो सकती है, कहीं पुलिस ने उन्हें यूं ही रफादफा करने की कोशिश तो नहीं की है। उस समय मुसलमानों के खिलाफ दंगे हुए थे, राज्य में बीजेपी की सरकार थी और केंद्र में एनडीए की, जिसे अल्पसंख्यकों की पिटाई और हिंदुओं की हिंसा की संतुष्टि चुनावी नजरिए से लाभ पहुंचा सकती थी। आप बहस के लिए कह सकते हैं कि जो गलत है, सो गलत है। या नियम-कानून भी कोई चीज है। पर डिमॉक्रसी में सिद्धांत और संविधान जमीन पर किस तरह अपना रूप बदल लेते हैं, यह हम सब जानते हैं। दार्शनिक प्लेटो ने 'रिपब्लिक' में इस स्थिति की कल्पना की थी। उसने लिखा कि इसमें संदेह नहीं कि डिमॉक्रसी दूसरी शासन व्यवस्थाओं से बेहतर होती है, लेकिन उसका भी क्षरण और पराभव होता है और वह भीड़तंत्र (मॉबोक्रेसी) में बदल जाती है। तब संख्या बल से सही और गलत की परिभाषा निर्धारित होने लगती है और बहुसंख्यक अपने हिसाब से चीजों को तोड़-मरोड़ लेते हैं। ऐसी स्थितियों में हमारी स्वतंत्र न्यायपालिका की भूमिका किसी उद्धारक या रक्षक की तरह नजर आती है। हायर जुडिशरी को चोरी, घूसखोरी और जमीन जायदाद के मामलों में उलझने के बदले, अपनी इस नई भूमिका में आगे बढ़ना चाहिए।

Sunday, 1 February 2009

राहुल की राह


योगेश गुलाटी


पिछले कुछ समय से राजनीतिक गलियारे से छन-छनकर यह खबर आई (या आने दी गई) कि सरकार के कुछ हालिया फैसले राहुल गांधी के प्रभाव में लिए गए। मसलन मुंबई हादसे को लेकर पाकिस्तान के प्रति कड़े रुख का इजहार और जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्ला की ताजपोशी। लेकिन कांग्रेस सीधे-सीधे यह नहीं कह सकती कि वह मनमोहन सिंह के नेतृत्व को खारिज कर रही है। ऐसा करना यूपीए सरकार की उपलब्धियों पर खुद ही पानी फेर देना होगा, फिर वह कौन सा मुंह लेकर जनता के बीच वोट मांगने जाएगी?इसीलिए जो नेता राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाए जाने की बात कर रहे हैं, वे मनमोहन सिंह के कामकाज की प्रशंसा करना भी नहीं भूलते, लेकिन वे साफ तौर पर यह भी नहीं कहते कि कांग्रेस मनमोहन सिंह को भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश करके चुनाव मैदान में उतरेगी कि नहीं। चुनाव के पहले कांग्रेस नेतृत्व के सवाल को अनसुलझा रखना चाहती है लेकिन राहुल की इमेज चमकाने का अभियान भी चलता रहेगा।राहुल गांधी के मामले में सोनिया गांधी ने बहुत ही फूंक-फूंक कर कदम उठाए हैं। कुछ उसी तरह, जैसे राजीव गांधी के मामले में इंदिरा गांधी ने उठाए थे। पहले कहा गया कि राहुल राजनीति में नहीं आएंगे। फिर धीरे-धीरे वे सियासत में आए और उसके बाद सांसद बने। उसके बाद उन्हें पार्टी संगठन में अहम जिम्मेदारी दी गई। अपने चुनाव क्षेत्र और देश के दूसरे हिस्सों में राहुल लगातार दौरे कर रहे हैं। पार्टी चाहती है कि राहुल समाज से परिचित हों और जनता भी उन्हें जान जाए। शुरू-शुरू में राहुल ने कुछ अपरिपक्वता दिखाई थी। बांग्लादेश और बाबरी मस्जिद के संबंध में उनके दिए बयान से विवाद हुआ, पर अब वह बहुत संभलकर बोल रहे हैं। संसद में भी उनके भाषणों में परिपक्वता दिखने लगी है। सवाल है कि क्या देश की जनता राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार करने को तैयार है? राहुल के व्यक्तित्व में कोई करिश्मा नहीं है, लेकिन युवा होना उनकी सबसे बड़ी ताकत है। यह ठीक है कि उन्हें अपने पिता की तरह किसी तरह की सहानुभूति लहर का लाभ नहीं मिल रहा है, लेकिन उनके लिए सकारात्मक बात यह है कि विपक्षी दलों के पास कोई युवा नेता नहीं है। यह नहीं भूलना चाहिए कि आज देश की 70 फीसदी आबादी 35 वर्ष से कम उम्र के युवाओं की है। यह वर्ग अब राजनीति पर निर्णायक असर डालने की स्थिति में आ गया है। आज की यह युवा पीढ़ी स्वतंत्रता के बाद पैदा हुई है। यह कई पुराने आग्रहों और रूढि़यों से मुक्त है। यह सूचना क्रांति और ग्लोबलाइजेशन के दौर में जवान हुई है, इसलिए उसके सोचने का ढंग अलग है। यह पॉलिटिक्स और लीडरशिप के बारे में पुरानी पीढ़ी से भिन्न राय रखती है। इसे ऐसा नेता चाहिए जो ठोस काम करे, जो डिवेलपमंट सुनिश्चित कर सके ताकि इस पीढ़ी के सपने साकार हों। हाल के विधानसभा चुनावों के परिणाम में इस नजरिए की झलक मिली है। यह पीढ़ी अस्सी पार कर चुके लालकृष्ण आडवाणी की बजाय युवा राहुल गांधी को ज्यादा उम्मीद से देख रही है। राहुल के विरोध में यह तर्क दिया जाता है कि वह अनुभवहीन हैं। लेकिन आज के दौर में विजन ज्यादा महत्वपूर्ण है, अनुभव नहीं। नई पीढ़ी नया नजरिया चाहती है। रही वंशवाद की बात, तो यह मामला कमजोर पड़ता जा रहा है क्योंकि आज हर पार्टी इसका शिकार हो चुकी है। ऐसे में राहुल गांधी के लिए स्थितियां निश्चय ही अनुकूल होती जा रही हैं, लेकिन यह सवाल तो फिर भी बचता ही है कि क्या कांग्रेस राहुल गांधी को महज एक युवा प्रतीक की तरह इस्तेमाल करेगी या नई आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सत्ता में रहकर या उसके बाहर गंभीरता से प्रयास भी करेगी?

Friday, 23 January 2009

आइए, भारत की गरीबी का जश्न मनाएं!



योगेश गुलाटी


पिछले कुछ बरसों से पश्चिमी मीडिया में (खासकर अमेरिका में) भारत की आर्थिक प्रगति के बारे में इतना कुछ कहा जा चुका है कि यहां के जनमानस में इस मुल्क (भारत) की खास तस्वीर बन गई। जहां कभी शहरों में सड़कों पर गाएं, सपेरे और हाथी घूमा करते थे, ऐसे गरीब देश में हजारों-लाखों आईटी एक्सपर्ट्स का होना किसी चमत्कार से कम नहीं समझा गया। दो महीने पहले जब मुंबई की शानदार इमारतों पर आतंकी हमले की आंखोंदेखी छवियां अमेरिकी लोगों ने टीवी और इंटरनेट पर देखीं तो उनका दिल भारत के प्रति सहानुभूति से भर आया। यह वही देश था, जिसे थोडे़ दिनों पहले प्रेज़िडंट बुश और अमेरिकी कांग्रेस ने न्यूक्लिअर डील का तोहफा दिया था। मुंबई ने अमेरिकी दिलों में एक महत्वपूर्ण जगह बना ली। मुंबई हमले के कुछ ही दिनों बाद झोपड़पट्टी की जिंदगी में गरीबी और बदहाली की नई परिभाषाएं दर्शाती हुई चमक-दमक वाली फिल्म स्लमडॉग मिलिनेअर अमेरिका के कई शहरों में रिलीस हुई। जब इस फिल्म को हॉलिवुड में चार-चार गोल्डन ग्लोब पुरस्कारों से सम्मानित किया गया तो लगा जैसे अमेरिकी दिलों में इंडिया की हर चीज के लिए प्यार उमड़ आया है, उसकी गरीबी और बदहाली के लिए भी। हॉलिवुड स्थिति अंतरराष्ट्रीय फिल्म पत्रकारों का संगठन चुनी हुई फिल्मों और टीवी सीरियलों को 'गोल्डन ग्लोब' से पुरस्कृत करता है। स्लमडॉग मिलिनेअर को हॉलिवुड में मिली अभूतपूर्व सफलता के बाद इसे ऑस्कर में सम्मानित करने का रास्ता खुल गया है। सचमुच संगीतकार ए. आर. रहमान में कामयाबी के उस मुकाम पर पहुंच गए हैं, जहां कभी पंडित रविशंकर भी नहीं पहुंच सके। इस फिल्म के ब्रिटिश डाइरेक्टर डैनी बॉयल बवर्ले हिल्स और न्यू यॉर्क में अपनी प्रसिद्धि का जश्न मनाने के बाद अब इंडिया में स्लमडॉग... के रिलीस को लेकर उत्साहित नजर आ रहे हैं। आखिर इस फिल्म में ऐसी कौन-सी बात है, जिसने पश्चिमी दर्शकों और समीक्षकों का मन मोह लिया स्लमडॉग... कहानी है गरीबी और अमीरी के भेदभाव की। यह कहानी है गरीबी और आपराधिक दुनिया के बीच संबंधों की। यह कहानी है भाई-भाई के बीच धोखेबाजी की। लेकिन यह कहानी एक अनाथ बच्चे की मेहनत या प्रतिभा की उतनी नहीं है, जितनी कि एक संयोग। जिसके कारण वह कौन बनेगा करोड़पति प्रोग्रैम के सभी सवालों का उत्तर दे पाता है। यह उस जीवट या आत्मविश्वास की कहानी नहीं है, जैसा अमिताभ बच्चन जंजीर, कुली और दीवार जैसी फिल्मों में भारतीय दर्शकों को दिखाते रहे। जूते पॉलिश करनेवाले एक अनाथ के यह कहने पर कि 'मैं जमीन पर फेंके हुए पैसे नहीं उठाता' सिनेमा हॉल में तालियां गूंज उठती थीं। स्लमडॉग... एक निष्ठुर फिल्म है, जिसका निर्देशक गरीब के सपनों का मजाक उड़ाते हुए अनाथ बालक को पाखाने से भरे कुंड (वेल) में डुबकी मारते दिखाता है। फिल्म के एक दृश्य में अमिताभ बच्चन के स्लम कॉलोनी में हेलिकॉप्टर से उतरने की खबर बस्ती में आंधी की तरह फैल जाती है। लोग पागलों की तरह हेलिकॉप्टर की तरफ दौड़ते हैं। उसी वक्त बालक जमाल को उसके दोस्त एक शौचालय में बंद कर देते हैं। जमाल करे तो क्या करे! वह नीचे पाखाने के गहरे कुंड की तरफ देखता है, नाक दबाकर डुबकी लगा देता है और दूसरी तरफ से बाहर निकलता है, सिर से पांव तक पाखाने (शिट) से लिपटा हुआ। उसी गंदगी में सना वह अमिताभ की तरफ जाता है ऑटोग्राफ मांगने। जरा सोचिए, यह कैसी कल्पना है! बॉलिवुड के पलायनवादी डाइरेक्टर मनमोहन देसाई ने भी ऐसे सीन की कभी कल्पना नहीं की होगी। अपनी चमक-दमक और तेज रफ्तार के कारण स्लमडॉग... दर्शक को कुछ सोचने का मौका नहीं देती और घटनाओं को संजोग की डोर में जल्दी-जल्दी पिरोते हुए आगे बढ़ जाती है, जैसे कि ट्रेन छूटने के पहले आप फास्ट फूड रेस्तरां में खाना झपट रहे हों। अपुर संसार में सत्यजित राय ने, मेघे ढाका तारा में ऋत्विक घटक ने और अंकुर में श्याम बेनेगल ने अपनी कलात्मक और तीखी शैली में गरीबी और सामाजिक अन्याय का गहरा रिश्ता दिखाया था, लेकिन सत्यजीत रॉय को उनकी मृत्यु शैया पर पहुंचने के बाद ही हॉलिवुड ने ऑस्कर के योग्य समझा जबकि घटक, विमल रॉय या बेनेगल को पहचानने से भी इनकार किया। ब्रिटिश राज के दौरान सामान्य भारतीयों का स्वाभिमान दिखानेवाली बॉलिवुड फिल्म लगान भी ऑस्कर के शामियाने में न पहुंच सकी। शीशे की तरह पारदर्शी और हृदयहीन फिल्म स्लमडॉग... हमें यह याद दिलाती है कि भारत में अनाथ बच्चों के लिए एक ही जगह है, जहां से उन्हें अंधा बनाकर भीख मांगने के लिए मजबूर किया जाता है। ताजमहल के गाइड चोर और फरेबी होते हैं। स्लमडॉग... से हमने यह भी जाना कि वहां पले-बढ़े बच्चे के लिए करोड़पति बनना एक संजोग ही हो सकता है। स्लमडॉग... में जमाल सभी सवालों का जवाब इसलिए जानता था कि उन सवालों का उसकी बीती जिंदगी से सीधा नाता था। लेकिन गरीबी में पलकर भी प्रतिभाशाली बनने के अनेक उदाहरण भारत में मिल जाएंगे, जोकि फिल्मों के विषय बन सकते हैं। भारतीय कलाकार और टेक्नीशियनों को लेकर पश्चिम तर्ज पर मुंबई की स्लम जिंदगी का चित्रण करने वाली फिल्म 'गोल्डन ग्लोब' या 'ऑस्कर' पुरस्कार जीत सकती है और हॉलिवुड भारत की उस पुरानी तस्वीर पर मुहर लगा सकता है कि आर्थिक रूप से प्रगतिशील यह देश असल में हाथी, सपेरे और स्लमडॉग का देश है। आइए, हॉलिवुड के साथ मिलकर हम सभी इस गरीबी के जश्न में शामिल हो जाएं।

Wednesday, 5 November 2008

कौन सा सपना मचल रहा है


कौन सा सपना मचल रहा है
ये कौन सा सपना मचल रहा है

ये खून किसका उबल रहा है

ये किसकी सांसों में आग सी है

ये कौन गिर के संभल रहा है

ये किसके सुर हैं सिके सिके से

ये किसकी धड़कन चटक रही है

ये किसके कदमों में फौज सी है

ये कौन करवट बदल रहा है

ये कौन दरिया को पी रहा है

ये कौन सच कह के जी रहा है

ये किसके घाव में है तरन्नुम

ये कौन लोहा पिघल रहा है

ये किसका साया है धूप जैसा

ये किसका लहू है ‘सूप’ जैसा

ये किसके होठों में हड्डियां हैं

ये कौन नीदों में चल रहा है

चलो टटोलूं मैं आज खुद को

कहीं ये गुस्ताख मैं तो नहीं

ये हलचलें हैं मुझी में शायद

यकीं मुझे खुद पे मिल रहा है.

Friday, 26 September 2008

मैं गीत ग़मों के गाता हूँ!


योगेश gulati

रास रंग की महफ़िल में,

मैं गीत ग़मों के गता हूँ,

महलों की जो नीवें भरते,

मैं उनकी व्यथा सुनाता हूँ,

उसका बच्चा रोता है,

वो पुरी रात ना सोता है!

वो दिन भर मेहनत करता है,

पर..उसका पेट ना भरता है!

उसकी माँ बीमार है,

लेकिन वो लाचार है,

दावा वो लाए कहाँ से,

डॉक्टर का खर्च उठाए कहाँ से?

क्योंकि जितना वो कमाता है,

उससे तो बस टा-नमक ही आता है!

नई नहीं ये बात कोई,

मै बात वो ही बतलाता हूँ,

महलों की जो नीवें भरते,

मैं उनकी व्यथा सुनाता हूँ!

गन्दी भद्दी बस्ती में,

एक खद्दर वाला आया है,

बड़ी-बड़ी बातें वो करता,

कितने सपने लाया है!

बदलेगी तस्वीर ये कहता,

फ़िर से चुनाव जो आया है!

वो गर्मी में मेहनत करता है,

बारिश में फांके करता है!

ठण्ड में सुकुड कर सोता,

अकसर रातों में रोता है!

नयी नहीं ये बात कोई,

मैं बात वो ही बतलाता हूँ,

महलों की जो नीवें भरते,

मैं उनकी व्यथा सुनाता हूँ!


Thursday, 25 September 2008

मेरी अधूरी कविता....


इक बस्ती उजियारी सी,
इक में अँधियारा क्यूँ रहता है?

माँ तू तो कहती......

हम सब एक इश्वर की है संताने,

फ़िर , इक सोता फुटपाथों पर,
इक महलों में क्यूँ रहता है?

इक बस्ती में रोज़ हैं मेले,

इक में सन्नाटा क्यूँ रहता है?

मेघा देता है पानी,

नया सृजन फ़िर करता है,

सूरज देता है रोशनी,

नहीं भेदभाव वो करता है,

फ़िर ऊंच-नीच में बटा ये मानव,

आपस में क्यों लड़ता है?

इक बस्ती उजियारी सी,

इक में अँधियारा क्यों रहता है?


ये कविता अधूरी है....लेकिन आप चाहे तो इसे पुरी कर सकते हैं ....तो लिख भेजिए मुझे, अपने नाम और एक फोटो के साथ yogesh_gulatius@yahoo.co.in पर और कर दीजिये इसे पुरा! प्रकाशित होगी ये आपके नाम और फोटो के साथ!