
Monday, 18 May 2009
लेफ्ट नही राइट चलो!

पहली प्रतिक्रिया....
विकास शर्मा रायपुर 09329444278
Sunday, 10 May 2009
क्यों न हमारे देश में भी अनिवार्य हो मतदान!

मौजूदा चुनाव में खासकर महानगरों में कम मतदान की खबरों के बीच लालकृष्ण आडवाणी ने मतदान को अनिवार्य करने की पैरवी की। इस पर कुछ लोगों की प्रतिक्रिया थी कि ऐसा करना लोकतंत्र विरोधी होगा। कुछ ने कहा कि मतदान के लिए बल प्रयोग अनुचित है। वामपंथियों की प्रतिक्रिया मौलिक थी। उन्होंने कहा कि यह कोई नया विचार नहीं है, पहले भी इसकी वकालत की जाती रही है।
मैं समझता हूं यह ऐसा विचार है जिस पर विचार का समय अब आ गया है। इसलिए नहीं कि यह मतदाताओं को बाहर निकालने का सबसे अच्छा तरीका है (सबसे अच्छा तरीका तो यही होगा कि वे स्वेच्छा और स्वप्रेरणा से वोट देने आएं) बल्कि इसलिए कि मतदान का प्रतिशत अगर इसी तरह गिरता रहा तो भारतीय लोकतंत्र को गहरा धक्का पहुंचेगा। भारत में आज राजनीति का स्वरूप और उसमें जनभागीदारी को देखते हुए यह एक ऐसा विचार है जो हमारी राजनीतिक प्रणाली को बदल सकता है। यह पार्टियों और जनता के बीच संवाद व रिश्तों में भी आमूलचूल परिवर्तन ला सकता है।
सबसे पहले तो इससे हमारी संसदीय प्रणाली में प्रतिनिधित्व बढ़ सकेगा। कैसे? मौजूदा प्रणाली को देखिए। मान लें कि आप 40 मतदाताओं वाले एक निर्वाचन क्षेत्र से उम्मीदवार हैं। इनमें से 22 यानी 55 प्रतिशत वोट ही नहीं देते। बाकी 18 में चार आपको वोट देते हैं, तीन किसी दूसरे उम्मीदवार को, दो-दो वोट दो अन्य उम्मीदवारों को और सात अन्य को एक-एक वोट मिलता है।
इस तरह 40 में से कुल चार यानी 10 फीसदी मतदाताओं के समर्थन से आप ‘जन प्रतिनिधि’ बन जाते हैं। 1952 में स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव से यही स्थिति रही है। मतदान को अनिवार्य बना देने से इस हालत में सुधार हो सकता है।
चूंकि ज्यादातर मतदाता वोट नहीं डालते, इसलिए किसी भी उम्मीदवार के लिए मतदाताओं के किसी एक समुदाय को लामबंद करने के लिए जाति या संप्रदाय का कार्ड खेलना आसान हो जाता है। अनिवार्य मतदान का नतीजा यह होगा कि अगर एक निर्वाचन क्षेत्र में 30 फीसदी मतदाता किसी एक समुदाय के और 70 फीसदी किसी अन्य समुदाय के हैं, तो कोई भी पार्टी या उम्मीदवार किसी संकीर्ण एजेंडे पर चुनाव नहीं जीत सकती, क्योंकि बहुसंख्यक समुदाय उसे खारिज कर देगा।
अगर मतदान अनिवार्य हो जाए राजनेताओं को सभी मतदाताओं से जुड़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। इसके चलते उन्हें अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को नए सिरे से परिभाषित करना होगा। इसके अलावा जब मतदान अनिवार्य होगा, तब मतदाता को भी यह छानबीन भी करनी होगी कि कौन-सा उम्मीदवार कैसा है।
इस कवायद से राजनीतिक प्रणाली में मतदाता की रुचि नए सिरे से जागृत हो सकती है। इसके साथ अगर मतदाता को ‘उपरोक्त में से कोई नहीं’ पर बटन दबाने का भी विकल्प मिल जाए तो सोने पर सुहागा हो जाएगा। अगर बड़ी संख्या में मतदाता सभी उम्मीदवारों को खारिज करके यह विकल्प चुनते हैं तो यह अपने आप में अहम संदेश होगा। इससे राजनीतिक पार्टियां मतदाता पर ज्यादा ध्यान देने को बाध्य होंगी और यह हमारे देश में सचमुच बड़ा बदलाव होगा।
हम अपने नेताओं को पहले ही बहुत कोस चुके हैं। सवाल यह है कि समस्या क्या सिर्फ नेता ही हैं, जनता नहीं? मौजूदा विकल्पों से बार-बार की नाराजगी से उपजा मोहभंग समझ में आता है। लेकिन आज स्थिति कुछ और भी नजर आती है। कई शहरों में मतदान के दिन को छुट्टी का दिन समझा जाता है। वोट नहीं देने वालों में संपन्न तबका सबसे आगे है।
जहां तक विरोध प्रदर्शनों में मोमबत्तियां जलाने वाले युवाओं की बात है, तो उनके बारे में हाल ही में सेवानिवृत्त मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने एक दिलचस्प बात कही थी - 18 से 25 वर्ष की उम्र के मतदाताओं में से 70 फीसदी ने अपने को मतदाता सूचियों में दर्ज ही नहीं करवाया।
लिहाजा मतदाताओं को अब बताना होगा कि वोट देना अधिकार ही नहीं, कर्तव्य और जिम्मेदारी भी है। यह अधिकार भारतीयों को आसानी से हासिल नहीं हुआ है। अलबत्ता जो लोग अनिवार्य मतदान के बाद भी वोट देने नहीं आते, उनके विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।
जिन तीस से ज्यादा देशों में मतदान अनिवार्य है, कहीं भी इस मामले में सख्त सजा का प्रावधान नहीं है। वहां ज्यादा से ज्यादा जुर्माना होता है और बीमार होने की स्थिति में वोट नहीं देने की भी छूट है। जिन देशों में अनिवार्य मतदान है, वहां न सिर्फ मतदान प्रतिशत खासा अच्छा है, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों के उल्लंघनों की भी ज्यादा चर्चा नहीं है।
भारत में भी इस पर व्यापक बहस का अब समय आ गया है। हो सकता है यह बहस ही उदासीन मतदाताओं में कुछ रुचि पैदा कर सके।
अनपढ़ मां की जिद ने बनाया आईएएस

अहमदाबाद प्रकाश कंवर को अपने अनपढ़ होने का मलाल था, लेकिन साधारण परिस्थिति में गुजर-बसर करते हुए आज अपनी बेटी डॉ. रतनकंवर गढ़वी चारण (24) को आईएएस बना देखकर वे गौरवान्वित हैं।
रतनकंवर ने पहले अपनी मेहनत से एमबीबीएस की डिग्री हासिल की और इस वर्ष यूपीएससी की परीक्षा में 124वीं रैंक हासिल करने में कामयाब रही। यहां के मणिनगर में हरिपुर इलाके की धीरज सोसायटी में रहने वाली रतनकंवर के पिता हड़मत सिंह आलू और प्याज के व्यापारी हैं।
उन्होंने बताया कि उनकी बेटी बचपन से ही पढ़ाई में होशियार रही है। दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं में उसने 91 फीसदी से ज्यादा अंक प्राप्त किए।
मां की इच्छा पूरी की
रतनकंवर के दो भाइयों भवदेव और सिद्धार्थ ने बताया कि मां ने तीनों बच्चों को उच्च शिक्षा और तरक्की के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया। इसके चलते भवदेव ने बीई-आईटी व एमबीए और सिद्धार्थ ने बीटेक किया तो रतनकंवर ने एमबीबीएस करने बाद आईएएस बनने की ठानी। भाइयों का कहना है कि आईएएस बनकर रतनकंवर ने मां की वर्षो पुरानी इच्छा पूरी कर दी है।
सफलता का श्रेय मां को रतनकंवर ने भी अपनी सफलता का श्रेय मां को देते हुए बताया, ‘डॉक्टर बनने के पहले और यूपीएससी की परीक्षा की तैयारी के दौरान ऐसा लगता था जैसे मां को ही परीक्षा देनी है। वे मेरे साथ पूरी रात जागती रहती थीं।’
मैं कभी स्कूल नहीं गई। इसका मुझे दु:ख था, लेकिन बेटी की सफलता से मुझे बहुत संतोष मिला है। लगता है जैसे मैंने ही पढ़ाई पूरी कर ली है।’
- प्रकाश कंवर (आईएएस बनने वाली रतनकंवर की मां)
Tuesday, 14 April 2009
सबसे बड़े प्रजातंत्र की लागत

विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र के लिए हो रहे चुनाव पर एक अनुमान के मुताबिक करीब 18 हजार करोड़ रूपए खर्च होंगे। इस मायने में भारत का यह आम चुनाव कुछ महीने पहले अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव के खर्च को भी पीछे छोड़ देगा। उसमें लगभग दस हजार करोड़ रूपए खर्च हुए थे।
इस संबंध में राष्ट्रीय दलों के चुनावी प्रत्याशियों और वरिष्ठ नेताओं से चर्चा की। स्वाभाविक रूप से इस संबंध में खुल कर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। नाम न जाहिर करने की शर्त पर इन नेताओं का कहना है कि एक सांसद के चुनाव में तीन से पांच करोड़ रूपए की राशि खर्च होती है।
सूत्रों का कहना है कि अगर चुनाव जद्दोजहद और खींचतान वाला हो तो यह खर्च दुगुना और तिगुना भी हो सकता है। राष्ट्रीय दलों की बात करें तो उनकी ओर से प्रत्याशियों को लगभग एक करोड़ रूपए की राशि चुनाव खर्च के लिए दी जाती है। चुनाव खर्च मोटे तौर पर प्रचार सामग्री और जनसभा के आयोजन तथा कार्यकर्ताओं को प्रतिदिन दी जाने वाली राशि के रूप में होता है।
एक कार्यकर्ता को रोज करीब 200 रूपए दिए जाते हैं। विधानसभा क्षेत्रवार तीन सौ से पांच सौ कार्यकर्ता चुनाव प्रचार के लिए जुटते हैं।
आमतौर पर एक लोकसभा क्षेत्र में छह से आठ विधानसभा क्षेत्र होते हैं।
सूत्र बताते हैं कि पहले चुनाव में वाहन आदि की व्यवस्था पर खासी रकम खर्च होती थी लेकिन चुनाव आयोग की सख्ती के मद्देनजर अब इसमें काफी कमी आई है। फिर भी चोरी छिपे बडी संख्या में वाहन अब भी चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल होते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले गाडियां किराए पर ली जाती थीं अब खुद ज्यादातर कार्यकर्ताओं के पास कार या जीप होती है जिसका इस्तेमाल प्रचार के लिए किया जाता है।
सूत्रों के अनुसार पहले चुनाव में कंबल ् कपड़े और मदिरा बंटने की बातें ही ज्यादा सामने आती थीं लेकिन पिछले कुछ वर्षो में चुनाव में एक वर्ग ऐसा भी सामने आया है जिसके लिए विशेष उपहार की व्यवस्था होती है। इन उपहारों में मल्टी यूटिलिटी व्हीकल सहित अन्य मूल्यवान वस्तुएं शामिल होती हैं। चुनाव में विशिष्ट उपहार प्राप्त करने वाला यह वर्ग राजनीतिक समीकरण की दृष्टि से खासा महत्वपूर्ण होता है। ये राजनीतिक रसूख रखने वाले लोग होते हैं जिनके कहने पर संबंधित क्षेत्रों में पांच से लेकर पचास हजार तक के वोटों का फैसला हो जाता है।
खास बात यह भी है कि राजनीतिक दलों में कुछ विशिष्ट कार्यकर्ताओं का ऐसा हुजूम भी होता है जिन्हें टास्क परफार्मर कहा जाता है। ऐसे कार्यकर्ता उन क्षेत्रों में झोंके जाते हैं जहां उम्मीदवार की हालत कमजोर होती है। अनुकूल परिणाम आने पर टास्क परफार्मर कार्यकर्ता भी मूल्यवान उपहारों से नवाजे जाते हैं।
करीब पांच महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में राष्ट्रीय स्तर के एक दल के कार्यकर्ताओं को इसी तर्ज पर एक ट्रक भर-भर मोटरसाइकिलें बांटे जाने की खासी चर्चा रही थी।
Friday, 3 April 2009
घोषणा पत्र जारी, भाजपा फिर राम भरोसे...

माना जा रहा था कि भाजपा अपने मैनिफेस्टो में हिन्दुत्व पर लौट सकती है। पिछले चुनावों में भाजपा ने अपना घोषणा पत्र जारी नहीं किया था। एनडीए का कॉमन मिनिमम प्रोग्राम जारी कर भाजपा ने अपने गठबंधन की बात प्रमोट की थी। उम्मीद यह भी की जा रही थी की यह घोषणा पत्र कांग्रेसी मैनिफेस्टो का जवाब होगा।
घोषणा पत्र जारी करने से पहले समारोह में भाजपा का अभियान गीत सुनाया गया। इस दौरान मंच पर आडवाणी, वैंकया, जसवंत सिंह, मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह और अरूण जेटली मौजूद थे। भाजपा के वरिष्ठ नेता रविशंकर प्रसाद ने घोषणा पत्र पढ़कर सुनाया।
भाजपा के इस घोषणा पत्र की खूबियां .......
- २ रूपए गेंहूं चावल
- किसानों को ४ फीसदी पर लोन
- ६ फीसदी पर होम लोन देने का वादा
- सेंट्रल सेल्स टेक्स खत्म होगा
- रेहड़ी वालों को ४ फीसदी पर लोन
- पोटा कानून लाएंगे
- विदेश में जमा काला धन वापस लाएंगे
- एफबीटी खत्म करेंगे ( फ्रिंज बैनिफिट टैक्स )
- गांवो को पक्की सड़क
- आयकर में छूट
- रामसेतु नहीं टूटने देंगे
- पर्यटन क्षेत्रों को बढावा
- पूर्ण ऊर्जा व सड़क संपर्क स्थापित करने देंगे
- जनसुरक्षा बढ़ाई जाएगी
- भारत बांग्लादेश बाड़ लगाने का काम पूरा
- माओवादियों , आतंकवादियों के खिलाफ अभियान
- अलगवावादी, आतंकवादी समर्थित देशों पर दबाव नीति
- जय जवान सैन्य बलों अर्धसैनिक बलों को आयकर मुक्त
- सैन्य बलों के लिए पृथक वेतन आयोग का गठन
- सेनाओं और पैरामिलिट्री फोर्स को वेतन पर आयकर में छूट
- बिजली का उत्पादन निर्भरता कम
- मध्य प्रदेश की लाड़ली लक्ष्मी को पूरे देश में
- धारा 370 हटाएंगे
- सस्ती शिक्षा
- 2014 तक सभी के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं
- घर पर एम्बुलैंस की व्यवस्था, नए एम्स की स्थापना पुर्नजीवित
- ग्लोबल वॉर्मिंग को रोकने के लिए कार्यक्रम
- अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाएंगें
- वरिष्ठ नागरिकों की पेंशन कर मुक्त
भाजपा ने उन चीजों को भी अपने मैनिफेस्टो में शामिल किया है जो कांग्रेस से कहीं छूट गए थे। राजनाथ सिंह ने अंत में मैनिफेस्टो कमेटी के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी समेत सभी को धन्यवाद दिया जिन्होंने घोषणा पत्र तैयार करने में मदद की है। राजनाथ सिंह ने कहा कि उन्होंने राजनीतिक , आर्थिक, सामाजिक , सांस्कृतिक सभी पक्षों को ध्यान में रखते हुए पत्र तैयार किया है। इसमें भाजपा की दार्शनिक अवधारणा को ध्यान में रखा गया है, यह संतुलित है। उन्होंने कहा कि यह अन्य पार्टियों के घोषणा पत्र की तरह विचार शून्य नहीं है। हमने यह केवल वादे नहीं किए हम इसका अक्षरशः पालन करेंगे, हर साल इसकी समीक्षा करेंगे। इस मौके पर आडवाणी ने कहा की घोषणा पत्र के अनुसार हम यह सारे वादे पूरे करना चाहते हैं। हम देश को सुरक्षा देना चाहते हैं। उन्होंने सैन्य सेवाओं को ज्यादा से ज्यादा आर्थिक फायदा पहुंचाने का वादा किया, उन्होंने वीरता पुरस्कारों की राशी को 30000 रूपए तक बढ़ाने की बात भी कही।
क्या पार्टियों के घोषणा पत्रों का कोई महत्व है.. या यह सिर्फ वोटरों को लुभाने के खोखले वादे हैं......अपने विचार जरूर लिखें....
Thursday, 2 April 2009
जुए में पत्नी हारी, जुआरियों ने किया दुष्कर्म !

विवाहिता की शिकायत के मुताबिक, दस साल पहले उसकी शादी बटावदापार गांव में सल्लू के साथ हुई थी। पति को जुआ खेलने की लत थी। गत 25 मार्च को सल्लू जुए में पचास हजार रुपए हार गया। रुपए की एवज में उसने पत्नी को ही दांव पर लगा दिया। जब सल्लू रात 12 बजे घर आया तो पत्नी को बाहर जाने के लिए कहा। घर से बाहर निकलते ही गांव के परसराम ने उसे पकड़कर मुंह में रूमाल ठूंस दिया और हाथ-पैर रस्सी से बांध दिए। बाद में उसे जीप में डालकर जंगल ले जाया गया जहां तीन लोगों ने उसके साथ सामूहिक दुराचार किया।
31 मार्च की रात जब जुआरी शराब के नशे में बेसुध हो गए, तब वह मौका पाकर भाग निकली। जंगल में भटकते हुए सड़क पर आई और एक बस ड्राइवर की मदद से गुना (मप्र) चली गई। गुना से वह अपने पीहर रूठियाई गांव आई और अपनी मां को सारी दास्तान सुनाई।
भरोसा नहीं फिर भी जांच
महिला के बयान में विरोधाभास है। उसके अपने पति से संबंध ठीक नहीं हैं। 29 मार्च को उसके पति सल्लू ने खुद गुमशुदगी का मामला दर्ज कराया था। भरोसा नहीं होता, कोई पति अपनी पत्नी के साथ ऐसा कर सकता है? -ओमप्रकाश, एसपी, बारां
अपहरण नहीं
एसपी के आदेश से गांव जाकर पूछताछ की है। विवाहिता की पुत्री, पुत्र, सास और पड़ोसियों से पूछताछ में अपहरण की कोई बात सामने नहीं आई। फिर भी मामले की जांच की जा रही है। -राजेन्द्रसिंह चारण, डीएसपी, छबड़ा
एक पति के द्धारा जुएं में अपनी पत्नी को दांव पर लगा देना किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता। आपकी नजर में ऐसे पति को क्या सजा दी जानी चाहिए?
Monday, 30 March 2009
आडवाणी का काला धन स्विस बैंक में !

लालू सोमवार को बिहार के सिवान, सिताबदियारा व मांझागढ़ में सभाओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि अगर आडवाणी को प्रधानमंत्री की कुर्सी मिली तो मैं राजनीति से संन्यास ले लूंगा। भाजपा देश में राममंदिर का राग अलाप कर एक बार फिर दंगा कराना चाहती है। वह अल्पसंख्यकों को यहां से भगाना चाहती है, जो हम नहीं होने देंगे। वरुण गांधी प्रकरण में उन्होंने आरएसएस और भाजपा पर गलत तरीके से फायदा उठाने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा कि साधु यादव को शामिल कर कांग्रेस गलतफहमी का शिकार हो गई है। उसे मालूम नहीं कि जब तक लालू हैं, तभी तक कोई लाल है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार किसी का भी भला करने वाले नहीं हैं।
दिल्ली, तेरी गलियों का वो इश्क याद आता है................

शर्मिंदा होने का एक और अवसर!

अडवाणी की जिद !

बीजेपी के पीएम कैंडिडेट लालकृष्ण आडवाणी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ टीवी पर बहस करना चाहते हैं, मनमोहन ने इंकार कर दिया तो उन्होंने सोनिया को न्योता दे दिया! आडवानी ज़िद पर हैं...! उनका कहना है बहस तो होनी ही चाहिए वो भी ठीक उसी तरह जिस तरह अमेरिका में प्रेजिडंट पद के उम्मीदवार बहस करते हैं। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि संसदीय जनतंत्र में इस तरह की बहस का कोई रिवाज नहीं है। लेकिन मान लीजिए कि यह अमेरिकी परंपरा अपने देश में भी शुरू हो जाए तो नजारा कैसा होगा? हो सकता है तब शरद पवार, मायावती, रामविलास पासवान और यहां तक कि लालू प्रसाद भी मैदान में कूद पड़ें। इनका सवाल यह होगा कि आखिर डिबेट आडवाणी जी और मनमोहन सिंह ही क्यों करेंगे? इन्होंने यह कैसे मान लिया कि सिर्फ उन्हीं की पार्टियां प्रधानमंत्री का उम्मीदवार तय करेंगी? यदि बहस की नौबत आती तो पता चलता कि शरद पवार ने मनमोहन सिंह को चुनौती दे डाली और लालू प्रसाद आडवाणी से बहस करने के लिए ताल ठोंककर खड़े हो गए। लालू प्रसाद तो बहस की शुरुआत में ही यह कह देते कि उन्होंने आडवाणी जी की कुंडली देख ली है, उसमें उनके प्रधानमंत्री बनने का कोई योग ही नहीं है। आडवाणी के लिए इसका जवाब देना आसान नहीं होता। कल्पना कीजिए कि ऐसी ही बहस के लिए फर्स्ट राउंड में मायावती और मुलायम सिंह आमने-सामने खड़े हो गए, तब किस तरह की बहस होगी। उधर दक्षिण में जयललिता, देवगौड़ा और चंद्रबाबू नायडू इसी उम्मीद में बहस में उतर सकते थे कि उनके दावे पर पुनर्विचार हो सकता है। लोग टीवी खोलते और हर एक घंटे के बाद उन्हें प्रधानमंत्री पद के 2 संभावित उम्मीदवार बहस करते हुए नजर आते। यहां जब क्षेत्रीय पार्टियां विधानसभा चुनाव में एक-दूसरे को सांपनाथ, नागनाथ बताने से नहीं चूकतीं तो राष्ट्रीय बहस का स्तर तो और ऊंचा हो जाता। हर नेता बेहतर परफॉर्म करने की कोशिश करता। लेकिन उन नेताओं का क्या होता, जो चतुर वक्ता नहीं होते? तब चुनाव आयोग से इस बात की मांग की जाती कि पीएम कैंडिडेट को बहस में अपना वक्ता लाने की छूट दी जाए। अगर आयोग यह छूट दे देता तो मनमोहन सिंह की ओर से कपिल सिब्बल और मुलायम सिंह यादव की जगह अमर सिंह भेजे जाते। वैसे बहस का प्रस्ताव रखते हुए आडवाणी ने क्षण भर के लिए यह जरूर सोचा होगा कि काश! टीवी डिबेट से ही पीएम का फैसला हो जाता। लेकिन टीवी या मंच पर बोलने से यह कैसे पता चलेगा कि कौन सचमुच 'लौह पुरुष' है और कौन 'कमजोर पुरुष।'
Sunday, 29 March 2009
नफ़रत की राजनीति!

गुजरात हाई कोर्ट ने राज्य की महिला तथा बाल विकास राज्य मंत्री मायाबेन कोडनानी की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर यह संदेश दिया है कि भारतीय राष्ट्र-राज्य के मूलभूत सिद्धांतों और संवैधानिक मूल्यों से खिलवाड़ करने वाले लोग कानून को कुछ दिनों तक धोखा देने में भले ही कामयाब हो जाएं पर वे उसके शिकंजे से बच नहीं सकते। अदालत ने यह निर्णय देते हुए कहा कि धर्मांध लोग आतंकवादियों से कम नहीं हैं। इस निर्णय के बाद कोडनानी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और विशेष जांच दल (एसआईटी) के कार्यालय में सरेंडर कर दिया। हाई कोर्ट के इस फैसले ने नरेंद्र मोदी सरकार को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। राज्य के अनेक सामाजिक संगठन शुरू से ही यह कहते रहे हैं कि वर्ष 2002 के दंगों के लिए राज्य का नेतृत्व वर्ग और पुलिस-प्रशासन का एक तबका भी जवाबदेह रहा है, लेकिन मोदी ने इसे मानने से हमेशा इनकार किया। कोडनानी के मामले में अब वह क्या कहेंगे? कोडनानी ने एक जन प्रतिनिधि होकर भी संवैधानिक ही नहीं मानवीय मूल्यों की भी धज्जियां उड़ाईं। उन पर नरोदा पाटिया में दंगाइयों की भीड़ को उकसाने और हथियार बांटने का आरोप है। इतना ही नहीं, जब उनके खिलाफ जांच शुरू हुई तो उन्होंने कानून की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की। इसके बावजूद नरेंद्र मोदी ने उन्हें मंत्रिमंडल में रखा और परोक्ष रूप से उनका बचाव भी किया। वह तो यह भी मानने से इनकार करते रहे हैं कि तत्कालीन पुलिस अधिकारियों ने दंगों को रोकने में कोई ढिलाई बरती। लेकिन उनके दावे की कलई पिछले महीने तब खुल गई जब एसआईटी ने एक डीएसपी को ड्यूटी में लापरवाही बरतने और सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने के आरोप में गिरफ्तार किया। एसआईटी ने कुछ और अफसरों की संदिग्ध भूमिका की ओर भी इशारा किया है, जिनमें एक सेवानिवृत्त अडिशनल डीजीपी भी हैं। आश्चर्य तो यह है कि गुजरात दंगे को लेकर राज्य सरकार की ओर उंगली उठने के बाद भी बीजेपी शर्मसार नहीं हुई, बल्कि पार्टी में नरेंद्र मोदी का कद और बढ़ गया। उन्हें प्रधानमंत्री बनाए जाने तक की मांग उठी। उन्हें विकास पुरुष के रूप में प्रॉजेक्ट करके पार्टी ने उनके दामन पर लगे दाग को धोने की कोशिश की। लेकिन समाज में नफरत फैलाकर, संवैधानिक मूल्यों को ताक पर रखकर विकास का कोई भी कदम व्यर्थ है। कई देशों में तानाशाही की व्यवस्था में जबर्दस्त आर्थिक तरक्की हुई है, लेकिन जनता ने कभी उस व्यवस्था को पसंद नहीं किया। यह दुर्भाग्य है कि बीजेपी जनतंत्र और विकास की बात करते हुए भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती। एक तरफ तो वह देश में सच्चा सेक्युलरिज्म लाने की बात करती है, लेकिन दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय के खिलाफ वरुण गांधी के उत्तेजक भाषण का समर्थन करती है और उनके बचाव में चुनाव आयोग तक पर निशाना साधती है। कोडनानी पर गुजरात हाई कोर्ट के फैसले से बीजेपी को सबक लेना चाहिए कि नफरत की राजनीति इस देश में कभी कामयाब नहीं हो सकती।
कब तक रहेंगे पीछे?

Saturday, 28 March 2009
कल थीं कांग्रेस की एमएलए, आज मजदूरी को मजबूर

Monday, 23 March 2009
लो आ गई नैनो !

सपना जब साकार होता है तो उद्गार खुद ब खुद निकलते है। रतन टाटा के साथ भी सोमवार को ऐसा ही हुआ, जब अमूमन गंभीरता की चादर ओढ़े रहने वाले देश के इस प्रमुख उद्योगपति ने गुड आफ्टरनून कहते हुए तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी की चुटकी ली।
नैनो की लांचिंग से पहले सोमवार को आयोजित प्रेस कांफ्रेंस की शुरुआत में ही जब एक पत्रकार ने टाटा से यह सवाल दागा कि वह ममता को क्या संदेश देना चाहेंगे, तो इस धीर-गंभीर उद्योगपति ने जो उत्तर दिया, उससे पूरे सभागार में हंसी गूंज उठी। चिढ़ाने वाले अंदाज में टाटा ने कहा कि मैं उन्हें सिर्फ गुड आफ्टरनून कहना चाहूंगा। पश्चिम बंगाल के सिंगुर में भूमि अधिग्रहण के विरोध में ममता द्वारा चलाए गए आंदोलन के चलते टाटा को अपनी परियोजना हटाकर गुजरात के साणंद में लगानी पड़ी है।
नैनो परियोजना को टाटा का ड्रीम प्रोजेक्ट माना जाता है। सोमवार को इसके सफल होने की खुशी टाटा के चेहरे पर झलक रही थी। उन्होंने कहा कि नैनो परंपराओं को तोड़ने की भावना का परिचय देती है। ड्राइंग बोर्ड पर इसका डिजाइन बनने से लेकर इसके व्यावसायिक लांच तक इसने
काफी उतार-चढ़ाव एवं चुनौतियां देखी हैं। नैनो को बनाने वाली टीम को बधाई देते हुए टाटा ने कहा कि जो कार कभी असंभव मानी जाती थी, इस टीम की बदौलत अब वास्तविकता बन चुकी है।
टाटा ने खुलासा किया कि इस कार को यूरोप एवं अमेरिकी बाजारों में भी पेश किए जाने की योजना है, लेकिन फिलहाल इसको चीन ले जाने का कंपनी का कोई इरादा नहीं है। कुछ दिन पहले जेनेवा में आयोजित आटो शो में टाटा मोटर्स ने नैनो का यूरोप में उतारा जाने वाला वैरियंट नैनो यूरोपा पेश किया है।
नैनो का सफर
-मार्च 2003 : रतन टाटा ने जेनेवा मोटर शो में एक लाख रुपये की सस्ती कार पेश करने का ऐलान किया।
-मई 2006 : टाटा मोटर्स ने सिंगुर [पश्चिम बंगाल] में 1500 करोड़ रुपये के निवेश से नैनो प्लांट लगाने की घोषणा की।
-अक्टूबर 2006 : तृणमूल कांग्रेस ने सिंगुर में कारखाना लगाने के विरोध में राज्य स्तरीय बंद का आह्वान किया।
-दिसंबर 2006 : सिंगुर में हिंसा, तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी ने भूख हड़ताल शुरू की। यह 25 दिन चली।
-जनवरी 2007 : सिंगुर में कार परियोजना के लिए भूमि पूजन।
-फरवरी 2007 : सिंगुर में पुलिस व आंदोलकारियों में झड़प हुई।
-जनवरी 2008 : रतन टाटा ने दिल्ली आटो एक्सपो में नैनो को पेश किया।
-मार्च 2008 : लखटकिया कार जेनेवा मोटर शो में भी पेश की गई।
-अगस्त 2008 : पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य व ममता बनर्जी में बातचीत।
-सितंबर 2008 : राज्यपाल के हस्तक्षेप से सरकार व तृणमूल कांग्रेस में समझौता, जो ज्यादा देर नहीं चला।
-अक्टूबर 2008 : रतन टाटा ने नैनो परियोजना को सिंगुर से साणंद [गुजरात] ले जाने का ऐलान किया।
-फरवरी 2009 : टाटा मोटर्स ने 23 मार्च को पेश नैनो को पेश करने की घोषणा की।
-मार्च 2009 : नैनो का यूरोपीय वर्जन जेनेवा मोटर शो में पेश। तीन साल में यूरोप में उतारी जाएगी।
Sunday, 22 March 2009
कोई भी रोक नहीं पाया फांसी..
लाहौर षड्यंत्र केस में 23 मार्च 1931 को जब 23 वर्षीय भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को सूली पर लटकाया गया तो इसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनी गई। ब्रिटिश हुकूमत के इस कुकृत्य की जहां तत्कालीन भारतीय नेताओं ने जमकर आलोचना की, वहीं देश-विदेश के तमाम अखबारों ने भी इसे सुर्खियां बनाया। फांसी 24 मार्च को दी जानी थी। लेकिन जनविद्रोह के डर से ब्रिटिश हुक्मरानों ने तिथि चुपके से बदलकर 23 मार्च कर दी।
बिपिन चंद्र द्वारा लिखी गई भगत सिंह की जीवनी 'मैं नास्तिक क्यों हूं' में इस घटना पर तत्कालीन नेताओं और अखबारों द्वारा व्यक्त की गई तीखी टिप्पणियां सिलसिलेवार ढंग से दर्ज हैं।
-'..यह काफी दुखद और आश्चर्यजनक घटना है कि भगत सिंह और उसके साथियों को समय से एक दिन पूर्व ही फांसी दे दी गई। 24 मार्च को कलकत्ता से कराची जाते हुए रास्ते में हमें यह दुखद समाचार मिला। भगत सिंह युवाओं में नई जागरूकता का प्रतीक बन गया है।' [सुभाष चंद्र बोस]
-'मैंने भगत सिंह को कई बार लाहौर में एक विद्यार्थी के रूप में देखा। मैं उसकी विशेषताओं को शब्दों में बयां नहीं कर सकता। उसकी देशभक्ति और भारत के लिए उसका अगाध प्रेम अतुलनीय है। लेकिन इस युवक ने अपने असाधारण साहस का दुरुपयोग किया। मैं भगत और उसके साथी देशभक्तों को पूरा सम्मान देता हूं। साथ ही देश के युवाओं को आगाह करता हूं कि वे उसके मार्ग पर न चलें।' [महात्मा गांधी]
-'हम सबके लाड़ले भगत सिंह को नहीं बचा सके। उसका साहस और बलिदान भारत के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।' [जवाहर लाल नेहरू]
-'अंग्रेजी कानून के अनुसार भगत सिंह को सांडर्स हत्याकांड में दोषी नहीं ठहराया जा सकता था। फिर भी उसे फांसी दे दी गई।' [वल्लभ भाई पटेल]
-'भगत सिंह ऐसे किसी अपराध का आरोपी नहीं था जिसके लिए उसे फांसी दे दी जाती। हम इस घटना की कड़ी निंदा करते हैं।' [प्रसिद्ध वकील और केंद्रीय विधानसभा सदस्य डीबी रंगाचेरियार]
-'भगत सिंह एक किंवदंती बन गया है। देश के सबसे अच्छे फूल के चले जाने से हर कोई दुखी है। हालांकि भगत सिंह नहीं रहा लेकिन 'क्रांति अमर रहे' और 'भगत सिंह अमर रहे' जैसे नारे अब भी हर कहीं सुनाई देते हैं।' [अंग्रेजी अखबार द पीपुल]
-'पूरे देश के दिल में हमेशा भगत सिंह की मौत का दर्द रहेगा।' [उर्दू अखबार रियासत]
-'राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह की मौत से पूरे देश पर दुख का काला साया छा गया है।' [आनंद बाजार पत्रिका]
-'जिस व्यक्ति ने वायसराय को इन नौजवानों को फांसी पर लटकाने की सलाह दी, वह देश का गद्दार और शैतान था।' [पंजाब केसरी]
Sunday, 15 March 2009
गाँव बसा नहीं, लुटेरे पहले आ गए !

Saturday, 14 March 2009
तेरा क्या होगा पाकिस्तान?

Thursday, 12 March 2009
मेरा शहर बदल गया है?
Wednesday, 4 March 2009
गरीबी पश्चिम में खूब बिकती है।

फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनेर' का इतना हल्ला मचा हुआ है कि मुझ जैसे साधारण पत्रकार को भी यह देखनी पड़ी। मैं इस फिल्म की कलात्मक उत्कृष्टता, म्यूजिक या सॉन्ग पर टिप्पणी करने की पात्रता नहीं रखता, लेकिन एक बात निश्चय ही पूरे आत्म विश्वास के साथ कर सकता हूं और वह यह कि ब्रिटेन, अमेरिका और कई पश्चिमी देशों की भारत को देखने की जो पुरानी और पूर्वाग्रहपूर्ण दृष्टि रही है, उसमें कोई खास बदलाव नहीं आया है। भारत को एक गरीब, आपस में लड़नेवाला, भ्रष्ट और कमजोर देश माना जाता रहा है। एक ऐसा देश जहां गरीब मनुष्य होकर भी समाज में आधे-पौने मनुष्य का दर्जा रखते हैं। जिनकी अपनी कोई कीमत नहीं लेकिन जिनकी गरीबी पश्चिम में खूब बिकती है। भारत में गरीब होना चूंकि कमतर मनुष्य होना है, इसलिए कम से कम हमारे शहरों में तो कोई गरीब भी यह नहीं चाहता कि उसकी गरीबी दिखाई जाए। यही कारण है कि इस फिल्म के ब्रिटिश निर्देशक डैनी ब्वॉयल जब फिल्मांकन के सिलसिले में स्लम बस्तियों में गए तो वहां उनके साथ काम करने को तैयार हुए लोगों ने पूछा : 'आप हमें गरीबों के रूप में तो दर्शाने नहीं जा रहे?' उन्होंने क्या उत्तर दिया यह तो मालूम नहीं है लेकिन 'टाइम' पत्रिका में '10 क्वेश्चन्स' कॉलम के अंतर्गत उनसे पूछे गए एक सवाल का उत्तर यहां दृष्टव्य है। उनसे पूछा गया था कि भारत में गरीबी का रोमानीकरण करने के आरोपों के बारे में आपका क्या उत्तर है तो उन्होंने कहा 'लोगों ने जो स्लम बस्तियों में हमारे साथ काम कर रहे थे, हमसे पूछा कि आप (फिल्म में)हमें गरीबों के रूप में तो चित्रित नहीं करेंगे? या करेंगे? क्योंकि पश्चिमी लोग हमेशा ऐसा ही करते हैं। मगर मैंने फिल्म को एक ऐसी ऊर्जा के साथ बनाने की कोशिश की है ताकि यह प्रतिबिम्बित हो कि यह जगह कैसी है (जहां ये लोग रहते हैं) कि गरीबी के बावजूद यहां एक जीवंतता-जिजीविषा है।' लेकिन गरीबी दिखाने के पश्चिमी पूर्वाग्रह के चलते उन्हें स्लम के अपने सहयोगियों की संवेदनशीलता का जरा भी ध्यान नहीं रहा। कुरूप यथार्थ का जैसा वीभत्सीकरण यहां दिखाई देता है, उसे देखकर रुह तक कंपा देनेवाली जुगुप्सा पैदा होती है। एक दृश्य में स्लम का बच्चा संडास में बैठा है। उसे पता चलता है कि वहीं कहीं अमिताभ बच्चन आया है। अमिताभ बच्चन के ऑटग्राफ लेने के लिए वह बच्चा संडास से मल के कुण्ड में नाक दबाकर कूद जाता है और शायद सामने से तत्काल हटाने के लिए मजबूर कर देनेवाली स्थिति में ऑटग्राफ भी पा लेता है। कलाओं में यथार्थ का अतिकरण कई बार भाव-भंगिमाओं के साधारणीकरण और संप्रेषण के लिहाज से किया जाता है। लेकिन ऐसी वीभत्स अति? मैं पूछना चाहूंगा कि मल से सने बल्कि नहाये बच्चे को कल यदि खुद फिल्म निर्देशक डैनी बॉयल को ऑटग्राफ देना पड़े तो क्या वह कुछ सेकंड भी वहां ठहरना सह सकेंगे? ठीक है कि सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा आज भी भारत में जारी है, लेकिन गरीब बच्चे के अमिताभ-आकर्षण के एक प्रतीक को इस सीमा तक खींचना किस कलागत औचित्य को दर्शाता है? डैनी बॉयल इसके लिए अपनी ब्रिटेन में हुई परविश या संस्कार को जिम्मेदार मानते हैं। तो यह संस्कार या पूर्वाग्रह क्या है? कि भारतीय गंदे होते हैं? उनके घरों से मैला उठाने के लिए एक अलग जाति के लोग आते हैं? कि वे गंदा पानी पीते हैं और गंदे हाथों से खाना खाते है? आदि-आदि। जो लोग इस फिल्म को भारतीय फिल्म सिद्ध करने के लिए शीर्षासन कर रहे है, और कह रहे है कि इसकी कहानी भारतीय है और एक भारतीय द्वारा ही लिखी गई है, इसके पात्र भारतीय हैं, संगीत और संगीतकार भारतीय है, इसका फिल्मांकन भारत में हुआ है, वे लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि इसका निर्देशक और उसकी टीम विदेशी है। और उसने माना है कि यह फिल्म एक हाइब्रिड फिल्म है। देशी और विदेशी टीमों का एक संयुक्त उपक्रम। फिल्म निर्देशक और पटकथा दोनों सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं और ये दोनों विदेशी हैं। इसलिए यह भारतीय फिल्म नहीं मानी जा सकती। आप चाहें तो खुद निर्देशक से सत्र लेकर इसे वर्णसंकर कह सकते हैं। फिल्म का नजरिया पश्चिमी है, संवेदनशीलता पश्चिमी है और बम्बइया फिल्मों के लटके-झटकों के बावजूद इसमें वही दिखाया गया है, जो पश्चिमी दर्शक देखना चाहता है। पिछले एक दशक में यूरोप और अमेरिका में भारत की पुरानी गरीब और पिछड़े देश की इमेज पर एक उभरती हुई आर्थिक और सैन्य ताकत की इमेज हावी है। यह धारणा बनी है कि भारत और चीन कुछ दशकों में दुनिया की महाशक्तियों में होंगे। भारतीय या भारतीय मूल के उद्योगपति विदेशी कंपनियां खरीद रहे है और अरबपतियों की विश्व कतार में खड़े होने वाले भारतीयों या भारतवंशियों की संख्या बढ़ रही है। भारत को जी-8 जैसे अमीर देशों की बैठकों में बुलाया जाने लगा है। अपनी प्रतिभा और परिश्रम से अमेरिका और अन्य देशों में भारतीय छा गए हैं। भारत अंतरिक्ष की भी एक ताकत बन चुका है और उसके पास करीब-करीब इतनी आबादी वाला मध्यवर्ग है, जो अमेरिका की पूरी आबादी है। यह एक तरह का कल्चरल शॉक जैसा है। इसलिए दो छवियों के बीच इस पृष्ठभूमि में द्वंद्व में संतुलन बैठाने का रास्ता यह निकाला गया है कि भारत की इस नई इमेज को तोड़ो। उसे पुरानी गरीब, पिछड़ी और जाहिल की इमेज पर हावी मत होने दो। भारत को उसके अंधेरे में, उसकी दरारों में पकड़ो, जहां सीलन है, बदबू है, गंदगी है और जहां लोग नहीं मानों कॉकरोच रहते हैं। ऐसे कॉकरोच जिन्हें करीब 60 सालों में न तो मिटाया जा सका है और न मिटाया जा सकेगा। भारत की इस कटु सचाई से मैं मुंह नहीं मोड़ रहा। भारत निश्चय ही गरीब और पिछड़ा देश है। देश की 77 प्रतिशत आबादी प्रतिदिन एक डॉलर (करीब 50 रु.)भी नहीं कमा पाती। करोड़ों लोगों को दिन में एक बार ही मुश्किल से खाना मिल पाता है। बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। रहने के लिए झोपड़ी और पीने के लिए साफ पानी नहीं है। हिन्दू-मुस्लिम दंगे होते हैं (फिल्म में ऐसे ही एक दंगे में बचपन में ही नायक की माँ मारी जाती है), अल्पसंख्यक जुल्मों का शिकार होते हैं और जमाल जैसा बच्चा अगर एक दिन अमीर बन भी सकता है तो यह कौन बनेगा करोड़पति जैसे टीवी कार्यक्रमों से निकला एक चमत्कार ही है। भारत में ज्ञान की कद्र है और ज्ञान से धन भी अर्जित किया जा सकता है, लेकिन गरीब मुसलमानों के बच्चे शिक्षा से नहीं, अंडरवर्ल्ड के फंदे में फंसकर वह ज्ञान अर्जित करते हैं जो एक दिन टीवी कार्यक्रमों के जरिए उन्हें लॉटरी तक पहुंचाता है। फिल्म में नायक एक जगह चैनल के स्टूडियो में बैठा अनिल कपूर के प्रश्नों के उत्तर दे रहा है तो फ्लैशबैक में दो पुलिसकमिर्यों की ज्यादतियों के बीच उन यातनाओं को बयान कर रहा है, जिनसे गुजरते हुए उसे क्विज के उत्तर प्राप्त हुए। तो फिल्म का असली पक्ष वह नहीं है जो स्टूडियो की चमक-दमक में दिखाया गया है, असली पक्ष फ्लैशबैक में है, जहां दंगों में अल्पसंख्यकों का मारा जाना है, भिक्षा कराने वाले गिरोहों द्वारा अबोध बच्चों का पकड़ा जाना और फिर हाथ-पैर तुड़वाना या आंख फुड़वाना है, ताकि लोगों को दया आए और वे ज्यादा भीख दें। बड़ी बारीक तरह से फिल्म में उग्र हिन्दूवाद को भी उठाया गया है और जैसे संकेत किया गया है कि भिखारी बच्चा हिन्दू हो या मुसलमान पर भीख मांगते हुए वह हिन्दू प्रार्थना ही गाता है। स्लम की बच्चियां देह शोषण की शिकार हैं और लोग अपना जीवन या तो अमिताभ बच्चन की एक झलक पाने की चाह में या फिर कौन बनेगा करोड़पति जैसे कार्यक्रमों के जरिए भाग्य उदय होने की आशा में जीते हैं। अगर फिल्म में कोई मन को छूनेवाली बात है तो जमाल और लतिका का प्रेम है, जो आश्रयहीन और अनाथ बच्चों में भी उतना ही मौलिक और निश्छल हो सकता है, जैसा सामान्य तौर पर होता है। रहमान बड़े संगीतकार है लेकिन उनके जिस गीत का शोर है, उसे भी उनका उत्कृष्ट या प्रतिनिधि गीत नहीं माना जा सकता। जरा सोचिए कि अगर यही फिल्म किसी भारतीय ने बनाई होती तो क्या उसे 8 ऑस्कर मिलते। एक साधारण दर्शक के नाते मैं सत्यजित राय की पथेर पांचाली जैसी उत्कृष्ट फिल्म से इस फिल्म की तुलना करना चाहता जिसकी गरीबी के आधार पर की जा रही है ना ही किसी को करनी चाहिए। वहां गरीबी गौण हो जाती है और मानवीय प्रश्न ही अंतत: आपका पीछा करता रहता है। उन्हें सम्मान भी बहुत बाद में मिला। इस फिल्म को मिल रहे सम्मान कोई भी अवहेलना नहीं कर सकता, लेकिन कृपया इस फिल्म को इस संदर्भ के साथ भी मिलाकर देखिए कि एक उभरते भारत का धीरे-धीरे पश्चिमी दृष्टि से ओझल हो रहा पुराना सच इस रूप में आखिर क्यों याद दिलाया जा रहा है? क्या इस मनोरंजन-सरोकार के पीछे वही पुरानी श्रेष्ठता ग्रन्थि काम नहीं कर रही है? लेकिन क्रोध करने की बजाय आप भी इस फिल्म को जरूर देखिए और सोचिए कि क्या नाराज होकर हम भारत को देखने वाली इस पुरानी पश्चिमी दृष्टि को बदलवा सकते हैं या हमें ही अपने यहां व्यापक पटल पर बदलाव लाने की जरूरत है? तो उत्तर इस वाक्य के अन्त में है लेकिन मैं नहीं जानता कि यह कैसे होगा।