Wednesday, 18 November 2009

हिँदी मेँ शिक्षा कहीँ षड्यँत्र तो नहीँ?

वैसे तो बात ज़्यादा पुरानी नहीँ है....लेकिन बहुत पुरानी हो चली है! अगर आप देश की आज़ादी के वक्त मेँ लौटेँ तो आपको ये बात बस कल की ही बात लगेगी! बात पुरानी उनके लिये है जिन्होँने तरक्की की रह पकड ली है! जो लोग आर्थिक उदारीकरण के रथ पर सवार होकर दुनिया के सारे सुख और सुविधाओं का मज़ा ले रहे हैँ...! वो भला सन सैँतालिस की उस काली रात मेँ क्युँ लौटना चाहेँगे? लेकिन ऐसे लोगोँ की सँख्या बहुत ही कम है! सरकारी आकडोँ के मुताबिक आज भी चालीस फीसदी से ज़्यादा लोग गरीबी की रेखा से नीचे बसर कर रहे हैँ! तो उनके लिये सन सैँतालिस की वो रात पुरानी नहीँ है! क्योँकि उंनकी वो रात तो अब तक नहीँ बीती! आज़ादी का सूरज उन्होँने नहीँ देखा! वो तो आज भी गरीब, लाचार और मजबूर हैँ!
चलिये अब बात पर आते हैँ ! तो बात है देश के सँसाधनोँ के बटवारे की! अगर आप भारतीय सवतंत्रता सँग्राम का इतिहास उठा कर देँखेँ तो आप पायेँगे कि इसकी नीँव समाजवादवाद मेँ है! ये समाजवाद गाँधी से भी पुराना है! भारतीय सवतँत्रता के इतिहास मेँ पहला अँग्रेज विरोधी सँघर्ष था सँयासी विद्रोह! जिसका उल्लेख बँकिम चँद्र चटर्जी ने अपने उपन्यास आनँद मठ मेँ किया है! केना सरकार और दिर्जिनारायण के नेतृत्व मेँ सन 1760 मेँ शुरु हुआ ये विद्रोह 1800 तक चला! बिहार और बँगाल मेँ हुए इस विद्रोह मेँ देश की गरीब जनता ने बढ- चढ कर हिस्सा लिया! ये हिँदुस्तान मेँ अँग्रेजोँ को दी गई पहली चुनौती थी! जो सीधे गरीब जनता ने दी थी! जिसकी जड मेँ था समाजवाद का बीज! और समाजवाद का यही बीज आने वाले सालोँ मेँ ब्रितानी हुकूमत के लिये मुश्किलेँ खडी करता रहा! फकीर विद्रोह(1776), चुआरो विद्रोह(1798), पालीगरोँ का विद्रोह(1799), भील विद्रोह(1825), रामोसी विद्रोह(1822), पागलपँथी विद्रोह(1825), खासी विद्रोह(1833), नील विद्रोह(1854), जैसे दर्जनोँ विद्रोहोँ की गाथाओँ से भरा पडा है भारतीय स्वतँत्रता का इतिहास! (क्या कहा आपने नहीँ पढा कभी)
कहीँ ना कहीँ देश की आज़ादी के अगुआ इस बात को अच्छी तरह समझ गये थे कि समाजवाद के बल पर ही आज़ादी की मँज़िल को पाया जा सकता है! समाजवाद ही वो शक्ति है जिसके दम पर गरीब भारत की जनता एक साथ ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ खडी हो सकती है! शायद यही कारण था कि महात्मा गाँधी ने “ग्राम स्वराज” की कल्पना की थी! समाजवाद के लिये भारत की गरीब जनता ने दो सौ साल तक लडाइ लडी! आखिर हमने समाजवाद के बल पर स्वराज पा ही लिया! स्वराज तो आ गया लेकिन वो समाजवाद जिसके लिये भारत की आम जनता ने लँबी लडाइ लडी थी! उसे भुला दिया गया! हालाकि देश के पहले प्रधानमँत्री पँडित नेहरु समाजवाद के प्रबल पक्षधर थे! वो खुली आँखोँ से समाजवाद का सपना देखते थे! लेकिन वो भी देश की गरीब जनता के बीच सँसाधनोँ का सही बटॅवारा नहीँ करा सके! अभी भी किसान को ज़मीन पर मालिकाना हक नहीँ मिला था! आज़ादी के बाद भी ज़मीदार और रजवाडोँ की शान कायम थी! और देश की गरीब जनता के पास खाने के लिये अन्न नहीँ था! गाँवोँ की दशा बेहाल थी! किसान कर्ज़ मेँ डूबा था! और मज़दूर से बेगारी कराई जा रही थी! विनोबा भावे के भू आँदोलन ने किसानोँ के ज़ख्मोँ पर मरहम लगाने का काम ज़रूर किया लेकिन ये पर्याप्त नहीँ था!
खैर हम बात कर रहे थे सँसाधनोँ के बँटवारे की! सन 47 मेँ सबसे बडा सवाल यही था कि देश के सँसाधनोँ पर पहला हक किसका हो? पूँजीपतियोँ और ज़मीनदारोँ का ?
या गरीबोँ और आदिवासियोँ का? दुर्भाग्य से अँग्रेज़ोँ के जाने के बाद भी सत्ता पर पूँजीपतियोँ और ज़मीनदारोँ का ही वर्चस्व कायम था! लेकिन समाजवाद के नाम पर बलिदान देने वाली भारत की गरीब जनता के बलिदान को इतनी जल्दी कैसे भुलाया जा सकता था? इसलिये तय हुआ कि देश मेँ मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाई जायेगी! यानी समाजवाद और पूँजीवाद दोनोँ साथ- साथ चलेँगे! अमीर और गरीब हिल-मिल कर रहेँगे!
(यानि देश की आम जनता को अभी और बलिदान देना था!)
श्रम के बिना पूँजी का कोई अस्तित्व नहीँ! श्रम ही वो साधन है जो पूँजी को बढाता है! पूँजी(पूँजीपति) और श्रम( गरीब जनता) दोनोँ मिलकर देश के पुनर्निर्माण के कार्य मेँ जुट गये! दोनोँ की मेहनत रँग लाई! इसीलिये कभी सपेरोँ का देश के नाम से जाना जाने वाला भारत आज दुनिया की उभरती हुई महाशक्ति है! लेकिन क्या आपने कभी भारत के गाँवोँ से गुज़रने वाली लोकल ट्रेनोँ मेँ सफर किया है? यदि हाँ तो आपको सन सैँतालिस और आज के भारत मेँ ज़्यादा अँतर नज़र नहीँ आयेगा!

अब आप कहेँगे कि मेरे इस लेख का शीर्षक समाजवाद होना चाहिये था....हिँदी मेँ शिक्षा का इन सब से क्या सँबँध? तो जनाब सँबँध बडा गहरा है! फिलहाल रात गहरा गई है लेकिन बात अभी बाकी है.......
क्रमश:

Friday, 13 November 2009

राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट,

पिछ्ले दिनोँ देश के एक प्रतिष्ठित सरकारी सँस्थान मेँ जाने का मौका मिला! तो देखा एक बोर्ड हर जगह टँगा था! बोर्ड पर लिखा था....”अगर आपसे किसी काम के बदले सँस्थान का कोई कर्मचारी पैसोँ की माँग करता है तो तत्काल निदेशक से सम्पर्क करेँ!”
वहाँ कार्यरत अपने मित्र से मैने हर जगह टँगे इस बोर्ड का मतलब जानना चाहा तो वो मुस्कुराते हुए बोला: कितने नासमझ हो तुम ? मतलब ये कि अगर आपको रिश्वत देनी है तो सीधे निदेशक को ही देँ! बिचौलियोँ से सावधान! जब ज्यादा छान-बीन की तो पता चला कि वाकई मेँ वहाँ के निदेशक ऐसे ही गम्भीर आरोपोँ से घिरे हैँ! और इनक्वायरी चल रही है! मुझे ये मामला गँभीर इसलिये लगा क्योँकि ये सँस्थान वाकई देश का एक महत्वपूर्ण सँस्थान है! और जब इतने सँवेदंशील सँस्थान मेँ खुले तौर पर रिश्वत ली जा रही थी तो देश के बाकी सरकारी कार्यलयोँ मेँ भ्रष्टाचार के स्तर का अँदाज़ा लगाया जा सकता है! लेकिन सवाल ये है कि जब बात होती है भ्रष्टाचार की तो शिकँजे मेँ सिर्फ छोटी मछलियाँ ही क्योँ फसती हैँ? बडे मगरमच्छोँ पर कार्वाई क्योँ नहीँ होती? प्रधानमँत्री मनमोहन सिँह ने बीते दिनोँ जब यही बात कही थी तब मुझे इस बात का आभास होने लगा था कि जल्द ही कोई बडा नेता शिकँजे मेँ आने वाला है! और अब झारखँड के निर्दलीय मुख्यमँत्री मधुकोडा पर शिकँजा कस गया है! इस बार जाल मेँ है बडी मछली! चार हज़ार करोड रुपयोँ के घोटाले के सबूत मिल रहे हैँ...उस राज्य से जिस पर कुदरत तो मेहरबान रही है..लेकिन किस्मत नहीँ! 15 नवम्बर झारखँड के सबसे बडे सपूत बिरसा मुँडा का जन्मदिन है! यही दिन चुना था झारखँड के जन्म के लिये यहाँ की जनता ने! लेकिन झारखँड के निर्दलीय मुख्यमँत्री मधु कोडा ने इस सपने पर पलीत लगा दी! झारखँड मेँ निर्दलीय विधायक के रूप मेँ मुख्यमँत्री पद सँभाल कर इतिहास रचने वाले मधु कोडा पर आरोप है कि उन्होँने दो नँबर की कमाई मेँ भी इतिहास रच दिया! कोडा ने सिर्फ दो साल के अपने कार्यकाल मेँ चार हज़ार करोड रुपए से अधिक के वारे न्यारे कर डाले! खास बात ये है कि कोडा त्याग तपस्या और बलिदान की शिक्षा देने वाले आरएसएस की उपज हैँ! जिन्हेँ बीजेपी ने मँत्री बनाया! और काँग्रेस ने मुख्यमँत्री! लेकिन ये कोई सवाल नहीँ है! सवाल ये है कि कोडा कैसे इतनी बडी रकम अकेले ही डकार गये! क्या हमारी व्यस्था इतनी लाचार और पँगु है कि बिना आधार वाला मुख्यमँत्री भी इतनी बडी रकम हजम कर सकता है?
जब सन दो हज़ार के 15 नवँबर को भारतीय सँघ के 28 वेँ राज्य के रूप मेँ झारखँड का गठन हुआ था तो झारखँड की भोली और गरीब जनता ने एक सपना देखा था! उन्हेँ लगा था कि बिहार के कुशासन और राजनीतिक अपसँस्कृति से मुक्ति पाकर अब उनका प्रदेश विकास की नई उँचाइयोँ को छूएगा! क्योँकि ये इलाका खनिज सँपदा से भरपूर था! आधारभूत सँरचना भी अच्छी थी! अच्छी शिक्षण सँस्थायेँ थी! और ये प्रदेश कोरे कागज पर अपनी योजनायेँ बना सकता था! फिर झारखँड मेँ इतनी लूट क्योँ मची? ये कोइ बडा सवाल नहीँ है! बडा सवाल ये है कि क्या ये लूट सिर्फ झारखँड मेँ ही है या बाकी प्रदेशोँ मेँ भी यही सब चल रहा है? जो दिखता है वो तो सच होता है लेकिंजो छुपा हुआ है क्या वो सच नहीँ है? बहुमत का जादुई आकडा जुटाने के लिये ब्लेकमेल की राजनीति के परिणाम इससे भी भयानक हो सकते हैँ!
देश के नये जन्मेँ इस राज्य के जन्म के साथ ही इसके पतन की कहानी लिख दी गई थी! झारखँड मुक्ति मोर्चा घूस काँड भारत के सँवैधानिक इतिहास मेँ बहुचर्चित काँड है! जब बाबूलाल मराँडी की सरकार थी तब उसी सरकार के कुछ मँत्रियोँ ने अपने निजी स्वार्थोँ के लिये भाजपा को इस बात के लिये मजबूर कर दिया था कि वो बाबूलाल के स्थान पर किसी अन्य को पार्टी का नेता चुने! और भाजपा को सरकार बचाने लिये इस दबाव के आगे झुकना पडा! वैसे ही जैसे आज कर्नाटक मेँ भाजपा ने झुक कर अपनी सकार बचाई है! यानि कर्नाटक मेँ भी इतिहास एक बार फिर खुद को दोहरा रहा है! कर्नाटक का मुद्दा कोडा की कहानी से जुडा है इसलिये यहाँ उसका ज़िक्र करना भी ज़रूरी है! प्रेस काँफ्रेँस मेँ कर्नाटक के मुख्यमँत्री येदयुरपा की आँखोँ बहते आँसू कर्नाटॅक मेँ लोकतँत्र के पतन की दास्ताँ बयाँ करते हैँ! लेकिन बीजेपी ने अपनी पिछ्ली भूल से कोई सबक ना लेते हुए कर्नाटक मेँ भी झारखँड की कहानी को दोहराया है! सुषमा स्वराज भलेँ ही कहेँ कि सँकट टॅल गया है... लेकिन वो भी ये अच्छी तरह जानती हैँ कि सँकट तो अब शुरु हुआ है! कर्नाटॅक की जनता को अभी असली तमाशा देखना है! उम्मीद कीजिये कि यहाँ वैसा ना हो जैसा झारखँड मेँ हुआ!
खैर हम बात कर रहे थे झारखँड की! मराँडी और अर्जुन मुँडा की सरकार मेँ भी मधुकोडा मँत्री थे! लेकिन तब वे बदनाम नहीँ थे! साल दो हज़ार पाँच मेँ उच्चतम न्यायलय के हस्तक्षेप के बाद अर्जुन मुँडा सरकार बनी! और उस सरकार मेँ एनोस एक्का और हरिनारायण राय सहित मधु कोडा भी मँत्री बनेँ! एनोस एक्का और हरिनारायण राय अपने विभाग के कामकाज मेँ खुली छूट चाहते थे! जो अधिकारी इन मँत्रियोँ से सहमत नहीँ होते थे उनका तबादला कर दिया जाता था! क्योँकि इन मँत्रियोँ को पैसोँ का स्वाद लग चुका था! झारखँड की राजनीति की बिसात पर जो शतरँज चल् रही थी उसमेँ अपनी अहमियत को ये अच्छी तरह पहचान चुके थे! लेकिन अर्जुन मुँडा सरकार उन्हेँ इतनी छूट देने के लिये तैयार नहीँ थी! नतीजतन इन्होँने उस सरकार से समर्थन वापस ले लिया! काँग्रेस, झारखँड मुक्ति मोर्चा और राजद ने इनके मँसूबोँ को बढाया! निर्दलीय विधायक मधु कोडा को मुख्यमँत्री बनाया जिसमेँ झामुमो भी शामिल हुआ! इस कोडा सरकार के मुख्य खैवनहार थे लालू प्रसाद यादव! जिन्हेँ काँग्रेस का पूरा समर्थन था! तो क्या इस लूट मेँ कोडा अकेले शामिल थे? लालू कहते हैँ हमने तो सरकार चलाने के लिये समर्थन दिया था लूट मचाने के लिये नहीँ! तो इधर काँग्रेस ने बडी मछली को फाँस कर एक तीर से दो निशाने तो कर लिये...! लेकिन जब कोडा एँड कँपनी झारखँड को लूट रही थी....बाबू से लेकर अधिकारी और मँत्रीयोँ मेँ हिस्सा बट रहा था...और जनता न्याय के लिये ठोकरेँ खा रही थी....उन पूरे दो सालोँ तक क्या काँग्रेस सो रही थी? इस लूट के लिये ज़िम्मेदार आखिर कौन है? और इस बात की क्या गारँटी है कि ऐसी ही लूट महाराष्ट्र, हरियाणा या कर्नाटक मेँ नहीँ चल रही होगी? येदयुरप्पा के आँसू बहुत कुछ कहते हैँ...ज़रूरत है आसूओँ के पीछे की कहानी को समझा जाये और जल्द उसका निदान खोजा जाये! नहीँ तो झारखँड मेँ हुई लूट के किस्से बाकी प्रदेशोँ मेँ भी होते रहेँगे....जनता योँ ही तकलीफोँ मेँ जीती रहेगी....नेता अमीर और अमीर होते जायेँगे... और हम योँ ही कागज़ काले करते रहेँगे!

Thursday, 8 October 2009

असली खबरों से टीआरपी आती है!

कल एक रीजनल न्यूज चेनल के चेयरमेन से मुलाकात के दौरान चर्चा टीआरपी पर आ गइ! वे बोले मै एक नेशनल न्यूज़ चेनल लाँच करने वाला था लेकिन अब मैने अपना विचार बदल दिया है! क्योँकि न्यूज चैनल मेँ टीआरपी का बडा पँगा है! टीआरपी के लिए क्या कुछ नहीँ करना पडता? इसीलिये अब मै न्यूज़ चेनल की जगह फिल्मी और म्यूज़िक चैनल लाँच करने की सोच रहा हूँ! मैने सिर्फ इतना ही कहा यकीन मानिये असली खबरोँ से टीआरपी आती है! ये वैसा ही है जैसे मारधाड और सेक्स से भरपूर फिल्मोँ का एक दौर था ! जो बहुत थोडे वक्त के लिये था! अब फिर पावारिक और लीक से हट कर फिल्मोँ का दौर आ गया है! ये वैसा ही है जैसे सास-बहू टायप्ड टीवी सोप का दौर आया था! ये दौर भी आया और चला गया! लेकिन इस दौर मे और इसके बाद भी दर्शकोँ ने हर उस कोशिश को सराहा जो कुछ अलग थी! जहाँ फिल्मोँ मेँ पारिवारिक और लीक से हट कर विषयोँ की वापसी हुइ है ! वहीँ टीवी पर भी मध्यम वर्गीय परिवार और गाँवोँ की कहानियाँ अब धूम मचा रही हैँ! 12/24 करोल बाग का ही उदारहण ले लीजिये...! ज़ी टीवी का ये नया सीरियल दिल्ली के एक मध्यम वर्गीय परिवार की तस्वीर पेश करता है! साथ ही समाज की सोच पर सवाल भी खडे करता है! इस सीरियल ने इन दिनो धूम मचा रखी है! क्योँकि ये एक आम मध्यम वर्गीय परिवार की कहानी है जिससे हर कोइ खुद को रिलेट करता है!यही बात न्यूज़ चैनलोँ के लिये भी लागू होती है! हर वो खबर हिट है जो आम आदमी से सीधे जुडी है! और वो टीआरपी भी देगी! ज़रुरत इस बात की है कि आप उस खबर के मर्म को समझ कर उसे खबर के रुप मे पेश करेँ! ना कि तमाशे रुप मेँ! न्यूज़ रूम मेँ रिपोर्टर कइ बार ऐसी खबरेँ लेकर आते हैँ जो वाकइ बडी होती है! और उनका इम्पेक्ट भी काफी अच्छा हो सकता है! लेकिन मै तब हैरान हो जाता हुँ जब रिपोर्टर को खुद ही नही पता होता है कि जो स्टोरी वो लेकर आया है उसमे खबर क्या है! ऐसा शायद इस लिये है कि हम टीवी पत्रकार न्यूज़ पर मेहनत करना नहीँ चाहते! हम खबरोँ की तह तक जाने की बात तो करते हैँ लेकिन असल मेँ खबरोँ की तह तक जाने से डरते हैँ! जब खबरोँ पर मेहनत ही नहीँ की जायेगी तो टीआरपी भला कैसे आयेगी? यहाँ ये बात भी ध्यान देने लायक है कि टीआरपी के मापदँड कितने सही है? क्योँकि प्रसार भारती की झिडकी के बाद दूरदर्शन की टीआरपी मेँ हैरान कर देने वाली बढोतरी हुइ है!मुझे याद है आन्ध्र प्रदेश के एक गाँव से डायन हत्या की एक स्टोरी हमारे रिपोर्टर ने फाइल की थी! गौरतलब है कि आन्ध्र प्रदेश मेँ आज भी खुले तौर पर डायन बता कर बेकसूर महिलाओँ को मार दिया जाता है! पुलिस और प्रशासन की नाक के नीचे ये सारी घटनाएँ होती है! हैरानी की बात तो ये है कि सरकार को भी इस बात की जानकारी होती है! बावजूद इसके ना तो आज तक कोइ ठोस कार्वाइ ही की गइ है ना ही सरकार ने इसे रोकने की कोइ ठोस कोशिश ही कभी की है! अब बात स्टोरी की कतरते हैँ, स्टोरी ये थी कि गाँव वालोँ ने डायन बता कर दो महिलाओँ को दर्दनाक यातनायेँ दे कर मार डाला था! जब मैने विज़वल देखे तो मेरे रोँगटे खडे हो गये! गाँव के चौक पर लगभग सारा गाँव जमा था! लोगोँ ने पहले तो दोनो महिलाओँ को पत्थरोँ से बुरी तरह ज़ख्मी किया! उसके बाद उनके मुह मेँ लोहे की राड डाल कर उनके दाँत तोड दिये! इस दौरान दोनोँ महिलाएँ दर्द से छ्टपटाती रही! वो अपनी जान की भीख माँग रही थी! लेकिन मध्य युग मेँ जी रहे उस गाँव के बाशिन्दोँ के पास रहम की कोइ गुँजाइश नहीँ थी! उन्होँने दोनोँ महिलाओँ के अंतराँगोँ पर लात घुँसे और लोहे की राड से वार किया! महिलाओँ को खुन से लथपथ तडपते हुए जब काफी वक्त हो गया तो प्रशासन की एक वैन आइ और दोनोँ महिलाओँ को अस्पताल ले जाया गया! जहाँ उनहोँने दम तोड दिया! यानी एक गाँव ने मिल कर दो बेगुनाह महिलाओँ को डायन बता कर बेदर्दी से कत्ल कर दिया था! और प्रशासन और सरकार तमाशबीन बनी देख रहे थे! ये खबर हमारे चैनल पर सुबह की शिफ्ट मेँ एँकर विज़वल बाइट के रुप मेँ चल कर उतर चुकी थी! लेकिन इसे हेड लाइन नहीँ बनाया गया था! (एक पुलिवाले द्वारा एक बच्चे की पिटाइ उस वक्त सभी चैनलोँ पर ब्रेकिँग न्युज़ के रुप मेँ चल रही थी! और सिर्फ उसी के विज़वल बार बार दिखा कर उसपर घँटोँ से चैट चल रहा था!)लेकिन मै ये जानता था कि डायन हत्या की ये खबर जो सिर्फ हमारे पास थी कितनी अहम थी? इसलिये मैने तत्काल इस खबर पर पैकेज बनवाए! रिपोर्टर जिसने इस खबर को खुद कवर किया था उसका लाइव चैट करवाया! आन्ध्र प्रदेश सरकार के ज़िम्मेदार अधिकारियोँ को भी फोनो पर लिया! इसके बाद मानवाधिकार से जुडे सँगठनोँ का भी फोनो करवाया! हमने आन्ध्रप्रदेश सरकार से सीधा सवाल पूछा कि ये आन्ध्र प्रदेश मेँ हो क्या रहा है? हालाकि हमारा चैनल अभी लाँच ही हुआ था और हमारा डिस्ट्रीब्युशन भी कम ही हुआ था! फिर भी हमारी कोशिश रँग लाइ! हमारे खबर दिखाने के बाद आँध्र् प्रदेश सरकार ने जाँच के बाद दोषियोँ को कडी सज़ा दिलाने का वादा किया! लेकिन इस खबर को अभी और आगे बढाया जा सकता था! क्योँकि आँध्रप्रदेश मेँ डायन हत्या आम बात है! दरअसल ये आदिवासी इलाकोँ मेँ विधवा महिलाओँ की सम्पत्ति और ज़मीन हडपने का एक हथकँडा है! आँध्र प्रदेश के पिछ्डे इलाकोँ की ही तरह छत्तीसगढ के आदिवासी इलाकोँ मेँ भी डायन बता कर बेगुनाह महिलाओँ को मार दिये जाने की घटॅनाएँ आम हो चली थीँ! उस वक्त मै इटीवी मेँ था ! और हमने इसके खिलाफ एक मुहीम छेड दी थी! क्योँकि डायन हत्या की रोज आ रही रिपोर्टोँ ने हमेँ दँग कर दिय था! ज़मीन हडपने के लिये महिलओँ को डायन बता कर मारा जा रहा था! हमने इन खबरोँ को प्राथमिकता से दिखाया! और सरकार से वही सवाल पुछा कि आखिर छत्तीसगढ मेँ ये हो क्या रहा है? जिसका परिणाम ये हुआ कि रमन सरकार ने छत्तीसगढ विधानसभा मेँ डायन हत्या को रोकने के लिए बिल पेश किया! और ये बिल पास हुआ! इसके बाद छत्तीसगढ मेँ इटीवी किसी पहचान का मोहताज नहीँ रहा! यानि असली खबरोँ से टीआरपी आती है! कम से कम पत्रकारिता के अपने छोटे से अनुभव मेँ मैने तो यही सीखा है! ज़रुरत खबरोँ की भीड मेँ से असली खबरोँ को पहचानने की और उनहेँ खबर के रुप मेँ पेश करने की है!

Saturday, 5 September 2009

ये कैसा गुस्सा?

पुरे दिन तमाशा चलता रहा...! सारा देश इस तमाशे को देख रहा था! लेकिन सच बोलने का साहस किसी में नहीं था ! खबरिया चेनलो के रिपोर्टर उन्हें प्रदर्शनकारी कह रहे थे.... जो लोगो की गाडिया जला रहे थे ....! हिंडन नदी के डूब क्षेत्र में शुक्रवार को सिंचाई विभाग और प्रशासन ने एक मकान तोड़ दिया था। उसके विरोध में ही लोग शुक्रवार से उत्तेजित थे। शुक्रवार को भी इसके विरोध में एनएच-24 पर कई घंटे ट्रैफिक जाम रहा था। शनिवार को फिर से आए दस्ते को देखकर लोग भड़क गए। हिंडन नदी के आसपास बौद्ध विहार, तिगरी व छिजारसी इलाके के लोग विरोध में शामिल हो गए। पथराव में एक दर्जन से अधिक लोगों के अलावा आधा दर्जन पुलिसकर्मी भी घायल हो गए। गौरतलब है कि करीब 2 दशक पहले नैशनल हाइवे-24 से सटी कई एकड़ भूमि पर बौद्ध विहार तथा तिगरी क्षेत्र में अवैध रूप से कालोनियां काटी गई थीं। हिंडन नदी से सटी भूमि पर भी सैकड़ों प्लॉट काटकर मकान बनाए गए थे। हिंडन नदी के अंदर मुख्य धारा के आसपास 6-7 साल पहले मकान बनने शुरू हुए थे। वहां कई दर्जन मकान और क्रेसर प्लांट लगे हुए हैं। गत दिनों ग्रेटर नोएडा में आए प्रमुख सचिव ने सिंचाई विभाग को निर्देश दिया था कि वह हिंडन नदी की मुख्य धारा से 400 मीटर के दायरे में आने वाली भूमि को डूब क्षेत्र मानते हुए उनकी मार्किंग की प्रक्रिया शुरू करें। इस पर अमल करते हुए सिंचाई विभाग की टीम शुक्रवार सुबह वहां मार्किंग करने चली गई। इस दौरान विभाग की टीम ने वहां एक मकान पर बुलडोजर चला दिया। इस पर शुक्रवार शाम को स्थानीय लोगों में गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने नैशनल हाइवे पर जाम लगा दिया। बाद में जब प्रशासनिक अधिकारियों में मामले में हस्तक्षेप करने का आश्वासन दिया, तो लोग शांत हो गए। लेकिन, शनिवार की सुबह करीब 8 बजे मार्किंग के लिए टीम फिर वहां पहुंची तो उन्हें देखकर लोग भड़क उठे। जानकारी के मुताबिक स्थानीय लोग बड़ी संख्या में एडीएम सिटी से मिलने कलेक्ट्रेट पर पहुंच गए एवं घटनाक्रम से अवगत कराया। इस पर सिटी मैजिस्ट्रेट घटनास्थल जाने के लिए निकले। उधर, टीम को खदेड़ने के लिए लोगों ने पथराव शुरू कर दिया। पथराव की सूचना पर वहां गई पुलिस पर भी पथराव किया गया। पथराव में सीओ सदर आरके गौतम, इंस्पेक्टर योगेश पाठक, सब इंस्पेक्टर सिमरजीत समेत कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। इसके बाद गुस्साए लोगों ने फिर नैशनल हाइवे-24 के करीब 2 किलोमीटर हिस्से पर जाम लगा कर वाहनों में तोड़फोड़ शुरू कर दी। यह देखकर वाहनों में बैठे लोग जान बचाकर इधर-उधर भागने लगे। इस दौरान उपद्रवियों ने रोडवेज की विभिन्न रूटों की 4 बसों, 3 प्राइवेट बसों, एक सरकारी एंबेसडर, वैगन आर समेत एक दर्जन वाहनों को आग के हवाले कर दिया और दर्जन वाहनों को तोड़ डाला। इस दौरान छर्रे लगने से 2 स्थानीय लोग घायल हो गए। घटनास्थल पर डीएम आर. रमेश कुमार, एसएसपी अखिल कुमार समेत तमाम आला अधिकारी करीब पहुंचे। पुलिस ने क्रेन मंगवाकर क्षतिग्रस्त वाहनों को किनारे कराकर एक ओर से ट्रैफिक शुरू कराया। इस पुरे वाकये को सारा देश खबरिया चैनलों के ज़रिये दिन भर देखता रहा! धू-धू कर गाडिया जल रही थी ! हाइवे पर फसे लोग जान बचा कर भाग रहे थे...! सवाल ये है की ये लोग प्रदर्शनकारी थे या उपद्रवकारी?

Thursday, 6 August 2009

कौन करेगा पहल?

19 अगस्त, 1946 को जन्मे बिल क्लिंटन आठ वर्ष अमेरिका के राष्ट्रपति रहकर वर्ष 2000 में पद से हटे। उन्होंने राजनीति से विदा ले ली और बिल क्लिंटन फाउंडेशन बनाया। इस प्रतिष्ठान के द्वारा वे सक्रिय हैं और जन सेवा की अनेक परियोजनाएं विश्व के अनेक देशों में उनके प्रयास से चल रही हैं। सभी गैर-राजनीतिक हैं। टोनी ब्लेयर 2 मई,1997 को 44 वर्ष की आयु में प्रधानमंत्री बने तथा 27 जून, 2007 को बिना तीसरा कार्यकाल पूरा किए पद से हट गए। सुगबुगाहट तो दूसरा कार्यकाल पूरा करने पर ही उनके हट जाने की थी और तभी तय हो गया था कि तीसरी बार सरकार बनाकर कुछ समय बाद वे हटेंगे।
वे योजनानुसार हटे तथा सक्रिय राजनीति से दूर हो गए। भारत में यदि वह प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री रहे होते और हार जाते तो कतई पीछे नहीं हटते- कोशिश करते रहते कि संसद में आगे की पंक्ति पर बैठने की जगह का जुगाड़ कैसे हो? टोनी ब्लेयर ने ‘टोनी ब्लेयर फेथ फाउंडेशन’ की स्थापना की। आज विश्व में विभिन्न धर्मो, पंथों तथा संप्रदायों में समरसता तथा सहजता स्थापित करना कितना आवश्यक है, इसे दुहराने की आवश्यकता नहीं है। ब्रिटेन के सामने भी यह समस्या लगातार बढ़ रही है। पूर्व प्रधानमंत्री ने इसे समझा तथा अब वह स्कूलों, कॉलेजों तथा महाविद्यालयों में सर्वधर्म समभाव तथा सर्वधर्म समादर के सिद्धांतों को स्थापित करने के प्रयास में जुट गए हैं।
इस प्रतिष्ठान से विश्व के अनेक देशों में संस्थाएं जुड़ी हैं। यदि वे इस प्रयास में सफलतापूर्वक जुड़े रहे तथा कार्य में जुटे रहे तो संभव है लोग इस योगदान को उनके प्रधानमंत्रित्व काल के योगदान को भूलकर याद रखें! जॉर्ज बुश से 2004 में संदेहपूर्ण परिस्थितियों में राष्ट्रपति पद का चुनाव हारे अल गोरे के साथ ऐसा ही हुआ। वे राजनीति से हटे तथा वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिग, ओजोन परत इत्यादि समस्याओं के समाधान में पूरी तरह समर्पित हो गए। आज कौन याद करता है कि वह अमेरिका के उपराष्ट्रपति रहे थे? सभी उनके गैर राजनीतिक कार्य की सराहना करते हैं और जानते हैं कि उन्हें बाद के काम के लिए नोबेल पुरस्कार मिल चुका है।
इसी प्रकार जिमी कार्टर जब दूसरी बार राष्ट्रपति का चुनाव हारे तो राजनीति से बाहर चले गए, मगर हाथ पर हाथ धर कर नहीं बैठे। आज वे विश्व में शांति स्थापित करने के प्रयासों में दौरे करते हैं, सुदूर अफ्रीका में हजारों लोगों को उनके प्रयासों के कारण रहने को घर मिल जाते हैं। जॉन केनेथ गालब्रेथ, हेनरी किसिंजर राजनीति से हटकर विश्वविद्यालयों में लौट गए और वहां सक्रिय हुए। भारत में मोहन धारिया का नाम उभरता है, जो राजनीति से हटे पर पर्यावरण संरक्षण में योगदान के लिए सराहे जाते हैं। वह अपवाद है।
भारत में ऐसा क्यों संभव नहीं होता है? यहां जो पद पर जितने अधिक दिन रह सकता है, उसी अनुपात में उसकी बढ़ती ‘महानता’ प्रतिपादित की जाती है। ऊंचे पदों पर रहे लोग जब किसी दूसरे क्षेत्र में कार्य करने की घोषणा करने पर, तब जो संदेश जाएगा, वह भारतीय जनमानस में तुरंत अपनी स्वीकार्यता बना सकता है। प्रधानमंत्री पद स्वीकार न कर सोनिया गांधी ने जो स्थान भारतीय लोगों के मानस पटल पर पाया है, वह पद पर बैठकर पाना संभव नहीं था।
विरोधी पक्ष कुछ भी कहें राहुल गांधी का राजनीतिक कद इस तथ्य से बढ़ा है कि उन्होंने मंत्री पद स्वीकार नहीं किया। इस सबके बावजूद जब लालू जी तथा रामविलास पासवान लोकसभा में किस कुर्सी पर बैठे, पहली लाइन में कैसे बैठें या राज्यसभा में कैसे पहुंचें जैसे प्रश्नों में उलझ कर रह जाते हैं, तब लगता है कि इनकी नजर अन्य क्षेत्रों पर क्यों नहीं जाती है। यह राजनीति से संन्यास लेकर बिहार में बाढ़ प्रबंधन या दलितों की शिक्षा में भागीदारी जैसे कार्य हाथ में लेकर क्यों नहीं आते? करुणानिधि अपने परिवार को पूरी तरह सत्ता में लाना चाहते हैं, परंतु अपने वृद्ध व्याधिग्रसित शरीर को आराम देने को तैयार नहीं हैं। अपने दल के व्यक्ति विशेष को विभाग विशेष जिदपूर्वक दिलाकर उन्होंने प्रधानमंत्री के विशेषधिकार पर चोट की, जिसे सामान्य जन स्वीकार नहीं करता है। इस प्रकार के कृत्य से जनतंत्र की जड़ें हिलने लगती हैं।
राजनेताओं के बाद आज तो हर तरफ कारपोरेट सेक्टर की ही चर्चा है। हर तरफ वैश्वीकरण के प्रभाव, परिणाम, दुष्प्रभाव दिखाई देते हैं। भारतीय उद्योगपति अमीरों की सूचियों में स्थान पा रहे हैं। मंदी के बावजूद भारतीय उद्योगपति जीवंत हैं तथा धनार्जन में पूरी तरह संलिप्त हैं। कुछ पब्लिक स्कूल या डीम्ड विश्वविद्यालय भी चला रहे हैं। वे अपने घर परिवार में विशेष अवसरों पर 44 मंजलीय भवन, नई एअर लाइन या याट ‘गिफ्ट’ में दे देते हैं। ऐसे अवसर पर जमशेद जी टाटा की याद आना अनिवार्य है।
उन्हें भारत की चिंता थी। पानी के जहाज पर अमेरिका से लौटते समय उनका तथा स्वामी विवेकानंद का संवाद आंखें खोलने वाला है। उसी के परिणामस्वरूप बैंगलौर के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सांइसेज की स्थापना हुई। बाद में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की स्थापना हो सकी। क्या आप हमारे नए धन कुबेरों में से ऐसा कोई नाम गिना सकेंगे? सभी को जानकर खुशी होगी।
समाज के निर्माण तथा लोगों के जीवन स्तर को सुधारने का प्रयास केवल राजनीति, पद प्राप्ति तथा सरकार द्वारा ही नहीं किए जा सकते हैं। जो राजनीति कर चुके हैं, मान-सम्मान प्राप्त कर चुके हैं, वे यदि आगे आकर एक फावड़ा चलाएं तो हजारों हाथ उठ खड़े हो जाएंगे, लोग उन्हें कंधे पर बिठा लेंगे और ईमानदारी से परिवर्तन के प्रयास प्रारंभ हो जाएंगे। सरकार भी सुधरेगी- लोग सशक्त होंगे।

Wednesday, 29 July 2009

क्या देह के दम पर नारी पुरुषों को चुनौती दे रही है?

घुंघट के साथ नारी ने आज दुपट्टा भी उतर फेंका है! उसे दुपट्टा बेकार का झंझट लगाने लगा है! स्वतंत्रता की आड़ में नारी को नग्न कराने का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है! स्कूल, कालेज, चोराहे, बाजार, यहां तक कि मंदिर और पूजा स्थलों पर भी अब बड़ी संख्या में भड़काऊ और अर्ध नग्न कपडे पहने आधुनिक नारियों का देखा जाना आम हो गया है! ऐसे में सवाल ये है कि क्या आपका सर उस वक्त शर्म से झुक जाता है जब मन्दिर और पूजा स्थलों में अर्ध नग्न कपडे पहने या अंग प्रदर्शन करते लड़कियों को आप देखते हैं? क्या कोई नारी इस बात का जवाब दे सकती है कि आज हर जगह नारी अंग प्रदर्शन क्यों कर रही है? कहीं पुरुषों से प्रतिस्पर्धा में जितने के लिए नारी अपने शरीर को हथियार कि तरह तो इस्तेमाल नहीं कर रही है? और ऐसा है? तो क्या नारी सही कर रही है? क्या Deh के dam पर नारी पुरुषों को chunauti दे रही है?

Saturday, 25 July 2009

वह कश्मीर से अपने जले घर की लकड़ी के टुकड़े लेकर आया


राजेंद्र तिवारी
Editor, Bhaskar websites

कश्मीर हम सबके लिए बहुत भावनात्मक मसला है। कश्मीर की बात चलती है तो हम इतना भावुक हो उठते हैं कि बाकी सब भूल जाते हैं। इतने गहन भावनात्मक जुड़ाव वाले मसले पर सब लोग अपने-अपने अनुभव, कहानियां और विचार शेयर करें तो सभी पक्षों के साथ एक संपूर्ण तस्वीर सामने आएगी हम सबके दिल-दिमाग में बसे कश्मीर की। जम्मू-कश्मीर के हर चप्पे में मार्मिक कहानियां सांस ले रही हैं। हर कोई इन कहानियों का मर्म अपनी सोच-धारणा के हिसाब से निकाल सकता है। मुझे एक सच्ची कहानी याद आ रही है एक कश्मीरी पंडित बच्चे की जो कश्मीर से विस्थापित माता-पिता के साथ जम्मू में रहता था। उसके मां-बाप 1990-91 में कश्मीर से भागकर जम्मू आए थे। यह बच्चा उस समय मां की गोद में था। पिता उसे अनंतनाग स्थिति अपने मकान और खेतों के बारे में लगातार बताते रहते थे। बच्चा धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था। अपने पिता के बचपन, दक्षिणी कश्मीर खासतौर पर अनंतनाग जिले का विवरण उसे आकर्षित करता था। जब वह 10 साल का हुआ तबसे उसने अनंतनाग जिले के अपने मकान को देखने की जिद शुरू की। पिता उसे किसी न किसी बहाने टालते रहते थे। वह बच्चा अपने मां-पिता और रिश्तेदारों से अपने मूल स्थान (दक्षिणी कश्मीर) से जुड़े किस्से सुनते-सुनते 7वीं कक्षा में गया। वह अपनी जमीन छूना चाहता था, अपने मकान को देखना चाहता था, वहां के चश्मों के पानी से खेलना चाहता था। कच्चे अखरोट से अपने हाथों पर कलाकारी करना चाहता था (कच्चा अखरोट घिसने पर लाल रंग छोड़ता है और यदि आप उसे हाथ पर घिसें तो लगता है जैसे मेंहदी लगा ली हो)। धीरे-धीरे उसका धैर्य जवाब देने लगा या यह कहें कि जन्मभूमि का आकर्षण धैर्य पर भारी पड़ना शुरू हो गया। एक दिन वह रोजाना की तरह घर से स्कूल के लिए निकला। जेब में अपनी बचत के सारे पैसे (करीब 250 रु.) लेकर। उसने तय कर लिया था कि आज वह अपने पुश्तैनी घर जाएगा जरूर। काफी देर तक वह जम्मू के बसअड्डे पर बैठा रहा। करीब 11 बजे उसने अपना इरादा और हिम्मत और पक्की की, बैठ गया अनंतनाग जाने वाली बस में। बस्ता साथ में था और उसमें लंच बाक्स। उसने पता कर लिया था कि अनंतनाग से कहां की बस पकड़नी होगी। शाम को बस अनंतनाग पहुंची। वहां से उसने अपने गांव जाने वाली बस पकड़ ली। आखिरी बस थी सो 15-20 यात्री ही उसमें थे। उधर, जम्मू में जब बच्चा शाम को घर नहीं पहुंचा तो माता-पिता चिंतित हुए। स्कूल से पता किया तो पता चला कि वह बच्चा तो आज स्कूल ही नहीं गया। पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई। फिर मां-बाप ने सोचा, अखबारों में इश्तहार भी दें दें। तो वे हमारे अखबार के दफ्तर भी आए। वहां गांव वाली बस में एक व्यक्ति ने उस अकेले बच्चे को देखा तो उत्सुकतावश पूछ लिया कहां जाना है। बच्चे ने गांव का नाम बताया। उस व्यक्ति को बच्चे की शक्ल अपने उस पड़ोसी से मिलती-जुलती लगी जो 1991 में गांव छोड़कर चले गए थे। व्यक्ति ने बच्चे से पिता का नाम पूछा तो कनफर्म हो गया कि उन्हीं का बच्चा है। उस व्यक्ति ने पूछा बेटा अकेले क्यों आए। तो बच्चे ने वजह बता दी। वह व्यक्ति बच्चे को अपने साथ ले गया अपने घर। सुबह उसने जम्मू फोन करके बताया कि बच्चा उनके पास घर में है, वे चिंता न करें और यहां आकर बच्चे को ले जाएं। बच्चा जब लौटकर जम्मू आया तो अपने साथ लाया था अपने जले घर में बच गई लकड़ी के टुकड़े, थोड़ी सी मिट्टी और कुछ अखरोट !

Wednesday, 22 July 2009

कलाम की तलाशी पर संसद में हंगामा

दिल्ली हवाई अड्डे पर भारत के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की तलाशी का मामला तूल पकड़ता जा रहा है. सरकार ने इस मामले में अमरीकी एयरलाइन कंपनी को नोटिस जारी किया है.
संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में कई दलों के नेताओं ने यह मामला उठाया और सरकार से कॉंटिनेंटल एयरलाइंस का लाइसेंस रद्द करने की माँग की.
सदस्यों ने कहा कि इस तरह की लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और इस कंपनी को भारत में विमान सेवा देने की इजाज़त नहीं मिलनी चाहिए.
प्रोटोकॉल के हिसाब से देश के पूर्व राष्ट्रपति होने के नाते एपीजे अब्दुल कलाम भारत के उन अहम शख़्शियतों में शामिल हैं जिन्हें इस तरह की तलाशी से अलग रखा गया है.
ये मामला 24 अप्रैल का है जब अब्दुल कलाम कॉंटिनेंटल एयरलाइंस के विमान से दिल्ली से अमरीकी शहर नेवार्क जा रहे थे.
सदस्यों का कहना था कि अब्दुल कलाम एक आम भारतीय नागरिक नहीं बल्कि देश के पूर्व राष्ट्रपति हैं और उनका अपमान एक तरह से भारत का अपमान है।
कुछ साल पहले अमरीकी हवाई अड्डे पर तत्कालनी रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडिस की तलाशी का मुद्दा उठा था. पिछले लोकसभा के अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने भी हवाई अड्डे पर तलाशी का विरोध करते हुए ऑस्ट्रेलिया का दौरा रद्द कर दिया था.

नारी ब्लाग के लिए खुश खबर...!

कौमार्य परीक्षण मामला : मप्र सरकार को नोटिस जारी
महिला आयोग ने शहडोल में कन्याओं के हुए कथित कौमार्य परीक्षण मामलें में जांच के बाद राज्य की मध्यप्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है। सामूहिक विवाह समारोह से पहले लड़कियों का जबर्दस्ती कौमार्य परीक्षण कराने का मामलें ने तूल पकड़ लिया था। महिला आयोग ने इस पूरे मामलें में केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट भेज दी है। महिला आयोग ने इस पूरे मामलें को महिलाओं की अस्मिता के साथ खिलवाड़ बताया है और मानव अधिकारों को लेकर गंभीर मामला बताया है।

आग से घिरा है भारत !

पाकिस्तान में जो स्थिति है, उसे अशांति कहना सचाई से आंख मूंदना है। पाकिस्तान में आज सत्ता का कोई एक निश्चित केंद्र नहीं रह गया है। न चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बने आसिफ अली जरदारी, न उनसे चुनाव हारने के बाद भी पाकिस्तानी राजनीति में खासी जगह रखने वाले नवाज शरीफ और न वह फौज ही, जो ऐसे हर मौके पर सत्ता हथिया लेने का खेल खेलती आई है। जब इन तीनों की ऐसी हालत है, तो पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ की तो बिसात ही क्या है, जो हर तरह से एक पिटे मोहरे भर रह गए हैं। पाकिस्तान की ऐसी हालत क्यों हुई है? जवाब पिछले दिनों राष्ट्रपति जरदारी ने खुद ही दिया है कि हमने छोटे क्षुद्र राजनीतिक लाभों के लिए आतंकवाद को जन्म दिया और आतंकवादियों को पाला-पोसा। पाकिस्तान अपने जन्म से ही एक अनाथ राष्ट्र रहा है, जिसे किसी ने भी स्थिर राजनीतिक-सामाजिक ढांचा देने की कोशिश नहीं की। जिन्ना कुछ दिन जीवित रहते तो शायद ऐसा कर पाते। उनके बाद तो राजनीतिज्ञों, फौजियों और मुल्लाओं की मनमानी ही पाकिस्तान की किस्मत बनाती-बिगाड़ती रही है। इसलिए आज एक राष्ट्र के रूप में वह अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। वह अपनी पूर्व-पश्चिम सीमा पर तालिबानियों के खिलाफ जो कार्रवाई कर रहा है, वह भले ही आतंकवाद के खिलाफ लग रही हो, लेकिन है वह खुद को बचाने की अंतिम कोशिश ही। उसमें उसे जितनी सफलता मिली है और जितनी मिलेगी, वह इसलिए कि वह अमेरिकी दबाव में, अमेरिका के साथ मिलकर की जा रही कार्रवाई है। उसके पीछे पाकिस्तानी समाज और फौज की दिली रजामंदी नहीं है। यही कारण है कि वह हमारी तरफ की सीमा पर की जा रही आतंकी कार्रवाइयों के बारे में न कुछ कर रहा है और न कुछ कह रहा है। बहुत संभव है कि यह सारी कसरत लिफाफा बदलने तक सीमित रह जाए।
और स्टोरीज़ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करे बांग्लादेश के भीतरी हालत का अंदाजा बांग्लादेश राइफल्स की हाल की बगावत से लगाया जा सकता है। वह किसी ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा मुल्क है। शेख हसीना अपनी कुर्सी पर भले ही हैं, देश की नब्ज उनके हाथ में नहीं है। हमारे पूर्वांचल के उल्फा आतंकी वहां पनाह लिए हुए हैं और भारत के प्रति एक खास किस्म की नफरत को हवा देते रहते हैं। नेपाल में अभी कौन सा तंत्र है, कहना कठिन है। माओवादियों के लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होने से जो बड़ी संभावना पैदा हुई थी, वह बिखर चुकी है और वैकल्पिक सरकार के पास और जो कुछ भी हो, राष्ट्रीय स्वीकृति नहीं है। दूसरी तरफ सत्ता का स्वाद चख लेने के बाद प्रचंड व उनके लोगों के लिए भी पुरानी तरह की लड़ाई लड़ना संभव नहीं रह गया है। माओवादियों का वह पूरा राजनीतिक ढांचा एक ऐसा बम बन गया है जिसका पलीता खो गया है। इसलिए नेपाल में आज राजनीतिक जोड़तोड़ का दिशाहीन खेल चल रहा है। राष्ट्रीय विकास की जो थोड़ी-बहुत परियोजनाएं शुरू हुई थीं, वे सब भी ठिठक गई हैं। दूसरी तरफ नेपाल को चीन की तरफ ले जाने की (या चीन के नेपाल के भीतर आने की) स्थिति भी बनाई जा रही है। इनका मुकाबला करने के लिए भारत नेपाल के अंदरूनी मामलों में जिस तरह हस्तक्षेप करता रहा है, वह आज की स्थिति में अच्छी राजनयिक पहल का उदाहरण नहीं है और उसके नकारात्मक परिणाम आ रहे हैं। हमारे नीचे का श्रीलंका तमिल टाइगर्स को हराकर जीता है या किसी अंधेरी गुफा में प्रवेश कर गया है, यह समय ही बताएगा। प्रभाकरन जैसों का सफाया कर देने के बाद जो सबसे बड़ी चुनौती है श्रीलंका के सामने, वह तमिल और सिंहली आबादी को यह अहसास कराने की है कि वे एक ही देश के नागरिक हैं। सरकारी खजाने की चमक और राजनीतिक चालबाजियों से जख्मजदा लोगों का विश्वास नहीं जीता जा सकता है, यह हमने देखा है। ऐसे पड़ोसियों से घिरे हम क्या इस सचाई को समझ पा रहे हैं कि दुनिया बदलती जा रही है? पड़ोसी होने, बड़ा होने, शक्तिशाली व समर्थ होने आदि के मतलब भी बदलते जा रहे हैं। छोटे से छोटे मुल्कों में अपनी गैरत का बोध बढ़ा है और उनके सामने विकल्प भी ज्यादा खुल गए हैं। अफगानिस्तान और इराक ने अमेरिका को जिस चक्रव्यूह में फंसा दिया है, वह भी हमें सावधान कर रहा है कि पड़ोसियों के साथ बराबरी के स्तर पर आकर व्यवहार करना होगा। उनका कोई भी संकट हमारे लिए अपनी रोटी सेंकने का अवसर नहीं है। अपनी विश्वसनीयता ऐसी बननी चाहिए कि हम उनकी जनाकांक्षा को समझते हैं, उसका सम्मान करते हैं और उसे पूरा करने में मददगार भी हैं। यह कोरी कूटनीतिक पहल नहीं होगी, इसे नागरिक स्तर पर भी अभिव्यक्त होना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी। अगर हम जी 8 के साथ बैठने लगे हैं, तो वहां का अजेंडा इन छोटे और आकार लेने में लगे राष्ट्रों के पक्ष में बदलना चाहिए। दैत्याकार अर्थव्यवस्थाओं के संकट का रोना रोने में भारत भी शामिल हो जाए, तो यह हमारे राष्ट्रीय हित के खिलाफ है। हमें जवाहरलाल नेहरू की उस ऐतिहासिक समझ को आगे बढ़ाना होगा, जिसमें उन्होंने एशियाई मामलों से महाशक्तियों को दूर रखने की अथक कोशिश की थी। इसलिए चीन की तरफ दरवाजा खोलने की पहल भी उन्होंने की थी, वह कोशिश विफल हुई, लेकिन निरर्थक नहीं हुई है। वैश्विकरण की आज की आंधी में यह और भी जरूरी हो गया है कि हम अपना विश्व तय करें और उसे पुख्ता करें, और जब हम ऐसा करना चाहेंगे, तब हमें यह सचाई पहचाननी व स्वीकारनी होगी कि कोई भी दुनिया अपने पड़ोस से ही शुरू होती है। पड़ोसी ही है जो हमारे सबसे पास होता है और सबसे पहले पहुंचता है। वह कैसा है, यह हमें समझना ही चाहिए, लेकिन वह हमारे अनुकूल कैसे बने, इसकी सावधान कोशिश भी हर स्तर पर करनी चाहिए। आज की दुनिया में सबसे मजबूत, सुरक्षित और संपन्न देश वह है, जो अपने अनुकूल पड़ोसियों के साथ जीता है। भारत की विदेश नीति में सदाशयता जितनी बढ़ेगी, वह पड़ोसियों को साथ व पास लाने में उतना ही समर्थ होगा।

करोगे सच का सामना ?

कहते हैं रिश्ते ऊपर वाला तय करता है। किसको किससे मिलना है, किसके साथ रहना है, किसके साथ जाना है, सब कुछ 'लकीरों' में छिपा रहता है। पर, कुछ रिश्ते यहां भी बनते हैं, जिसे इंसान खुद बनाता है, इट मींस फिजिकल रिलेशन। रिश्तों को लेकर हमेशा से ही बहस होती रही है। कभी इसकी पहचान को लेकर, कभी इसकी सच्चाई को लेकर, तो कभी इसकी अहमियत को लेकर। होमोसेक्सुअल के बारे में किया जा रहा हो-हल्ला थमा भी नहीं था कि एक रियलिटी शो में फिजिकल रिलेशन सहित कई पर्सनल क्वेश्चंस अचानक से चर्चा का केंद्र बन गये। बीती जिंदगी के कई ऐसे सच, जिसे लोग भूलना चाहते हैं या भुलाने की कोशिश करते हैं, उसके बारे में पॉलीग्राफी मशीन के सामने सच उगलवाना कितना सच है। हालांकि सामाजिक ताने-बाने को कुरेदती-झकझोरती यह पहेली स्टार्टिग से ही इतनी पॉपुलर हो गई है कि समाजशास्त्रियों व मनोवैज्ञानिकों को बहस का फिर से एक बहाना मिल गया। हम न तो रियलिटी शो की बुराई कर रहे और न ही उसके पार्टिसिपेंट्स की, पर लाइफ की सच्चाई जानने का ऐसा प्लेटफार्म हमारी सोसायटी को हजम नहीं हो रहा। हम बात कर रहे हैं स्टार प्लस पर 15 जुलाई से मंडे टू फ्राइडे रात 10.30 बजे दिखाए जाने वाले रियलिटी शो 'सच का सामना' की। देश के कॉमन व सेलिब्रेटीज के लिए तैयार किये गए इस शो में पार्टिसिपेंट्स अपनों के बीच स्क्रीन पर देख रहे लाखों लोगों के सामने जिंदगी की सच्चाई की अग्निपरीक्षा देते हैं। शो में पार्टिसिपेंट्स से उनकी लाइफ के पर्सनल व इम्बरैसिंग सवाल पूछे जाते हैं, जिनके आंसर देकर वे एक ही दिन में करोड़पति बन सकते हैं।
इस शो को होस्ट कर रहे हैं राजीव खंडेलवाल। यह इंटरनेशनल रियलिटी गेम मोमेंट ऑफ ट्रूथ का रीमेक है, जिसे 23 देशों में मिली पॉपुलरिटी के बाद इंडियंस को देखने का मौका मिला है। इस साइकोलॉजिकल गेम में पार्टिसिपेंट्स से उनकी निजी जिंदगी से रिलेटेड सवाल पूछे जाते हैं, जो उन्होंने इससे पहले शायद किसी से शेयर किया हो। कितना सच, सच्चाई का सामना। यहां सवाल यह है कि कितना सच है सच का सामना करने वाला यह रियलिटी शो। फॉरेनर की तरह इंडियंस भी अब रियलिटी शोज के दीवने हो गये हैं, यह तो हर कोई जानता है। अब राखी के स्वयंवर को ही लीजिए, आइटम गर्ल राखी किससे शादी करेगी, कैसे करेगी, ये तो आने वाला वक्त बताएगा, पर इंडियन सोसायटी के लिए यह शो किसी नाटक से कम नहीं है। डॉक्टर सुभाषचंद्र झा कहते हैं कि इस तरह के रियलिटी शोज बस एक नाटक है। सच का सामना भी राखी के स्वयंवर की तरह नौटंकी ही है। सच्चाई की बात तो छोड़िए, जो चीज समाज में पर्दे के अंदर हो रहा है, उसे सबके सामने लाया जा रहा है, यह कहीं से भी जायज नहीं है। मेरी मानें तो सेंसर बोर्ड को इस शो पर बैन लगा देना चाहिए।
सवालों से इमोशनल अत्याचार
शो के पहले एपिसोड की पार्टिसिपेंट्स स्मिता मताई से कई बेतुके सवाल पूछे गए। दो बच्चों की मां स्मिता मुंबई में पति टोनी के साथ रहती हैं। वे वहां एक टिफिन ढाबा चलाती हैं। शो के दौरान उनसे मां के साथ उनके रिलेशन पर सवाल पूछे गए, जिससे वे इमोशनल हो गई थीं। उनसे पूछा गया कि पति अल्कोहलिक थे, जिससे आपकी मैरिज लाइफ अफेक्टेड हुई थी। इस दौरान आपके दिल में कभी भी उन्हें जान से मारने का ख्याल आया था। वहीं, दूसरे एपिसोड में यंग दिल वाले 64 वर्षीय लखनऊ के युसूफ हुसैन से कई पर्सनल सवाल पूछे गए। सच का सामना करते वक्त उनके साथ उनकी बेटी सफीना, गर्लफ्रेंड जेसबेल, पहली तीन पत्‍ि‌नयों में से एक कंचन, छोटे भाई हबीब और सन इन लॉ हंसल थे। ट्रेवल एजेंसी के मालिक और उर्दू पोएट युसूफ जो आर्ट, लिटरेचर और महिलाओं के दीवाने हैं, से पूछा गया कि आपको अब भी ड्रीम गर्ल का इंतजार है। आपका अपनी बेटी से कम उम्र की किसी लड़की के साथ फिजिकल रिलेशन रहा है? अब इस तरह के सवाल पूछने का क्या मतलब। क्रिश्चियन माइनॉरिटी एजुकेशनल सोसायटी के सेक्रेटरी व संत डोमिनिक सेवियोज हाई स्कूल के प्रिंसिपल ग्लेन जोसफ गॉल्स्टन का कहना है कि इस शो में लोग अपने मन से आते हैं, उन्हें प्रेशर नहीं दिया जाता। फिर भी, हर किसी की पर्सनल लाइफ होती है और उसमें औरों को नहीं झांकना चाहिए। वेल, एंटरटेनमेंट के लिए जब तक कुछ डिफरेंट नहीं होगा, व्यूअर्स अट्रैक्ट कैसे होंगे, इसीलिए टीवी चैनलों में ऐसा मसाला परोसा जा रहा है।
इस संबंध में क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. बिंदा सिंह का कहना है कि रुपए-पैसों के लिए आदमी किसी भी हद तक जा सकता है। यह सच और झूठ के नाम पर सिर्फ कंप्यूजन पैदा करता है, जिसका सीधा असर बच्चों पर पड़ेगा। आज भी हमारी सोसायटी में इतना खुलापन नहीं आया है, लेकिन रियलिटी शो में इस तरह के खुलेपन की आड़ में एक गंदा मजाक पेश किया जा रहा है। वहीं डॉ सुधा सिन्हा का कहना है कि इस तरह के शोज से फैमिली पर बैड अफेक्ट पड़ेगा। सब जानते हैं कि एक-एक फैमिली मिलकर ही समाज बनता है। ऐसे शोज से हमारी सोसायटी में बिखराव आएगा।

Thursday, 16 July 2009

शोपिया का सच

29 मई को 17 साल की आसिया जान अपनी 24 वर्षीय गर्भवती भाभी नीलोफर के साथ बगीचे में गई थीं। उनके वहां से नहीं लौटने पर घर वालों ने तलाश की और मायूस होकर पुलिस के पास गए। पुलिस ने शुरू में इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया। नाले से दोनों की लाश बरामद होने के बाद नागरिकों में गुस्सा फैलने लगा। लोग कहते रहे कि दोनों की इज्जत लूटी गई है, लेकिन पुलिस टस से मस नहीं हुई और 1 जून को मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से कहलवा दिया कि दोनों की मौत डूबने से हुई है। 6 जून को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रदेश कांग्रेस के नेता सैफुद्दीन सोज को बुलाकर बात की। सोज के श्रीनगर लौटने के बाद रेप का केस दर्ज हुआ। लेकिन इस बीच बहुत नुकसान हो चुका था। श्रीनगर के भारतविरोधी प्रेस और मुजफ्फराबाद के मीडिया ने पूरे मामले को इस तरह पेश किया मानो कश्मीर में सुरक्षा बल औरतों की इज्जत पर हाथ डालने के लिए आजाद हैं। इसके बाद जले पर नमक डालने का काम किया जस्टिस जान कमिशन की रिपोर्ट ने, जिसे कश्मीर के वित्त मंत्री अब्दुल रहीम ने एक ऐतिहासिक दस्तावेज बना डाला। रिपोर्ट में आसिया और नीलोफर को इशारे से बदचलन बताते हुए आसिया के भाई शकील पर अनैतिक आचरण का आरोप लगा दिया गया, जिसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि फ्लेश ट्रेड में शामिल किसी व्यक्ति की हत्या हो जाए तो मामले को रफा-दफा कर दिया जाना चाहिए और न्याय का कोई तकाजा नहीं बनता। जिस जस्टिस जान के दस्तखत से रिपोर्ट पेश की गई, वह अब कह रहे हैं कि ये अंश पुलिस रिपोर्ट के हैं, जिसे मुख्य रिपोर्ट में उन्होंने शामिल नहीं किया था। जस्टिस जान यह भी कह रहे हैं कि पुलिस ने अलग से 60 गवाहों के बयान लिए थे, जिनके आधार पर उसने रिपोर्ट पेश की, जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया था। लेकिन शोपियां के एसपी का कहना है कि सभी गवाहों के बयान एक साथ लिए गए। जाहिर है, जस्टिस जान और एसपी, दोनों का कथन सही नहीं हो सकता। शोपियां के लोगों और जस्टिस जान के मुताबिक, कई महत्वपूर्ण सबूत नष्ट कर दिए गए। आसिया और नीलोफर के संबंधियों का यह भी आरोप है कि शोपियां के एसपी जावेद इकबाल मट्टू ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को प्रभावित करने की कोशिश की। लोग जान कमिशन की रिपोर्ट पर यकीन नहीं कर रहे, इसलिए उसे अब दाखिल दफ्तर करने का कोई विकल्प नहीं है। बहुत से सबूत नष्ट कर दिए गए हैं, फिर भी कुछ सवालों के सही जवाब मिल जाएं तो इंसाफ का तकाजा काफी हद तक पूरा हो सकता है। आसानी से पता लगाया जा सकता है कि पहले दिन से सचाई पर पर्दा कौन डाल रहा था और मुख्यमंत्री के मुंह से गलतबयानी कराने का वास्तव में जिम्मेदार कौन है। यह जानकारी भी जुटाना कठिन नहीं है कि आसिया और नीलोफर के चरित्र पर उंगली किन पुलिसकर्मियों ने उठाई। गांव की अनपढ़ दाइयां भी शरीर देखकर बता सकती हैं कि फलां महिला की इज्जत लूटी गई या नहीं। इस बात की भी पुष्टि हो सकती है कि एसपी मट्टू पोस्टमॉर्टम रूम में गए थे या नहीं। पहला पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टरों ने पूरे यकीन से कैसे कह दिया कि रेप नहीं हुआ? जब कि जिस एक डॉक्टर निकहत ने रेप की पुष्टि की, उन्हें निलंबित कर दिया गया। निलंबन किसके कहने से हुआ? स्पष्ट है, निलंबन के पीछे जो अधिकारी हैं वे भी सचाई छिपाना चाहते थे। परिस्थितियां बता रही हैं कि आसिया और नीलोफर के साथ जो हुआ, वह अपराध की साधारण घटना नहीं है। हो सकता है कि इसके पीछे गहरी साजिश हो। यह भी संभव है कि सरकारी एजेंसियों से जुड़े कुछ लोगों का किसी षडयंत्र के तहत हाथ हो। कश्मीर में आग भड़काते रहने के लिए इसी तरह के हादसे तो सबसे ज्यादा मददगार होते हैं। इसलिए कुछ अफसरों का तबादला पर्याप्त नहीं है। सख्ती से जवाबदेही तय की जानी चाहिए। कश्मीर जैसे अति संवेदनशील इलाके में हुई इस घटना ने पूरे देश को बुरी तरह नहीं झकझोरा है। जिस देश की संसद में कोई मंत्री यह कहकर बाइज्जत निकल जाए कि दंगों में गर्भवती महिलाओं के साथ रेप और हत्या जैसी घटनाएं तो होती ही रहती हैं, वहां शोपियां की त्रासदी से ज्यादा विचलित होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। लेकिन सवाल यह है कि आप किस तरीके से कश्मीर को भारत के साथ रखना चाहते हैं? विधि की सामान्य प्रक्रिया से संबंध विच्छेद कर या पुलिस स्टेट बनाकर तो कतई नहीं। शोपियां के लोगों को सलाम कि भारतीय व्यवस्था से न्याय की आशा उन्होंने नहीं छोड़ी है। शोपियां में आंदोलन चला रही मजलिस-ए-मुशावरत ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है। हाई कोर्ट बार असोसिएशन के अध्यक्ष मियां अब्दुल कयूम और विधि विशेषज्ञ सैयद तसद्दुक हुसैन सीबीआई जांच चाहते हैं। उनकी मायूसी के नतीजे अच्छे नहीं होंगे। मुशावरत ने चेतावनी भी दे दी है कि इंसाफ के लिए वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय तक जाएगी। दुनिया के मुस्लिम मुद्दों पर विचार के लिए अमेरिकी प्रशासन की विशेष दूत फारहा पंडित से संपर्क करने की आवाजें उठने लगी हैं। हमें पाकिस्तान की तरफ से कश्मीर समस्या के नए सिरे से अंतरराष्ट्रीयकरण की चिंता सताती रहती है। हमारे लिए उससे अधिक चिंताजनक आसिया और नीलोफर केस का अंतरराष्ट्रीयकरण होना चाहिए। किसी भी फौजी तैयारी से हजार गुना ज्यादा असरदार कश्मीरी अवाम का यह यकीन होगा कि भारत का निजाम नाइंसाफी नहीं होने देगा। शोपियां का हादसा एक केस स्टडी है कि हम राष्ट्र राज्य की जड़ों को किस तरह मजबूत करना चाहते हैं। न्याय और अन्याय का अहसास तय करेगा कि रूस के चेचेन्या और चीन के उइगुर सूबे से कश्मीर क्यों और किस तरह भिन्न और भारत का अभिन्न अंग है।

Wednesday, 15 July 2009

क्या नारी भी पुरूष का इस्तेमाल करती है?

नारी ब्लॉग को नाराज कराने की मेरी मंशा नही

Thursday, 21 May 2009

सत्ता की मलाई के लिए मारामारी

चौतरफा समर्थन से उत्साहित नजर आ रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कड़े रुख के कारण कैबिनेट में ज्यादा मंत्रिपद की मांग पर अड़े यूपीए के प्रमुख सहयोगी डीएमके की दाल नहीं गल पाई। आखिरकार उसने सरकार से बाहर रह कर समर्थन देने का फैसला किया है। मंत्रिपद की जद्दोजहद में कड़ा रुख अपनाते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पहले के साढ़े छह सांसद पर एक कैबिनेट मंत्री के फामरूले को सख्त बनाते हुए संदेश भिजवा दिया कि दस सांसदों पर एक कैबिनेट मंत्री बनाया जाएगा। मनमोहन शुक्रवार शाम 6:30 बजे प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे।
नाराज हुआ डीएमके
इस फामरूले से डीएमके ने नाराजगी जताते हुए बातचीत समाप्त कर दी और कहा कि वह सरकार का बाहर से समर्थन करेगा। डीएमके रेल मंत्रालय, भूतल परिवहन मंत्रालय, आई टी जैसे अहम मंत्रालय मांग रहा था। लेकिन कांग्रेस रेल, भूतल परिवहन मंत्रालय देने को राजी नहीं हुई।
मनाने की कोशिश
देर रात तक चली डीएमके को मनाने की कोशिश में दो कैबिनेट मंत्री, एक स्वतंत्र प्रभार और चार राज्य मंत्री देने का फामरूला सामने आया। लेकिन डीएमके ने अझागिरी, कोनीमोझी, दयानिधि मारन के साथ टी आर बालू और ए राजा को भी कैबिनेट मंत्री बनाने की मांग रख दी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी, गुलाम नबी आजाद, अहमद पटेल जैसे नेता डीएमको को मनाने में कामयाब नहीं हुए। करुणानिधि ने कहा है कि चेन्नई में पार्टी कार्यसमिति की बैठक में भावी रणनीति तय की जाएगी। एजेंसी के मुताबिक कांग्रेस ने कहा है कि बातचीत अभी जारी है। डीएमके पिछली सरकार की तरह सीट और विभाग मांग रहा है जो उसे स्वीकार नहीं है।
ममता राजी, मिलेगी रेल
मनमोहन के नए फामरूले के तहत ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को एक कैबिनेट मंत्रालय दिया जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस के कोटे से पांच राज्य मंत्री भी बनाए जा सकते हैं। पहले ममता डीएमके से एक ज्यादा मंत्री की मांग पर अड़ गई थीं, पर बाद में वह मान गईं।
क्यों मानी ममता?
तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी एक कैबिनेट व पांच राज्यमंत्रियों के फामरूले पर राजी।
कारण
पश्चिम बंगाल में दो साल बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। ममता को यदि मुख्यमंत्री बनना है तो यह कांग्रेस के समर्थन से ही संभव। उद्योगों के खिलाफ होने की छवि से मुक्त होने के लिए उदार आर्थिक नीतियों वाली कांग्रेस के साथ की जरूरत। तृणमूल को पश्चिम बंगाल में एकतरफा जीत हासिल नहीं हुई है। इसलिए वाम मोर्चे पर अभी से दबाव बनाने के लिए सत्ता और साथ की जरूरत।
एनसीपी नाखुश
एनसीपी कोटे के मंत्रालयों पर भी लगातार बातचीत चलती रही। सूत्रों के मुताबिक शरद पवार को केवल कृषि मंत्रालय देने की बात पर एनसीपी खेमा खुश नजर नहीं आया। प्रफुल्ल पटेल के मंत्रालय को लेकर भी असमंजस बना रहा। कांग्रेस नागरिक उड्डयन मंत्रालय अपने पास रखने की इच्छुक है।
अब्दुल्ला भी नाराज
तय फामरूले के तहत नेशनल कान्फ्रेंस के फारुक अब्दुल्ला को भी कैबिनेट में जगह नहीं मिलने की चर्चा चलती रही। इसके कारण जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला नाराज बताए जा रहे हैं। वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के मुताबिक राजद के लालू यादव के नाम पर कोई विचार नहीं हुआ है। झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन को भी कोई जिम्मेदारी न मिलने के संकेत हैं।
हो सकते हैं पंजाब से दो मंत्री
पंजाब से अब एक के बदले दो सांसदों को मंत्रिमंडल में स्थान मिल सकता है। चंडीगढ़ से लगातार जीत हासिल करने वाले पवन बंसल को इस बार कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिल सकता है। उनके अलावा मंत्रिमंडल में पटियाला से चुनी र्गई पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की पत्नी परनीत कौर और जालंधर से सांसद व पंजाब कांग्रेस के प्रधान मोहिंदर सिंह केपी को शामिल किया जा सकता है। कांग्रेस के अलग-अलग खेमों ने अपने समर्थकों को मंत्री बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया है।
क्या होगा सुशील कुमार शिंदे का?
दलित नेता सुशील कुमार शिंदे कैबिनेट का हिस्सा होंगे या नहीं? इस बात को लेकर महाराष्ट्र में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कांग्रेस का एक बड़ा तबका उन्हें लोकसभा का स्पीकर बनाने पर तुला है, परंतु महाराष्ट्र के कांग्रेस के कुछ नेताओं का मानना है कि ऐसा करना पार्टी के लिए आत्मघाती कदम साबित हो सकता है।
क्या मलाई है इन मंत्रालयों में?
बड़े बजट वाले मंत्रालयों में आर्थिक लाभ का ‘स्कोप’ तो है ही जनाधार बढ़ाने की राजनीतिक मलाई भी है।
रेल : बड़े बजट के साथ बड़ी संख्या में नौकरियां। आम जीवन से लेकर उद्योग जगत तक से व्यापक संपर्क।
दूरसंचार : तेजी से बढ़ता मंत्रालय । करोड़ों के नए प्रोजेक्ट। ऑपरेटरों को स्पेक्ट्रम वितरण और टेलीफोन लाइनों के विस्तार में पैसे का बड़ा खेल।
ग्रामीण विकास : नरेगा जैसी फ्लैगशिप योजना। ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार देने में अव्वल। जनता को सीधे प्रभावित करने का मौका।
स्वास्थ्य : ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन। छह नए एम्स बनाने का प्रस्ताव। शहरी स्वास्थ्य मिशन को लाने की योजना। जनता पर सीधा असर।
सड़क परिवहन : करोड़ों की सड़क परियोजनाएं। काम का जनता पर सीधा असर।

Monday, 18 May 2009

लेफ्ट नही राइट चलो!


योगेश गुलाटी ........

वामपंथ की ऐतिहासिक भूलों का सिलसिला थम नहीं रहा है। 1996 की बात है, प्रकाश करात के नेतृत्व में सीपीएम का पोलित ब्यूरो ज्योति बसु को भारत का प्रधानमंत्री न बनने देने को लेकर अड़ गया था। बाद में ज्योति बाबू ने इसे अपनी पार्टी की ऐतिहासिक भूल कहा था, हालांकि उस कथित वैचारिक संघर्ष से ही पाटीर् के शीर्ष पर पहुंचे करात आज भी इसे कोई भूल नहीं मानते। लेकिन 2009 के आम चुनाव में सीपीएम के सांसदों की तादाद जब 43 से घट कर 16 पर और पूरे वाम मोर्चे की 62 से घट कर 24 पर आ गई, तब भी वाम नेता इसे अपनी किसी वैचारिक गलती का नतीजा नहीं मानते तो इसका क्या अर्थ लगाया जाए? वाम नेता अगर ईमानदारी से सोचें तो उनकी पराजय में राज्य स्तरीय कारणों की भूमिका तो है ही, लेकिन उन्हें अगर भविष्य के लिए खुद को तैयार करना है तो पिछले पांच सालों की अपनी केंद्रीय राजनीति की चीरफाड़ पूरी निर्ममता से करनी होगी। यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन देते हुए जो मुद्दे उन्होंने उठाए, उनमें ज्यादातर राष्ट्रहित में थे। इसके बावजूद देश में लगातार उनकी गैर-जिम्मेदार और विघ्न-संतोषी छवि क्यों बनती गई, इस बारे में उन्हें गंभीरता से विचार करना चाहिए। खासकर चुनाव से ठीक पहले यूपीए को हराने का एकमात्र लक्ष्य लेकर जिस तरह उन्होंने मायावती, देवगौड़ा और जयललिता जैसे छंटे-छंटाए अवसरवादियों से तालमेल किया, उसका वाम राजनीति से क्या संबंध हो सकता है? इन अप्रीतिकर सवालों को छोड़ कर वाम नेता अगर खुशफहमियां गढ़ने में ही जुटे रहते हैं तो फिर मार्क्स ही उनका भला करें!

पहली प्रतिक्रिया....

आज दो महीने की चुनावी कवायद का पटाक्षेप चौंकाने वाले परिणामों के साथ हुआ है..परिणामों.. इस लिए कि एक ओऱ जनता ने गठबंधन सरकार के समर्थन में लगभग स्पष्ट फैसला दिया है वहीं निरंकुश, स्वेक्षाचारी और अतिमहात्वांकाक्षी उदंड नेताओं को पूरे मन से सबक सीखा दिया है..आज के परिणाम भले ही किसी राष्ट्रीय मु्द्दे का समर्थन नहीं है लेकिन राजनीति की राष्ट्रीय दिशा जरूर तय कर सकते हैं.ये जनादेश विकल्पहीनता के बीच में विकल्प का भी संकते देते हैं...पूरे चुनावी गहमागहमी के बीच अपने मु्द्दों को तलाशती जनता ने राजनेताओं को अपनी अहमियत का अहसास करा दिया है..जूते - चप्पल की चर्चाओं और बुढ्ढी और गुड़िया के विशेषणों के इर्द गिर्द घुमती रही चुनावी बहस ने दो महीने तक जनता को खूब बोर किया, मीडिया में प्लांटेड राय प्रसारित कर राजनीतिक दल और नेता जनता को गुमराह करने की कोशिश करते रहे लेकिन चुनाव परिणाम ने इन सभी की खुशफहमी को चंद घंटों में ही काफूर कर दिया.. इलेक्ट्रानिक मीडिया ने घंटों कपोलकल्पित सरकारें बनाई और कई ख्याली प्रधानमंत्री देश को लाखों के विज्ञापनों के बीच परोसा.आज के परिणाम ने साफ कर दिया कि देश की जनता बाजारू चकाचौंध के बीच सादगी पसंद है..वो उदंड, आक्रमक और हाईटेक नेताओं को ज्यादा सहन नहीं कर सकती..लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान, लक्ष्मण सिंह ,वाइको,मायावती, जयललीता जैसे नेताओं का हाल ये बताने को काफी है कि अकड़ और अख्खड़ रवैया जनता झेलने को अभिशप्त नहीं है. आंकड़ों की बाजीगरी कर जनता का समय जाया करने वाली मीडिया का वो भ्रम भी इस जनादेश ने एक बार फिर तोड़ दिया है कि सवा अरब की आबादी के तेवर को कमरे में बैठकर भांपा जा सकता है.बहरहाल यहाँ युवा मतदातों की यु्वा सोच को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है और यूँ कहे युवा मानसिकता को जनता ने हाथों हाथ लिया है..जनता ने कथित बूढ़ी पार्टी के युवा नेतृत्व को तमाम आशंकाओं के बावजूद स्वीकार किया वहीं पच्चीस साल की युवा पार्टी को समय से पहले बूढ़ा बना दिया. नतीजों में कोई धुंधलाहट रह नहीं गई है और बिना किसी विशेष मेहनत के अब विद्वान अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह फिर देश के सरदार बनेंगे..वैसे लोकसभा चुनाव परिणाम के ताजा आँकड़ों ने ये भी सिद्ध कर दिया है विकास के मुद्दों पर चुनाव लड़े ही नहीं जाते हैं बल्कि जनता का विश्वास भी जीता जा सकता है. बहरहाल सत्ता के गलियारों की सरगर्मी मद्धम होने लगी है ऐसे में उम्मीद की जा सकती है अब दिल्ली का चुनावी तापमान बड़ी तेजी से नीचे उतरेगा..आने वाले दिनों में अनिश्चितता की तपीश खत्म होगी..और विकास की बौछार से देश की जनता को राहत मिल सकेगी..
विकास शर्मा रायपुर 09329444278

Sunday, 10 May 2009

क्यों न हमारे देश में भी अनिवार्य हो मतदान!


मौजूदा चुनाव में खासकर महानगरों में कम मतदान की खबरों के बीच लालकृष्ण आडवाणी ने मतदान को अनिवार्य करने की पैरवी की। इस पर कुछ लोगों की प्रतिक्रिया थी कि ऐसा करना लोकतंत्र विरोधी होगा। कुछ ने कहा कि मतदान के लिए बल प्रयोग अनुचित है। वामपंथियों की प्रतिक्रिया मौलिक थी। उन्होंने कहा कि यह कोई नया विचार नहीं है, पहले भी इसकी वकालत की जाती रही है।
मैं समझता हूं यह ऐसा विचार है जिस पर विचार का समय अब आ गया है। इसलिए नहीं कि यह मतदाताओं को बाहर निकालने का सबसे अच्छा तरीका है (सबसे अच्छा तरीका तो यही होगा कि वे स्वेच्छा और स्वप्रेरणा से वोट देने आएं) बल्कि इसलिए कि मतदान का प्रतिशत अगर इसी तरह गिरता रहा तो भारतीय लोकतंत्र को गहरा धक्का पहुंचेगा। भारत में आज राजनीति का स्वरूप और उसमें जनभागीदारी को देखते हुए यह एक ऐसा विचार है जो हमारी राजनीतिक प्रणाली को बदल सकता है। यह पार्टियों और जनता के बीच संवाद व रिश्तों में भी आमूलचूल परिवर्तन ला सकता है।
सबसे पहले तो इससे हमारी संसदीय प्रणाली में प्रतिनिधित्व बढ़ सकेगा। कैसे? मौजूदा प्रणाली को देखिए। मान लें कि आप 40 मतदाताओं वाले एक निर्वाचन क्षेत्र से उम्मीदवार हैं। इनमें से 22 यानी 55 प्रतिशत वोट ही नहीं देते। बाकी 18 में चार आपको वोट देते हैं, तीन किसी दूसरे उम्मीदवार को, दो-दो वोट दो अन्य उम्मीदवारों को और सात अन्य को एक-एक वोट मिलता है।
इस तरह 40 में से कुल चार यानी 10 फीसदी मतदाताओं के समर्थन से आप ‘जन प्रतिनिधि’ बन जाते हैं। 1952 में स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव से यही स्थिति रही है। मतदान को अनिवार्य बना देने से इस हालत में सुधार हो सकता है।
चूंकि ज्यादातर मतदाता वोट नहीं डालते, इसलिए किसी भी उम्मीदवार के लिए मतदाताओं के किसी एक समुदाय को लामबंद करने के लिए जाति या संप्रदाय का कार्ड खेलना आसान हो जाता है। अनिवार्य मतदान का नतीजा यह होगा कि अगर एक निर्वाचन क्षेत्र में 30 फीसदी मतदाता किसी एक समुदाय के और 70 फीसदी किसी अन्य समुदाय के हैं, तो कोई भी पार्टी या उम्मीदवार किसी संकीर्ण एजेंडे पर चुनाव नहीं जीत सकती, क्योंकि बहुसंख्यक समुदाय उसे खारिज कर देगा।
अगर मतदान अनिवार्य हो जाए राजनेताओं को सभी मतदाताओं से जुड़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। इसके चलते उन्हें अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को नए सिरे से परिभाषित करना होगा। इसके अलावा जब मतदान अनिवार्य होगा, तब मतदाता को भी यह छानबीन भी करनी होगी कि कौन-सा उम्मीदवार कैसा है।
इस कवायद से राजनीतिक प्रणाली में मतदाता की रुचि नए सिरे से जागृत हो सकती है। इसके साथ अगर मतदाता को ‘उपरोक्त में से कोई नहीं’ पर बटन दबाने का भी विकल्प मिल जाए तो सोने पर सुहागा हो जाएगा। अगर बड़ी संख्या में मतदाता सभी उम्मीदवारों को खारिज करके यह विकल्प चुनते हैं तो यह अपने आप में अहम संदेश होगा। इससे राजनीतिक पार्टियां मतदाता पर ज्यादा ध्यान देने को बाध्य होंगी और यह हमारे देश में सचमुच बड़ा बदलाव होगा।
हम अपने नेताओं को पहले ही बहुत कोस चुके हैं। सवाल यह है कि समस्या क्या सिर्फ नेता ही हैं, जनता नहीं? मौजूदा विकल्पों से बार-बार की नाराजगी से उपजा मोहभंग समझ में आता है। लेकिन आज स्थिति कुछ और भी नजर आती है। कई शहरों में मतदान के दिन को छुट्टी का दिन समझा जाता है। वोट नहीं देने वालों में संपन्न तबका सबसे आगे है।
जहां तक विरोध प्रदर्शनों में मोमबत्तियां जलाने वाले युवाओं की बात है, तो उनके बारे में हाल ही में सेवानिवृत्त मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने एक दिलचस्प बात कही थी - 18 से 25 वर्ष की उम्र के मतदाताओं में से 70 फीसदी ने अपने को मतदाता सूचियों में दर्ज ही नहीं करवाया।
लिहाजा मतदाताओं को अब बताना होगा कि वोट देना अधिकार ही नहीं, कर्तव्य और जिम्मेदारी भी है। यह अधिकार भारतीयों को आसानी से हासिल नहीं हुआ है। अलबत्ता जो लोग अनिवार्य मतदान के बाद भी वोट देने नहीं आते, उनके विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।
जिन तीस से ज्यादा देशों में मतदान अनिवार्य है, कहीं भी इस मामले में सख्त सजा का प्रावधान नहीं है। वहां ज्यादा से ज्यादा जुर्माना होता है और बीमार होने की स्थिति में वोट नहीं देने की भी छूट है। जिन देशों में अनिवार्य मतदान है, वहां न सिर्फ मतदान प्रतिशत खासा अच्छा है, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों के उल्लंघनों की भी ज्यादा चर्चा नहीं है।
भारत में भी इस पर व्यापक बहस का अब समय आ गया है। हो सकता है यह बहस ही उदासीन मतदाताओं में कुछ रुचि पैदा कर सके।

अनपढ़ मां की जिद ने बनाया आईएएस



अहमदाबाद प्रकाश कंवर को अपने अनपढ़ होने का मलाल था, लेकिन साधारण परिस्थिति में गुजर-बसर करते हुए आज अपनी बेटी डॉ. रतनकंवर गढ़वी चारण (24) को आईएएस बना देखकर वे गौरवान्वित हैं।
रतनकंवर ने पहले अपनी मेहनत से एमबीबीएस की डिग्री हासिल की और इस वर्ष यूपीएससी की परीक्षा में 124वीं रैंक हासिल करने में कामयाब रही। यहां के मणिनगर में हरिपुर इलाके की धीरज सोसायटी में रहने वाली रतनकंवर के पिता हड़मत सिंह आलू और प्याज के व्यापारी हैं।
उन्होंने बताया कि उनकी बेटी बचपन से ही पढ़ाई में होशियार रही है। दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं में उसने 91 फीसदी से ज्यादा अंक प्राप्त किए।
मां की इच्छा पूरी की
रतनकंवर के दो भाइयों भवदेव और सिद्धार्थ ने बताया कि मां ने तीनों बच्चों को उच्च शिक्षा और तरक्की के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया। इसके चलते भवदेव ने बीई-आईटी व एमबीए और सिद्धार्थ ने बीटेक किया तो रतनकंवर ने एमबीबीएस करने बाद आईएएस बनने की ठानी। भाइयों का कहना है कि आईएएस बनकर रतनकंवर ने मां की वर्षो पुरानी इच्छा पूरी कर दी है।
सफलता का श्रेय मां को रतनकंवर ने भी अपनी सफलता का श्रेय मां को देते हुए बताया, ‘डॉक्टर बनने के पहले और यूपीएससी की परीक्षा की तैयारी के दौरान ऐसा लगता था जैसे मां को ही परीक्षा देनी है। वे मेरे साथ पूरी रात जागती रहती थीं।’
मैं कभी स्कूल नहीं गई। इसका मुझे दु:ख था, लेकिन बेटी की सफलता से मुझे बहुत संतोष मिला है। लगता है जैसे मैंने ही पढ़ाई पूरी कर ली है।’
- प्रकाश कंवर (आईएएस बनने वाली रतनकंवर की मां)

Tuesday, 14 April 2009

सबसे बड़े प्रजातंत्र की लागत


विभिन्न नेताओं ने स्वीकार किया है कि एक सांसद के चुनाव पर तीन से पांच करोड़ रूपए की राशि खर्च होती है। अमूमन चुनाव प्रचार के लिए एक दिन में होने वाला खर्च करीब पांच लाख रूपए होता है जो प्रचार के अंतिम हफ्ते तक बढ़ कर दस से पन्द्रह लाख तक भी पहुंच सकता है।
विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र के लिए हो रहे चुनाव पर एक अनुमान के मुताबिक करीब 18 हजार करोड़ रूपए खर्च होंगे। इस मायने में भारत का यह आम चुनाव कुछ महीने पहले अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव के खर्च को भी पीछे छोड़ देगा। उसमें लगभग दस हजार करोड़ रूपए खर्च हुए थे।
इस संबंध में राष्ट्रीय दलों के चुनावी प्रत्याशियों और वरिष्ठ नेताओं से चर्चा की। स्वाभाविक रूप से इस संबंध में खुल कर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। नाम न जाहिर करने की शर्त पर इन नेताओं का कहना है कि एक सांसद के चुनाव में तीन से पांच करोड़ रूपए की राशि खर्च होती है।
सूत्रों का कहना है कि अगर चुनाव जद्दोजहद और खींचतान वाला हो तो यह खर्च दुगुना और तिगुना भी हो सकता है। राष्ट्रीय दलों की बात करें तो उनकी ओर से प्रत्याशियों को लगभग एक करोड़ रूपए की राशि चुनाव खर्च के लिए दी जाती है। चुनाव खर्च मोटे तौर पर प्रचार सामग्री और जनसभा के आयोजन तथा कार्यकर्ताओं को प्रतिदिन दी जाने वाली राशि के रूप में होता है।
एक कार्यकर्ता को रोज करीब 200 रूपए दिए जाते हैं। विधानसभा क्षेत्रवार तीन सौ से पांच सौ कार्यकर्ता चुनाव प्रचार के लिए जुटते हैं।
आमतौर पर एक लोकसभा क्षेत्र में छह से आठ विधानसभा क्षेत्र होते हैं।
सूत्र बताते हैं कि पहले चुनाव में वाहन आदि की व्यवस्था पर खासी रकम खर्च होती थी लेकिन चुनाव आयोग की सख्ती के मद्देनजर अब इसमें काफी कमी आई है। फिर भी चोरी छिपे बडी संख्या में वाहन अब भी चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल होते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले गाडियां किराए पर ली जाती थीं अब खुद ज्यादातर कार्यकर्ताओं के पास कार या जीप होती है जिसका इस्तेमाल प्रचार के लिए किया जाता है।
सूत्रों के अनुसार पहले चुनाव में कंबल ् कपड़े और मदिरा बंटने की बातें ही ज्यादा सामने आती थीं लेकिन पिछले कुछ वर्षो में चुनाव में एक वर्ग ऐसा भी सामने आया है जिसके लिए विशेष उपहार की व्यवस्था होती है। इन उपहारों में मल्टी यूटिलिटी व्हीकल सहित अन्य मूल्यवान वस्तुएं शामिल होती हैं। चुनाव में विशिष्ट उपहार प्राप्त करने वाला यह वर्ग राजनीतिक समीकरण की दृष्टि से खासा महत्वपूर्ण होता है। ये राजनीतिक रसूख रखने वाले लोग होते हैं जिनके कहने पर संबंधित क्षेत्रों में पांच से लेकर पचास हजार तक के वोटों का फैसला हो जाता है।
खास बात यह भी है कि राजनीतिक दलों में कुछ विशिष्ट कार्यकर्ताओं का ऐसा हुजूम भी होता है जिन्हें टास्क परफार्मर कहा जाता है। ऐसे कार्यकर्ता उन क्षेत्रों में झोंके जाते हैं जहां उम्मीदवार की हालत कमजोर होती है। अनुकूल परिणाम आने पर टास्क परफार्मर कार्यकर्ता भी मूल्यवान उपहारों से नवाजे जाते हैं।
करीब पांच महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में राष्ट्रीय स्तर के एक दल के कार्यकर्ताओं को इसी तर्ज पर एक ट्रक भर-भर मोटरसाइकिलें बांटे जाने की खासी चर्चा रही थी।

Friday, 3 April 2009

घोषणा पत्र जारी, भाजपा फिर राम भरोसे...


भाजपा ने आज बीजेपी मुख्यालय पर एक समारोह में अपना मैनिफेस्टो जारी किया। घोषणा पत्र जारी करने के लिए आयोजित इस समारोह के दौरान मंच पर पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी और राजनाथ सिंह के साथ अटल बिहारी वाजपेयी का फोटो भी लगा था। यह माना जा रहा है कि पिछले विधानसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी को प्रचार से दूर रखने के बाद भाजपा को फिर उनका महत्व समझ आ गया है। भाजपा ने मान लिया है कि अटलजी के बिना पार्टी अधूरी है और इसी कारण उन्हें घोषणा पत्र के कवर पर भी जगह दी गई है।
माना जा रहा था कि भाजपा अपने मैनिफेस्टो में हिन्दुत्व पर लौट सकती है। पिछले चुनावों में भाजपा ने अपना घोषणा पत्र जारी नहीं किया था। एनडीए का कॉमन मिनिमम प्रोग्राम जारी कर भाजपा ने अपने गठबंधन की बात प्रमोट की थी। उम्मीद यह भी की जा रही थी की यह घोषणा पत्र कांग्रेसी मैनिफेस्टो का जवाब होगा।
घोषणा पत्र जारी करने से पहले समारोह में भाजपा का अभियान गीत सुनाया गया। इस दौरान मंच पर आडवाणी, वैंकया, जसवंत सिंह, मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह और अरूण जेटली मौजूद थे। भाजपा के वरिष्ठ नेता रविशंकर प्रसाद ने घोषणा पत्र पढ़कर सुनाया।
भाजपा के इस घोषणा पत्र की खूबियां .......
- २ रूपए गेंहूं चावल
- किसानों को ४ फीसदी पर लोन
- ६ फीसदी पर होम लोन देने का वादा
- सेंट्रल सेल्स टेक्स खत्म होगा
- रेहड़ी वालों को ४ फीसदी पर लोन
- पोटा कानून लाएंगे
- विदेश में जमा काला धन वापस लाएंगे
- एफबीटी खत्म करेंगे ( फ्रिंज बैनिफिट टैक्स )
- गांवो को पक्की सड़क
- आयकर में छूट
- रामसेतु नहीं टूटने देंगे
- पर्यटन क्षेत्रों को बढावा
- पूर्ण ऊर्जा व सड़क संपर्क स्थापित करने देंगे
- जनसुरक्षा बढ़ाई जाएगी
- भारत बांग्लादेश बाड़ लगाने का काम पूरा
- माओवादियों , आतंकवादियों के खिलाफ अभियान
- अलगवावादी, आतंकवादी समर्थित देशों पर दबाव नीति
- जय जवान सैन्य बलों अर्धसैनिक बलों को आयकर मुक्त
- सैन्य बलों के लिए पृथक वेतन आयोग का गठन
- सेनाओं और पैरामिलिट्री फोर्स को वेतन पर आयकर में छूट
- बिजली का उत्पादन निर्भरता कम
- मध्य प्रदेश की लाड़ली लक्ष्मी को पूरे देश में
- धारा 370 हटाएंगे
- सस्ती शिक्षा
- 2014 तक सभी के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं
- घर पर एम्बुलैंस की व्यवस्था, नए एम्स की स्थापना पुर्नजीवित
- ग्लोबल वॉर्मिंग को रोकने के लिए कार्यक्रम
- अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाएंगें
- वरिष्ठ नागरिकों की पेंशन कर मुक्त
भाजपा ने उन चीजों को भी अपने मैनिफेस्टो में शामिल किया है जो कांग्रेस से कहीं छूट गए थे। राजनाथ सिंह ने अंत में मैनिफेस्टो कमेटी के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी समेत सभी को धन्यवाद दिया जिन्होंने घोषणा पत्र तैयार करने में मदद की है। राजनाथ सिंह ने कहा कि उन्होंने राजनीतिक , आर्थिक, सामाजिक , सांस्कृतिक सभी पक्षों को ध्यान में रखते हुए पत्र तैयार किया है। इसमें भाजपा की दार्शनिक अवधारणा को ध्यान में रखा गया है, यह संतुलित है। उन्होंने कहा कि यह अन्य पार्टियों के घोषणा पत्र की तरह विचार शून्य नहीं है। हमने यह केवल वादे नहीं किए हम इसका अक्षरशः पालन करेंगे, हर साल इसकी समीक्षा करेंगे। इस मौके पर आडवाणी ने कहा की घोषणा पत्र के अनुसार हम यह सारे वादे पूरे करना चाहते हैं। हम देश को सुरक्षा देना चाहते हैं। उन्होंने सैन्य सेवाओं को ज्यादा से ज्यादा आर्थिक फायदा पहुंचाने का वादा किया, उन्होंने वीरता पुरस्कारों की राशी को 30000 रूपए तक बढ़ाने की बात भी कही।


क्या पार्टियों के घोषणा पत्रों का कोई महत्व है.. या यह सिर्फ वोटरों को लुभाने के खोखले वादे हैं......अपने विचार जरूर लिखें....