Wednesday, 26 May 2010
गन्दे नाले पर भी जुटेंगे ब्लागर: दिल्ली से योगेश गुलाटी
प्यार भरा निमन्त्रण कोई भला कैसे अस्वीकार कर सकता है! पिछले रविवार मुझे एक ज़रूरी मीटिंग में जाना था! उस दिन गर्मी भी बहुत थी, और नांगलोई मेरे घर से करीब दो घंटे का सफर था! लेकिन अविनाश जी ने जो स्नेहभरा निमन्त्रण मेरे ब्लाग पर छोडा वो मुझे नांगलोई की उस छोटूमल जाट धर्मशाला तक खींच लाया! अपना एक दिन मैंने उन लोगों से मिलने के लिये दिया जिन्हें मैं जानता तक नहीं था! बडा ही अदभुत अनुभव था ये मेरे जीवन का! सभी से मिल कर और उनके विचार जानकर जो खुशी हुई उसका मैं शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता! वो गर्म दोपहरी एक अनोखी शीतलता का एहसास करा रही थी! इसी लिये मैंने कहा कि ये हिन्दी ब्लागिंग के इतिहास में एक पन्ना दर्ज हो रहा था! ब्लागर्स एसोसिएशन एक बहुत सुन्दर विचार है! यदि ये विचार कार्य रूप में परिणित होता है, तो एक मिसाल कायम की जा सकती है! निश्चित तौर पर ये मीडिया का विकल्प और सामाजिक चेतना का बडा मंच साबित हो सकता है! क्योंकि प्रबुध्द ब्लागरों में अपने-अपने क्षेत्र के विद्वान और विषय वेत्ता भी शामिल हैं! आज की इस भागमभाग वाली ज़िन्दगी में जहां लोगों के पास वक्त की सख्त कमी है, और सभी सिर्फ अपने बारे में ही सोचने में व्यस्त हैं, वहां यदि ब्लागिंग जैसी कोई चीज़ प्रबुध्दजनों को एक दूसरे से सीधे जोड रही है, तो निश्चय ही इसे नज़रअंदाज़ करना एक बडी भूल होगी! मैं ये नहीं कहता कि ब्लागिंग से हम कोई क्रांति कर देंगे! क्रांति हमारा उद्देश्य भी नहीं है! लेकिन विभिन्नताओं वाले कईं लोगों में कोई चीज़ यदि समान हो, जो उन्हें एक मंच पर लाने का काम करे तो निश्चय ही उसमें कोई असाधारण बात तो होगी ही! मुझे लगता है कि हिन्दी ब्लागिंग अपने शुरुआती दौर में है! इसे अभी लंबा सफर तय करना है! लेकिन एक नदी की तरह ये अपना मार्ग खुद बना लेगी! इसलिये खुशदीप जी आप गंदे नाले पर भी ब्लागर मिलन समारोह करवा लीजिये, मेरा दावा है वहां भी ब्लागर आयेंगे! बिन बुलाये आयेंगे! और हर ब्लागर मीट में उनकी संख्या बढती ही जायेगी! यही हिंदी ब्लागिंग की असली ताकत है, जो वक्त आने पर उभर कर सामने आयेगी!
वो सूरज को आंख दिखाता था: दिल्ली से योगेश गुलाटी
करोल बाग मेट्रो स्टेशन के करीब एक मरियल सा रिक्षावाला तपती दुपहरी में रिक्षा खींच रहा था! फटी पैंट और एक बनियान बस यही था उसके तन पर! लू के थपेडों से बचने के लिये उसने अपने कान कपडे से ढक रखे थे! पैरों में टूटी सी चप्पल थी! गर्मी की इस दुपहरी में उसके पसीने से नहाये शरीर को देख कर तापमान की भीषणता का अंदाज़ा लग रहा था! उसके रिक्षे पर एक प्रेमी जोडा बैठा था! दोनों एक दूसरे की बाहों में मगन थे! आते-जाते लोगों की निगाहें उनकी हरकतों पर टिकी थी! लेकिन दोनों ही इस बात से बेपरवाह थे! प्रेमी अपनी प्रेमिका को सूरज से बचाने की कोशिश करता दिख रहा था! दोनों ही पहनावे से काफी उन्मुक्त और आधुनिक नज़र आ रहे थे! हालाकि दिल्ली में इस तरह के नज़ारे आम हो चले हैं! लेकिन मुझे उसमें कुछ खास नज़र आ रहा था! रिक्षावाला चुंकि शरीर से काफी दुबला था इसलिये उसे दोनों को खींचने में काफी ज़ोर लगाना पड रहा था! वो कभी सूरज को आंख दिखाता तो कभी ज़ोर लगा कर रिक्षा खींचता! ऎसा लग रहा था मानो वो सूरज को चुनौती दे रहा हो, कि "तू चाहे कितनी भी आग बरसा ले, मेरे हौंसले को डिगा नहीं पायेगा"! लेकिन मैं उसकी मजबूरी को समझ रहा था! क्योंकि पेट की आग सबसे भयानक होती है! करोल बाग मेट्रो स्टेशन के नज़दीक रिक्षा रोक कर रिक्षावाले ने कहा, साहब मेट्रो स्टेशन आ गया! प्रेमी युगल ने होंश संभाला, अपने आस-पास देखा और रिक्षा से उतर गये! प्रेमी ने दस रुपये का नोट रिक्षा वाले को थमा दिया! "साहब इतनी दूर से आप दोनों को खींच कर लाया हूं, बीस रुपये होते हैं"! रिक्षावाले ने कहा! "मेरे पास छुट्टे नहीं हैं बस यही दस का नोट है लेना हो तो लो"! ये कह कर प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ आगे बढ गया! पसीने में तर रिक्षावाला उस दस के नोट को देख कर कुछ सोचने लगा! उसने फिर सूरज की तरफ देखा! सामने की दुकान से प्रेमी युगल ने पचास रुपये में कोका-कोला की दो बोतलें खरीदीं, अपना गला तर किया! इसके बाद गर्मी में आराम से वक्त बिताने के लिये पास के मेक्डानेल्स में जा कर बैठ गये! इधर रिक्षावाला मेट्रो स्टेशन के सामने लगी रिक्षों की लंबी लाईन में सबसे पीछे अपना रिक्षा लगा कर सवारी के लिये अपनी बारी का इंतज़ार करने लगा! लू के थपेडों का असर उसके शरीर पर तो हो रहा था लेकिन मेहनत और इमानदारी के उसके हौंसले पर लू के थपेडे कोई असर नहीं डाल पाये थे! रिक्षावाला सूरज को देख कर मुस्कुरा रहा था!
लोग यूं ही बदनाम किया करते हैं: दिल्ली से योगेश गुलाटी
इश्क का नाम लिया करते हैं,
लोग यूं ही बदनाम किया करते हैं!
हमारे पास नहीं काम कोई दूजा,
इसीलिये चाहत का काम किया करते हैं!
चाहत अब फितरत बन गई है,
फितरत को अंजाम दिया करते हैं!
इश्क का नाम लिया करते हैं,
लोग यूं ही बदनाम किया करते हैं!
क्या चाहने भर से कोई मिल जाता है यारों,
फिर चाहत को क्यों इल्ज़ाम दिया करते हैं!
क्या हिम्मत है ज़माने में मरने की,
हम किसी पर मरने का काम किया करते हैं!
इश्क का नाम लिया करते हैं,
लोग यूं ही बदनाम किया करते हैं!
चाहकर भी चाहत को छुपाना,
ये काम नहीं आसां,
गमें मोहब्बत में हम,
जाम पर जाम पिया करते हैं!
इश्क का नाम लिया करते हैं,
लोग यूं ही बदनाम किया करते हैं!
उसको तो खबर भी नहीं कि हम उसपर मरते हैं,
फिर ज़माने भर में, लोग हमें क्यों बदनाम किया करते हैं!
सुना है इश्क करने वालों का नाम बडा होता है ज़माने में,
छोटे नाम को बडा बनाने के लिये इल्ज़ाम लिया करते हैं!
इश्क का नाम लिया करते हैं,
लोग यूं ही बदनाम किया करते हैं!
लोग यूं ही बदनाम किया करते हैं!
हमारे पास नहीं काम कोई दूजा,
इसीलिये चाहत का काम किया करते हैं!
चाहत अब फितरत बन गई है,
फितरत को अंजाम दिया करते हैं!
इश्क का नाम लिया करते हैं,
लोग यूं ही बदनाम किया करते हैं!
क्या चाहने भर से कोई मिल जाता है यारों,
फिर चाहत को क्यों इल्ज़ाम दिया करते हैं!
क्या हिम्मत है ज़माने में मरने की,
हम किसी पर मरने का काम किया करते हैं!
इश्क का नाम लिया करते हैं,
लोग यूं ही बदनाम किया करते हैं!
चाहकर भी चाहत को छुपाना,
ये काम नहीं आसां,
गमें मोहब्बत में हम,
जाम पर जाम पिया करते हैं!
इश्क का नाम लिया करते हैं,
लोग यूं ही बदनाम किया करते हैं!
उसको तो खबर भी नहीं कि हम उसपर मरते हैं,
फिर ज़माने भर में, लोग हमें क्यों बदनाम किया करते हैं!
सुना है इश्क करने वालों का नाम बडा होता है ज़माने में,
छोटे नाम को बडा बनाने के लिये इल्ज़ाम लिया करते हैं!
इश्क का नाम लिया करते हैं,
लोग यूं ही बदनाम किया करते हैं!
Sunday, 23 May 2010
जब मैं पहुंचा दिल्ली ब्लागर मिलन समारोह: दिल्ली से योगेश गुलाटी
मैं अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल की और,
राह में हमदम मिले...कारवां बनता गया!
जी हां कुछ ऎसा ही था दिल्ली ब्लागर मिलन समारोह्! जलजला जी से मिलने की आस लिये मैं जा पहुंचा नांगलोई की जाट धर्मशाला! रविवार का दिन था, लेकिन सूरज जम कर अपना कहर बरसा रहा था! लेकिन हमने भी ठाना था ब्लागजगत की जानी मानी हस्तीयों से रुबरु होना ही है! सो जा पहुंचे नांगलोई रेलवे स्टेशन की उस छोटू राम जाट धर्मशाला! वहां एक गोल घेरा बनाये कुछ लोग पहले से ही बैठे थे! देश और समाज के लिये चिन्ता की जो लकीरें उनके चेहरे पर दिख रही थीं, उसे देख कर हमने पहचान लिया कि ये सभी ब्लागर्स ही हैं! सभी सोच में मगन थे, एक दूसरे से कम ही बात कर रहे थे! हम भी साईड की एक कुर्सी पर जा बैठे! और अन्य ब्लागर्स की तरह चिन्तन में मगन हो गये! जलपान की भी अछ्छी व्यवस्था थी इसलिये सभी ब्लागर्स ने उसका भी लुत्फ उठाया! जिन बलागर्स को मैं पहचान पाया उनमें थीं संगीता पुरी, अविनाश जी और खुशदीप सहगल! इसके अलावा भी कईं सुविख्यात ब्लागर बंधु और उनकी ब्लागर बहनें पधारी थीं! हम उम्मीद कर रहे थे कि वे भी अपने कीमती विचार रखेंगी, लेकिन उन्होंने श्रोता बनने में ही रुचि दिखाई! यह मीट इस मायने में भी खास थी कि इसमें शिरकत करने वाले कुछ लोग ब्लोगर तो नहीं थे, लेकिन वो ब्लोग के पाठक ज़रूर थे! उन्होंने भी भविष्य में अपना ब्लोग शुरु करने की इच्छा जताई! चंडीदत्त शुक्ल काफी देर बाद आये, सबसे आखिर में पहुंचे अजय जी! सभी ने दोनों का स्वागत किया! ब्लागर्स मीटिंग शुरु हो चुकी थी! सभी ने ब्लागर मिलन समारोह को एक सराहनीय पहल बताया! इसके बाद सभी ने अपने विचार व्यक्त किये! बढती गर्मी में ब्लागरों के शीतल विचार हवा की ठंडी लहर की तरह लग रहे थे! सभी ने ब्लागर संघ बनाने और भविष्य में ब्लागर मिलन समारोह करते रहने पर सहमति जताई! ब्लागिंग से जुडे अन्य कईं मुद्दों पर भी खुल कर चर्चा हुई! जिनमें हिन्दी ब्लागिंग का भविष्य, सेन्सरशिप, आचार संहिता, तकनीकी जानकारी, समाज में जागरुकता, ब्लागिंग के माध्यम से सार्थक पहल, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इत्यादि प्रमुख थे! अंत में संगीता पुरी जी ने सभी का आभार प्रकट किया! इसके बाद सामूहिक फोटो सेशन हुआ, जिसमें सभी ब्लागरों ने बढ-छढ कर हिस्सा लिया! आते-जाते लोग बडी हैरानी से ये सब देख रहे थे, उन्हें नहीं समझ आ रहा था कि ये सब हो क्या रहा है? शायद उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं रहा हो कि ये हिंदी ब्लाग जगत के इतिहास का एक पन्ना दर्ज हो रहा था!
राह में हमदम मिले...कारवां बनता गया!
जी हां कुछ ऎसा ही था दिल्ली ब्लागर मिलन समारोह्! जलजला जी से मिलने की आस लिये मैं जा पहुंचा नांगलोई की जाट धर्मशाला! रविवार का दिन था, लेकिन सूरज जम कर अपना कहर बरसा रहा था! लेकिन हमने भी ठाना था ब्लागजगत की जानी मानी हस्तीयों से रुबरु होना ही है! सो जा पहुंचे नांगलोई रेलवे स्टेशन की उस छोटू राम जाट धर्मशाला! वहां एक गोल घेरा बनाये कुछ लोग पहले से ही बैठे थे! देश और समाज के लिये चिन्ता की जो लकीरें उनके चेहरे पर दिख रही थीं, उसे देख कर हमने पहचान लिया कि ये सभी ब्लागर्स ही हैं! सभी सोच में मगन थे, एक दूसरे से कम ही बात कर रहे थे! हम भी साईड की एक कुर्सी पर जा बैठे! और अन्य ब्लागर्स की तरह चिन्तन में मगन हो गये! जलपान की भी अछ्छी व्यवस्था थी इसलिये सभी ब्लागर्स ने उसका भी लुत्फ उठाया! जिन बलागर्स को मैं पहचान पाया उनमें थीं संगीता पुरी, अविनाश जी और खुशदीप सहगल! इसके अलावा भी कईं सुविख्यात ब्लागर बंधु और उनकी ब्लागर बहनें पधारी थीं! हम उम्मीद कर रहे थे कि वे भी अपने कीमती विचार रखेंगी, लेकिन उन्होंने श्रोता बनने में ही रुचि दिखाई! यह मीट इस मायने में भी खास थी कि इसमें शिरकत करने वाले कुछ लोग ब्लोगर तो नहीं थे, लेकिन वो ब्लोग के पाठक ज़रूर थे! उन्होंने भी भविष्य में अपना ब्लोग शुरु करने की इच्छा जताई! चंडीदत्त शुक्ल काफी देर बाद आये, सबसे आखिर में पहुंचे अजय जी! सभी ने दोनों का स्वागत किया! ब्लागर्स मीटिंग शुरु हो चुकी थी! सभी ने ब्लागर मिलन समारोह को एक सराहनीय पहल बताया! इसके बाद सभी ने अपने विचार व्यक्त किये! बढती गर्मी में ब्लागरों के शीतल विचार हवा की ठंडी लहर की तरह लग रहे थे! सभी ने ब्लागर संघ बनाने और भविष्य में ब्लागर मिलन समारोह करते रहने पर सहमति जताई! ब्लागिंग से जुडे अन्य कईं मुद्दों पर भी खुल कर चर्चा हुई! जिनमें हिन्दी ब्लागिंग का भविष्य, सेन्सरशिप, आचार संहिता, तकनीकी जानकारी, समाज में जागरुकता, ब्लागिंग के माध्यम से सार्थक पहल, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इत्यादि प्रमुख थे! अंत में संगीता पुरी जी ने सभी का आभार प्रकट किया! इसके बाद सामूहिक फोटो सेशन हुआ, जिसमें सभी ब्लागरों ने बढ-छढ कर हिस्सा लिया! आते-जाते लोग बडी हैरानी से ये सब देख रहे थे, उन्हें नहीं समझ आ रहा था कि ये सब हो क्या रहा है? शायद उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं रहा हो कि ये हिंदी ब्लाग जगत के इतिहास का एक पन्ना दर्ज हो रहा था!
Saturday, 22 May 2010
जनसत्ता और हिंदुस्तान का शुक्रिया: दिल्ली से योगेश गुलाटी
आपके फोन के ज़रिये ही ये सूचना मिली कि जनसत्ता और हिन्दुस्तान में ब्लाग "दिल्ली से योगेश गुलाटी" का प्रमुखता के साथ ज़िक्र किया गया! आपके इस असीम प्यार के लिये आपका ऋणी हूं! जनसत्ता ने अपने सम्पादकीय पेज पर गरीबी पर लिखी मेरी एक पोस्ट को स्थान दिया, इसके लिये जनसत्ता के सम्पादक मंडल का आभार! इसलिये नहीं कि उन्होंने मेरी पोस्ट को अपने अखबार में स्थान दिया, बल्कि इस्लिये कि उन्होंने गरीबों की आवाज़ को आपतक पहुंचाने का सराहनीय काम किया है! मैं जानता हूं कि महज़ कागज़ काले करने भर से हिन्दुस्तान से गरीबी की ये काली रात बीतने वाली नहीं है! लेकिन जब तक हम सोये रहेंगे और सिर्फ अपने बारे में ही सोचेंगे तब तक वो सुनहरा सूरज हम नहीं देख पायेंगे, जिसकी कल्पना हम बीते छ्ह दशकों से करते आये हैं! दिल्ली में आकर ही मैंने ये जाना कि किस तरह एक तबका कुछ ना करके भी लगातार आगे और आगे बढता जा रहा है...! और किस तरह एक बडा तबका दिन रात मेहनत करके भी दो वक्त की रोटी तक नहीं जुटा पा रहा! जबकि ये सरकार दशकों से गरीबों के हित में काम कर रही है! और हर बार गरीबी हटाने के नाम पर ही हर सरकार सत्ता में आती है! तो फिर क्या वजह है कि हमारी आधी से ज्यादा आबादी बदहाली का शिकार है? गरीबी के इस केंसर का सही इलाज करने की बजाय हमारी सरकारें इस बदरंग तस्वीर को छुपाने की कोशिश करती नज़र आती है! एक विदेशी आकर हमारे एक गरीब गांव को गोद लेता है! क्या यही है एक सशक्त भारत की पहचान? क्या आक्सफोर्ड से आने के बाद एक गरीब की कुटिया में रात बिता देनेभर से उस गरीब को भुखमरी से निजात मिल जायेगी? नरेगा जैसी योजनाये चलाकर झूठी वाहवाही बटोरने से क्या ऎसी योजनायें भ्रष्टाचार की भेंट चढना बंद हो जायेंगी? शिक्षा का निजीकरण करके वैसे भी सरकार ने इसे गरीबों की पहुंच से दूर कर दिया है! और उच्च शिक्षा तो एक गरीब के लिये दिवा स्वप्न की तरह है! जो दो वक्त के रोटी का जुगाड नहीं कर सकता वो लाखों की फीस देकर मेडिकल इंजीनियरिंग या एमबीए की पढाई करने के बारे में कैसे सोच सकता है? यानि गरीबों के लिये आगे बढने की रास्ते ही बंद कर दिये गये हैं! प्राचीन भारत में दबंगों ने वर्ण व्यवस्था को कुछ इस तरह चालाकी के साथ लागू किया कि क्षुद्र का बेटा हमेंशा क्षुद्र ही बना रहा! लगता नहीं कुछ ऎसे ही हालात आज भी हैं?जहां गरीब का बेटा गरीब ही बने रहने को मजबूर है! लेकिन स्वस्थ्य समाज के लिये विषमतायें अच्छी नहीं होतीं! ये विषमतायें अलगाव को जन्म देती हैं! नक्सलवाद के रूप में इस अलगाव का दंश हम भोग रहे हैं! इसलिये समाज और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास पर बल देने की ज़रूरत है! सबसे बडी चुनौती जनसंख्या के स्थिरीकरण की है जिसकी तरफ ना तो कोई ध्यान दे रहा है ना ही ये मुद्दा ही बन पाया है! यदि हमारी जनसंख्या इसी गति से बढती रही तो चाहे कितना ज़ोर लगा लें, समाज से गरीबी और विषमता को समाप्त नहीं कर पायेंगे!
क्या ममता सिर्फ बंगाल की रेल-मंत्री हैं?: दिल्ली से योगेश गुलाटी
वो तो एक गरीब ब्राह्मण का बेटा था जिसने मीलों दूर हुई एक रेल दुर्घटना की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था! उसे कुर्सी का ज़रा भी मोह नहीं था! वो क्षेत्रवाद या परिवारवाद की राजनीति नहीं करता था! सारा देश उसका घर था इसीलिये वो इस देश का प्रधानमंत्री बना और आज भी ये देश अपने उस लाल पर नाज़ करता है! मुझे उसका नाम लेने की ज़रूरत नहीं क्योंकि आप जानते हैं मैं किसकी बात कर रहा हूं! लेकिन आज राजनीति में ऎसे नेता कहां देखने को मिलते हैं! आज से पहले तक मैं रेलमंत्री ममता बेनर्जी का बहुत सम्मान करता था! मैं उन्हें एक जुझारु महिला नेत्री मानता था जो इस देश की नारी शक्ति का प्रतीक बन सकती थीं! लेकिन हाल ही में दो ऎसी घटनाएं हुईं जिससे मैं तृणमूल कांग्रेस की इस फायरब्रांड नेत्री के बारे में अपने विचारों पर पुनर्विचार करने को मजबूर हो गया! पहला वाकया घटा कुछ दिन पहले नई दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर ! ये बताने की ज़रूरत नहीं कि इन दिनों दिल्ली में सूरज किस कदर कहर बरसा रहा है! उस तपती दुपहरी में बिहार के हज़ारों यात्री अपने गंतव्य तक जाने के लिये (नई दिल्ली रेलवे स्टेशन जो कि अपनी अव्यवस्थाओं के लिये पहले से ही खासा मशहूर है, पर) ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे! हिंदुस्तान में लोकल ट्रेन का सफर और वो भी गर्मीं में, ये सफर कितना कष्टदायक होता है! लेकिन गरीब इसके लिये मजबूर हैं! क्योंकि इसके सिवाय और कोई चारा उनके पास नहीं है! बचपन में जब मैं लोकल ट्रेन का सफर किया करता था तो एसी फर्स्ट क्लास की खाली बोगीयों और ठसा-ठस भरी लोकल बोगी को देखकर अपनी मां से ये पूछता था कि एक बोगी में हज़ारों लोग और इतनी सारी बोगीयों में सिर्फ चंद लोग ऎसा क्यों? मां कहती बेटा जब तू बडा होगा तो तुझे खुद ही इस सवाल का जवाब मिल जायेगा! शायद मां ये जानती थी कि बाल-मन गरीबी और अमीरी के इस अंतर को अभी नहीं समझ पायेगा! लेकिन आज भी मुझे उस सवाल का जवाब नहीं मिला है! माना गरीबों को एसी में यात्रा करने का हक नहीं है! लेकिन कम से कम जो टिकिट का पैसा वो देते हैं उसके बदले में उन्हें लोकल ट्रेन में आरामदायक यात्रा करने का हक तो है? हमारी समाजवादी सरकार जो गरीबों के लिये इतनी चिंतित रहती है, जिसने कामनवेल्थ गेम्स के ठीक पहले दिल्ली में गरीबों के लिये मेट्रो चला दी, ( ये अलग बहस का मुद्दा हो सकता है कि उसी सरकार ने दिल्ली से गरीब हटाओ मुहिम भी चला रखी है!) क्या वो लोक कल्याणकारी सरकार गरीबों के लिये ज़्यादा साधरण बोगीयों वाली ट्रेने नहीं चला सकती है? फिर वो रेल मँत्री जो गरीबों की लडाई लडने के लिये बंगाल को अखाडे में तब्दील कर देती हैं और सिंगूर में उद्योगपति रतन टाटा से संग्राम करती हैं, वही ममता बेनर्जी नई-दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मची भगदड के लिये बिहार के उन गरीब यात्रियों को ही क्यों ज़िम्मेदार ठहराती हैं? अगर ये ट्रेन बिहार की जगह बंगाल जा रही होती क्या तब भी रेलमंत्री का ऎसा ही निष्ठुर बयान आता? इस हादसे ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बदइंतज़ामी की पोल तो खोली ही है, साथ ही भेड बकरीयों की तरह लोकल बोगीयों में ठुसकर यात्रा करने को मजबूर इस देश की आधी से भी ज़्यादा आबादी का दर्द भी बंया किया है! जो ये जानते हैं कि ये यात्रा उनकी अंतिम यात्रा साबित हो सकती है फिर भी लोकल ट्रेनों की साधरण बोगीयों में सफर करने को मजबूर हैं! वो जानते हैं इन लोकल बोगीयों में उनके साथ कोई भी हादसा हो सकता है! इन लोकल बोगीयों में सुरक्षा के भी कोई प्रबंध नहीं होते! रात के सफर के दौरान भी नहीं! शायद सरकार ये सोचती है कि गरीबों को सुरक्षा की क्या ज़रूरत? उनके पास है ही क्या जो लुट सकता है? रही बात गरीबों की जान की तो वो कितनी सस्ती है ये बताने की ज़रूरत नहीं! मुंबई में आज भी लोग लोकल ट्रेनों में लटक कर और उसकी छतों पर सफर करते हैं! सवाल ये है कि क्या वो ये रिस्क अपनी मर्ज़ी से उठाते हैं या वो ऎसा करने को मजबूर हैं? रेल मंत्रालय ने अमीर तबके लिये तो लक्ज़री यात्रा के तमाम प्रबंध किये हैं! और वो उनकी सुविधाओं का पूरा-पूरा ख्याल भी रखता आया है! लेकिन हमारी समाजवादी सरकार ने लोकल ट्रेन में सफर करने वाले गरीब वर्ग की तकलीफों को दूर करने की कोई कोशिश कभी क्यों नहीं की? क्या हमारी रेल मंत्री एक आम भारतीय की तरह लोकल ट्रेन में सफर कर सकती हैं? मैं दावे के साथ कह सकता हूं नहीं! तो फिर इस देश की आधी से ज्यादा आबादी को इतना कष्टदायक सफर करने के लिये मजबूर क्यों बना दिया गया है? मुझे याद है जब मैं कालेज में पढता था, मैंने कहीं जाने के लिये ट्रेन का टिकिट खरीदा! ट्रेन दो घंटे लेट थी! इतने इंतज़ार के बाद जब ट्रेन आई तो मैं हैरान था, क्योंकि ट्रेन की लोकल बोगी में पैर रखने तक की जगह नहीं थी! फिर भी लोग उसमें घुसे चले जा रहे थे! लेकिन खचा-खच भरी उस लोकल बोगी में घुसने की मेरी हिम्मत नहीं हुई! जाना चूंकि ज़रूरी था और मैं वो ट्रेन मिस नहीं कर सकता था, इसलिये मैंने फर्स्ट क्लास की खाली बोगी में सफर करने का फैसला किया! जब टीसी ने टिकिट चेक किया तो साधारण श्रेणी का टिकिट देख कर उसने मुझे फाईन भरने को कहा! उस वक्त समाजवाद से कुछ ज़्यादा ही प्रभावित था सो कह दिया, मैं अपनी मर्ज़ी से अमीरों की बोगी में नहीं चढा, आपका रेलवे फर्स्ट क्लास की तो इतनी बोगी ट्रेन में लगवाता है क्या कुछ लोकल बोगीयां नहीं लगा सकता? टीसी ने कहा, अगर इस ट्रेन में जगह नहीं थी तो आपको अगली ट्रेन का इंतज़ार करना चाहिये था! क्या आम आदमी के वक्त की कीमत नहीं होती? और क्या आपको लगता है कि अगली ट्रेन की लोकल बोगी खाली होगी? मैंने एक और सवाल दाग दिया! मेरे समाजवादी सत्याग्रह से झल्लाकर टीसी आगे बढ गया! खैर मैं बात रेल मंत्री की कर रहा था! हमारी रेलमंत्री का कहना है कि दिल्ली उनका घर नहीं है! उनका घर तो बंगाल में है! इस बयान से क्षेत्रवाद की बू आती है! हैरानी की बात ये है कि कांग्रेस रेलमंत्री के इस बयान का समर्थन कर रही है! क्षुद्र् राजनीतिक स्वार्थ किस कदर हावी हैं कि राष्ट्रीय पार्टीयां भी उनका समर्थन करने को मजबूर हैं! लेकिन ये सिर्फ भारत में ही हो सकता है जब गैर ज़िम्मेदाराना बयानों के लिये दो केन्द्रीय मंत्रीयों को फटाकार और एक को निष्कासित किया जाता है तभी लगातार गैरज़िम्मेदाराना बयानों के लिये एक केन्द्रीय मंत्री का समर्थन भी किया जाता है!
Friday, 14 May 2010
मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ फतवा जारी
मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ देश की सबसे बड़ी मुस्लिम संस्था दारुल उलूम, देवबंद
ने फतवा जारी कर दिया है। इसके मुताबिक मुस्लिम महिलाओं का पुरुषों के साथ काम करना इस्लाम धर्म के खिलाफ है। एक टीवी चैनल की वेबसाइट के मुताबिक, इस फतवे में कहा गया है कि मुस्लिम महिलाओं का ऐसी कोई भी सरकारी या प्राइवेट नौकरी करना गैरइस्लामी है, जिसमें महिला और पुरुष एकसाथ काम करते हों और महिलाओं को पुरुषों से बिना पर्दे के बात करनी पड़ती हो। देवबंद के धार्मिक नेताओं का कहना है कि शरियत में साफ साफ कहा गया है कि मुस्लिम महिलाएं ऑफिस में बुरका पहनकर जाएं और पुरुष कॉलीग्स के साथ बातचीत न करें। इस फतवे का दूसरे मुस्लिम संप्रदायों ने भी समर्थन किया है। सुन्नी मुस्लिम नेता मौलाना अबुल इरफान ने कहा कि जो औरतें करियर बना रही हैं, उन्हें जीते जी तो बहुत कामयाबी मिल सकती है, लेकिन मौत के बाद उन्हें ऊपर वाले को जवाब देना होगा। तब उन्हें अपने करियर के फैसले पर अफसोस होगा।
Thursday, 13 May 2010
गरीबी हटाओ, लेकिन गरीबों को बख्श दो: दिल्ली से योगेश गुलाटी
दो भारत बसते हैं यारों मेरे हिन्दुस्तान में....इक रहता सोने की बस्ती,एक रहता कब्रिस्तान में!!हां वो बिल्कुल ऎसा ही लग रहा था....मानो वो किसी कब्रिस्तान से ही उठ कर आया हो! वो किसी ज़िन्दा भूत से कम नहीं लग रहा था! उसका जिस्म लगभग नंगा था...! मांस पर उभरी हड्डीयों का कंकाल उसकी बेबसी और गरीबी की कहानी बयां कर रहा था! उसका वो चेहरा अब भी मेरी आंखों के सामने घूम रहा है! गरीबी का वो ज़िंदा भूत मुझे सोने नहीं दे रहा! नहीं मैं भूत से बिल्कुल नहीं डरता, क्या भूत इंसान नहीं होते? होते हैं वो भी इंसान होते हैं.....अज नहीं कभी तो होते थे? लेकिन मुझे तो डर उनसे लगता है जो इंसान होकर भी इंसान नहीं! जो महलों में रहते हैं लेकिन झोंपडी में रहने वालों का दर्द नहीं समझते! जो एसी में रहते हैं लेकिन तपती दुपहरी में उनके आलीशान बंगलों की नींवें भरने वालों की पीड वो नहीं समझते! वो अंग्रेज़ी में बतियाते हैं लेकिन हिंदुस्तानी आत्मा की तकलीफ को नहीं समझते! जिन गरीबों की मेहनत से वो अपना साम्राज्य खडा करते हैं, उन गरीबों को दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम भी नहीं करते!चारों तरफ से चमक रहा दिल्ली का कनाट प्लेस! इस इलाके की तस्वीर बदलने का काम अब भी पूरे ज़ोर शोर से होरहा है! पुराने हो चले कनाट प्लेस को बिल्कुल आधुनिक बना दिया गया है! सफेद रंग में रंगी इसकी इमारतें संगेमरमर को भी शर्मिंदा कर रही हैं! हर-तरफ चका-चौंध, सुंदरता, और अइश्वर्य बिखरा है! इसे देख कर एक विकसित भारत की तस्वीर बनने लगती है! चारों और विदेशी सैलानीयों का जमावडा और चमचमाती गाडियों का शोर....इन सब की बीच कनाट प्लेस सर्कल पर बने मेट्रो स्टेशन की सीढीयों से नीचे उतरते हुए मेरे पैर अचानक थम गये! हां गरीबी का वो ज़िंदा भूत वहीं बैठा था! मैंने देखा लोग उसे हिकारत भरी नज़रों से देखते हुए दूर से निकल रहे हैं.....शायद सराकार की ही तरह उन्हें भी दिल्ली की शान में गरीबी का वो धब्बा सुहा नहीं रहा था! कुछ दिन पहले कनाट प्लेस से गरीबों और भिखारियों को हटाने की मुहीम सरकार ने चलाई थी! जिसमें सारे गरीबों को उस इलाके से हटा दिया गया था! लेकिन आश्चर्य गरीबी का वो ज़िंदा भूत वैभव की प्रतीक मेट्रो की सीढीयों पर बैठा...सरकार की उस मुहीम को मुंह छिढा रहा था! उसकी हालत वाकई में दयनीय थी! तपती दुपहरी मेँ उसके तन पर एक कपडा ना था! गरीबों की जान बडी सख्त होती है.....वो इतनी आसानी से नहीं निकलती! शायद इसीलिये वो ज़िंदा था! लेकिन उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं था! हां मैं भी नहीं! मुझे लगा वो भूखा है! मैं जानता हूं दस रुपये में दिल्ली में खाना नहीं मिलता, फिर भी मैंने दस का एक नोट उसके हाथ में थमा दिया! लेकिन मैं जानता था ये काफी नहीं है....! उसे कपडों की ज़रूरत थी! उसे दवाओं और इलाज की ज़रूरत थी! इन सबके बाद उसे काम की ज़रूरत थी! मैं ये सोछ ही रहा था कि पीछे से एक रौबदार आवाज़ आई...."तू फिर यहां आकर बैठ गया?" तुझे भी ठिकाने लगाना पडेगा! मैंने पीछे मुड कर देखा, वो दिल्ली पुलिस का सिपाही था! उसे भी सरकार की ही तरह वो गरीबी का ज़िंदा भूत शायद अच्छा नहीं लग रहा था! सिपाही की बात सुनकर वो डर गया! उसकी उम्र 25-30 की रही होगी! लेकिन वो इतना कमज़ोर था कि उठ नहीं पा रहा था! लेकिन जब वो उठ कर खडा हुआ तो....लोग उससे कट कर गुज़रने लगे...मानो इन्सान नहीं वाकई में कोई भूत हो! हां गरीबी का वो ज़िंदा भूत खडा हो गया था! लेकिन उसने किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया! वो अपने लिये वो जगह तलाशने लगा, जहां अमीर ना हों! लेकिन मैं जानता था कि कम से कम कनाट प्लेस में तो ऎसी कोई जगह नहीं थी!
गरीबी हटाओ, लेकिन गरीबों को बख्श दो: दिल्ली से योगेश गुलाटी
दो भारत बसते हैं यारों मेरे हिन्दुस्तान में....
इक रहता सोने की बस्ती,एक रहता कब्रिस्तान में!!
हां वो बिल्कुल ऎसा ही लग रहा था....मानो वो किसी कब्रिस्तान से ही उठ कर आया हो! वो किसी ज़िन्दा भूत से कम नहीं लग रहा था! उसका जिस्म लगभग नंगा था...! मांस पर उभरी हड्डीयों का कंकाल उसकी बेबसी और गरीबी की कहानी बयां कर रहा था! उसका वो चेहरा अब भी मेरी आंखों के सामने घूम रहा है! गरीबी का वो ज़िंदा भूत मुझे सोने नहीं दे रहा! नहीं मैं भूत से बिल्कुल नहीं डरता, क्या भूत इंसान नहीं होते? होते हैं वो भी इंसान होते हैं.....अज नहीं कभी तो होते थे? लेकिन मुझे तो डर उनसे लगता है जो इंसान होकर भी इंसान नहीं! जो महलों में रहते हैं लेकिन झोंपडी में रहने वालों का दर्द नहीं समझते! जो एसी में रहते हैं लेकिन तपती दुपहरी में उनके आलीशान बंगलों की नींवें भरने वालों की पीड वो नहीं समझते! वो अंग्रेज़ी में बतियाते हैं लेकिन हिंदुस्तानी आत्मा की तकलीफ को नहीं समझते! जिन गरीबों की मेहनत से वो अपना साम्राज्य खडा करते हैं, उन गरीबों को दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम भी नहीं करते!
चारों तरफ से चमक रहा दिल्ली का कनाट प्लेस! इस इलाके की तस्वीर बदलने का काम अब भी पूरे ज़ोर शोर से होरहा है! पुराने हो चले कनाट प्लेस को बिल्कुल आधुनिक बना दिया गया है! सफेद रंग में रंगी इसकी इमारतें संगेमरमर को भी शर्मिंदा कर रही हैं! हर-तरफ चका-चौंध, सुंदरता, और अइश्वर्य बिखरा है! इसे देख कर एक विकसित भारत की तस्वीर बनने लगती है! चारों और विदेशी सैलानीयों का जमावडा और चमचमाती गाडियों का शोर....इन सब की बीच कनाट प्लेस सर्कल पर बने मेट्रो स्टेशन की सीढीयों से नीचे उतरते हुए मेरे पैर अचानक थम गये! हां गरीबी का वो ज़िंदा भूत वहीं बैठा था! मैंने देखा लोग उसे हिकारत भरी नज़रों से देखते हुए दूर से निकल रहे हैं.....शायद सराकार की ही तरह उन्हें भी दिल्ली की शान में गरीबी का वो धब्बा सुहा नहीं रहा था! कुछ दिन पहले कनाट प्लेस से गरीबों और भिखारियों को हटाने की मुहीम सरकार ने चलाई थी! जिसमें सारे गरीबों को उस इलाके से हटा दिया गया था! लेकिन आश्चर्य गरीबी का वो ज़िंदा भूत वैभव की प्रतीक मेट्रो की सीढीयों पर बैठा...सरकार की उस मुहीम को मुंह छिढा रहा था! उसकी हालत वाकई में दयनीय थी! तपती दुपहरी मेँ उसके तन पर एक कपडा ना था! गरीबों की जान बडी सख्त होती है.....वो इतनी आसानी से नहीं निकलती! शायद इसीलिये वो ज़िंदा था! लेकिन उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं था! हां मैं भी नहीं! मुझे लगा वो भूखा है! मैं जानता हूं दस रुपये में दिल्ली में खाना नहीं मिलता, फिर भी मैंने दस का एक नोट उसके हाथ में थमा दिया! लेकिन मैं जानता था ये काफी नहीं है....! उसे कपडों की ज़रूरत थी! उसे दवाओं और इलाज की ज़रूरत थी! इन सबके बाद उसे काम की ज़रूरत थी! मैं ये सोछ ही रहा था कि पीछे से एक रौबदार आवाज़ आई...."तू फिर यहां आकर बैठ गया?" तुझे भी ठिकाने लगाना पडेगा! मैंने पीछे मुड कर देखा, वो दिल्ली पुलिस का सिपाही था! उसे भी सरकार की ही तरह वो गरीबी का ज़िंदा भूत शायद अच्छा नहीं लग रहा था! सिपाही की बात सुनकर वो डर गया! उसकी उम्र 25-30 की रही होगी! लेकिन वो इतना कमज़ोर था कि उठ नहीं पा रहा था! लेकिन जब वो उठ कर खडा हुआ तो....लोग उससे कट कर गुज़रने लगे...मानो इन्सान नहीं वाकई में कोई भूत हो! हां गरीबी का वो ज़िंदा भूत खडा हो गया था! लेकिन उसने किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया! वो अपने लिये वो जगह तलाशने लगा, जहां अमीर ना हों! लेकिन मैं जानता था कि कम से कम कनाट प्लेस में तो ऎसी कोई जगह नहीं थी!
Wednesday, 12 May 2010
खाप पंचायतों का बढ़ता खौफ
इंडियन नेशनल लोक दल के प्रधान ओम प्रकाश चौटाला और काग्रेस के युवा सासद नवीन जिंदल में क्या समानता ढूंढ़ी जा सकती है? अगर राजनीतिक प्रतिबद्धताओं को देखें या उम्र का फासला देखें तो कुछ भी एक जैसा नहीं है। अलबत्ता खाप पंचायतों को लेकर दिए अपने ताजे बयान के बाद दोनों एक ही तरफ खड़े दिखाई देते हैं।
पिछले कुछ समय से खाप पंचायतों की तरफ से एक मुहिम चल रही है, जिसके अंतर्गत हिंदू विवाह अधिनियम की धारा-5 को बदलने की माग उठी है। कहा जा रहा है कि चूंकि इसके अंतर्गत सगोत्र शादियों की इजाजत है, इसलिए इसे समाप्त किया जाए या परिवर्तित किया जाए।
देखा जा सकता है कि मनोज-बबली हत्याकांड में आए अदालती फैसले के बाद [जिसमें अपनी इच्छा से शादी किए इस युवा जोड़े को मारने के आदेश इलाके की खाप पंचायत ने जारी किए थे], जिसमें हत्या में शामिल कातिलों को सजा सुनाई गई है, इस मुहिम ने जोर पकड़ा है।
पिछले दिनों पाई नामक स्थान पर हुई ऐसी ही सर्वखाप पंचायत में अपने आधार को बढ़ाने की फिराक में खाप पंचायत की महिला विंग और युवा विंग का भी गठन किया गया था। लोगों को याद होगा कि सर्वखाप पंचायतों के ऐसे ही एक सम्मेलन में यह ऐलान किया गया था कि वह आगे की रणनीति के तौर पर नवीन जिंदल के घर को घेरेगा ताकि उन पर तथा बाकी संसद सदस्यों पर दबाव बनाया जा सके।
सभी जानते हैं कि दलित अत्याचारों का मसला हो या 'इज्जत' की रक्षा के नाम पर की जाने वाली हत्याओं का मामला, खाप पंचायतों ने हमेशा मानवीय तर्क प्रणाली को नकारने की कोशिश की है। राज्य, कानून और अधिकारों के स्थान पर बैठे लोगों द्वारा प्रदत्त 'संरक्षण' के बिना खापों के लिए यह संभव नहीं होता कि वह देश के कानूनों को चुनौती देने वाले निर्णय लें। हिसार जिले में घटित मिर्चपुर काड ने भी इस हकीकत को उजागर किया था कि दलितों की बस्ती पर हमला करने के पहले बाकायदा खाप पंचायत बिठाई गई थी, जिसने इसे अंजाम देने के आदेश दिए थे।
हरियाणा के प्रख्यात युवा उद्योगपति नवीन जिंदल ने इस बात का इंतजार किए बिना कि उनकी पार्टी की इस मसले पर आधिकारिक पोजिशन क्या है, पिछले दिनों बयान दिया कि वह सगोत्र विवाह के खिलाफ खाप पंचायतों की मुहिम के साथ हैं और वह संसद में इस माग को रखेंगें।
ध्यान देने योग्य है कि कैथल जिले में सर्व जाति सर्व खाप पंचायत के जलसे में पहुंचकर जनाब नवीन जिंदल ने बाकायदा इस बात का ऐलान किया।
खाप पंचायतों द्वारा ऐसे मामलों को लेकर बरपाए जाते कहर के इस माहौल में कुछ ऐसी खबरें भी छन-छनकर आती हैं, जो बताती हैं कि उम्मीद महज एक शब्द नहीं है। अपनी मर्जी से शादी करनेवाले तमाम लोगों का जीना मुश्किल कर देने वाले खाप पंचायतों के फरमानों को चुनौती देता एक गाव उसी हरियाणा में ही मौजूद है- सिरसा जिले का चौटाला गाव।
इसकी सबसे ताजी मिसाल उसी गाव के रहने वाले 21 वर्षीय राकेश गौरिया और उसकी पत्नी सरोज हैं, जो परीकथाओं की तर्ज पर इन दिनों 'खुशी से अपनी जिंदगी बीता रहे हैं।' राकेश की बहन मंजू ने भी अपने पड़ोस के युवक से शादी की है, यहा तक कि राकेश की 65 वर्षीय दादी रामप्यारी ने भी अपने पड़ोसी से ब्याह रचाया था।
दिलचस्प है कि इस गाव में दो सौ से अधिक ऐसे जोड़े यानी 400 से अधिक ऐसे लोग हैं, जिन्होंने उसी गाव में अपना बचपन बिताया है और जिन्होंने उसी गाव में अपने लिए जीवनसाथी भी तलाशा है। साफ है कि ये लोग अगर कहीं बाहर रह रहे होते तो तमाम प्रताड़नाओं के शिकार हो जाते।
अपने गाव में अपनी ही मर्जी से शादी कर रह रहे सबसे बुजुर्ग लोगों में 71 वर्षीय राम परताप को शुमार किया जा सकता है, जिन्होंने अपनी पड़ोसन लिछमा से चालीस साल पहले शादी की थी। अपने वैवाहिक जीवन से बेहद प्रसन्न लिछमा कहती हैं कि अपने गाव में ही शादी करना अपराध कैसे हो गया। मुझे देखिए, जब चाहे मैं अपने माता-पिता से मिल सकती हूं। बेहद सहिष्णु और प्रगतिशील जान पड़ने वाला चौटाला गाव अकेला नहीं है। इसके बगल में स्थित भारू खेड़ा में भी जब 21 साल के राकेश रतिवाल ने गाव की ही 18 वर्षीय अलका से शादी करने की इच्छा जाहिर की, तब उसका जोरदार समर्थन राकेश के पिता बलराज ने किया। समूचा गाव इस शादी में शरीक हुआ।
इन दिनों हरियाणा प्रशासकीय सुधार आयोग के सदस्य डीआर चौधरी, जिन्होंने 1948 में अपने ही गाव में शादी की थी, बताते हैं कि सिरसा, हिसार और फतेहाबाद जिलों में या राजस्थान के बाड़मेर या जैसलमेर जिलों में ऐसे कई गाव हैं, जिन्होंने ऐसे मध्ययुगीन कानूनों को चुनौती दी है।
माल और देसी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तरों के लिए मशहूर गुड़गांव से कुछ वक्त पहले स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत बढ़ती शादियों की खबर आई थी। मालूम हो कि यह वही कानून है, जिसके तहत अंतरजातीय यहा तक कि अंतरधर्मीय विवाह भी संभव है। अगर पारंपारिक शादी एक सामाजिक शादी है तो इसके अंतर्गत की जाने वाली शादी एक वैधानिक प्रक्रिया है, जिसके लिए महज मूल जन्म प्रमाणपत्र और चंद गवाहों की जरूरत होती है। वैसे यह अधिनियम 1954 में ही बना था, लेकिन बनने के साढ़े चार दशक बाद भी नतीजे सिफर ही साबित हो रहे थे, लेकिन इधर बीच इनमें तेजी आ रही है।
अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने के मामले में समाज के समर्थन की एक नायाब मिसाल महाराष्ट्र के जिला चंद्रपूर का छोटा-सा गाव करंजी है। मुश्किल से दो हजार आबादी वाले इस गाव में बीते पाच साल में 38 प्रेम विवाह हुए हैं, जिनमें से 20 अंतरजातीय विवाह हैं तो 18 जाति के भीतर प्रेम विवाह हैं। नंदा-रामभाऊ जितार, नलेश्वर गजभे-वंदना, छब्बुताई-प्रेमचंद, राकेश थेरकर-सुनंदा, वनिता चापले, बाली भडके, संदेश पचारे, वत्सला वानोडे, छोटी खोब्रागडे, सतीश बावणे, सुरमुखसिंग डागी आदि कुछ नाम हैं, जिन्होंने अंतरजातीय शादी की है।
ऐसा नहीं कि यह सिलसिला बहुत सुनियोजित था। यह वर्ष 2005 की बात थी, जब पास के एक गाव से एक जोड़ा करंजी पहुंचा। अशोक गरपल्लीवार जहा कुम्भार जाति से संबधित था तो मीनाक्षी देउलमाले तेली जाति से संबधित थी। वे दरअसल अपने परिवार वालों के डर से भागते हुए करंजी पहुंचे थे और गाव के ही मंदिर में रुके थे। उनके आने की खबर पंचायत को लगी और उन दोनों को पंचायत कार्यालय बुलाया गया। सरपंच प्रभाताई खोब्रागडे और पंचायत के बाकी सदस्यों ने उनसे लंबी बातचीत की। उन्होंने महसूस किया कि अगर इन दोनों की शादी नहीं कराई गई तो वे आत्महत्या भी कर सकते हैं। प्रभाताई की पहल पर दोनों के माता-पिता को बुलाया गया और समझाया गया। वे मन मारकर इस रिश्ते के लिए राजी हो गए। प्रभाताई आखों में चमक लिए बताती हैं कि इस युगल की दोनों बेटिया गाव के ही स्कूल में जाती हैं। धीरे-धीरे पंचायत के इस अनूठे हस्तक्षेप की खबर दूर-दूर तक फैली और कई प्रेमी युगल वहा पहुंचने लगे। अगल-बगल के गाव के ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश से भी कुछ युगल यहा पहुंचे।
प्रश्न उठता है कि क्या करंजी पहले से ही ऐसा था। बिल्कुल नहीं! महज सात साल पहले गाव में विभिन्न जातियों में आपस में भी काफी तनाव था। दलितों के अपने अलग कुएं थे, पिछड़ी जातियों के अपने अलग। अब बहुत कुछ बदल गया है। यह अकारण नहीं कि महाराष्ट्र की सरकार ने इस गाव को 'तंटामुक्त' यानी झगड़ों से मुक्त गाव होने के नाते विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया है।
छोटे-से ग्राम करंजी में नजर आ रहे इस बड़े करिश्मे के पीछे किसी संगठित सामाजिक समूह का हाथ भले न हो, लेकिन अपने आप में यह खबर विलक्षण है कि आज की तारीख में यह छोटा-सा गाव समूचे जिले के लिए ही नहीं, पूरे सूबे के लिए एक नजीर बना है।
भारत के उज्वल भविष्य की कामना रखने वाले हर शख्स को अब यह तय करना है कि क्या खापों के कुहासे में इस मंजिल को पाया जा सकता है या करंजी के उजास में!
उदारवादी सोच रखें खाप पांचायतें
डा. एमएस मलिक। चिंता की बात है कि सम्मानित खाप और सर्वखाप पंचायतों का प्रचाीन गौरवपूर्ण इतिहास आज विवादास्पद, विरोधाभाष व आलोचना का केंद्र बनता जा रहा है। इन सम्मानित खाप पंचायतों की ऐतिहासिक पृष्टिभूमि का अध्ययन करने से पता चलता है कि खाप पंचायतों ने शुरू से ही ग्रामीण समाज में सद्भावना, भाईचारा व शांति का माहौल बनाए रखने के लिए अहम निर्णायक कार्य किए हैं, जिस कारण इनका फैसला हर व्यक्ति सिर-माथे पर स्वीकार कर लेता था और इन्हें सम्मान से पंच-परमेश्वर के खिताब से जाना जाता था। खाप पंचायतों द्वारा सूझबूझ से लिए गए निर्णय पूरे राष्ट्र के लिए न्याय के स्रोत साबित हुए हैं।
सर्वखाप पंचायतों के गौरवपूर्ण इतिहास व सम्मानजनक छवि के ठीक विपरीत आज सर्वखाप पंचायतों का मौलिक स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। मेरा मानना है कि आज सर्वखाप पंचायतों के अंदर शरारती एवं राजनैतिक तत्व अपने निजी स्वार्थो की पूर्ति के लिए प्रवेश कर रहे हैं, जिस कारण इनके वास्तविक मुद्दे धूमिल होते जा रहे हैं और सदियों पुरानी यह सम्मानित व्यवस्था नुक्ताचीनी व विरोधाभास का विषय बन गई है। आज कुछेक खाप पंचायतें दिशाहीन व नेतृत्वविहीन संगठनों की तरह कार्य कर रही हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि खाप पंचायतों का न तो कोई सामूहिक नेतृत्व है और न ही कोई एकछत्र नेतृत्व। शायद इसीलिए खाप पंचायतें स्वार्थपूर्ण व विभाजित नेतृत्व का शिकार हो रही हैं, जिस कारण इन खाप पंचायतों द्वारा दिए जा रहे बिना सूझबूझ व तर्कहीन फैसलों विशेषकर सगोत्र व अंतरजातीय विवाह से उत्पन्न विवादों के संदर्भ में दिए जा रहे मानमाने फैसलों की हर जगह आलोचना हो रही है। ये निर्णय सामाजिक भाईचारे और आपसी मेल-मिलाप के लिए बहुत नुकसानदायक सिद्ध हो रहे हैं।
इसके अलावा युवा वर्ग में निरंतर बढ़ती बेरोजगारी तथा भविष्य की अनिश्चितता के कारण उत्पन्न गंभीर उदासीनता भी खाप पंचायतों की प्राचीन परंपराओं तथा रूढि़वादी विचारधारा के साथ टकराव का कारण बनती जा रही है। यही कारण कि आज की युवा पीढ़ी का शादी-विवाह के मामलों में परंपराओं व रीति-रिवाजों का उल्लंघन करने के कारण खाप पंचायतों से निरंतर टकराव बढ़ रहा है। अनेक युवा दंपती खाप पंचायतों के सामाजिक बहिष्कार, गांव छोड़ने तथा पवित्र बंधन का त्याग करके भाई-बहन का रिश्ता कायम करने तक के बेतुकी फरमानों से दुखी होकर कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहे हैं।
खाप पंचायतों के प्रतिनिधियों द्वारा कई बार भावनाओं से वशीभूत होकर उत्तेजित भाषण दिए जाते हैं, जिसे मीडिया द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। इससे खाप पंचायतों की भूमिका का समाज में गलत संदेश जाता है।
आज कुछेक विभाजित खाप प्रतिनिधि अपने निजी स्वार्थो के कारण सामाजिक विवादों को हल निकालने की बजाए सत्ताधारी दलों के राजनेताओं व अपने राजनैतिक आकाओं के सामने उपस्थिति दर्ज कराने में ज्यादा रुचि रखते हैं। पिछले पांच-छह सालों के अंदर ग्रामीण समाज में हुई हिंसक घटनाएं विशेषकर कमजोर नेतृत्व वाली जातियों में हुए विवादों को सुलझाने में भी खाप पंचायतों की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगे हैं। हरियाणा में कैथल, करनाल, झज्जर, गोहाना तथा मिर्चपुर जिला हिसार में हुई पलायन, आगजनी व हत्या की घटनाएं जिनके अंदर सवर्ण जाति के लोगों को मुख्य रूप से दोषी माना गया है, को सुलझाने में भी खाप पंचायतों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं। इन विवादों को सुलझाने व प्रभावित वर्गो में शांति व सुरक्षा का माहौल स्थापित करने में खाप पंचायतें विफल रहीं हैं।
मेरा मानना है कि आज सगोत्र व गोत्र विवाह संबंधी विवाद केवल हरियाणा में नहीं, बल्कि समस्त उत्तरी भारत की एक गंभीर सामाजिक समस्या बन चुकी है और यह जाट वर्ग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अन्य जातियों व वर्गो में भी इस तरह के विवाद उत्पन्न हो रहे हैं।
प्राचीन सामाजिक परंपराएं हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं, जिनका अनुशरण किया जाना बहुत जरूरी है और इन परंपराओं को तोड़ना व उल्लघंन करना सामाजिक अपराध के क्षेत्र में आता है। यह सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुसार दंडनीय है। हमें हर हालत में दूध व खून के रिश्ते का खयाल रखना है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी मानव शरीर में जींस के संतुलन को कायम रखने तथा वंश के विकास व अनुवांशिक बीमारियों से बचने के लिए सगोत्र शादी वर्जित है। मेरा सुझाव है कि सर्वखाप पंचातयों को भी समय के साथ-साथ अपनी कार्यव्यवस्था व आचार संहिता में जरूरी बदलवाव लाना चाहिए। आज समय तेजी के साथ बदल रहा है। अत: खाप प्रतिनिधियों को भी उदारवादी सोच अपनानी चाहिए।
पिछले कुछ समय से खाप पंचायतों की तरफ से एक मुहिम चल रही है, जिसके अंतर्गत हिंदू विवाह अधिनियम की धारा-5 को बदलने की माग उठी है। कहा जा रहा है कि चूंकि इसके अंतर्गत सगोत्र शादियों की इजाजत है, इसलिए इसे समाप्त किया जाए या परिवर्तित किया जाए।
देखा जा सकता है कि मनोज-बबली हत्याकांड में आए अदालती फैसले के बाद [जिसमें अपनी इच्छा से शादी किए इस युवा जोड़े को मारने के आदेश इलाके की खाप पंचायत ने जारी किए थे], जिसमें हत्या में शामिल कातिलों को सजा सुनाई गई है, इस मुहिम ने जोर पकड़ा है।
पिछले दिनों पाई नामक स्थान पर हुई ऐसी ही सर्वखाप पंचायत में अपने आधार को बढ़ाने की फिराक में खाप पंचायत की महिला विंग और युवा विंग का भी गठन किया गया था। लोगों को याद होगा कि सर्वखाप पंचायतों के ऐसे ही एक सम्मेलन में यह ऐलान किया गया था कि वह आगे की रणनीति के तौर पर नवीन जिंदल के घर को घेरेगा ताकि उन पर तथा बाकी संसद सदस्यों पर दबाव बनाया जा सके।
सभी जानते हैं कि दलित अत्याचारों का मसला हो या 'इज्जत' की रक्षा के नाम पर की जाने वाली हत्याओं का मामला, खाप पंचायतों ने हमेशा मानवीय तर्क प्रणाली को नकारने की कोशिश की है। राज्य, कानून और अधिकारों के स्थान पर बैठे लोगों द्वारा प्रदत्त 'संरक्षण' के बिना खापों के लिए यह संभव नहीं होता कि वह देश के कानूनों को चुनौती देने वाले निर्णय लें। हिसार जिले में घटित मिर्चपुर काड ने भी इस हकीकत को उजागर किया था कि दलितों की बस्ती पर हमला करने के पहले बाकायदा खाप पंचायत बिठाई गई थी, जिसने इसे अंजाम देने के आदेश दिए थे।
हरियाणा के प्रख्यात युवा उद्योगपति नवीन जिंदल ने इस बात का इंतजार किए बिना कि उनकी पार्टी की इस मसले पर आधिकारिक पोजिशन क्या है, पिछले दिनों बयान दिया कि वह सगोत्र विवाह के खिलाफ खाप पंचायतों की मुहिम के साथ हैं और वह संसद में इस माग को रखेंगें।
ध्यान देने योग्य है कि कैथल जिले में सर्व जाति सर्व खाप पंचायत के जलसे में पहुंचकर जनाब नवीन जिंदल ने बाकायदा इस बात का ऐलान किया।
खाप पंचायतों द्वारा ऐसे मामलों को लेकर बरपाए जाते कहर के इस माहौल में कुछ ऐसी खबरें भी छन-छनकर आती हैं, जो बताती हैं कि उम्मीद महज एक शब्द नहीं है। अपनी मर्जी से शादी करनेवाले तमाम लोगों का जीना मुश्किल कर देने वाले खाप पंचायतों के फरमानों को चुनौती देता एक गाव उसी हरियाणा में ही मौजूद है- सिरसा जिले का चौटाला गाव।
इसकी सबसे ताजी मिसाल उसी गाव के रहने वाले 21 वर्षीय राकेश गौरिया और उसकी पत्नी सरोज हैं, जो परीकथाओं की तर्ज पर इन दिनों 'खुशी से अपनी जिंदगी बीता रहे हैं।' राकेश की बहन मंजू ने भी अपने पड़ोस के युवक से शादी की है, यहा तक कि राकेश की 65 वर्षीय दादी रामप्यारी ने भी अपने पड़ोसी से ब्याह रचाया था।
दिलचस्प है कि इस गाव में दो सौ से अधिक ऐसे जोड़े यानी 400 से अधिक ऐसे लोग हैं, जिन्होंने उसी गाव में अपना बचपन बिताया है और जिन्होंने उसी गाव में अपने लिए जीवनसाथी भी तलाशा है। साफ है कि ये लोग अगर कहीं बाहर रह रहे होते तो तमाम प्रताड़नाओं के शिकार हो जाते।
अपने गाव में अपनी ही मर्जी से शादी कर रह रहे सबसे बुजुर्ग लोगों में 71 वर्षीय राम परताप को शुमार किया जा सकता है, जिन्होंने अपनी पड़ोसन लिछमा से चालीस साल पहले शादी की थी। अपने वैवाहिक जीवन से बेहद प्रसन्न लिछमा कहती हैं कि अपने गाव में ही शादी करना अपराध कैसे हो गया। मुझे देखिए, जब चाहे मैं अपने माता-पिता से मिल सकती हूं। बेहद सहिष्णु और प्रगतिशील जान पड़ने वाला चौटाला गाव अकेला नहीं है। इसके बगल में स्थित भारू खेड़ा में भी जब 21 साल के राकेश रतिवाल ने गाव की ही 18 वर्षीय अलका से शादी करने की इच्छा जाहिर की, तब उसका जोरदार समर्थन राकेश के पिता बलराज ने किया। समूचा गाव इस शादी में शरीक हुआ।
इन दिनों हरियाणा प्रशासकीय सुधार आयोग के सदस्य डीआर चौधरी, जिन्होंने 1948 में अपने ही गाव में शादी की थी, बताते हैं कि सिरसा, हिसार और फतेहाबाद जिलों में या राजस्थान के बाड़मेर या जैसलमेर जिलों में ऐसे कई गाव हैं, जिन्होंने ऐसे मध्ययुगीन कानूनों को चुनौती दी है।
माल और देसी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तरों के लिए मशहूर गुड़गांव से कुछ वक्त पहले स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत बढ़ती शादियों की खबर आई थी। मालूम हो कि यह वही कानून है, जिसके तहत अंतरजातीय यहा तक कि अंतरधर्मीय विवाह भी संभव है। अगर पारंपारिक शादी एक सामाजिक शादी है तो इसके अंतर्गत की जाने वाली शादी एक वैधानिक प्रक्रिया है, जिसके लिए महज मूल जन्म प्रमाणपत्र और चंद गवाहों की जरूरत होती है। वैसे यह अधिनियम 1954 में ही बना था, लेकिन बनने के साढ़े चार दशक बाद भी नतीजे सिफर ही साबित हो रहे थे, लेकिन इधर बीच इनमें तेजी आ रही है।
अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने के मामले में समाज के समर्थन की एक नायाब मिसाल महाराष्ट्र के जिला चंद्रपूर का छोटा-सा गाव करंजी है। मुश्किल से दो हजार आबादी वाले इस गाव में बीते पाच साल में 38 प्रेम विवाह हुए हैं, जिनमें से 20 अंतरजातीय विवाह हैं तो 18 जाति के भीतर प्रेम विवाह हैं। नंदा-रामभाऊ जितार, नलेश्वर गजभे-वंदना, छब्बुताई-प्रेमचंद, राकेश थेरकर-सुनंदा, वनिता चापले, बाली भडके, संदेश पचारे, वत्सला वानोडे, छोटी खोब्रागडे, सतीश बावणे, सुरमुखसिंग डागी आदि कुछ नाम हैं, जिन्होंने अंतरजातीय शादी की है।
ऐसा नहीं कि यह सिलसिला बहुत सुनियोजित था। यह वर्ष 2005 की बात थी, जब पास के एक गाव से एक जोड़ा करंजी पहुंचा। अशोक गरपल्लीवार जहा कुम्भार जाति से संबधित था तो मीनाक्षी देउलमाले तेली जाति से संबधित थी। वे दरअसल अपने परिवार वालों के डर से भागते हुए करंजी पहुंचे थे और गाव के ही मंदिर में रुके थे। उनके आने की खबर पंचायत को लगी और उन दोनों को पंचायत कार्यालय बुलाया गया। सरपंच प्रभाताई खोब्रागडे और पंचायत के बाकी सदस्यों ने उनसे लंबी बातचीत की। उन्होंने महसूस किया कि अगर इन दोनों की शादी नहीं कराई गई तो वे आत्महत्या भी कर सकते हैं। प्रभाताई की पहल पर दोनों के माता-पिता को बुलाया गया और समझाया गया। वे मन मारकर इस रिश्ते के लिए राजी हो गए। प्रभाताई आखों में चमक लिए बताती हैं कि इस युगल की दोनों बेटिया गाव के ही स्कूल में जाती हैं। धीरे-धीरे पंचायत के इस अनूठे हस्तक्षेप की खबर दूर-दूर तक फैली और कई प्रेमी युगल वहा पहुंचने लगे। अगल-बगल के गाव के ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश से भी कुछ युगल यहा पहुंचे।
प्रश्न उठता है कि क्या करंजी पहले से ही ऐसा था। बिल्कुल नहीं! महज सात साल पहले गाव में विभिन्न जातियों में आपस में भी काफी तनाव था। दलितों के अपने अलग कुएं थे, पिछड़ी जातियों के अपने अलग। अब बहुत कुछ बदल गया है। यह अकारण नहीं कि महाराष्ट्र की सरकार ने इस गाव को 'तंटामुक्त' यानी झगड़ों से मुक्त गाव होने के नाते विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया है।
छोटे-से ग्राम करंजी में नजर आ रहे इस बड़े करिश्मे के पीछे किसी संगठित सामाजिक समूह का हाथ भले न हो, लेकिन अपने आप में यह खबर विलक्षण है कि आज की तारीख में यह छोटा-सा गाव समूचे जिले के लिए ही नहीं, पूरे सूबे के लिए एक नजीर बना है।
भारत के उज्वल भविष्य की कामना रखने वाले हर शख्स को अब यह तय करना है कि क्या खापों के कुहासे में इस मंजिल को पाया जा सकता है या करंजी के उजास में!
उदारवादी सोच रखें खाप पांचायतें
डा. एमएस मलिक। चिंता की बात है कि सम्मानित खाप और सर्वखाप पंचायतों का प्रचाीन गौरवपूर्ण इतिहास आज विवादास्पद, विरोधाभाष व आलोचना का केंद्र बनता जा रहा है। इन सम्मानित खाप पंचायतों की ऐतिहासिक पृष्टिभूमि का अध्ययन करने से पता चलता है कि खाप पंचायतों ने शुरू से ही ग्रामीण समाज में सद्भावना, भाईचारा व शांति का माहौल बनाए रखने के लिए अहम निर्णायक कार्य किए हैं, जिस कारण इनका फैसला हर व्यक्ति सिर-माथे पर स्वीकार कर लेता था और इन्हें सम्मान से पंच-परमेश्वर के खिताब से जाना जाता था। खाप पंचायतों द्वारा सूझबूझ से लिए गए निर्णय पूरे राष्ट्र के लिए न्याय के स्रोत साबित हुए हैं।
सर्वखाप पंचायतों के गौरवपूर्ण इतिहास व सम्मानजनक छवि के ठीक विपरीत आज सर्वखाप पंचायतों का मौलिक स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। मेरा मानना है कि आज सर्वखाप पंचायतों के अंदर शरारती एवं राजनैतिक तत्व अपने निजी स्वार्थो की पूर्ति के लिए प्रवेश कर रहे हैं, जिस कारण इनके वास्तविक मुद्दे धूमिल होते जा रहे हैं और सदियों पुरानी यह सम्मानित व्यवस्था नुक्ताचीनी व विरोधाभास का विषय बन गई है। आज कुछेक खाप पंचायतें दिशाहीन व नेतृत्वविहीन संगठनों की तरह कार्य कर रही हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि खाप पंचायतों का न तो कोई सामूहिक नेतृत्व है और न ही कोई एकछत्र नेतृत्व। शायद इसीलिए खाप पंचायतें स्वार्थपूर्ण व विभाजित नेतृत्व का शिकार हो रही हैं, जिस कारण इन खाप पंचायतों द्वारा दिए जा रहे बिना सूझबूझ व तर्कहीन फैसलों विशेषकर सगोत्र व अंतरजातीय विवाह से उत्पन्न विवादों के संदर्भ में दिए जा रहे मानमाने फैसलों की हर जगह आलोचना हो रही है। ये निर्णय सामाजिक भाईचारे और आपसी मेल-मिलाप के लिए बहुत नुकसानदायक सिद्ध हो रहे हैं।
इसके अलावा युवा वर्ग में निरंतर बढ़ती बेरोजगारी तथा भविष्य की अनिश्चितता के कारण उत्पन्न गंभीर उदासीनता भी खाप पंचायतों की प्राचीन परंपराओं तथा रूढि़वादी विचारधारा के साथ टकराव का कारण बनती जा रही है। यही कारण कि आज की युवा पीढ़ी का शादी-विवाह के मामलों में परंपराओं व रीति-रिवाजों का उल्लंघन करने के कारण खाप पंचायतों से निरंतर टकराव बढ़ रहा है। अनेक युवा दंपती खाप पंचायतों के सामाजिक बहिष्कार, गांव छोड़ने तथा पवित्र बंधन का त्याग करके भाई-बहन का रिश्ता कायम करने तक के बेतुकी फरमानों से दुखी होकर कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहे हैं।
खाप पंचायतों के प्रतिनिधियों द्वारा कई बार भावनाओं से वशीभूत होकर उत्तेजित भाषण दिए जाते हैं, जिसे मीडिया द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। इससे खाप पंचायतों की भूमिका का समाज में गलत संदेश जाता है।
आज कुछेक विभाजित खाप प्रतिनिधि अपने निजी स्वार्थो के कारण सामाजिक विवादों को हल निकालने की बजाए सत्ताधारी दलों के राजनेताओं व अपने राजनैतिक आकाओं के सामने उपस्थिति दर्ज कराने में ज्यादा रुचि रखते हैं। पिछले पांच-छह सालों के अंदर ग्रामीण समाज में हुई हिंसक घटनाएं विशेषकर कमजोर नेतृत्व वाली जातियों में हुए विवादों को सुलझाने में भी खाप पंचायतों की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगे हैं। हरियाणा में कैथल, करनाल, झज्जर, गोहाना तथा मिर्चपुर जिला हिसार में हुई पलायन, आगजनी व हत्या की घटनाएं जिनके अंदर सवर्ण जाति के लोगों को मुख्य रूप से दोषी माना गया है, को सुलझाने में भी खाप पंचायतों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं। इन विवादों को सुलझाने व प्रभावित वर्गो में शांति व सुरक्षा का माहौल स्थापित करने में खाप पंचायतें विफल रहीं हैं।
मेरा मानना है कि आज सगोत्र व गोत्र विवाह संबंधी विवाद केवल हरियाणा में नहीं, बल्कि समस्त उत्तरी भारत की एक गंभीर सामाजिक समस्या बन चुकी है और यह जाट वर्ग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अन्य जातियों व वर्गो में भी इस तरह के विवाद उत्पन्न हो रहे हैं।
प्राचीन सामाजिक परंपराएं हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं, जिनका अनुशरण किया जाना बहुत जरूरी है और इन परंपराओं को तोड़ना व उल्लघंन करना सामाजिक अपराध के क्षेत्र में आता है। यह सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुसार दंडनीय है। हमें हर हालत में दूध व खून के रिश्ते का खयाल रखना है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी मानव शरीर में जींस के संतुलन को कायम रखने तथा वंश के विकास व अनुवांशिक बीमारियों से बचने के लिए सगोत्र शादी वर्जित है। मेरा सुझाव है कि सर्वखाप पंचातयों को भी समय के साथ-साथ अपनी कार्यव्यवस्था व आचार संहिता में जरूरी बदलवाव लाना चाहिए। आज समय तेजी के साथ बदल रहा है। अत: खाप प्रतिनिधियों को भी उदारवादी सोच अपनानी चाहिए।
Sunday, 9 May 2010
जाति भारतीय समाज की सच्चाई है: दिल्ली से योगेश गुलाटी
जाति आधारित जनगणना ना कराने पर अडी सरकार आखिर जातिगत जनगणना के लिये राजी हो ही गई! इसके पहले हमारे देश में इस तरह की जनगणना तीस के दशक में अंग्रेज़ों ने कराई थी! ज़ाहिर है उस वक्त उनका मकसद जातिगत आधार पर देश की एकता को खंडित करने के रास्ते तलाशने का ही रहा था! लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक देश में जाति और धर्म के आधार पर विभाजन लोकतन्त्र को असफल बनाता है! जाहिर सी बात है कि यदि जनता का जाति और धर्म के आधार पर विभाजन हो जायेगा तो लोकतन्त्र कभी भी अपने लक्ष्य को पा नहीं सकेगा! ये विभाजन जितना गहरा होगा लोकतन्त्र उतना ही बीमार होगा! लेकिन हमारे देश में ये कडवी सच्चाई है कि जाति और धर्म हमारी राजनीति का यथार्थ बन चुके हैं! और जाति आधारित जनगणना ना करा कर हम केवल उस यथार्थ से आंखें चुराने का ही काम कर रहे हैं! क्योंकि दुनिया के इस सबसे बडे लोकतन्त्र में जाति और धर्म की खाई को और गहरा करने का काम तो हमारी राजनीति आज़ादी के बाद से ही कर रही है! लेकिन जाति आधारित जनगणना के बाद सही आकडे सामने आ जाने से सही मायनों में वंचित वर्गों की पहचान की जा सकेगी! इसके बाद उस वंचित वर्ग के कल्याण के लिये सरकार क्या करती है ये तो उस वर्ग की संख्याबल पर ही निर्भर करेगा ! लेकिन इससे काफी हद तक परिदृ्श्य स्पष्ट हो जायेगा कि कौन कितने पानी में है? और आज़ादी के बाद से अब तक सरकारी योजनाओं ने पिछडों का वाकई में कितना कल्याण किया है? ये आकडे इस मायने में भी खास होंगे कि ये देश की भावी राजनीति की दिशा निर्धारित करेंगे! वीपी सिंह् ने जब मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए पिछडों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की थी, तब कांग्रेस्-बीजेपी समेत तमाम राजनीतिक पार्टियां इसका व्यापक राजनीतिक निहितार्थ समझ नहीं पाई थीं! और इसके खिलाफ उठ खडी हुई थीं! इस राजनीतिक लडाई में वीपी सिंह ने अपनी कुर्सी खो दी थी! इस लिहाज़ से वो भले ही हारे हुए लगें, लेकिन उनकी राजनीति जीत गई थी! जाति चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है! और कास्ट फेक्टर के आधार पर ही हमारे देश में सरकारें बनती और गिरती हैं! इस हकीकत को सभी राजनीतिक दल बखूबी जानते हैं! और इसका फायदा भी उठाते रहे हैं! जबकि होना तो ये चाहिये था कि लोकतन्त्र को मजबूत बनाने के लिये तमाम राजनीतिक दल मिल कर चुनावों में कास्ट फेक्टर को डाईल्यूट कर धीरे-धीरे खत्म कर देते! लेकिन हुआ इसका ठीक उलट यानि ये फेक्टर उतरोत्तर मजबूत होता गया! और जाति से मुक्ति के बजाये हमारे देश में जाति की जडें गहरी होती गईं! निश्चित तौर पर जाति आधारित जनगणना के आकडों के आधार पर ही राजनैतिक दल आगामी चुनावों की रणनीति तय करेंगे! यानि इस जनगणना के पीछे सत्य का सामना करने का साहस नहीं बल्कि इसके पीछे का स्वार्थ ही अधिक नज़र आ रहा है!
Saturday, 8 May 2010
ANY REMEDY FOR JUDICIAL TORTURE?: दिल्ली से योगेश गुलाटी
जी हां मैं न्यायिक उपचारों की ही बात कर रहा हूँ! हमारे संविधान में प्रदत्त क़ानून के समक्ष समानता आज़ादी के दशकों बाद भी सच्चाई नहीं बन पाई है! आलम ये है कि न्याय पाने की पूरी प्रक्रिया इतनी कष्टप्रद है कि उससे कहीं बेहतर सज़ा भुगतना लगता है! यहां पीड़ित दो तरफा सज़ा भुगता है! पहला तो वो अन्याय को भोगता है! और दूसरा उस पीड़ा से शायद अधिक पीडादायक कानूनी प्रक्रिया के चक्रव्यू में ऐसा फंसता है कि उसकी ज़िंदगी कब इस उलझन में ही बीत जाती है उसे खुद पता नहीं चलता! न्याय की आस में वो बूढा हो जाता है! और मरने से पहले उसे न्याय मिल भी जाए तो ये उसके ज़ख्मो पर नमक का ही काम करता है! इसके ठीक उलट अपराधी हमारी अदालातोम की इस कमजोरी का बखूबी फ़ायदा उठा रहे हैं! वो आसानी से जमानत पर छूट जाते हैं! ह्त्या के मामलों में भी कमजोर जांच और सबूतों का अभाव उन्हें बरी कर देता है! हम इस सिध्दाम्त पर यकीन रखते हैं कि चाहे सौ अपराधी छूट जायें लेकिन एक निर्दोष को सज़ा नहीं होनी चाहिए! निर्दोष तो न्याय की गुहार और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान ही पर्याप्त सज़ा भुगत चुका होता है! क्योंकि अपराध को साबित करने का भार भी उसी के कंधों पर होता है, जिसके साथ अन्याय हुआ है! ऐसे में हमारी जांच एजेंसिया और पुलिस कितनी मददगार साबित होती हैं ये किसी से छुपा नहीं है! जांच में घोर लापरवाही और सबूतों को नष्ट हो जाने देना हमारे यहां जांच एजेसियों के लिए नई बात नहीं है! ऐसे में अदालत में आरोपों को साबित करना लोहे के चने चबाने जैसा है! कहते हैं "डिले डिनाय दी जस्टिस" ! क़ानून की किताब का ये पहला सबक हमारे यहां लागू नहीं होता! और हो भी नहीं सकता! क्योंकि हमारी अदालतों में केसों के अम्बार लगे हैं! हमारे २१ उच्च न्यायालयों में तीन करोड़ से ज्यादा केस पेंडिंग है! और अधीनस्थ न्यायालयों में करीब दो करोड़ से ज्यादा केस विचाराधीन है! देश की विभिन्न जेलों में करीब ढाई लाख लोग अंदर ट्रायल है! और दो हज़ार से ज़्यादा लोग पांच सालो से जेल में बंद है जबकि उनका अपराध साबित नहीं हुआ है! पेंडिंग केसों के मामले में यूपी नंबर एक पर है! अकेले इलाहबाद हाईकोर्ट में एक करोड़ से भी ज्यादा पेंडिंग केस हैं! जबकि सिक्किम महज़ ५१ विचाराधीन मामलों के साथ इस लिस्ट में सबसे नीचे है! यूपी के बाद नंबर आता है महाराष्ट्रा(४१ लाख), गुजरात (३९ लाख), पश्चिम बंगाल(20 लाख), बिहार(१२ लाख), कर्नाटका( १० लाख), राजस्थान( १० लाख), ओडिशा (१० लाख), आंध्र प्रदेश (९ लाख)!
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सी मामले पर अपनी चिंता जाहिर की है! इसके पहले सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन भी कई बार इस मुद्दे पर चिंता जता चुके हैं! लेकिन यहां सवाल ये है कि क्या सिर्फ चिंता जाहिर करना ही पर्याप्त है? सवाल ये भी है कि संविधान की आत्मा यानी क़ानून के समक्ष समानता को लागू करने के लिए क्या कदम उठाये जा रहे हैं? हम अभी तक लोकतंत्र के पहले लक्ष्य को भी नहीं पा सके है! क्योकि हमारी अदालते विचाराधीन मामलों से भरी है! न्याय महँगा ही नहीं आम आदमी की पहुच से बाहर की बात है! और पूरी न्यायिक प्रक्रिया कितनी कष्टप्रद है इसका अंदाज़ तो कोई भुक्तभोगी ही बाया कर सकता है! हमारे देश में १० लाख लोगो पर औसतन १४ जज है! और १५०० लोगो पर एक एडवोकेट! हमारे विश्विद्यालयो में क़ानून की शिक्षा का क्या आलम है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हमारे वकील कानूनी धाराओं से नहीं जुगाड़ से केस जीतने की कोशिश करते है! और ज्यादातर केस इस लिए नहीं सुलझ पाते क्योकि वकील नहीं चाहते कि उनका फैसला हो! सवाल ये भी है कि जब प्रधानमंत्री और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्याधीश इस मुद्दे पर गंभीर है तो फिर क्यों नहीं हो रहा कायाकल्प हमारी न्याय व्यवस्था का? विकसित देशों की न्याय व्यवस्था का माडल अपना कर हम इस दोष को दूर कर सकते है!
दिल्ली से योगेश गुलाटी की रिपोर्ट!
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सी मामले पर अपनी चिंता जाहिर की है! इसके पहले सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन भी कई बार इस मुद्दे पर चिंता जता चुके हैं! लेकिन यहां सवाल ये है कि क्या सिर्फ चिंता जाहिर करना ही पर्याप्त है? सवाल ये भी है कि संविधान की आत्मा यानी क़ानून के समक्ष समानता को लागू करने के लिए क्या कदम उठाये जा रहे हैं? हम अभी तक लोकतंत्र के पहले लक्ष्य को भी नहीं पा सके है! क्योकि हमारी अदालते विचाराधीन मामलों से भरी है! न्याय महँगा ही नहीं आम आदमी की पहुच से बाहर की बात है! और पूरी न्यायिक प्रक्रिया कितनी कष्टप्रद है इसका अंदाज़ तो कोई भुक्तभोगी ही बाया कर सकता है! हमारे देश में १० लाख लोगो पर औसतन १४ जज है! और १५०० लोगो पर एक एडवोकेट! हमारे विश्विद्यालयो में क़ानून की शिक्षा का क्या आलम है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हमारे वकील कानूनी धाराओं से नहीं जुगाड़ से केस जीतने की कोशिश करते है! और ज्यादातर केस इस लिए नहीं सुलझ पाते क्योकि वकील नहीं चाहते कि उनका फैसला हो! सवाल ये भी है कि जब प्रधानमंत्री और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्याधीश इस मुद्दे पर गंभीर है तो फिर क्यों नहीं हो रहा कायाकल्प हमारी न्याय व्यवस्था का? विकसित देशों की न्याय व्यवस्था का माडल अपना कर हम इस दोष को दूर कर सकते है!
दिल्ली से योगेश गुलाटी की रिपोर्ट!
Friday, 7 May 2010
कसाब को फांसी पर, जश्न किसलिये?
हिंदुस्तान के लिए एक ऐतिहासिक मुक़दमा ! आज़ाद हिन्दुस्तान के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था कि एक मुकदमे के फैसले का सारा मुल्क दिल थामे इंतज़ार कर रहा था! पूरे मुल्क को कसाब के लिए मौत की सजा का इंतज़ार था! और अदालत ने आखिर वो फैसला सुना ही दिया! अदालत ने कसाब से कहा कि तुम्हे मरते दम तक फांसी दी जायेगी! क्योंकि तुमने जो किया है, उसके एवज़ में इससे कम कोई सज़ा नहीं है! वाकई हमने इतिहास रच दिया! हम इस बात पर खुश हो सकते है कि हमने महज़ एक साल में एक बड़े आतंकी मुकदमे का फैसला कर दिया! क्योंकि हमारी अदालते साधारण विवादों का फैसला करने में भी दशको का समय लेती है! हम इस बात पर भी खुश हो सकते हैं कि इस संवेदनशील मामले में दो भारतीय आरोपीयों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया ! हमारे विद्वान इसे न्यायालय की निष्पक्षता से जोड़ कर देख रहे हैं! और वो कसाब को मिली फांसी की सज़ा पर जश्न मना रहे हैं! लेकिन जश्न किस बात का? आतंक की इस शतरंज में कसाब महज़ एक प्यादा है! इस खेल के असली खिलाड़ी तो हमारी पहुंच से बाहर हैं! क्या हम अमेरिका की तर्ज़ पर पकिस्तान और पाक- कश्मीर में चल रही आतंक की फेक्त्रीयो को ख़त्म करने की हिम्मत रखते हैं अगर नहीं ...तो एक कसाब को फांसी पर लटकाने से कुछ नहीं होने वाला! क्योंकि महज़ चंद लाख रुपयों के लालच में भारत पर हमला करने को कितने ही कसाब तैयार बैठे है! हमारे पड़ोसी मुल्कों में इतनी गरीबी है कि वहां भारत पर हमला करने के लिए मानव बम तैयार करना कोइ मुश्किल काम नहीं है! और दुर्भाग्य से हमने अब तक आतंक के खिलाफ अमेरिका जैसी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है जिसे देख कर ये लगता हो कि हम आतंक के खिलाफ वाकई में सख्त हैं! और हममे ऐसी किसी हरकत का मुह तोड़ जवाब देने की ताकत है! कसाब तो मरने के लिए भारत आया था....शायद वो खुश होगा कि अदालत में उसकी उम्र बढ़ गयी! क्योंकि अब उसके पास हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और फिर राष्ट्रपति के पास दया के लिए गुहार लगाने का रास्ता बचता है! इसके बाद भी कसाब के ज़िंदा रहने की पूरी उम्मीदें हैं! क्योंकि अकेले महाराष्ट्र में ५८ अपराधी फांसी की सज़ा का इंतजार कर रहे हैं! कसाब का नंबर ५९वां है! और अभी तो संसद पर हमले के दोषी अफ़ज़ल की दया याचिका भी विचाराधीन है! ऐसे में ये कैसे मान लिया जाए कि हामारी सरकारें आतंकवाद पर वाकई में सख्त हैं? लेकिनं २६/११ के हमले में मारे गए लोग इतने खुशकिस्मत नहीं थे! मज़हबी उन्माद ने उन्हें उसी दिन मौत की नींद सुला दिया था! लेकिन इससे भी बड़ा सवाल आतंक की इस साजिश को रचाने वाले वो असली आतंकी कहां हैं? क्या आतंक के असली आकाओं के गिरेबां तक पहुंचने की हिम्मत हमारी सरकारों में है? कहां हैं २६/११ के असली सूत्रधार जो सरहद के पार बैठे इस हमले को अंजाम दे रहे थे? शायद वो इस वक्त अगले हमले की तैय्यारी कर रहे हो? और हम कसाब की फांसी पर जश्न मना रहे हैं? हमें नहीं भूलना चाहिए अमेरिका पर हुए एक आतंकी हमले के बाद उसने दो मुल्क तबाह कर दिए थे! तब से अब तक वहां कोई आतंकी हमला नहीं हुआ! और हम हर महीने औसतन एक आतंकी हमले का गवाह बन रहे हैं! क्योंकि हम हर बार यही कहते हैं कि अगले हमले का मुंह तोड़ जवाब देंगे!
Monday, 26 April 2010
महंगाई के विरोध में देशव्यापी बंद कल
महंगाई के खिलाफ वाम मोर्चा और सपा, राजद, अन्नाद्रमुक, तेदेपा, बीजद सहित 13 राजनीतिक दल मंगलवार को भारत बंद करेंगे।
संसद में पेट्रोल, डीजल और खाद की कीमतों में बढोतरी के खिलाफ इन दलों के साथ कटौती प्रस्ताव पेश करने वाली भाजपा हालांकि इस बंद का हिस्सा नहीं बनेगी।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की पहल पर इन 13 दलों के नेताओं ने पिछले दिनों राष्ट्रीय राजधानी में दो दौर की बैठकें कीं, जिसके बाद तय किया गया था कि महंगाई के खिलाफ 27 अप्रैल को देशव्यापी हड़ताल की जाएगी और पेट्रोल, डीजल तथा खाद की कीमतों में वृद्धि के खिलाफ लोकसभा में कटौती प्रस्ताव पेश किया जाएगा।
इन दलों के नेताओं ने संसद परिसर में आयोजित संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में ऐलान किया है कि महंगाई के खिलाफ सरकार से उनकी जंग की शुरूआत हो चुकी है और यह लडाई सड़क से संसद तक लड़ी जाएगी।
माकपा ने सरकार के खिलाफ मोर्चाबंदी में बसपा को भी शामिल करने का प्रयास किया था लेकिन बात बन नहीं सकी और बसपा ने अब संकेत दे दिए हैं कि वह कटौती प्रस्तावों का समर्थन नहीं करेगी।
इन 13 दलों के नेता देश भर में होने वाले प्रदर्शनों की अगुवाई करेंगे जबकि मुख्य प्रदर्शन दिल्ली में होगा। मुख्य विपक्षी दल भाजपा महंगाई के खिलाफ 21 अप्रैल को ही महारैली कर चुकी है।
संसद में पेट्रोल, डीजल और खाद की कीमतों में बढोतरी के खिलाफ इन दलों के साथ कटौती प्रस्ताव पेश करने वाली भाजपा हालांकि इस बंद का हिस्सा नहीं बनेगी।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की पहल पर इन 13 दलों के नेताओं ने पिछले दिनों राष्ट्रीय राजधानी में दो दौर की बैठकें कीं, जिसके बाद तय किया गया था कि महंगाई के खिलाफ 27 अप्रैल को देशव्यापी हड़ताल की जाएगी और पेट्रोल, डीजल तथा खाद की कीमतों में वृद्धि के खिलाफ लोकसभा में कटौती प्रस्ताव पेश किया जाएगा।
इन दलों के नेताओं ने संसद परिसर में आयोजित संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में ऐलान किया है कि महंगाई के खिलाफ सरकार से उनकी जंग की शुरूआत हो चुकी है और यह लडाई सड़क से संसद तक लड़ी जाएगी।
माकपा ने सरकार के खिलाफ मोर्चाबंदी में बसपा को भी शामिल करने का प्रयास किया था लेकिन बात बन नहीं सकी और बसपा ने अब संकेत दे दिए हैं कि वह कटौती प्रस्तावों का समर्थन नहीं करेगी।
इन 13 दलों के नेता देश भर में होने वाले प्रदर्शनों की अगुवाई करेंगे जबकि मुख्य प्रदर्शन दिल्ली में होगा। मुख्य विपक्षी दल भाजपा महंगाई के खिलाफ 21 अप्रैल को ही महारैली कर चुकी है।
मोदी का मायाजाल...
पिछले कुछ साल में भारतीय क्रिकेट की सबसे कद्दावर हस्ती बने ललित मोदी का पतन भी कम नाटकीय नहीं रहा और उन्हें उसी साम्राज्य से नेस्तनाबूद कर दिया गया जो उन्होंने खुद खड़ा किया था।
इंडियन प्रीमियर लीग [आईपीएल] के फाइनल के कुछ देर बाद ही मोदी को निलंबित कर दिया गया जिससे आईपीएल कमिश्नर और चेयरमैन के रूप में उनका सफर समय से पहले थम गया। पांच बरस पहले बीसीसीआई के सबसे युवा उपाध्यक्ष बने मोदी की अक्खड़ कार्यशैली ने उनके विरोधियों की जमात खड़ी कर दी। यही वजह है कि आईपीएल में वित्तीय अनियमितताओं की बात सामने आते ही उन्हें हटाने के लिए लोग लामबंद हो गए। इंडियन प्रीमियर लीग के जन्मदाता मोदी भारतीय क्रिकेट के सबसे प्रभावशाली शख्स बनने से पहले महज एक व्यवसायी थे। आईपीएल बीसीसीआई के लिए ऐसी दुधारू गाय साबित हुआ जिसने पिछले तीन साल में उसके वारे-न्यारे कर दिए।
मोदी के 46 बरस के जीवन पर दृष्टिपात करें तो काफी उतार-चढ़ाव नजर आते हैं। सबसे पहले विवादों से उनका साबका कालेज के दिनों में पड़ा जब वह 1985 में अमेरिका की ड्यूक यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे। उन्हें ड्रग्स की कथित तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया गया।
भारत लौटने पर मोदी ने कई व्यवसायों में हाथ आजमाए और बाद में क्रिकेट में पदार्पण किया। बीसीसीआई में प्रवेश का उनका प्रयास आखिरकार 2004 में सफल हुआ। राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की तथाकथित सरपरस्ती में वह राजस्थान क्रिकेट संघ के अध्यक्ष बने। ऐसा आरोप है कि राजे सरकार ने खेल अधिनियम में संशोधन करके मोदी को 40 साल बाद हुए आरसीए चुनाव में मदद की। मोदी की जीत से कइयों के अहम को ठेस पहुंची जिसमें पूर्व अध्यक्ष किशोर रूंगटा शामिल थे। रूंगटा ने मोदी पर धोखेबाजी का आरोप लगाया। मोदी की कामयाबी का सिलसिला यहां से शुरू हुआ तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अगले साल वह बीसीसीआई के उपाध्यक्ष बने।
शरद पवार जब जगमोहन डालमिया को हराकर बीसीसीआई अध्यक्ष बने तब मोदी उनके साथ थे। यही वजह है कि इस धुरंधर राजनीतिज्ञ ने समूचे घटनाक्रम में मोदी का साथ दिया।
आईपीएल की अवधारणा के साथ मोदी मीलों आगे निकल आए। उन्होंने कारपोरेट समूहों और बालीवुड को जोड़कर क्रिकेट का ऐसा तमाशा तैयार किया जो 2008 में पहली गेंद फेंके जाने से पहले ही सुपरहिट हो गया।
क्रिकेट और फिल्मों के दीवाने भारत में इन दोनों का मिलन दर्शकों के लिए वरदान से कम नहीं रहा। शहर पर आधारित फ्रेंचाइजी टीमों के मुकाबले देखने के लिए दर्शक मैदान पर टूट पड़े। ऐसा आरोप है कि राजे सरकार ने खेल अधिनियम में संशोधन करके मोदी को 40 साल बाद हुए आरसीए चुनाव में मदद की।
ऐसी खबरें थी कि मोदी का कोलकाता नाइट राइडर्स, राजस्थान रायल्स और किंग्स इलेवन पंजाब में हिस्सा है लेकिन पहले साल में ये अटकलें बेदम साबित हुई। दूसरे सत्र में आईपीएल और मोदी फिर विवादों से घिर गए। भारत में आम चुनावों से इसकी तारीखें टकराने के कारण सरकार ने आईपीएल से तारीखों में बदलाव के लिए कहा।
लेकिन अक्खड़ मोदी सुनने के मूड में ही नहीं थे। उन्होंने गृहमंत्री की सुने बिना टूर्नामेंट दक्षिण अफ्रीका में कराया। अब ऐसा संदेह है कि उनमें से कई मैच फिक्स थे और मोदी खुद इसमें शामिल थे।
तीसरे सत्र में विवादों की इंतहा हो गई जब नए सत्र के लिए दो नई टीमों की बोली लगी। बोली लगने से पहले मोदी को पहला झटका लगा जब वह आरसीए का चुनाव हार गए। नई आईपीएल टीमों की नीलामी पहले रद्द हो गई क्योंकि बीसीसीआई का मानना था कि मोदी की रखी शर्ते काफी कड़ी थी। नीलामी होने पर कोच्चि को फ्रेंचाइजी मिलने से सभी को हैरानी हुई।
रेंदेवू स्पोर्ट्स वर्ल्ड जैसे गुमनाम ग्रुप ने अडानी समूह और वीडियोकान को हराकर फ्रेंचाइजी हासिल की। इसके बाद मोदी ने टीम के मालिकाना हक का ब्यौरा उजागर करके भानुमति का पिटारा खोल दिया। इसके चलते केंद्रीय मंत्री शशि थरूर को इस्तीफा देना पड़ा और उनकी करीबी दोस्त सुनंदा पुष्कर को 70 करोड़ की स्वैट इक्विटी। इसके बाद आईपीएल और फ्रेंचाइजी टीमों के दफ्तरों पर आयकर विभाग के छापे पड़े जिससे इस टी20 लीग में वित्तीय अनियमितताओं का खुलासा हुआ।
बीसीसीआई ने सारे मसलों पर बातचीत के लिए आईपीएल गवर्निंग काउंसिल की बैठक बुलाई लेकिन मोदी ने इसे अवैध करार देते हुए कहा कि वह ऐसी किसी बैठक में भाग नहीं लेंगे। बाद में उन्होंने मन बदलकर बैठक की अध्यक्षता करने का ऐलान किया लेकिन बोर्ड ने इससे पहले ही उन्हें निलंबित कर दिया।
इंडियन प्रीमियर लीग [आईपीएल] के फाइनल के कुछ देर बाद ही मोदी को निलंबित कर दिया गया जिससे आईपीएल कमिश्नर और चेयरमैन के रूप में उनका सफर समय से पहले थम गया। पांच बरस पहले बीसीसीआई के सबसे युवा उपाध्यक्ष बने मोदी की अक्खड़ कार्यशैली ने उनके विरोधियों की जमात खड़ी कर दी। यही वजह है कि आईपीएल में वित्तीय अनियमितताओं की बात सामने आते ही उन्हें हटाने के लिए लोग लामबंद हो गए। इंडियन प्रीमियर लीग के जन्मदाता मोदी भारतीय क्रिकेट के सबसे प्रभावशाली शख्स बनने से पहले महज एक व्यवसायी थे। आईपीएल बीसीसीआई के लिए ऐसी दुधारू गाय साबित हुआ जिसने पिछले तीन साल में उसके वारे-न्यारे कर दिए।
मोदी के 46 बरस के जीवन पर दृष्टिपात करें तो काफी उतार-चढ़ाव नजर आते हैं। सबसे पहले विवादों से उनका साबका कालेज के दिनों में पड़ा जब वह 1985 में अमेरिका की ड्यूक यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे। उन्हें ड्रग्स की कथित तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया गया।
भारत लौटने पर मोदी ने कई व्यवसायों में हाथ आजमाए और बाद में क्रिकेट में पदार्पण किया। बीसीसीआई में प्रवेश का उनका प्रयास आखिरकार 2004 में सफल हुआ। राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की तथाकथित सरपरस्ती में वह राजस्थान क्रिकेट संघ के अध्यक्ष बने। ऐसा आरोप है कि राजे सरकार ने खेल अधिनियम में संशोधन करके मोदी को 40 साल बाद हुए आरसीए चुनाव में मदद की। मोदी की जीत से कइयों के अहम को ठेस पहुंची जिसमें पूर्व अध्यक्ष किशोर रूंगटा शामिल थे। रूंगटा ने मोदी पर धोखेबाजी का आरोप लगाया। मोदी की कामयाबी का सिलसिला यहां से शुरू हुआ तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अगले साल वह बीसीसीआई के उपाध्यक्ष बने।
शरद पवार जब जगमोहन डालमिया को हराकर बीसीसीआई अध्यक्ष बने तब मोदी उनके साथ थे। यही वजह है कि इस धुरंधर राजनीतिज्ञ ने समूचे घटनाक्रम में मोदी का साथ दिया।
आईपीएल की अवधारणा के साथ मोदी मीलों आगे निकल आए। उन्होंने कारपोरेट समूहों और बालीवुड को जोड़कर क्रिकेट का ऐसा तमाशा तैयार किया जो 2008 में पहली गेंद फेंके जाने से पहले ही सुपरहिट हो गया।
क्रिकेट और फिल्मों के दीवाने भारत में इन दोनों का मिलन दर्शकों के लिए वरदान से कम नहीं रहा। शहर पर आधारित फ्रेंचाइजी टीमों के मुकाबले देखने के लिए दर्शक मैदान पर टूट पड़े। ऐसा आरोप है कि राजे सरकार ने खेल अधिनियम में संशोधन करके मोदी को 40 साल बाद हुए आरसीए चुनाव में मदद की।
ऐसी खबरें थी कि मोदी का कोलकाता नाइट राइडर्स, राजस्थान रायल्स और किंग्स इलेवन पंजाब में हिस्सा है लेकिन पहले साल में ये अटकलें बेदम साबित हुई। दूसरे सत्र में आईपीएल और मोदी फिर विवादों से घिर गए। भारत में आम चुनावों से इसकी तारीखें टकराने के कारण सरकार ने आईपीएल से तारीखों में बदलाव के लिए कहा।
लेकिन अक्खड़ मोदी सुनने के मूड में ही नहीं थे। उन्होंने गृहमंत्री की सुने बिना टूर्नामेंट दक्षिण अफ्रीका में कराया। अब ऐसा संदेह है कि उनमें से कई मैच फिक्स थे और मोदी खुद इसमें शामिल थे।
तीसरे सत्र में विवादों की इंतहा हो गई जब नए सत्र के लिए दो नई टीमों की बोली लगी। बोली लगने से पहले मोदी को पहला झटका लगा जब वह आरसीए का चुनाव हार गए। नई आईपीएल टीमों की नीलामी पहले रद्द हो गई क्योंकि बीसीसीआई का मानना था कि मोदी की रखी शर्ते काफी कड़ी थी। नीलामी होने पर कोच्चि को फ्रेंचाइजी मिलने से सभी को हैरानी हुई।
रेंदेवू स्पोर्ट्स वर्ल्ड जैसे गुमनाम ग्रुप ने अडानी समूह और वीडियोकान को हराकर फ्रेंचाइजी हासिल की। इसके बाद मोदी ने टीम के मालिकाना हक का ब्यौरा उजागर करके भानुमति का पिटारा खोल दिया। इसके चलते केंद्रीय मंत्री शशि थरूर को इस्तीफा देना पड़ा और उनकी करीबी दोस्त सुनंदा पुष्कर को 70 करोड़ की स्वैट इक्विटी। इसके बाद आईपीएल और फ्रेंचाइजी टीमों के दफ्तरों पर आयकर विभाग के छापे पड़े जिससे इस टी20 लीग में वित्तीय अनियमितताओं का खुलासा हुआ।
बीसीसीआई ने सारे मसलों पर बातचीत के लिए आईपीएल गवर्निंग काउंसिल की बैठक बुलाई लेकिन मोदी ने इसे अवैध करार देते हुए कहा कि वह ऐसी किसी बैठक में भाग नहीं लेंगे। बाद में उन्होंने मन बदलकर बैठक की अध्यक्षता करने का ऐलान किया लेकिन बोर्ड ने इससे पहले ही उन्हें निलंबित कर दिया।
Monday, 15 February 2010
ताकि भारत को सबक सिखाया जा सके.....!
जिस वक्त शिवसेना और शाहरुख की महाभारत का धारावाहिक चल रहा था....राहुल के मुँबई दौरे का चँदबरदई स्टाईल मेँ गुणगान किया जा रहा था! ठीक उसी वक्त पाक अधिकृत कश्मीर मेँ भारत पर अगले हमले की घोषणा की जा रही थी! उस वक्त जब सरहद के पार भारत के खिलाफ जिहादी नारे लग रहे थे....हमारे यहाँ कथित बुध्दिजीवी एक अनोखी बहस मेँ उलझे थे! हमारी सरकार को उन जिहादी नारोँ की कोई फिक्र नहीँ थी! क्योँकि उसे तो एक फिल्म को रीलीज़ कराना था! लश्कर से जुडे जमात-उद-दावा के नेता मक्की ने पीओके मेँ चार फरवरी को कश्मीर सम्मेलन मेँ कहा था कि पुणे समेत तीन भारतीय शहरोँ पर जिहादी हमला करेँगे, ताकि भारत को सबक सिखाया जा सके! हालाकि हमारे गृह मँत्री को इस बार भी खूफिया तँत्र की नाकामी से इनकार है! सही है जब खुले-आम घोषणा करके हमले किये जा रहे हैँ तो इसे खूफिया तँत्र की नाकामी से जोड कर नहीँ देखा जाना चाहिये! वैसे भी हमारे खूफिया अधिकारियोँ का उपयोग विरोधियोँ की जासूसी कराने मेँ होने लगे, तो देश की सुरक्षा की जानकारी की उम्मीद करना बेमानी ही होगा! हमने एक बार फिर ये साबित कर दिया है कि हमारा सिस्टम एक फिल्म को रीलीज़ करवा कर हिट बनाने मेँ तो योगदान दे सकता है लेकिन घोषणा कर के किये गये आतँकी हमलोँ को रोकने मेँ कामयाब नहीँ हो सकता! बहरहाल हम कश्मीर मेँ आतँकवादियोँ के पुनर्वास की योजना पर जश्न मना सकते हैँ! केन्द्र सरकार ने पीओके से लौटने की इच्छा रखने वाले आतँकीयोँ का स्वागत करने की योजना बनाई है! इस योजना की सिफारिश जम्मू-कश्मीर के मुख्यमँत्री उमर अब्दुल्ला और प्रधानमँत्री द्वारा गठित एक कार्यसमूह ने की थी! सरकार का मानना है कि इस योजना से जम्मू-कश्मीर के उन हज़ारोँ परिवारोँ मेँ खुशी लौट सकेगी, जिनके पुरुष सदस्य आतँकी सँगठनोँ के बहकावे पर हथियारोँ की ट्रेनिँग लेने पीओके चले गये थे! लेकिन अब जिन्होँने हथियार डालने की इच्छा जताई है! सरकार का ये भी मनना है कि इस तरह वो पीओके मेँ आतँक की फेक्ट्रीयोँ का नेटवर्क खत्म कर सकती है! यानि एक तरफ सुरक्षा बल अपनी जान पर खेल कर सीमा की चौकसी कर रहे हैँ और दूसरी तरफ हमारी सरकारेँ आतँकीयोँ को पीओके से कश्मीर मेँ लाकर उनका पुनर्वास कर रही है! ऐसे मेँ ये सवाल उठना लाज़मी है कि नक्सलवाद को आतँकवाद से बडा खतरा मानने वाली हमारी सरकारोँ के पास क्या नक्सलियोँ के पुनर्वास की कोई योजना है? वो गरीब आदिवासियोँ के पुनर्वास के लिये भी क्या उतनी ही नरम है? और कश्मीरी पँडित....? उनके सवाल पर हमारी सरकार मौन क्योँ हो जाती है? क्योँ नहीँ दिखाई देता हमारी सरकारोँ को कश्मीरी पँडितोँ का दर्द? जो हिँसा का रास्ता अख्तियार कर भारत की अखँडता को चुनौती देते हैँ, सरकार को उनके पुनर्वास की चिँता सता रही है! और जो अपने ही देश मेँ रिफ्यूज़ी का जीवन बिता रहे हैँ उनकी कोई चिँता किसी को नहीँ है!
अपनी इस अनोखी योजना के बल पर शायद कश्मीर के मुख्यमँत्री उमर अब्दुल्ला को अगला नोबल शाँति पुरुस्कार भी मिल जाये..! लेकिन उनहेँ नहीँ भूलना चाहिये कि नोबल शाँति पुरस्कार से सम्मानित अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने इराक और अफगानिस्ताअन पर अपनी नीतियोँ के सँदर्भ मेँ कहा था कि मैँ महात्मा गाँधी का अनुयायी ज़रूर हूँ लेकिन मैँ गाँधी नहीँ बन सकता!
अपनी इस अनोखी योजना के बल पर शायद कश्मीर के मुख्यमँत्री उमर अब्दुल्ला को अगला नोबल शाँति पुरुस्कार भी मिल जाये..! लेकिन उनहेँ नहीँ भूलना चाहिये कि नोबल शाँति पुरस्कार से सम्मानित अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने इराक और अफगानिस्ताअन पर अपनी नीतियोँ के सँदर्भ मेँ कहा था कि मैँ महात्मा गाँधी का अनुयायी ज़रूर हूँ लेकिन मैँ गाँधी नहीँ बन सकता!
Saturday, 13 February 2010
वेलेँटाईन ने हिँदुस्तानियोँ को प्रेम करना सिखा दिया!
आज के दिन सँत वेलेँटाईन को मेरा प्रणाम! भगवन आपने हिँदुस्तानियोँ को प्रेम करना सिखा दिया! ये आप ही की कृपा का परिणाम है कि आज हमारे बाग बगीचे गुलज़ार रहेँगे! हालाकि गुलज़ार तो वो पहले भी थे लेकिन आज तो समा कुछ और ही होगा! आज प्यार करने वाले अपने प्यार का खुल्लम-खुल्ला प्रदर्शन करेँगे! और प्यार के कथित दुश्मन उनकी खुल्लम खुल्ला पिटाई! हे वेलेँटाईन देवता हम हिँदुस्तानी इस बात के लिये आपके सदा आभारी रहेँगे कि आपने हमेँ खुले मेँ प्यार करना सिखाया! चार दिवारियोँ के भीतर प्यार मेँ वो मज़ा नही जो खुले मेँ है! हालाकि प्रेम का त्यौहार तो हमारी सँस्कृति मेँ भी है! होली और बसँतोत्सव प्रेम के ही तो प्रतीक हैँ! लेकिन अपनी सँस्कृति हमेँ अब अच्छी नहीँ लगती! हमेँ तो आपकी पाश्चात्य सभ्यता से प्रेम हो चला है! इसीलिये तो अब हम हिँदुस्तानी युवा पूरी तरह पाश्चात्य सभ्यता मेँ डूब गये हैँ! हम अब ऐसा कोई कारण नहीँ छोडना चाहते जिससे हम पिछडे कहलायेँ! क्योँकि हमेँ अपनी कोई चीज़ नहीँ भाती! आपकी उन्मुक्त सँस्कृति के हम दीवाने हैँ! इसी लिये आपकी भाषा आपकी सँस्कृति और आपके तरीकोँ को हम तेज़ी के साथ अपना रहे हैँ! पहले जन्मदिन पर हम दीप जलाते थे अब मोमबत्तीयाँ बुझाते हैँ! गरीबोँ को भोजन कराते थे, अब केक काट कर उसे मुँह पर लगाते हैँ! माँ अब मोम हो गई है....और पिता डैड! पहले माता-पिता के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लेते थे अब गले मिलते हैँ! इतने पर भी खुद को नई पहचान दी है! कर्ज़ लेकर घी पीने वाली कहावत को हम शब्दश: चरितार्थ कर रहे हैँ! कर्ज़ लेकर ही हम पढाई करते हैँ! और फिर हमारे देश को कर्ज़े मेँ डुबोने वाली विदेशी कँपनीयोँ मेँ काम करते हैँ! होम लोन, कार लोन, सब कुछ लोन पर! पहले हमारे पुरखे साहूकारोँ के कर्ज़ मेँ डूबे होते थे! और आज जब हमारा देश भी कर्ज़े से चल रहा है! तो ऐसे मेँ लोन लेने की ये परँपरा हम कैसे तोड सकते हैँ! हमारी दकियानूसी सँस्कृति से मुक्ति दिलाने मेँ आपने जो योगदान दिया है उसके लिये हम हमेँशा आपके आभारी रहेँगे! हम तो बस उस दिन की आस मेँ जी रहे हैँ अब हमारे देश की सडकोँ पर भी इटली और जर्मनी जैसे नज़ारे दिखाई देँगे! जब हम हर दिन को वेलेँटाईन डे की तरह मना सकेँगे! और बाज़ार हमारा बखूबी इस्तेमाल कर सकेगा! महँगे विदेशी कार्ड्स और विदेशी गिफ्ट खरीद कर आज हम आपको अपने श्रध्दा सुमन अर्पित करेँगे! पबोँ मेँ जाकर जम कर महँगी विदेशी शराब पीयेँगे! पाश्चात्य सँगीत पर जम कर ठुमके लगायेँगे! जमकर जश्न मनायेँगे क्योँकि हम आज़ाद हैँ! जश्न इसलिये भी क्योँकि आज हमारे प्रेरणास्त्रोत महान सँत वेलेँटाइन को याद करने का दिन है!
Thursday, 11 February 2010
सभी गुमनाम हैँ सर!
रोज़ आफिस आफिस जाते वक्त उसे देखता था! तो उसके ज़िन्दा होने पर मुझे आश्चर्य होता था! वो जिसके शरीर पर हड्डियोँ का ढाँचा नज़र आये वो शख्स ज़िँदा हो तो आश्चर्य तो होगा ही! गुमनाम था वो शख्स! इसलिये नहीँ कि उसका कोई नाम नहीँ था! उसका भी कोई नाम तो रहा होगा! लेकिन किसी को जब उसके होने या ना होने से ही कोई फर्क नहीँ पडता था, तो फिर उसके नाम के होने का भी क्या मतलब रह जाता था! शायद इसी लिये आस-पास के लोग उसे गुमनाम कहते थे! उम्र कोई तीस से पैँतीस के बीच! हर आने-जाने वाले को वो बस देखता था! बोलता कुछ नहीँ था! लेकिन जाने क्योँ मुझे लगता था कि उसकी आँखेँ बहुत कुछ कह रही हैँ! पूरी एक दास्तान थी उसकी आँखोँ मेँ इस बात का यकीन है मुझे! कुछ तो कहानी रही होगी उसकी भी! यही सोच कर मैँने आस-पास के लोगोँ से उसके बारे मेँ जानना चाहा..! लेकिन दिलवालोँ की इस दिल्ली मेँ किसी के पास इतना वक्त नहीँ था कि वो एक गुमनाम शख्स के बारे मेँ मुझसे बात कर सके!
सर्दी अपना कहर ढहा रही थी ! और हम सर्दी को जम कर कोस रहे थे! सुबह के शिफ्ट मेँ न्यूज़ बुलेटिँस की ज़िम्मेदारी मुझ पर थी इसलिये सबेरा होने के पहले ही ड्राइवर मुझे लेने पहुँच जाता था! लेकिन गिरते पारे और कहर बरसाते कोहरे से सारी दिल्ली परेशान थी! ना तो पारा चढने का नाम ले रहा था ना ही कोहरा कम होने का! सुबह आफिस से फोन आया, “ सर दस मिनिट मेँ ड्राईवर आपके पास पहुँच जायेगा!” तैयार होकर जब मैँ नीचे पहुँचा तो मुझे अपनी इस जल्दबाजी पर अफसोस हुआ! क्योँकि सर्दी इतनी ज्यादा थी कि खुले मेँ एक मिनिट भी पहाड जैसा लग रहा था! जबकि मैँने गर्म कपडे पहने थे! कुछ ही देर मेँ गाडी आ गई, तो ड्राईवर ने भी मुझसे वही सवाल किया जिस बेवकूफी पर मैँ खुद को कोस रहा था! उसने कहा,- इतनी सर्दी मेँ आप पहले से ही बाहर क्योँ आ गये? मैँ जल्दी से गाडी मेँ बैठा,और ड्राईवर ने गाडी बढाई! आगे कुछ दूर मोड पर पहुँच कर मेरी नज़र शीशे से बाहर गई तो मैँ हैरान रह गया! फुटपाथ पर एक शख्स खुद को समेट कर सर्दी से बचने की नाकाम कोशिश कर रहा था! उसके पास एक चादर भी नहीँ थी! और उसके कपडे फटे हुए थे! ये जानने के लिये कि वो कौन है और इतनी सर्दी मेँ फुटपाथ पर क्या कर रहा है? मैँने ड्राईवर से गाडी रोकने को कहा! गाडी से उतर कर मैँ उसके पास पहुँचा तो देखा ये तो वोही शख्स है जिसे लोग गुमनाम कहते हैँ! तभी ड्राईवर चिल्लाया, “सर दिल्ली के फुटपाथ पर हज़ारोँ लोग ऐसे ही रात गुज़ारते हैँ! जल्दी कीजिये आफिस के लिये लेट हो रहा है!” मेरे कदम पीछे मुडे और ड्राएवर ने सुनसान सडक पर गाडी दौडा दी! दिन भर आफिस मेँ खबरोँ के शोर मेँ उलझा रहा! लेकिंन खबरोँ के इस शोर मेँ मुझे उस “गुमनाम” की खामोश दास्तान सुनाई दे रही थी इसलिये मैँने इनपुट से कहा कि इस कडाके की सर्दी मेँ दिल्ली के फुटपाथोँ पर सोने वाले बेघर लोगोँ पर एक स्टोरी करो!
शाम को आफिस से लौटते वक्त मैँ गर्म कपडोँ की एक दुकान मेँ पहुँचा! मैँने एक कँबल खरीदा और सोचने लगा जब ये कँबल “गुमनाम” को दूँगा तो वो कितना खुश होगा? कँबल लेकर जब उस चौक के करीब पहुँचा तो देखा गुमनाम वहाँ नहीँ है! मैँने उसे आस-पास देखा, लेकिन वो मुझे कहीँ दिखाई नहीँ दिया! मुझे कँबल लिये घूमते देख एक दुकानदार ने मुझसे सवाल किया, किसे ढूँढ रहे हैँ आप? गुमनाम को.....यही बुलाते हैँ ना आप उसे? मैँने कहा! देर कर दी आपने! एमसीडीए वाले ले गये हैँ उसे! सुबह सर्दी से उसकी मौत हो गई! उसके इन शब्दोँ ने मुझे निशब्द कर दिया!
दूसरे दिन रिपोर्टर ने सर्दी मेँ फुटपाथ पर सोने वाले बेघर लोगोँ पर वो स्टोरी फाईल की जो मैँने करने को कहा था! वो मेरे पास आया और उसने कल सर्दी से हुई मौतोँ का आकडा बताया...24. उसने कहा स्टोरी कैसी लगी सर? मैँने कहा इसमेँ एक “गुमनाम” भी है! रिपोर्टर बोला ठँड से मरने वालोँ का कोई नाम नहीँ है, सभी गुमनाम हैँ सर !
सर्दी अपना कहर ढहा रही थी ! और हम सर्दी को जम कर कोस रहे थे! सुबह के शिफ्ट मेँ न्यूज़ बुलेटिँस की ज़िम्मेदारी मुझ पर थी इसलिये सबेरा होने के पहले ही ड्राइवर मुझे लेने पहुँच जाता था! लेकिन गिरते पारे और कहर बरसाते कोहरे से सारी दिल्ली परेशान थी! ना तो पारा चढने का नाम ले रहा था ना ही कोहरा कम होने का! सुबह आफिस से फोन आया, “ सर दस मिनिट मेँ ड्राईवर आपके पास पहुँच जायेगा!” तैयार होकर जब मैँ नीचे पहुँचा तो मुझे अपनी इस जल्दबाजी पर अफसोस हुआ! क्योँकि सर्दी इतनी ज्यादा थी कि खुले मेँ एक मिनिट भी पहाड जैसा लग रहा था! जबकि मैँने गर्म कपडे पहने थे! कुछ ही देर मेँ गाडी आ गई, तो ड्राईवर ने भी मुझसे वही सवाल किया जिस बेवकूफी पर मैँ खुद को कोस रहा था! उसने कहा,- इतनी सर्दी मेँ आप पहले से ही बाहर क्योँ आ गये? मैँ जल्दी से गाडी मेँ बैठा,और ड्राईवर ने गाडी बढाई! आगे कुछ दूर मोड पर पहुँच कर मेरी नज़र शीशे से बाहर गई तो मैँ हैरान रह गया! फुटपाथ पर एक शख्स खुद को समेट कर सर्दी से बचने की नाकाम कोशिश कर रहा था! उसके पास एक चादर भी नहीँ थी! और उसके कपडे फटे हुए थे! ये जानने के लिये कि वो कौन है और इतनी सर्दी मेँ फुटपाथ पर क्या कर रहा है? मैँने ड्राईवर से गाडी रोकने को कहा! गाडी से उतर कर मैँ उसके पास पहुँचा तो देखा ये तो वोही शख्स है जिसे लोग गुमनाम कहते हैँ! तभी ड्राईवर चिल्लाया, “सर दिल्ली के फुटपाथ पर हज़ारोँ लोग ऐसे ही रात गुज़ारते हैँ! जल्दी कीजिये आफिस के लिये लेट हो रहा है!” मेरे कदम पीछे मुडे और ड्राएवर ने सुनसान सडक पर गाडी दौडा दी! दिन भर आफिस मेँ खबरोँ के शोर मेँ उलझा रहा! लेकिंन खबरोँ के इस शोर मेँ मुझे उस “गुमनाम” की खामोश दास्तान सुनाई दे रही थी इसलिये मैँने इनपुट से कहा कि इस कडाके की सर्दी मेँ दिल्ली के फुटपाथोँ पर सोने वाले बेघर लोगोँ पर एक स्टोरी करो!
शाम को आफिस से लौटते वक्त मैँ गर्म कपडोँ की एक दुकान मेँ पहुँचा! मैँने एक कँबल खरीदा और सोचने लगा जब ये कँबल “गुमनाम” को दूँगा तो वो कितना खुश होगा? कँबल लेकर जब उस चौक के करीब पहुँचा तो देखा गुमनाम वहाँ नहीँ है! मैँने उसे आस-पास देखा, लेकिन वो मुझे कहीँ दिखाई नहीँ दिया! मुझे कँबल लिये घूमते देख एक दुकानदार ने मुझसे सवाल किया, किसे ढूँढ रहे हैँ आप? गुमनाम को.....यही बुलाते हैँ ना आप उसे? मैँने कहा! देर कर दी आपने! एमसीडीए वाले ले गये हैँ उसे! सुबह सर्दी से उसकी मौत हो गई! उसके इन शब्दोँ ने मुझे निशब्द कर दिया!
दूसरे दिन रिपोर्टर ने सर्दी मेँ फुटपाथ पर सोने वाले बेघर लोगोँ पर वो स्टोरी फाईल की जो मैँने करने को कहा था! वो मेरे पास आया और उसने कल सर्दी से हुई मौतोँ का आकडा बताया...24. उसने कहा स्टोरी कैसी लगी सर? मैँने कहा इसमेँ एक “गुमनाम” भी है! रिपोर्टर बोला ठँड से मरने वालोँ का कोई नाम नहीँ है, सभी गुमनाम हैँ सर !
माई नेम इज़ “कामन मेन”
कोई कहता है माई नेम इज़ खान...तो कोई कहता है माई नेम इज़ ठाकरे! तो सोचा आज मैँ भी बता ही दूँ कि माई नेम इज़ कामन मेन! शाहरुख की फिल्म की रिलीज़ के ठीक पहले ये बात बताना इसलिये भी मुझे ज़रूरी लगा कि ठाकरे और खान की इस महाभारत मेँ सरकार ने मुझे भुला दिया है! मेरी जान की कोई कीमत नहीँ है! मेरी ज़िँदगी और मौत बस एक आँकडा है! सरकारी आँकडा! मेरे साथ कभी भी कुछ भी हो सकता है! गुँडे-बदमाश, अँडरवर्ल्ड और आतँकवादी सभी मेरी जान के पीछे पडे हैँ! लेकिन सरकार को मेरी कतई चिँता नहीँ है! उसे चिँता है तो इस बात की कि शाहरुख की फिल्म रीलीज़ हो जाये! और आईपीएल वक्त पर हो जाये! इसीलिये तो मेरी प्यारी सरकार ने मुँबइ को छावनी मेँ तब्दील कर दिया है! ऐसा उसने पहले कभी नहीँ किया! तब भी नहीँ जब मुँबई की लोकल ट्रेनोँ मेँ हुए आतँकी हमलोँ मेँ मैँ मारा जा रहा था! आजकल कोई मराठी मानुष की बात कर रहा है तो किसी को उत्तर भारतीयोँ की चिँता सता रही है! लेकिन मुझे भूल गये...... मुम्बई का डिब्बेवाला और बिहार का रिक्शे वाला..... वो मैँ ही तो हूँ! एक आम भारतीय! खान भी मैँ ही हूँ और ठाकरे भी तो मैँ ही हूँ! वैसे सरकार ने ये पहली बार नहीँ किया है! वो तो मुझे आज़ादी के बाद से ही भूलती आई है! मैँ एक आम आदमी हूँ जिसे “आम” समझ कर जिसने चाहा चूमा और जम कर चूसा! ये सिलसिला आज भी जारी है ! अब तो मुझमेँ गुठलियोँ के सिवाय कुछ बचा ही नहीँ है! लेकिन फिर भी सरकार की सारी कल्याणकारी योजनाओँ का केन्द्र मैँ ही हूँ! हाँ वो मैँ ही हूँ जिसके कल्याण लिये पास होती हैँ कईँ योजनाएँ और बटता है अरबोँ का फँड ! फिर भी मैँ भूख से मर रहा हूँ! ना मेरा कोई भविष्य है ना ही मेरे बच्चोँ का! मेरे बच्चे खैराती स्कूलोँ मेँ तालीम के नाम पर अपना वक्त बरबाद कर रहे हैँ! उन्हेँ हिँदी मेँ शिक्षा दी जा रही है! जबकि सरकार ये जानती है कि सरकारी दफ्तर हो या मल्टी नेशनल कँपनी अँग्रेज़ी के बिना कहीँ नौकरी नहीँ मिलती! डाक्टरी, इँजीनियरिँग, कानून, एमबीए, सारी बडी डिग्रीयाँ कानवेँट मेँ पढे अमीरोँ के बच्चोँ को ही बाटी जा रही हैँ! ऐसे मेँ अगर मेरा बच्चा सरकारी बिजली के खँबे के नीचे पढ कर अँग्रेज़ी सीख भी जाता है तो, उसे लाखोँ रुपये खर्च कर महँगी डिग्रीयाँ दिलाना मेरी औकात के बाहर की बात है! मेरे पास तो दो वक्त की रोटी का भी जुगाड नहीँ! तो फीस के लिये लाखोँ रुपये कहाँ से लाउँगा? क्योँकि मैँ एक आम आदमी हूँ! और मेरे बच्चे आम ही बनने के लिये मजबूर हैँ! खास तो ठाकरे साहब हैँ....! खास तो किँग खान हैँ.....! क्योँकि ठाकरे साहब ये जानते हैँ कि राजनीति के लिये ताकत का इस्तेमाल कब और कहाँ करना चाहिये! किँग खान भी इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैँ, कि विवादोँ से फिल्मोँ को फायदा ही नहीँ पहुँचता बल्कि अवार्ड भी मिलते हैँ! विदेशोँ मेँ जाकर अब वो ये बता सकते हैँ कि अपने ही देश मेँ उनकी फिल्म का कितना विरोध हुआ! खास है हमारी पुलिस जो अँडरवर्ल्ड और आतँकीयोँ से लडॅने मेँ कभी इतनी तैयार नहीँ दिखी जितनी इस फिल्म को रिलीज़ कराने के लिये मुस्तैद है! खास है हमारी सरकार जो आम आदमी यानि मेरे लिये साठ सालोँ से सोच-सोच कर बूढी हो गई है! मेरा क्या है मैँ तो आम आदमी हूँ! मैँ महँगाई के बोझ तले दबा जा रहा हूँ! लेकिन किसी को इसकी कोई फिक्र नहीँ! उल्टा सरकार कीमतेँ बढाने की तैय्यारी कर रही है! आटा-दाल मेरी पहुँच से बाहर की बात हो गये हैँ! चीनी खाना तो मैँ शरद पँवार साहब के सुझाव देने के पहले ही छोड चुका था! क्योँकि मैँ जानता हूँ कि ज़्यादा चीनी से डयबटीज़ हो जाता है! पर क्या पँवार साहब ने चीनी खाना छोड दिया? वो तो पोरबँदर के एक साधारण दीवान का बेटा था जो कहने के पहले खुद उस पर अमल करता था! पँवार साहब तो बडे उद्योगपति हैँ! और भारत सरकार के इतने बडे मँत्री हैँ! उनहेँ भला चीनी छोडने की क्या ज़रूरत? बीते सालोँ मेँ जब मुझे गन्ने के दाम नहीँ मिल रहे थे...मैँ यूपी के चौराहोँ पर मेहनत से उपजाई गन्ने की फसल जला रहा था....तब भी तो चीनी मिलोँ के मालिक सरकार से मिलकर मिठाईयाँ खा रहे थे! उस वक्त भी सरकार मेरी आत्महत्याओँ से बेफिक्र थी! विदर्भ मेँ भी तो मैँ ही मर रहा था! उत्तर भारतीय और मराठी किसान दोनोँ के दुख-दर्द बाँटने वाला कोई नहीँ था! क्योँकि दोनोँ ही रूपोँ मेँ वो मैँ ही तो था आम आदमी! और आज भी जब महँगाई और बेरोज़गारी मुझे निगल रही है...मुझे बचाने वाला कोई नहीँ है! क्योँकि माई नेम इस कामन मेन! ए पूअर कामन मेन ओफ इँडिया! मेरे दर्द और भी हैँ क्या आपके पास सुनने का वक्त है?
Monday, 8 February 2010
भ्रष्टाचार अनँत...भ्रष्टाचार कथा अनँता!
आयकर विभाग इन दिनोँ देश भर मेँ छापेमारी कर रहा है! मध्यप्रदेश के बाद अब छत्तीसगढ के आला अधिकारी भी आयकर विभाग के निशाने पर आ गये हैँ! आईएस अधिकारियोँ और नेताओँ के गद्दोँ और बाथरूमोँ मेँ कुबेर के खजाने मिले होँ ये कोई पहली बार नहीँ हुआ है! लेकिन मीडिया मेँ इन खबरोँ के आने के बाद काफी लोगोँ ने अपने बेडरूम और बाथरूम की सफाई करवा दी है! कम से कम मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ के बडे अधिकारी अब कोई रिस्क लेने के मूड मेँ नहीँ हैँ! ये बात दीगर है कि इन भ्रष्ट अधिकारियोँ का सूचना तँत्र इतना व्यापक है कि छापे-मारी की कार्रवाई से पहले ही इनहेँ सूचना मिल जाती है! लेकिन फिर भी सावधानी मेँ ही समझदारी है ये बात हमारे जीनियस अधिकारी अच्छी तरह जानते हैँ!
लेकिन शिवसेना, शाहरुख और राहुल गाँधी की महाभारत के बीच इस मुद्दे की चर्चा कोई करना नहीँ चाहता! हालाकि चर्चा तो राहुल के मुँबई दौरे के वक्त पाकिस्तान मेँ मनाये गये काशिमीर डे की भी नहीँ हुई! जहाँ बडे पैमाने पर भारत विरोधी नारे लगाये गये थे! और भारत मेँ आतँकवाद फैलाने के लिये लश्कर की जम कर पीठ थपथपायी गई थी! कश्मीर के एक अलगाववादी नेता ने इस सभा को फोन पर एड्रेस भी किया था! पाकिस्तान की सरकार ने भी प्रदर्शनोँ का समर्थन किया! इस सभा मेँ भारत पर आतँकी हमले करने वाले मोहममद हामिद सईद सहित कईँ आतँकी भी शामिल हुए थे! लेकिन हमारी सरकार ने पाकिस्तान से इसका कोई जवाब नहीँ माँगा! उससे भी चकित कर देने वाली बात ये कि उसी दिन हमारी सरकार ने पाकिस्तान के सामने बातचीत की पेशकश की! पाकिस्तान मेँ खुलेआम भारत पर हमले करने वाले आतँकी भारत के खिलाफ जिहाद यानि युध्द करने के लिये वहाँ की आवाम को उकसा रहे हैँ! पाकिस्तानी सरकार उनहेँ गिरफ्तार करने की बजाय उनके समर्थन मेँ बयान दे रही है ( पाकिस्तान के प्रधानमँत्री ने उसी दिन कश्मीर की आज़ादी के समर्थन मेँ बयान दिया था!)!....... हमारी सरकार उसी दिन पाकिस्तान से बातचीत की पेशकश करती है! और.......... हमारा मीडिया राहुल के मुँबई दौरे का चँदबरदई स्टाईल मेँ गुणगान करते नहीँ थकता! ये भ्रष्टाचार का कौन सा प्रकर है इसका फैसला आप ही कीजिये! फिलहाल मैँ बात कर रहा हूँ बिहार की!
बिहार मेँ इन दिनोँ मुख्यमँत्री नितिश कुमार आपरेशन क्लीन बिहार चला रहे हैँ! ( इसकी चर्चा भी मीडिया मेँ कहीँ नहीँ है!) नितीश खुश हैँ कि बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम 2009 को मँजूरी देने के लिये केन्द्र सरकार सहमत हो गई है! अब उनकी नज़र भ्रष्टाचार की कमाई से बनी आलीशान इमारतोँ पर है! इस कानून के लागू होने के बाद इन इमारतोँ को जब्त कर नितीश इनमेँ गरीब बच्चोँ के लिये सरकारी स्कूल खोल देँगे!
अपराधोँ के कुछ वर्गोँ के जल्द निपटारे और भ्रष्टाचार से जुडी सँपत्ति के अधिग्रहण को आसान बनाने के लिये विशेष न्यायलयोँ का गठन इस विधेयक के माध्यम से किया जायेगा! विधेयक की प्रस्तावना मेँ कहा गया है कि चूँकि सरकार के पास ऐसा मानने के पर्याप्त कारण मौजूद हैँ कि सार्वजनिक पदोँ पर कार्य या कार्य कर चुके व्यक्तियोँ, जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 2ग के तहत लोकसेवक भी हैँ, ने बडी सँख्या मेँ अकूत धन अर्जित किया है, जो उनकी आय के ज्ञात स्त्रोतोँ से मेल नहीँ खाता है! इसलिये अब राज्य सरकार अधिसूचना जारी कर पर्याप्त सँख्या मेँ विशेष न्यायालयोँ की स्थापना करेगी! इन विशेष न्यायलयोँ की अध्यक्षता पटना उच्च न्यायाल की सहमति और राज्य सरकार की और से निर्दिष्ट न्यायाधीश करेँगे! बिहार मेँ सता मेँ आने के बाद मुख्यमँत्री नितीश कुमार के सामने हर स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार पर विराम लगाने की चुनौती मुँह बाँये खडी थी! सच तो यही है कि आज़ादी के बाद से ही बिहार मेँ घोटालोँ की बुनियाद पड गई थी! छोआ घोटाले से शुरु हुआ ये सिलसिला 2004 के बाढ राहत घोटाले तक जारी रहा! देर आये, दुरुस्त आये वाली कहावत यहाँ चरितार्थ होती दिखती है! क्योँकि बिहार नहीँ ये तो पूरे देश मेँ पहले ही हो जाना चाहिये था! आपरेशन क्लीन बिहार की शुरुआत कर नितिश ने बाकी राज्योँ को भी एक राह दिखाई है! अब देखना ये है कि बाकी राज्य पाटॅलिपुत्र से शिक्षा लेते हैँ या नहीँ
लेकिन शिवसेना, शाहरुख और राहुल गाँधी की महाभारत के बीच इस मुद्दे की चर्चा कोई करना नहीँ चाहता! हालाकि चर्चा तो राहुल के मुँबई दौरे के वक्त पाकिस्तान मेँ मनाये गये काशिमीर डे की भी नहीँ हुई! जहाँ बडे पैमाने पर भारत विरोधी नारे लगाये गये थे! और भारत मेँ आतँकवाद फैलाने के लिये लश्कर की जम कर पीठ थपथपायी गई थी! कश्मीर के एक अलगाववादी नेता ने इस सभा को फोन पर एड्रेस भी किया था! पाकिस्तान की सरकार ने भी प्रदर्शनोँ का समर्थन किया! इस सभा मेँ भारत पर आतँकी हमले करने वाले मोहममद हामिद सईद सहित कईँ आतँकी भी शामिल हुए थे! लेकिन हमारी सरकार ने पाकिस्तान से इसका कोई जवाब नहीँ माँगा! उससे भी चकित कर देने वाली बात ये कि उसी दिन हमारी सरकार ने पाकिस्तान के सामने बातचीत की पेशकश की! पाकिस्तान मेँ खुलेआम भारत पर हमले करने वाले आतँकी भारत के खिलाफ जिहाद यानि युध्द करने के लिये वहाँ की आवाम को उकसा रहे हैँ! पाकिस्तानी सरकार उनहेँ गिरफ्तार करने की बजाय उनके समर्थन मेँ बयान दे रही है ( पाकिस्तान के प्रधानमँत्री ने उसी दिन कश्मीर की आज़ादी के समर्थन मेँ बयान दिया था!)!....... हमारी सरकार उसी दिन पाकिस्तान से बातचीत की पेशकश करती है! और.......... हमारा मीडिया राहुल के मुँबई दौरे का चँदबरदई स्टाईल मेँ गुणगान करते नहीँ थकता! ये भ्रष्टाचार का कौन सा प्रकर है इसका फैसला आप ही कीजिये! फिलहाल मैँ बात कर रहा हूँ बिहार की!
बिहार मेँ इन दिनोँ मुख्यमँत्री नितिश कुमार आपरेशन क्लीन बिहार चला रहे हैँ! ( इसकी चर्चा भी मीडिया मेँ कहीँ नहीँ है!) नितीश खुश हैँ कि बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम 2009 को मँजूरी देने के लिये केन्द्र सरकार सहमत हो गई है! अब उनकी नज़र भ्रष्टाचार की कमाई से बनी आलीशान इमारतोँ पर है! इस कानून के लागू होने के बाद इन इमारतोँ को जब्त कर नितीश इनमेँ गरीब बच्चोँ के लिये सरकारी स्कूल खोल देँगे!
अपराधोँ के कुछ वर्गोँ के जल्द निपटारे और भ्रष्टाचार से जुडी सँपत्ति के अधिग्रहण को आसान बनाने के लिये विशेष न्यायलयोँ का गठन इस विधेयक के माध्यम से किया जायेगा! विधेयक की प्रस्तावना मेँ कहा गया है कि चूँकि सरकार के पास ऐसा मानने के पर्याप्त कारण मौजूद हैँ कि सार्वजनिक पदोँ पर कार्य या कार्य कर चुके व्यक्तियोँ, जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 2ग के तहत लोकसेवक भी हैँ, ने बडी सँख्या मेँ अकूत धन अर्जित किया है, जो उनकी आय के ज्ञात स्त्रोतोँ से मेल नहीँ खाता है! इसलिये अब राज्य सरकार अधिसूचना जारी कर पर्याप्त सँख्या मेँ विशेष न्यायालयोँ की स्थापना करेगी! इन विशेष न्यायलयोँ की अध्यक्षता पटना उच्च न्यायाल की सहमति और राज्य सरकार की और से निर्दिष्ट न्यायाधीश करेँगे! बिहार मेँ सता मेँ आने के बाद मुख्यमँत्री नितीश कुमार के सामने हर स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार पर विराम लगाने की चुनौती मुँह बाँये खडी थी! सच तो यही है कि आज़ादी के बाद से ही बिहार मेँ घोटालोँ की बुनियाद पड गई थी! छोआ घोटाले से शुरु हुआ ये सिलसिला 2004 के बाढ राहत घोटाले तक जारी रहा! देर आये, दुरुस्त आये वाली कहावत यहाँ चरितार्थ होती दिखती है! क्योँकि बिहार नहीँ ये तो पूरे देश मेँ पहले ही हो जाना चाहिये था! आपरेशन क्लीन बिहार की शुरुआत कर नितिश ने बाकी राज्योँ को भी एक राह दिखाई है! अब देखना ये है कि बाकी राज्य पाटॅलिपुत्र से शिक्षा लेते हैँ या नहीँ
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