Wednesday, 2 June 2010

सरकार को दी चुनौती, मेट्रो में घुसा बंदर: दिल्ली से योगेश गुलाटी

दिल्ली मेट्रो में बंदर के घुसने के बाद से ही दिल्ली सरकार खासी चिंतित नज़र आ रही है! मुख्यमंत्री का ये सख्त आदेश था कि कामनवेल्थ गेम्स के मद्देनज़र गरीब और उनके पूर्वज यानि बंदर मेट्रो स्टेशन के आस-पास भी ना फटकें! गरीबों पर तो दिल्ली सरकार का ज़ोर चल गया लेकिन बंदरों पर नही चल सका! तमाम सुरक्षा व्यवस्था की धज्जियां उडाते हुए एक फिदायीन बंदर दिल्ली मेट्रो में घुसने में कामयाब हो ही गया! दिलशाद गार्डन की ओर जाने वाली रिठाला मेट्रो में ये बंदर ना केवल घुसने में कामयाब हुआ बल्कि उसने बकायदा मेट्रो में बिना टिकिट सफर भी कर डाला! हालाकि यात्रियों को इस बंदर के अपने साथ सफर करने से कोई परेशानी नहीं हुई और उन्होंने बिस्किट खिला कर अपने साथी यात्री का स्वागत किया!

लेकिन मेट्रो में बंदर के घुस आने की खबर लगते ही प्रशासन में हडकंप मच गया! उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि गरीबों का पूर्वज ये कम्बख्त बंदर इतनी कडी सुरक्षा के बावजूद इतनी बडी हिमाकत करने में कामयाब कैसे हो गया! इसलिये तत्काल बंदर को बाहर निकालने के लिये औद्योगिक सुरक्षा बल मौके पर बुला ली गई! मेट्रो ट्रेन को अगले स्टेशन पर रोक कर यात्रियों से खाली कराया गया! और फिर सुरक्षा बल के जवान बंदर को ट्रेन से बाहर निकालने के काम में जुट गये! इसके लिये उन्होंने साम-दाम, दंड-भेद सारी नीतियों का सहारा लिया! लेकिन कम्बख्त बंदर एयरकंडीशन ट्रेन से बाहर आने को राज़ी ही नहीं हुआ!

जब सुरक्षा बलों ने हार मान ली तो मेट्रो स्टाफ के एक समझदार कर्मचारी ने अक्ल का इस्तेमाल किया! उसने थोडे से चने मेट्रो के बाहर रख दिये, जिसे देख कर वो भोला बंदर ललचाया और एक ही छलांग में मेट्रो ट्रेन से बाहर आ गया! मेट्रो प्रशासन ने तत्काल मेट्रो ट्रेन के दरवाज़े बंद किये और मेट्रो को रवाना कर दिया! मेट्रो प्रशासन ने खुशी के लड्डू यात्रीयों में बंटवाए! इस कामयाबी की सूचना तत्काल मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंचा दी गई! क्योंकि आखिर उन्हें गरीबों के पूर्वज उस बंदर को मेट्रो से बाहर करने में कामयाबी मिल गयी थी! खैर बंदर वो काम कर चुका था जो वो करने आया था! मेट्रो की सवारी कर वो दिल्ली सरकार को अपना संदेश दे चुका था!

दरसल इस घटना की स्क्रिप्ट घटना से एक दिन पहले ही रिठाला के नज़दीक एक बगीचे में उस समय लिख दी गई थी! जब सर्व समाज बंदर महा सभा ने सर्व सहमति से ये प्रस्ताव पारित किया था कि दिल्ली पर उनका भी उतना ही हक है जितना कि उनके वंशजों का! दिल्ली के तमाम बुध्दिजीवी बंदर इस सभा में शिरकत करने पहुंचे थे! सर्व समाज बंदर महासभा का मानना है कि वो भी दिल्लीवासी हैं, और रिश्ते में चूंकि इंसानों के पूर्वज हैं इस लिहाज से उन्हें सीनियर सिटिजन का दर्जा मिलना चाहिये! और इस गर्मी में मुफ्त में मेट्रो की सवारी की अनुमति मिलनी चाहिये!

ये सर्व समाज बंदर महासभा बंदरों के साथ दिल्ली सरकार के रवैये से खासी नाराज़ है! उनका कहना है कि दिल्ली सरकार को गरीबों की ही तरह उनकी भी कोई चिंता नहीं है! बल्कि दिल्ली सरकार ने पिछले साल बंदरों को दिल्ली से दफा करने के लिये ठीक वैसी ही मुहीम चालाई थी जैसी इन दिनों वो गरीबों के लिये चला रही है! लेकिन इस मुहीम को धता बताते हुए तमाम बंदर दिल्ली वापस आ गये! इतना ही नहीं इस मुहीम का विरोध करने की खातिर उन्होंने अन्य प्रदेशों से अपने रिश्तेदारों को भी बुला लिया था! और आज दिल्ली में पिछले साल की तुलना में दुगने बंदर हैं! सर्व समाज बंदर महासभा का कहना है कि वो गरीब नहीँ हैं, जो चुप रहेंगे! वो बंदर हैं और अपने हक की लडाई पुरज़ोर तरीके से लडेंगे!

इसतरह बंदर महसभा में सर्व सम्मत्ति से ये प्रस्ताव पास हुआ कि दिल्ली मेट्रो में घुस कर दिल्ली की शीला सरकार को चुनौती दी जाये! इसके लिये बकायदा एक ट्रेंड फिदायीन बंदर का इस्तेमाल किया गया! उसे किसी भी कीमत पर मेट्रो ट्रेन से बाहर ना आने की नसीहत दी गई थी! लेकिन वो मूर्ख बंदर गरीबों के ही तरह लालच में फंस गया! और थोडे से चने के लालच मे अपने उद्देश्य से भटक कर ट्रेन से बाहर आ गया! शायद इसलिये क्योंकि गरीब और बंदर दोनों में ही एक समानता उनका खाली पेट है! और शायद यही कारण है कि सरकार ने बंदर और उनके वंशजों को विदेशी मेहमानों के आने से पहले दिल्ली से बाहर करने की ठानी है! क्योंकि पेट की खातिर अगर इन्होंने विदेशी मेहमानों के सामने हाथ फैला दिये तो दिल्ली की इज़्ज़त का क्या होगा?

Monday, 31 May 2010

कौन समझेगा झारखंड का दर्द?: दिल्ली से योगेश गुलाटी

झारखंड जिसे वन प्रदेश के नाम से भी जाना जाता है, उसे प्रकृति ने भरपूर संपदा से नवाज़ा है! झार का अर्थ होता है पेड और खंड का अर्थ प्रदेश! नाम से ही स्पष्ट है कि वनों का ये प्रदेश निश्चय ही प्राकृतिक संधानों से परिपूर्ण होगा! और ऎसा ही है भी, यहां वन संपदा, कोयला और खनिजों के भंडार हैं! बावजूद इसके ये आदिवासी प्रदेश देश के सबसे गरीब प्रदेशों में आता है! 22 जिले और दो करोड सत्तर लाख की जनसंख्या वाले इस वन प्रदेश का ये दुर्भाग्य ही रहा है कि हमेंशा से ही यहां के भोले-भाले आदिवासियों को छला गया है!
आज से 72 साल पहले आदिवासी महासभा ने अलग झारखंड का जो सपना देखा था वो 15 नवंबर 2000 को आदिवासी नेता बिरसा मुंडा के जन्मदिन पर पूरा हुआ! इस दिन झारखंड देश का 28 वां राज्य बना! तब ये माना जा रहा था कि अब झारखंड की बदहाली के दिन लद जायेंगे, और ये वन प्रदेश तरक्की की राह में बाकी प्रदेशों को पीछे छोड देगा! क्योंकि जितने प्राकृतिक संसाधन झारखंड के पास हैं उतने सपन्न दूसरे प्रदेश नहीं हैं! लेकिन इसे झारखंड का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि 72 साल पहले देखा गया आदिवासी महासभा का वो सपना पूरा तो हो गया लेकिन परवान नहीं चढ सका! क्योंकि झारखंड राजनीति के खेल में इस कदर उलझ गया कि यहां के मूल मुद्दे आदिवासी और विकास एक बार फिर दरकिनार कर दिये गये!
आदिवासियों के विकास के नाम पर बना ये प्रदेश लूट का केन्द बन गया! झारखंड में जो लूट मची उसे देख कर सारा देश स्तब्ध रह गया! लगातार मुख्यमंत्री बदले गये! खुद को आदिवासियों का नेता बताने वालों ने लूट का कोई मौका हाथ से जाने नहीं दिया! झारखंड के एक पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा इन दिनों भ्रष्टाचार और अकूत संपत्ति अर्जित करने के आरोपों के बाद से ही जेल में हैं ! तो पूर्व मंत्री एनोस एक्का, कमलेश सिंह, और हरिनारायण सिंह भी जेल में उनका साथ दे रहे हैं! कुछ और पूर्व मंत्री और उनके नज़दीकीयों पर भी कानून का शिकंजा जल्द ही कसता दिख रहा है! यानि एक पूर्व मुख्यमंत्री का पूरा मंत्रीमंडल ही प्रदेश को लूटने के आरोपों के चलते सलाखों के पीछे है! झामुमो के मुखिया शिबू सोरेन के समर्थन में बनी मधु कोडा सरकार ने प्रदेश में जो लूट मचाई उसने सारे देश को हैरान कर दिया! और बुध्दिजीवी सोच में पड गये कि लोकतंत्र में यदि चुनी हुई सरकार ही प्रदेश को लूटने लगे तो क्या किया जाये?
इधर मधु कोडा को समर्थन देने वाले शीबू सोरेन का दामन भी पाक साफ नहीं है! उन पर भी कई संगीन आरोप लगते रहे हैं! कितने आश्चर्य की बात है कि झारखंड में सोरेन बीजेपी के सहयोग से मुख्यमंत्री बनते हैं और नई दिल्ली में जाकर कांग्रेस की यूपीए सरकार के पक्ष में वोट करते हैं! इस पर भी जब बीजेपी ने समर्थन वापस लिया तो सोरेन अपनी कुर्सी बचाने के लिये पूरी तरह आश्वस्त दिख रहे थे! शायद उन्हें ये भरोसा था कि कांग्रेस के साथ उनकी डील हो जायेगी और अगर कांग्रेस ने अपना मुख्यमंत्री बनाने की शर्त रखी तो वो केन्द्र में कोई भारी भरकम मंत्रालय मांग कर सौदा पटा लेंगे! लेकिन लगता है अंतिम समय में सोरेन का ये भ्रम टूट गया! और महज़ 14 विधायकों के बल पर झारखंड पर राज करने वाले सोरेन को इस्तीफा देने पर मजबूर होना पडा!
झारखंड में चाहे राष्ट्रपति शासन लग रहा हो, चाहे वहां विधानसभा निलंबित हो जाये, तब भी राजनीति के गलियारों में जोतोड का खेल बंद नहीं होने वाला! एक तरफ अमीर धरती के गरीब लोग विकास की उम्मीद लगाये बैठे हैं, तो दूसरी तरह उनके नेता जोड-तोड की राजनीति में मगन होकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं! ये वो प्रदेश है जहां लोग बीस रुपये प्रतिदिन से भी कम आय पर अपना गुजारा करते हैं! जहां की साक्षरता, भुखमरी, बेरोज़गारी और मानव विकास संबंधी आकडे आपको हिला कर रख देँगे! लेकिन 72 साल पहले आदिवासी महासभा ने झारखंड प्रदेश का सपना इसलिये तो नहीं देखा था कि झारखंड लूट और राजनीति के अखाडे में तब्दील हो जाये, और यहां के आदिवासी भूख से दम तोडते रहें?

लिव इन, प्यार या व्याभिचार?: दिल्ली से योगेश गुलाटी

जेट एयरवेज़ की एक एयरहोस्टेस ने अपने साथी पायलेट के खिलाफ रेप का मामला दर्ज करवाया है! जिसके बाद महिला के साथी पायलेट को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया! 22 वर्षीय एयरहोस्टेस 27 साल के पायलेट के साथ लिव इन रिलेशशिप में 2009 से रह रही थी! एयरहोस्टेस ने आरोप लगाया है कि उसके साथी पायलेट ने उसे शादी का वादा किया था, लेकिन बाद में वो मुकर गया! इससे एक बात उभर कर सामने आयी है कि महानगरों में लिव इन का प्रचलन बढ रहा है! सवाल ये है कि हमारे आधुनिक कहे जाने वाले युवा लिव इन का खुल कर समर्थन करते हैं! वो कहते हैं अगर दो प्यार करने वाले साथ रहना चाहते हैं तो इसमें बुराई क्या है! हैरानी की बात ये है कि लडकियां भी ऎसे तर्कों के मामले में पीछे नहीं हैं! लेकिन सवाल ये है पहले शादी के बिना साथ रहने का फैसला करते हो, बाद में शादी की ही बात पर अलगाव करते हो? अगर शादी ही करनी थी तो शादी करके साथ क्यों नहीं रहे सम्मान के साथ? पहले लिव - इन में रहते हो बाद में शादी की बात करते हो? शादी का इरादा था तो लिव - इन में क्यों रहे?

लिव -इन और शादी दोनों ही दो अलग - अलग मुद्दे हैं! हमारे कानून ने युवाओं को पूरी आज़ादी दे रखी है! और दो लोगों के मर्ज़ी से साथ रहने पर कानूनन कोई बंदिश नहीं है! लेकिन शादी में जहां ज़िम्मेदारी जुड जाती है, वहीं लिव - इन में ज़िम्मेदारी जैसी कोई बात नहीं होती! और आप कानूनी तौर पर अपने पार्टनर को किसी बात के लिये बाध्य नहीं कर सकते! आमतौर पर लिव- इन में रहने के बाद लडकियां अपने पार्टनर पर शादी के लिये दबव डालने लगती हैं! और जब वो शादी से इन्कार कर देता है तो चुंकि उनके पास दूसरा कोई रास्ता नहीं होता इसलिये वो प्रतिशोध में अपने उसी साथी पर जिसके साथ वो अपनी मर्ज़ी से रह रही थीं रेप का केस कर जेल भिजवा देती हैं!

लिव - इन प्यार है, इसके समर्थन में तर्क देने वाले महापुरुषों की लंबी फेहरिस्त है! लेकिन मुझे समझ नहीं आता अगर ये प्यार है तो व्याभिचार क्या है? हमारे युवाओं का एक वर्ग अति आधुनिक होने का दावा करता है! इसमें अधिकांश वे लोग हैं जो छोटे कस्बों में पले बढे हैं और अब नौकरी या शिक्षा के लिये महानगरों में रह रहे हैं! ऎसे में वो खुद को एक आज़ाद पंछी की तरह समझने लगते हैं! जो पिंजरे से अभी - अभी मुक्त हुआ हो! ये अपनी ज़िंदगी को खुल कर जीना चाहते हैं! और अपनी आज़ादी का भरपूर फायदा उठाना चाहते हैं! इसलिए इन्हें लिव इन से भी परहेज़ नहीं और खुल कर उसका समर्थन करते हैं! लेकिन कुछ समय बाद शादी के मुद्दे पर अलगाव सामने आ जाता है! और फिर वही सवाल उठता है कि अगर शादी ही करनी थी तो लिव - इन की क्या ज़रूरत थी? और अगर लिव - इन प्यार है तो व्याभिचार क्या है?

शर्मनाक...लाश के ऊपर से चलाते रहे कार: दिल्ली से योगेश गुलाटी

रिंग रोड पर हुए एक दर्दनाक हादसे में दिल्ली वालों की असंवेदनशीलता सामने आ गई। महिला की लाश सड़क पर पड़ी थी और कार वाले उसके ऊपर से गाड़ियां चलाते रहे। महिला का शव बुरी तरह क्षत - विक्षत हो गया। रोड एक्सिडेंट के अलावा पुलिस को आशंका है कि महिला की मौत की वजह चलती कार से उसे नीचे फेंकना भी हो सकती है।

यह घटना शनिवार रात 9:45 बजे राजौरी गार्डन इलाके में रिंग रोड फ्लाईओवर पर हुई। किसी राहगीर ने पुलिस को जानकारी दी कि कारें किसी लाश के ऊपर से गुजर रही हैं। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर ट्रैफिक रोक कर किसी तरह शव उठाने की कोशिश की। लगातार गाडि़यां चलते रहने के कारण शव के कई टुकड़े हो चुके थे। पायल और उसके कपड़ों की वजह से यह जानकारी मिल सकी कि शव किसी महिला का है। हालांकि जब लोगों को इस बारे में पता चला तो इसके बाद रिंग रोड पर दो घंटे तक जाम लगा रहा।

Saturday, 29 May 2010

डीयू से तौबा!: दिल्ली से योगेश गुलाटी

मेरे एक देहाती मित्र ने 12वीं में 96 प्रतिशत अंक अर्जित किये तो मैने उसे दिल्ली विश्चिद्यालय में दाखिला लेकर आगे पढाई करने की सलाह दी! मेरी इस सलाह को मानकर वो दाखिले की दौड में शामिल होने मेरे साथ दिल्ली विश्विद्यालय जा पहुंचा! खादी का कुर्ता-पजामा, और पैरों में चमडे की चप्पल पहने जब वो डीयू केम्पस में दाखिल हुआ, तो वहां के नज़ारे देख कर वो चौक गया! लेटेस्ट फैशन ट्रेंड को फालो करते छात्र-छात्राएं डीयू केंपस की शोभा बढा रहे थे! पूरा कैम्पस किसी फैशन शो से कम नहीं लग रहा था! अखबार और टीवी वाले भी डीयू के फैशन ट्रेंड की रिपोर्टिंग और हाट फोटो लेने में व्यस्त थे! लेकिन मेरे देहाती मित्र को कुछ समझ नहीं आ रहा था! जैसे-जैसे वो कैम्पस में आगे बढता जा रहा था, उसकी हैरानी बढती ही जा रही थी! उसे परेशान देख कर मैंने उसकी परेशानी का कारण जानना चाहा! उससे रहा नहीं गया और वो बोला, "यहां सब कार्टून बन कर क्यों घूम रहे हैं?" उसके इस सवाल पर मेंरी हंसी छूट गई! मैंने कहा ये तो डीयू का लेटेस्ट फैशन ट्रेंड है! देखा नहीं यहां इस फैशन को कवर करने के लिये कितनी मीडिया जुटी है़? वो बोला, "फैशन ट्रेंड? लेकिन हम तो यहां दाखिला करवाने आये हैं, क्या दिल्ली विश्विद्यालय में आज कोई फैशन परेड का आयोजन है?" उसके इस भोले सवाल पर मैंने कहा, अभी तो दाखिले की दौड है, एडमिशन के बाद के नज़ारे क्या तुम झेल पाओगे? शायद अपने पुराने और दकियानूसी संस्कारों की वजह से मेरा वो मित्र दिल्ली विश्वविद्यालय के उन्मुक्त वातावरण में असहज महसूस कर रहा था! बगीचे में लेटे छात्र-छात्राओं की नज़दीकीयां, बात-बात में एक दूसरे को छूना उसे जाने क्यों शर्मिंदा कर रहा था!! ऎसा वातावरण उसने शायद पहली बार देखा था, इसलिये मैंने उससे पूछ लिया, तुम्हारे शहर की यूनिवर्सिटी में कैसा माहौल होता है? "हमारे यहां तो बेहद सादगी भरा माहौल होता है, और हमें तो किसी लेटेस्ट फैशन ट्रेंड के बारे में कुछ पता ही नहीं होता है! हम तो वो ही सादे से कपडे पहनते हैं और हाथों में किताब लिये पढने पहुंच जाते हैं! बगीचों में बैठ कर भी हम पढाई ही करते हैं! और बात-बात में एम दूसरे को छूने को हमारे यहां अशिष्टता माना जाता है! और हां लडके-लडकियां इस तरह बगीचे में कभी लेटे हुए नहीं मिलते! वो सीना फुला कर बोला! "अरे भाई वो तुम्हारी देहाती यूनिवर्सिटी है और ये अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विश्विद्यालय! कुछ तो अंतर होगा ही! मैंने कहा! "अगर ऎसा है तो हमें हमारी वो देहाती यूनिवर्सिटी ही प्यारी है, हमें नहीं लेना यहां दाखिला! आप चलिये यहां से!" उसकी ये बात सुनकर मैं सन्न रह गया! वो वाकई में गंभीर नज़र आ रहा था! एक होनहार छात्र दिल्ली विश्विद्यालय में दाखिला लेना नहीं चाहता था! मैंने उसे समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वो अपने निर्णय पर अडिग रहा! देहात के सरकारी स्कूल में पढे उस होनहार लडके ने कानवेंट में पढे छात्रों के साथ दिल्ली विश्विद्यालय में पढने से इन्कार कर दिया था!

जन्मदिन है आज सोच रहा मैं क्या खोया क्या पाया: दिल्ली से योगेश गुलाटी

जन्म दिन है आज सोच रहा मैं, क्या खोया क्या पाया,
क्या अब तक जीवन यों ही व्यर्थ गवाया?
कितने बसंत देखे अब तक उनका हिसाब करूं,
या आने वाले कल को मैं प्रणाम करूं?
करने क्या आया मैं धरा पर,
क्या इस पर विचार करूं?
या जीवन की उलझनों को मैं पार करूं,
क्या द्रव्य का संग्रहण ही लक्ष्य है जीवन का,
या जीवन में एक नया लक्ष्य मैं तैयार करूं!
जितना समझता हूं दुनिया को,
उतना ही होता हूं निराश,
इससे तो अच्छा था मैं बच्चा ही रहता,
दुनिया के छल-कपट से दूर मन का सच्चा ही रहता!

देखे दुनिया के मेले,
और मेलों में देखे झमेले,
धन की चिन्ता में पिसता इंसान,
जब पैसा ही बन जाता भगवान,
तब सस्ती हो जाती इंसानी जान,

सबकी यही कोशिश,
बनानी है अपनी पहचान,
और इसी पहचान की चाहत में,
चल पडा है हर इंसान,
लेकिन वो जानता नहीं कि,
रेत पर खींची लकीरों की तरह है इंसान का वजूद,
वजूद जो इक दिन मिट जायेगा,
सागर की लहरों से लकीरों का,
नाम फिर गुम जायेगा,
जो रहेगा वो कर्म हैं,
विचार हैं, और ये संसार है!
इस नश्वर संसार में अनश्वर कुछ भी नहीं,
परिवर्तन तो प्रकृतिक का नियम है,
इस नियम से बढकर कुछ भी नहीं,

एक मदारी आया था,
संग अपने वो बंदर लाया था,
डमरू की थाप पर नाचता था बंदर,
मदारी की हर बात को मानता था बंदर,
वो कहता उठ तो उठ जाता,
वो कहता बैठ तो वो बैठ जाता,
मदारी के कहने पर वो करता था हर काम,
और हाथ जोड कर करता था सबको सलाम!
लेकिन जीवन मदारी का खेल तो नहीं,
पटरी पर चलने वाली ये कोई रेल तो नहीं,
जब तक ना मिलती राह कोई,
जीवन तब तक संग्राम रहेगा,
मंज़िल पर जब तक ना पहुंचोगे,
तब तक नहीं आराम रहेगा!

Thursday, 27 May 2010

वो सूरज को आंख दिखाता था: दिल्ली से योगेश गुलाटी

करोल बाग मेट्रो स्टेशन के करीब एक मरियल सा रिक्षावाला तपती दुपहरी में रिक्षा खींच रहा था! फटी पैंट और एक बनियान बस यही था उसके तन पर! लू के थपेडों से बचने के लिये उसने अपने कान कपडे से ढक रखे थे! पैरों में टूटी सी चप्पल थी! गर्मी की इस दुपहरी में उसके पसीने से नहाये शरीर को देख कर तापमान की भीषणता का अंदाज़ा लग रहा था! उसके रिक्षे पर एक प्रेमी जोडा बैठा था! दोनों एक दूसरे की बाहों में मगन थे! आते-जाते लोगों की निगाहें उनकी हरकतों पर टिकी थी! लेकिन दोनों ही इस बात से बेपरवाह थे! प्रेमी अपनी प्रेमिका को सूरज से बचाने की कोशिश करता दिख रहा था! दोनों ही पहनावे से काफी उन्मुक्त और आधुनिक नज़र आ रहे थे! हालाकि दिल्ली में इस तरह के नज़ारे आम हो चले हैं! लेकिन मुझे उसमें कुछ खास नज़र आ रहा था! रिक्षावाला चुंकि शरीर से काफी दुबला था इसलिये उसे दोनों को खींचने में काफी ज़ोर लगाना पड रहा था! वो कभी सूरज को आंख दिखाता तो कभी ज़ोर लगा कर रिक्षा खींचता! ऎसा लग रहा था मानो वो सूरज को चुनौती दे रहा हो, कि "तू चाहे कितनी भी आग बरसा ले, मेरे हौंसले को डिगा नहीं पायेगा"! लेकिन मैं उसकी मजबूरी को समझ रहा था! क्योंकि पेट की आग सबसे भयानक होती है! करोल बाग मेट्रो स्टेशन के नज़दीक रिक्षा रोक कर रिक्षावाले ने कहा, साहब मेट्रो स्टेशन आ गया! प्रेमी युगल ने होंश संभाला, अपने आस-पास देखा और रिक्षा से उतर गये! प्रेमी ने दस रुपये का नोट रिक्षा वाले को थमा दिया! "साहब इतनी दूर से आप दोनों को खींच कर लाया हूं, बीस रुपये होते हैं"! रिक्षावाले ने कहा! "मेरे पास छुट्टे नहीं हैं बस यही दस का नोट है लेना हो तो लो"! ये कह कर प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ आगे बढ गया! पसीने में तर रिक्षावाला उस दस के नोट को देख कर कुछ सोचने लगा! उसने फिर सूरज की तरफ देखा! सामने की दुकान से प्रेमी युगल ने पचास रुपये में कोका-कोला की दो बोतलें खरीदीं, अपना गला तर किया! इसके बाद गर्मी में आराम से वक्त बिताने के लिये पास के मेक्डानेल्स में जा कर बैठ गये! इधर रिक्षावाला मेट्रो स्टेशन के सामने लगी रिक्षों की लंबी लाईन में सबसे पीछे अपना रिक्षा लगा कर सवारी के लिये अपनी बारी का इंतज़ार करने लगा! लू के थपेडों का असर उसके शरीर पर तो हो रहा था लेकिन मेहनत और इमानदारी के उसके हौंसले पर लू के थपेडे कोई असर नहीं डाल पाये थे! रिक्षावाला सूरज को देख कर मुस्कुरा रहा था!

Wednesday, 26 May 2010

गन्दे नाले पर भी जुटेंगे ब्लागर: दिल्ली से योगेश गुलाटी

प्यार भरा निमन्त्रण कोई भला कैसे अस्वीकार कर सकता है! पिछले रविवार मुझे एक ज़रूरी मीटिंग में जाना था! उस दिन गर्मी भी बहुत थी, और नांगलोई मेरे घर से करीब दो घंटे का सफर था! लेकिन अविनाश जी ने जो स्नेहभरा निमन्त्रण मेरे ब्लाग पर छोडा वो मुझे नांगलोई की उस छोटूमल जाट धर्मशाला तक खींच लाया! अपना एक दिन मैंने उन लोगों से मिलने के लिये दिया जिन्हें मैं जानता तक नहीं था! बडा ही अदभुत अनुभव था ये मेरे जीवन का! सभी से मिल कर और उनके विचार जानकर जो खुशी हुई उसका मैं शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता! वो गर्म दोपहरी एक अनोखी शीतलता का एहसास करा रही थी! इसी लिये मैंने कहा कि ये हिन्दी ब्लागिंग के इतिहास में एक पन्ना दर्ज हो रहा था! ब्लागर्स एसोसिएशन एक बहुत सुन्दर विचार है! यदि ये विचार कार्य रूप में परिणित होता है, तो एक मिसाल कायम की जा सकती है! निश्चित तौर पर ये मीडिया का विकल्प और सामाजिक चेतना का बडा मंच साबित हो सकता है! क्योंकि प्रबुध्द ब्लागरों में अपने-अपने क्षेत्र के विद्वान और विषय वेत्ता भी शामिल हैं! आज की इस भागमभाग वाली ज़िन्दगी में जहां लोगों के पास वक्त की सख्त कमी है, और सभी सिर्फ अपने बारे में ही सोचने में व्यस्त हैं, वहां यदि ब्लागिंग जैसी कोई चीज़ प्रबुध्दजनों को एक दूसरे से सीधे जोड रही है, तो निश्चय ही इसे नज़रअंदाज़ करना एक बडी भूल होगी! मैं ये नहीं कहता कि ब्लागिंग से हम कोई क्रांति कर देंगे! क्रांति हमारा उद्देश्य भी नहीं है! लेकिन विभिन्नताओं वाले कईं लोगों में कोई चीज़ यदि समान हो, जो उन्हें एक मंच पर लाने का काम करे तो निश्चय ही उसमें कोई असाधारण बात तो होगी ही! मुझे लगता है कि हिन्दी ब्लागिंग अपने शुरुआती दौर में है! इसे अभी लंबा सफर तय करना है! लेकिन एक नदी की तरह ये अपना मार्ग खुद बना लेगी! इसलिये खुशदीप जी आप गंदे नाले पर भी ब्लागर मिलन समारोह करवा लीजिये, मेरा दावा है वहां भी ब्लागर आयेंगे! बिन बुलाये आयेंगे! और हर ब्लागर मीट में उनकी संख्या बढती ही जायेगी! यही हिंदी ब्लागिंग की असली ताकत है, जो वक्त आने पर उभर कर सामने आयेगी!

वो सूरज को आंख दिखाता था: दिल्ली से योगेश गुलाटी

करोल बाग मेट्रो स्टेशन के करीब एक मरियल सा रिक्षावाला तपती दुपहरी में रिक्षा खींच रहा था! फटी पैंट और एक बनियान बस यही था उसके तन पर! लू के थपेडों से बचने के लिये उसने अपने कान कपडे से ढक रखे थे! पैरों में टूटी सी चप्पल थी! गर्मी की इस दुपहरी में उसके पसीने से नहाये शरीर को देख कर तापमान की भीषणता का अंदाज़ा लग रहा था! उसके रिक्षे पर एक प्रेमी जोडा बैठा था! दोनों एक दूसरे की बाहों में मगन थे! आते-जाते लोगों की निगाहें उनकी हरकतों पर टिकी थी! लेकिन दोनों ही इस बात से बेपरवाह थे! प्रेमी अपनी प्रेमिका को सूरज से बचाने की कोशिश करता दिख रहा था! दोनों ही पहनावे से काफी उन्मुक्त और आधुनिक नज़र आ रहे थे! हालाकि दिल्ली में इस तरह के नज़ारे आम हो चले हैं! लेकिन मुझे उसमें कुछ खास नज़र आ रहा था! रिक्षावाला चुंकि शरीर से काफी दुबला था इसलिये उसे दोनों को खींचने में काफी ज़ोर लगाना पड रहा था! वो कभी सूरज को आंख दिखाता तो कभी ज़ोर लगा कर रिक्षा खींचता! ऎसा लग रहा था मानो वो सूरज को चुनौती दे रहा हो, कि "तू चाहे कितनी भी आग बरसा ले, मेरे हौंसले को डिगा नहीं पायेगा"! लेकिन मैं उसकी मजबूरी को समझ रहा था! क्योंकि पेट की आग सबसे भयानक होती है! करोल बाग मेट्रो स्टेशन के नज़दीक रिक्षा रोक कर रिक्षावाले ने कहा, साहब मेट्रो स्टेशन आ गया! प्रेमी युगल ने होंश संभाला, अपने आस-पास देखा और रिक्षा से उतर गये! प्रेमी ने दस रुपये का नोट रिक्षा वाले को थमा दिया! "साहब इतनी दूर से आप दोनों को खींच कर लाया हूं, बीस रुपये होते हैं"! रिक्षावाले ने कहा! "मेरे पास छुट्टे नहीं हैं बस यही दस का नोट है लेना हो तो लो"! ये कह कर प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ आगे बढ गया! पसीने में तर रिक्षावाला उस दस के नोट को देख कर कुछ सोचने लगा! उसने फिर सूरज की तरफ देखा! सामने की दुकान से प्रेमी युगल ने पचास रुपये में कोका-कोला की दो बोतलें खरीदीं, अपना गला तर किया! इसके बाद गर्मी में आराम से वक्त बिताने के लिये पास के मेक्डानेल्स में जा कर बैठ गये! इधर रिक्षावाला मेट्रो स्टेशन के सामने लगी रिक्षों की लंबी लाईन में सबसे पीछे अपना रिक्षा लगा कर सवारी के लिये अपनी बारी का इंतज़ार करने लगा! लू के थपेडों का असर उसके शरीर पर तो हो रहा था लेकिन मेहनत और इमानदारी के उसके हौंसले पर लू के थपेडे कोई असर नहीं डाल पाये थे! रिक्षावाला सूरज को देख कर मुस्कुरा रहा था!

लोग यूं ही बदनाम किया करते हैं: दिल्ली से योगेश गुलाटी

इश्क का नाम लिया करते हैं,
लोग यूं ही बदनाम किया करते हैं!

हमारे पास नहीं काम कोई दूजा,
इसीलिये चाहत का काम किया करते हैं!

चाहत अब फितरत बन गई है,
फितरत को अंजाम दिया करते हैं!

इश्क का नाम लिया करते हैं,
लोग यूं ही बदनाम किया करते हैं!

क्या चाहने भर से कोई मिल जाता है यारों,
फिर चाहत को क्यों इल्ज़ाम दिया करते हैं!

क्या हिम्मत है ज़माने में मरने की,
हम किसी पर मरने का काम किया करते हैं!

इश्क का नाम लिया करते हैं,
लोग यूं ही बदनाम किया करते हैं!

चाहकर भी चाहत को छुपाना,
ये काम नहीं आसां,
गमें मोहब्बत में हम,
जाम पर जाम पिया करते हैं!

इश्क का नाम लिया करते हैं,
लोग यूं ही बदनाम किया करते हैं!

उसको तो खबर भी नहीं कि हम उसपर मरते हैं,
फिर ज़माने भर में, लोग हमें क्यों बदनाम किया करते हैं!

सुना है इश्क करने वालों का नाम बडा होता है ज़माने में,
छोटे नाम को बडा बनाने के लिये इल्ज़ाम लिया करते हैं!

इश्क का नाम लिया करते हैं,
लोग यूं ही बदनाम किया करते हैं!

Sunday, 23 May 2010

जब मैं पहुंचा दिल्ली ब्लागर मिलन समारोह: दिल्ली से योगेश गुलाटी

मैं अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल की और,
राह में हमदम मिले...कारवां बनता गया!
जी हां कुछ ऎसा ही था दिल्ली ब्लागर मिलन समारोह्! जलजला जी से मिलने की आस लिये मैं जा पहुंचा नांगलोई की जाट धर्मशाला! रविवार का दिन था, लेकिन सूरज जम कर अपना कहर बरसा रहा था! लेकिन हमने भी ठाना था ब्लागजगत की जानी मानी हस्तीयों से रुबरु होना ही है! सो जा पहुंचे नांगलोई रेलवे स्टेशन की उस छोटू राम जाट धर्मशाला! वहां एक गोल घेरा बनाये कुछ लोग पहले से ही बैठे थे! देश और समाज के लिये चिन्ता की जो लकीरें उनके चेहरे पर दिख रही थीं, उसे देख कर हमने पहचान लिया कि ये सभी ब्लागर्स ही हैं! सभी सोच में मगन थे, एक दूसरे से कम ही बात कर रहे थे! हम भी साईड की एक कुर्सी पर जा बैठे! और अन्य ब्लागर्स की तरह चिन्तन में मगन हो गये! जलपान की भी अछ्छी व्यवस्था थी इसलिये सभी ब्लागर्स ने उसका भी लुत्फ उठाया! जिन बलागर्स को मैं पहचान पाया उनमें थीं संगीता पुरी, अविनाश जी और खुशदीप सहगल! इसके अलावा भी कईं सुविख्यात ब्लागर बंधु और उनकी ब्लागर बहनें पधारी थीं! हम उम्मीद कर रहे थे कि वे भी अपने कीमती विचार रखेंगी, लेकिन उन्होंने श्रोता बनने में ही रुचि दिखाई! यह मीट इस मायने में भी खास थी कि इसमें शिरकत करने वाले कुछ लोग ब्लोगर तो नहीं थे, लेकिन वो ब्लोग के पाठक ज़रूर थे! उन्होंने भी भविष्य में अपना ब्लोग शुरु करने की इच्छा जताई! चंडीदत्त शुक्ल काफी देर बाद आये, सबसे आखिर में पहुंचे अजय जी! सभी ने दोनों का स्वागत किया! ब्लागर्स मीटिंग शुरु हो चुकी थी! सभी ने ब्लागर मिलन समारोह को एक सराहनीय पहल बताया! इसके बाद सभी ने अपने विचार व्यक्त किये! बढती गर्मी में ब्लागरों के शीतल विचार हवा की ठंडी लहर की तरह लग रहे थे! सभी ने ब्लागर संघ बनाने और भविष्य में ब्लागर मिलन समारोह करते रहने पर सहमति जताई! ब्लागिंग से जुडे अन्य कईं मुद्दों पर भी खुल कर चर्चा हुई! जिनमें हिन्दी ब्लागिंग का भविष्य, सेन्सरशिप, आचार संहिता, तकनीकी जानकारी, समाज में जागरुकता, ब्लागिंग के माध्यम से सार्थक पहल, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इत्यादि प्रमुख थे! अंत में संगीता पुरी जी ने सभी का आभार प्रकट किया! इसके बाद सामूहिक फोटो सेशन हुआ, जिसमें सभी ब्लागरों ने बढ-छढ कर हिस्सा लिया! आते-जाते लोग बडी हैरानी से ये सब देख रहे थे, उन्हें नहीं समझ आ रहा था कि ये सब हो क्या रहा है? शायद उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं रहा हो कि ये हिंदी ब्लाग जगत के इतिहास का एक पन्ना दर्ज हो रहा था!

Saturday, 22 May 2010

जनसत्ता और हिंदुस्तान का शुक्रिया: दिल्ली से योगेश गुलाटी

आपके फोन के ज़रिये ही ये सूचना मिली कि जनसत्ता और हिन्दुस्तान में ब्लाग "दिल्ली से योगेश गुलाटी" का प्रमुखता के साथ ज़िक्र किया गया! आपके इस असीम प्यार के लिये आपका ऋणी हूं! जनसत्ता ने अपने सम्पादकीय पेज पर गरीबी पर लिखी मेरी एक पोस्ट को स्थान दिया, इसके लिये जनसत्ता के सम्पादक मंडल का आभार! इसलिये नहीं कि उन्होंने मेरी पोस्ट को अपने अखबार में स्थान दिया, बल्कि इस्लिये कि उन्होंने गरीबों की आवाज़ को आपतक पहुंचाने का सराहनीय काम किया है! मैं जानता हूं कि महज़ कागज़ काले करने भर से हिन्दुस्तान से गरीबी की ये काली रात बीतने वाली नहीं है! लेकिन जब तक हम सोये रहेंगे और सिर्फ अपने बारे में ही सोचेंगे तब तक वो सुनहरा सूरज हम नहीं देख पायेंगे, जिसकी कल्पना हम बीते छ्ह दशकों से करते आये हैं! दिल्ली में आकर ही मैंने ये जाना कि किस तरह एक तबका कुछ ना करके भी लगातार आगे और आगे बढता जा रहा है...! और किस तरह एक बडा तबका दिन रात मेहनत करके भी दो वक्त की रोटी तक नहीं जुटा पा रहा! जबकि ये सरकार दशकों से गरीबों के हित में काम कर रही है! और हर बार गरीबी हटाने के नाम पर ही हर सरकार सत्ता में आती है! तो फिर क्या वजह है कि हमारी आधी से ज्यादा आबादी बदहाली का शिकार है? गरीबी के इस केंसर का सही इलाज करने की बजाय हमारी सरकारें इस बदरंग तस्वीर को छुपाने की कोशिश करती नज़र आती है! एक विदेशी आकर हमारे एक गरीब गांव को गोद लेता है! क्या यही है एक सशक्त भारत की पहचान? क्या आक्सफोर्ड से आने के बाद एक गरीब की कुटिया में रात बिता देनेभर से उस गरीब को भुखमरी से निजात मिल जायेगी? नरेगा जैसी योजनाये चलाकर झूठी वाहवाही बटोरने से क्या ऎसी योजनायें भ्रष्टाचार की भेंट चढना बंद हो जायेंगी? शिक्षा का निजीकरण करके वैसे भी सरकार ने इसे गरीबों की पहुंच से दूर कर दिया है! और उच्च शिक्षा तो एक गरीब के लिये दिवा स्वप्न की तरह है! जो दो वक्त के रोटी का जुगाड नहीं कर सकता वो लाखों की फीस देकर मेडिकल इंजीनियरिंग या एमबीए की पढाई करने के बारे में कैसे सोच सकता है? यानि गरीबों के लिये आगे बढने की रास्ते ही बंद कर दिये गये हैं! प्राचीन भारत में दबंगों ने वर्ण व्यवस्था को कुछ इस तरह चालाकी के साथ लागू किया कि क्षुद्र का बेटा हमेंशा क्षुद्र ही बना रहा! लगता नहीं कुछ ऎसे ही हालात आज भी हैं?जहां गरीब का बेटा गरीब ही बने रहने को मजबूर है! लेकिन स्वस्थ्य समाज के लिये विषमतायें अच्छी नहीं होतीं! ये विषमतायें अलगाव को जन्म देती हैं! नक्सलवाद के रूप में इस अलगाव का दंश हम भोग रहे हैं! इसलिये समाज और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास पर बल देने की ज़रूरत है! सबसे बडी चुनौती जनसंख्या के स्थिरीकरण की है जिसकी तरफ ना तो कोई ध्यान दे रहा है ना ही ये मुद्दा ही बन पाया है! यदि हमारी जनसंख्या इसी गति से बढती रही तो चाहे कितना ज़ोर लगा लें, समाज से गरीबी और विषमता को समाप्त नहीं कर पायेंगे!

क्या ममता सिर्फ बंगाल की रेल-मंत्री हैं?: दिल्ली से योगेश गुलाटी

वो तो एक गरीब ब्राह्मण का बेटा था जिसने मीलों दूर हुई एक रेल दुर्घटना की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था! उसे कुर्सी का ज़रा भी मोह नहीं था! वो क्षेत्रवाद या परिवारवाद की राजनीति नहीं करता था! सारा देश उसका घर था इसीलिये वो इस देश का प्रधानमंत्री बना और आज भी ये देश अपने उस लाल पर नाज़ करता है! मुझे उसका नाम लेने की ज़रूरत नहीं क्योंकि आप जानते हैं मैं किसकी बात कर रहा हूं! लेकिन आज राजनीति में ऎसे नेता कहां देखने को मिलते हैं! आज से पहले तक मैं रेलमंत्री ममता बेनर्जी का बहुत सम्मान करता था! मैं उन्हें एक जुझारु महिला नेत्री मानता था जो इस देश की नारी शक्ति का प्रतीक बन सकती थीं! लेकिन हाल ही में दो ऎसी घटनाएं हुईं जिससे मैं तृणमूल कांग्रेस की इस फायरब्रांड नेत्री के बारे में अपने विचारों पर पुनर्विचार करने को मजबूर हो गया! पहला वाकया घटा कुछ दिन पहले नई दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर ! ये बताने की ज़रूरत नहीं कि इन दिनों दिल्ली में सूरज किस कदर कहर बरसा रहा है! उस तपती दुपहरी में बिहार के हज़ारों यात्री अपने गंतव्य तक जाने के लिये (नई दिल्ली रेलवे स्टेशन जो कि अपनी अव्यवस्थाओं के लिये पहले से ही खासा मशहूर है, पर) ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे! हिंदुस्तान में लोकल ट्रेन का सफर और वो भी गर्मीं में, ये सफर कितना कष्टदायक होता है! लेकिन गरीब इसके लिये मजबूर हैं! क्योंकि इसके सिवाय और कोई चारा उनके पास नहीं है! बचपन में जब मैं लोकल ट्रेन का सफर किया करता था तो एसी फर्स्ट क्लास की खाली बोगीयों और ठसा-ठस भरी लोकल बोगी को देखकर अपनी मां से ये पूछता था कि एक बोगी में हज़ारों लोग और इतनी सारी बोगीयों में सिर्फ चंद लोग ऎसा क्यों? मां कहती बेटा जब तू बडा होगा तो तुझे खुद ही इस सवाल का जवाब मिल जायेगा! शायद मां ये जानती थी कि बाल-मन गरीबी और अमीरी के इस अंतर को अभी नहीं समझ पायेगा! लेकिन आज भी मुझे उस सवाल का जवाब नहीं मिला है! माना गरीबों को एसी में यात्रा करने का हक नहीं है! लेकिन कम से कम जो टिकिट का पैसा वो देते हैं उसके बदले में उन्हें लोकल ट्रेन में आरामदायक यात्रा करने का हक तो है? हमारी समाजवादी सरकार जो गरीबों के लिये इतनी चिंतित रहती है, जिसने कामनवेल्थ गेम्स के ठीक पहले दिल्ली में गरीबों के लिये मेट्रो चला दी, ( ये अलग बहस का मुद्दा हो सकता है कि उसी सरकार ने दिल्ली से गरीब हटाओ मुहिम भी चला रखी है!) क्या वो लोक कल्याणकारी सरकार गरीबों के लिये ज़्यादा साधरण बोगीयों वाली ट्रेने नहीं चला सकती है? फिर वो रेल मँत्री जो गरीबों की लडाई लडने के लिये बंगाल को अखाडे में तब्दील कर देती हैं और सिंगूर में उद्योगपति रतन टाटा से संग्राम करती हैं, वही ममता बेनर्जी नई-दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मची भगदड के लिये बिहार के उन गरीब यात्रियों को ही क्यों ज़िम्मेदार ठहराती हैं? अगर ये ट्रेन बिहार की जगह बंगाल जा रही होती क्या तब भी रेलमंत्री का ऎसा ही निष्ठुर बयान आता? इस हादसे ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बदइंतज़ामी की पोल तो खोली ही है, साथ ही भेड बकरीयों की तरह लोकल बोगीयों में ठुसकर यात्रा करने को मजबूर इस देश की आधी से भी ज़्यादा आबादी का दर्द भी बंया किया है! जो ये जानते हैं कि ये यात्रा उनकी अंतिम यात्रा साबित हो सकती है फिर भी लोकल ट्रेनों की साधरण बोगीयों में सफर करने को मजबूर हैं! वो जानते हैं इन लोकल बोगीयों में उनके साथ कोई भी हादसा हो सकता है! इन लोकल बोगीयों में सुरक्षा के भी कोई प्रबंध नहीं होते! रात के सफर के दौरान भी नहीं! शायद सरकार ये सोचती है कि गरीबों को सुरक्षा की क्या ज़रूरत? उनके पास है ही क्या जो लुट सकता है? रही बात गरीबों की जान की तो वो कितनी सस्ती है ये बताने की ज़रूरत नहीं! मुंबई में आज भी लोग लोकल ट्रेनों में लटक कर और उसकी छतों पर सफर करते हैं! सवाल ये है कि क्या वो ये रिस्क अपनी मर्ज़ी से उठाते हैं या वो ऎसा करने को मजबूर हैं? रेल मंत्रालय ने अमीर तबके लिये तो लक्ज़री यात्रा के तमाम प्रबंध किये हैं! और वो उनकी सुविधाओं का पूरा-पूरा ख्याल भी रखता आया है! लेकिन हमारी समाजवादी सरकार ने लोकल ट्रेन में सफर करने वाले गरीब वर्ग की तकलीफों को दूर करने की कोई कोशिश कभी क्यों नहीं की? क्या हमारी रेल मंत्री एक आम भारतीय की तरह लोकल ट्रेन में सफर कर सकती हैं? मैं दावे के साथ कह सकता हूं नहीं! तो फिर इस देश की आधी से ज्यादा आबादी को इतना कष्टदायक सफर करने के लिये मजबूर क्यों बना दिया गया है? मुझे याद है जब मैं कालेज में पढता था, मैंने कहीं जाने के लिये ट्रेन का टिकिट खरीदा! ट्रेन दो घंटे लेट थी! इतने इंतज़ार के बाद जब ट्रेन आई तो मैं हैरान था, क्योंकि ट्रेन की लोकल बोगी में पैर रखने तक की जगह नहीं थी! फिर भी लोग उसमें घुसे चले जा रहे थे! लेकिन खचा-खच भरी उस लोकल बोगी में घुसने की मेरी हिम्मत नहीं हुई! जाना चूंकि ज़रूरी था और मैं वो ट्रेन मिस नहीं कर सकता था, इसलिये मैंने फर्स्ट क्लास की खाली बोगी में सफर करने का फैसला किया! जब टीसी ने टिकिट चेक किया तो साधारण श्रेणी का टिकिट देख कर उसने मुझे फाईन भरने को कहा! उस वक्त समाजवाद से कुछ ज़्यादा ही प्रभावित था सो कह दिया, मैं अपनी मर्ज़ी से अमीरों की बोगी में नहीं चढा, आपका रेलवे फर्स्ट क्लास की तो इतनी बोगी ट्रेन में लगवाता है क्या कुछ लोकल बोगीयां नहीं लगा सकता? टीसी ने कहा, अगर इस ट्रेन में जगह नहीं थी तो आपको अगली ट्रेन का इंतज़ार करना चाहिये था! क्या आम आदमी के वक्त की कीमत नहीं होती? और क्या आपको लगता है कि अगली ट्रेन की लोकल बोगी खाली होगी? मैंने एक और सवाल दाग दिया! मेरे समाजवादी सत्याग्रह से झल्लाकर टीसी आगे बढ गया! खैर मैं बात रेल मंत्री की कर रहा था! हमारी रेलमंत्री का कहना है कि दिल्ली उनका घर नहीं है! उनका घर तो बंगाल में है! इस बयान से क्षेत्रवाद की बू आती है! हैरानी की बात ये है कि कांग्रेस रेलमंत्री के इस बयान का समर्थन कर रही है! क्षुद्र् राजनीतिक स्वार्थ किस कदर हावी हैं कि राष्ट्रीय पार्टीयां भी उनका समर्थन करने को मजबूर हैं! लेकिन ये सिर्फ भारत में ही हो सकता है जब गैर ज़िम्मेदाराना बयानों के लिये दो केन्द्रीय मंत्रीयों को फटाकार और एक को निष्कासित किया जाता है तभी लगातार गैरज़िम्मेदाराना बयानों के लिये एक केन्द्रीय मंत्री का समर्थन भी किया जाता है!

Friday, 14 May 2010

मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ फतवा जारी


मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ देश की सबसे बड़ी मुस्लिम संस्था दारुल उलूम, देवबंद
ने फतवा जारी कर दिया है। इसके मुताबिक मुस्लिम महिलाओं का पुरुषों के साथ काम करना इस्लाम धर्म के खिलाफ है। एक टीवी चैनल की वेबसाइट के मुताबिक, इस फतवे में कहा गया है कि मुस्लिम महिलाओं का ऐसी कोई भी सरकारी या प्राइवेट नौकरी करना गैरइस्लामी है, जिसमें महिला और पुरुष एकसाथ काम करते हों और महिलाओं को पुरुषों से बिना पर्दे के बात करनी पड़ती हो। देवबंद के धार्मिक नेताओं का कहना है कि शरियत में साफ साफ कहा गया है कि मुस्लिम महिलाएं ऑफिस में बुरका पहनकर जाएं और पुरुष कॉलीग्स के साथ बातचीत न करें। इस फतवे का दूसरे मुस्लिम संप्रदायों ने भी समर्थन किया है। सुन्नी मुस्लिम नेता मौलाना अबुल इरफान ने कहा कि जो औरतें करियर बना रही हैं, उन्हें जीते जी तो बहुत कामयाबी मिल सकती है, लेकिन मौत के बाद उन्हें ऊपर वाले को जवाब देना होगा। तब उन्हें अपने करियर के फैसले पर अफसोस होगा।

Thursday, 13 May 2010

गरीबी हटाओ, लेकिन गरीबों को बख्श दो: दिल्ली से योगेश गुलाटी

दो भारत बसते हैं यारों मेरे हिन्दुस्तान में....इक रहता सोने की बस्ती,एक रहता कब्रिस्तान में!!हां वो बिल्कुल ऎसा ही लग रहा था....मानो वो किसी कब्रिस्तान से ही उठ कर आया हो! वो किसी ज़िन्दा भूत से कम नहीं लग रहा था! उसका जिस्म लगभग नंगा था...! मांस पर उभरी हड्डीयों का कंकाल उसकी बेबसी और गरीबी की कहानी बयां कर रहा था! उसका वो चेहरा अब भी मेरी आंखों के सामने घूम रहा है! गरीबी का वो ज़िंदा भूत मुझे सोने नहीं दे रहा! नहीं मैं भूत से बिल्कुल नहीं डरता, क्या भूत इंसान नहीं होते? होते हैं वो भी इंसान होते हैं.....अज नहीं कभी तो होते थे? लेकिन मुझे तो डर उनसे लगता है जो इंसान होकर भी इंसान नहीं! जो महलों में रहते हैं लेकिन झोंपडी में रहने वालों का दर्द नहीं समझते! जो एसी में रहते हैं लेकिन तपती दुपहरी में उनके आलीशान बंगलों की नींवें भरने वालों की पीड वो नहीं समझते! वो अंग्रेज़ी में बतियाते हैं लेकिन हिंदुस्तानी आत्मा की तकलीफ को नहीं समझते! जिन गरीबों की मेहनत से वो अपना साम्राज्य खडा करते हैं, उन गरीबों को दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम भी नहीं करते!चारों तरफ से चमक रहा दिल्ली का कनाट प्लेस! इस इलाके की तस्वीर बदलने का काम अब भी पूरे ज़ोर शोर से होरहा है! पुराने हो चले कनाट प्लेस को बिल्कुल आधुनिक बना दिया गया है! सफेद रंग में रंगी इसकी इमारतें संगेमरमर को भी शर्मिंदा कर रही हैं! हर-तरफ चका-चौंध, सुंदरता, और अइश्वर्य बिखरा है! इसे देख कर एक विकसित भारत की तस्वीर बनने लगती है! चारों और विदेशी सैलानीयों का जमावडा और चमचमाती गाडियों का शोर....इन सब की बीच कनाट प्लेस सर्कल पर बने मेट्रो स्टेशन की सीढीयों से नीचे उतरते हुए मेरे पैर अचानक थम गये! हां गरीबी का वो ज़िंदा भूत वहीं बैठा था! मैंने देखा लोग उसे हिकारत भरी नज़रों से देखते हुए दूर से निकल रहे हैं.....शायद सराकार की ही तरह उन्हें भी दिल्ली की शान में गरीबी का वो धब्बा सुहा नहीं रहा था! कुछ दिन पहले कनाट प्लेस से गरीबों और भिखारियों को हटाने की मुहीम सरकार ने चलाई थी! जिसमें सारे गरीबों को उस इलाके से हटा दिया गया था! लेकिन आश्चर्य गरीबी का वो ज़िंदा भूत वैभव की प्रतीक मेट्रो की सीढीयों पर बैठा...सरकार की उस मुहीम को मुंह छिढा रहा था! उसकी हालत वाकई में दयनीय थी! तपती दुपहरी मेँ उसके तन पर एक कपडा ना था! गरीबों की जान बडी सख्त होती है.....वो इतनी आसानी से नहीं निकलती! शायद इसीलिये वो ज़िंदा था! लेकिन उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं था! हां मैं भी नहीं! मुझे लगा वो भूखा है! मैं जानता हूं दस रुपये में दिल्ली में खाना नहीं मिलता, फिर भी मैंने दस का एक नोट उसके हाथ में थमा दिया! लेकिन मैं जानता था ये काफी नहीं है....! उसे कपडों की ज़रूरत थी! उसे दवाओं और इलाज की ज़रूरत थी! इन सबके बाद उसे काम की ज़रूरत थी! मैं ये सोछ ही रहा था कि पीछे से एक रौबदार आवाज़ आई...."तू फिर यहां आकर बैठ गया?" तुझे भी ठिकाने लगाना पडेगा! मैंने पीछे मुड कर देखा, वो दिल्ली पुलिस का सिपाही था! उसे भी सरकार की ही तरह वो गरीबी का ज़िंदा भूत शायद अच्छा नहीं लग रहा था! सिपाही की बात सुनकर वो डर गया! उसकी उम्र 25-30 की रही होगी! लेकिन वो इतना कमज़ोर था कि उठ नहीं पा रहा था! लेकिन जब वो उठ कर खडा हुआ तो....लोग उससे कट कर गुज़रने लगे...मानो इन्सान नहीं वाकई में कोई भूत हो! हां गरीबी का वो ज़िंदा भूत खडा हो गया था! लेकिन उसने किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया! वो अपने लिये वो जगह तलाशने लगा, जहां अमीर ना हों! लेकिन मैं जानता था कि कम से कम कनाट प्लेस में तो ऎसी कोई जगह नहीं थी!

गरीबी हटाओ, लेकिन गरीबों को बख्श दो: दिल्ली से योगेश गुलाटी



दो भारत बसते हैं यारों मेरे हिन्दुस्तान में....
इक रहता सोने की बस्ती,एक रहता कब्रिस्तान में!!
हां वो बिल्कुल ऎसा ही लग रहा था....मानो वो किसी कब्रिस्तान से ही उठ कर आया हो! वो किसी ज़िन्दा भूत से कम नहीं लग रहा था! उसका जिस्म लगभग नंगा था...! मांस पर उभरी हड्डीयों का कंकाल उसकी बेबसी और गरीबी की कहानी बयां कर रहा था! उसका वो चेहरा अब भी मेरी आंखों के सामने घूम रहा है! गरीबी का वो ज़िंदा भूत मुझे सोने नहीं दे रहा! नहीं मैं भूत से बिल्कुल नहीं डरता, क्या भूत इंसान नहीं होते? होते हैं वो भी इंसान होते हैं.....अज नहीं कभी तो होते थे? लेकिन मुझे तो डर उनसे लगता है जो इंसान होकर भी इंसान नहीं! जो महलों में रहते हैं लेकिन झोंपडी में रहने वालों का दर्द नहीं समझते! जो एसी में रहते हैं लेकिन तपती दुपहरी में उनके आलीशान बंगलों की नींवें भरने वालों की पीड वो नहीं समझते! वो अंग्रेज़ी में बतियाते हैं लेकिन हिंदुस्तानी आत्मा की तकलीफ को नहीं समझते! जिन गरीबों की मेहनत से वो अपना साम्राज्य खडा करते हैं, उन गरीबों को दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम भी नहीं करते!
चारों तरफ से चमक रहा दिल्ली का कनाट प्लेस! इस इलाके की तस्वीर बदलने का काम अब भी पूरे ज़ोर शोर से होरहा है! पुराने हो चले कनाट प्लेस को बिल्कुल आधुनिक बना दिया गया है! सफेद रंग में रंगी इसकी इमारतें संगेमरमर को भी शर्मिंदा कर रही हैं! हर-तरफ चका-चौंध, सुंदरता, और अइश्वर्य बिखरा है! इसे देख कर एक विकसित भारत की तस्वीर बनने लगती है! चारों और विदेशी सैलानीयों का जमावडा और चमचमाती गाडियों का शोर....इन सब की बीच कनाट प्लेस सर्कल पर बने मेट्रो स्टेशन की सीढीयों से नीचे उतरते हुए मेरे पैर अचानक थम गये! हां गरीबी का वो ज़िंदा भूत वहीं बैठा था! मैंने देखा लोग उसे हिकारत भरी नज़रों से देखते हुए दूर से निकल रहे हैं.....शायद सराकार की ही तरह उन्हें भी दिल्ली की शान में गरीबी का वो धब्बा सुहा नहीं रहा था! कुछ दिन पहले कनाट प्लेस से गरीबों और भिखारियों को हटाने की मुहीम सरकार ने चलाई थी! जिसमें सारे गरीबों को उस इलाके से हटा दिया गया था! लेकिन आश्चर्य गरीबी का वो ज़िंदा भूत वैभव की प्रतीक मेट्रो की सीढीयों पर बैठा...सरकार की उस मुहीम को मुंह छिढा रहा था! उसकी हालत वाकई में दयनीय थी! तपती दुपहरी मेँ उसके तन पर एक कपडा ना था! गरीबों की जान बडी सख्त होती है.....वो इतनी आसानी से नहीं निकलती! शायद इसीलिये वो ज़िंदा था! लेकिन उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं था! हां मैं भी नहीं! मुझे लगा वो भूखा है! मैं जानता हूं दस रुपये में दिल्ली में खाना नहीं मिलता, फिर भी मैंने दस का एक नोट उसके हाथ में थमा दिया! लेकिन मैं जानता था ये काफी नहीं है....! उसे कपडों की ज़रूरत थी! उसे दवाओं और इलाज की ज़रूरत थी! इन सबके बाद उसे काम की ज़रूरत थी! मैं ये सोछ ही रहा था कि पीछे से एक रौबदार आवाज़ आई...."तू फिर यहां आकर बैठ गया?" तुझे भी ठिकाने लगाना पडेगा! मैंने पीछे मुड कर देखा, वो दिल्ली पुलिस का सिपाही था! उसे भी सरकार की ही तरह वो गरीबी का ज़िंदा भूत शायद अच्छा नहीं लग रहा था! सिपाही की बात सुनकर वो डर गया! उसकी उम्र 25-30 की रही होगी! लेकिन वो इतना कमज़ोर था कि उठ नहीं पा रहा था! लेकिन जब वो उठ कर खडा हुआ तो....लोग उससे कट कर गुज़रने लगे...मानो इन्सान नहीं वाकई में कोई भूत हो! हां गरीबी का वो ज़िंदा भूत खडा हो गया था! लेकिन उसने किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया! वो अपने लिये वो जगह तलाशने लगा, जहां अमीर ना हों! लेकिन मैं जानता था कि कम से कम कनाट प्लेस में तो ऎसी कोई जगह नहीं थी!

Wednesday, 12 May 2010

खाप पंचायतों का बढ़ता खौफ

इंडियन नेशनल लोक दल के प्रधान ओम प्रकाश चौटाला और काग्रेस के युवा सासद नवीन जिंदल में क्या समानता ढूंढ़ी जा सकती है? अगर राजनीतिक प्रतिबद्धताओं को देखें या उम्र का फासला देखें तो कुछ भी एक जैसा नहीं है। अलबत्ता खाप पंचायतों को लेकर दिए अपने ताजे बयान के बाद दोनों एक ही तरफ खड़े दिखाई देते हैं।

पिछले कुछ समय से खाप पंचायतों की तरफ से एक मुहिम चल रही है, जिसके अंतर्गत हिंदू विवाह अधिनियम की धारा-5 को बदलने की माग उठी है। कहा जा रहा है कि चूंकि इसके अंतर्गत सगोत्र शादियों की इजाजत है, इसलिए इसे समाप्त किया जाए या परिवर्तित किया जाए।

देखा जा सकता है कि मनोज-बबली हत्याकांड में आए अदालती फैसले के बाद [जिसमें अपनी इच्छा से शादी किए इस युवा जोड़े को मारने के आदेश इलाके की खाप पंचायत ने जारी किए थे], जिसमें हत्या में शामिल कातिलों को सजा सुनाई गई है, इस मुहिम ने जोर पकड़ा है।

पिछले दिनों पाई नामक स्थान पर हुई ऐसी ही सर्वखाप पंचायत में अपने आधार को बढ़ाने की फिराक में खाप पंचायत की महिला विंग और युवा विंग का भी गठन किया गया था। लोगों को याद होगा कि सर्वखाप पंचायतों के ऐसे ही एक सम्मेलन में यह ऐलान किया गया था कि वह आगे की रणनीति के तौर पर नवीन जिंदल के घर को घेरेगा ताकि उन पर तथा बाकी संसद सदस्यों पर दबाव बनाया जा सके।

सभी जानते हैं कि दलित अत्याचारों का मसला हो या 'इज्जत' की रक्षा के नाम पर की जाने वाली हत्याओं का मामला, खाप पंचायतों ने हमेशा मानवीय तर्क प्रणाली को नकारने की कोशिश की है। राज्य, कानून और अधिकारों के स्थान पर बैठे लोगों द्वारा प्रदत्त 'संरक्षण' के बिना खापों के लिए यह संभव नहीं होता कि वह देश के कानूनों को चुनौती देने वाले निर्णय लें। हिसार जिले में घटित मिर्चपुर काड ने भी इस हकीकत को उजागर किया था कि दलितों की बस्ती पर हमला करने के पहले बाकायदा खाप पंचायत बिठाई गई थी, जिसने इसे अंजाम देने के आदेश दिए थे।

हरियाणा के प्रख्यात युवा उद्योगपति नवीन जिंदल ने इस बात का इंतजार किए बिना कि उनकी पार्टी की इस मसले पर आधिकारिक पोजिशन क्या है, पिछले दिनों बयान दिया कि वह सगोत्र विवाह के खिलाफ खाप पंचायतों की मुहिम के साथ हैं और वह संसद में इस माग को रखेंगें।

ध्यान देने योग्य है कि कैथल जिले में सर्व जाति सर्व खाप पंचायत के जलसे में पहुंचकर जनाब नवीन जिंदल ने बाकायदा इस बात का ऐलान किया।

खाप पंचायतों द्वारा ऐसे मामलों को लेकर बरपाए जाते कहर के इस माहौल में कुछ ऐसी खबरें भी छन-छनकर आती हैं, जो बताती हैं कि उम्मीद महज एक शब्द नहीं है। अपनी मर्जी से शादी करनेवाले तमाम लोगों का जीना मुश्किल कर देने वाले खाप पंचायतों के फरमानों को चुनौती देता एक गाव उसी हरियाणा में ही मौजूद है- सिरसा जिले का चौटाला गाव।

इसकी सबसे ताजी मिसाल उसी गाव के रहने वाले 21 वर्षीय राकेश गौरिया और उसकी पत्नी सरोज हैं, जो परीकथाओं की तर्ज पर इन दिनों 'खुशी से अपनी जिंदगी बीता रहे हैं।' राकेश की बहन मंजू ने भी अपने पड़ोस के युवक से शादी की है, यहा तक कि राकेश की 65 वर्षीय दादी रामप्यारी ने भी अपने पड़ोसी से ब्याह रचाया था।

दिलचस्प है कि इस गाव में दो सौ से अधिक ऐसे जोड़े यानी 400 से अधिक ऐसे लोग हैं, जिन्होंने उसी गाव में अपना बचपन बिताया है और जिन्होंने उसी गाव में अपने लिए जीवनसाथी भी तलाशा है। साफ है कि ये लोग अगर कहीं बाहर रह रहे होते तो तमाम प्रताड़नाओं के शिकार हो जाते।

अपने गाव में अपनी ही मर्जी से शादी कर रह रहे सबसे बुजुर्ग लोगों में 71 वर्षीय राम परताप को शुमार किया जा सकता है, जिन्होंने अपनी पड़ोसन लिछमा से चालीस साल पहले शादी की थी। अपने वैवाहिक जीवन से बेहद प्रसन्न लिछमा कहती हैं कि अपने गाव में ही शादी करना अपराध कैसे हो गया। मुझे देखिए, जब चाहे मैं अपने माता-पिता से मिल सकती हूं। बेहद सहिष्णु और प्रगतिशील जान पड़ने वाला चौटाला गाव अकेला नहीं है। इसके बगल में स्थित भारू खेड़ा में भी जब 21 साल के राकेश रतिवाल ने गाव की ही 18 वर्षीय अलका से शादी करने की इच्छा जाहिर की, तब उसका जोरदार समर्थन राकेश के पिता बलराज ने किया। समूचा गाव इस शादी में शरीक हुआ।

इन दिनों हरियाणा प्रशासकीय सुधार आयोग के सदस्य डीआर चौधरी, जिन्होंने 1948 में अपने ही गाव में शादी की थी, बताते हैं कि सिरसा, हिसार और फतेहाबाद जिलों में या राजस्थान के बाड़मेर या जैसलमेर जिलों में ऐसे कई गाव हैं, जिन्होंने ऐसे मध्ययुगीन कानूनों को चुनौती दी है।

माल और देसी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तरों के लिए मशहूर गुड़गांव से कुछ वक्त पहले स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत बढ़ती शादियों की खबर आई थी। मालूम हो कि यह वही कानून है, जिसके तहत अंतरजातीय यहा तक कि अंतरधर्मीय विवाह भी संभव है। अगर पारंपारिक शादी एक सामाजिक शादी है तो इसके अंतर्गत की जाने वाली शादी एक वैधानिक प्रक्रिया है, जिसके लिए महज मूल जन्म प्रमाणपत्र और चंद गवाहों की जरूरत होती है। वैसे यह अधिनियम 1954 में ही बना था, लेकिन बनने के साढ़े चार दशक बाद भी नतीजे सिफर ही साबित हो रहे थे, लेकिन इधर बीच इनमें तेजी आ रही है।

अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने के मामले में समाज के समर्थन की एक नायाब मिसाल महाराष्ट्र के जिला चंद्रपूर का छोटा-सा गाव करंजी है। मुश्किल से दो हजार आबादी वाले इस गाव में बीते पाच साल में 38 प्रेम विवाह हुए हैं, जिनमें से 20 अंतरजातीय विवाह हैं तो 18 जाति के भीतर प्रेम विवाह हैं। नंदा-रामभाऊ जितार, नलेश्वर गजभे-वंदना, छब्बुताई-प्रेमचंद, राकेश थेरकर-सुनंदा, वनिता चापले, बाली भडके, संदेश पचारे, वत्सला वानोडे, छोटी खोब्रागडे, सतीश बावणे, सुरमुखसिंग डागी आदि कुछ नाम हैं, जिन्होंने अंतरजातीय शादी की है।

ऐसा नहीं कि यह सिलसिला बहुत सुनियोजित था। यह वर्ष 2005 की बात थी, जब पास के एक गाव से एक जोड़ा करंजी पहुंचा। अशोक गरपल्लीवार जहा कुम्भार जाति से संबधित था तो मीनाक्षी देउलमाले तेली जाति से संबधित थी। वे दरअसल अपने परिवार वालों के डर से भागते हुए करंजी पहुंचे थे और गाव के ही मंदिर में रुके थे। उनके आने की खबर पंचायत को लगी और उन दोनों को पंचायत कार्यालय बुलाया गया। सरपंच प्रभाताई खोब्रागडे और पंचायत के बाकी सदस्यों ने उनसे लंबी बातचीत की। उन्होंने महसूस किया कि अगर इन दोनों की शादी नहीं कराई गई तो वे आत्महत्या भी कर सकते हैं। प्रभाताई की पहल पर दोनों के माता-पिता को बुलाया गया और समझाया गया। वे मन मारकर इस रिश्ते के लिए राजी हो गए। प्रभाताई आखों में चमक लिए बताती हैं कि इस युगल की दोनों बेटिया गाव के ही स्कूल में जाती हैं। धीरे-धीरे पंचायत के इस अनूठे हस्तक्षेप की खबर दूर-दूर तक फैली और कई प्रेमी युगल वहा पहुंचने लगे। अगल-बगल के गाव के ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश से भी कुछ युगल यहा पहुंचे।

प्रश्न उठता है कि क्या करंजी पहले से ही ऐसा था। बिल्कुल नहीं! महज सात साल पहले गाव में विभिन्न जातियों में आपस में भी काफी तनाव था। दलितों के अपने अलग कुएं थे, पिछड़ी जातियों के अपने अलग। अब बहुत कुछ बदल गया है। यह अकारण नहीं कि महाराष्ट्र की सरकार ने इस गाव को 'तंटामुक्त' यानी झगड़ों से मुक्त गाव होने के नाते विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया है।

छोटे-से ग्राम करंजी में नजर आ रहे इस बड़े करिश्मे के पीछे किसी संगठित सामाजिक समूह का हाथ भले न हो, लेकिन अपने आप में यह खबर विलक्षण है कि आज की तारीख में यह छोटा-सा गाव समूचे जिले के लिए ही नहीं, पूरे सूबे के लिए एक नजीर बना है।

भारत के उज्वल भविष्य की कामना रखने वाले हर शख्स को अब यह तय करना है कि क्या खापों के कुहासे में इस मंजिल को पाया जा सकता है या करंजी के उजास में!

उदारवादी सोच रखें खाप पांचायतें

डा. एमएस मलिक। चिंता की बात है कि सम्मानित खाप और सर्वखाप पंचायतों का प्रचाीन गौरवपूर्ण इतिहास आज विवादास्पद, विरोधाभाष व आलोचना का केंद्र बनता जा रहा है। इन सम्मानित खाप पंचायतों की ऐतिहासिक पृष्टिभूमि का अध्ययन करने से पता चलता है कि खाप पंचायतों ने शुरू से ही ग्रामीण समाज में सद्भावना, भाईचारा व शांति का माहौल बनाए रखने के लिए अहम निर्णायक कार्य किए हैं, जिस कारण इनका फैसला हर व्यक्ति सिर-माथे पर स्वीकार कर लेता था और इन्हें सम्मान से पंच-परमेश्वर के खिताब से जाना जाता था। खाप पंचायतों द्वारा सूझबूझ से लिए गए निर्णय पूरे राष्ट्र के लिए न्याय के स्रोत साबित हुए हैं।

सर्वखाप पंचायतों के गौरवपूर्ण इतिहास व सम्मानजनक छवि के ठीक विपरीत आज सर्वखाप पंचायतों का मौलिक स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। मेरा मानना है कि आज सर्वखाप पंचायतों के अंदर शरारती एवं राजनैतिक तत्व अपने निजी स्वार्थो की पूर्ति के लिए प्रवेश कर रहे हैं, जिस कारण इनके वास्तविक मुद्दे धूमिल होते जा रहे हैं और सदियों पुरानी यह सम्मानित व्यवस्था नुक्ताचीनी व विरोधाभास का विषय बन गई है। आज कुछेक खाप पंचायतें दिशाहीन व नेतृत्वविहीन संगठनों की तरह कार्य कर रही हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि खाप पंचायतों का न तो कोई सामूहिक नेतृत्व है और न ही कोई एकछत्र नेतृत्व। शायद इसीलिए खाप पंचायतें स्वार्थपूर्ण व विभाजित नेतृत्व का शिकार हो रही हैं, जिस कारण इन खाप पंचायतों द्वारा दिए जा रहे बिना सूझबूझ व तर्कहीन फैसलों विशेषकर सगोत्र व अंतरजातीय विवाह से उत्पन्न विवादों के संदर्भ में दिए जा रहे मानमाने फैसलों की हर जगह आलोचना हो रही है। ये निर्णय सामाजिक भाईचारे और आपसी मेल-मिलाप के लिए बहुत नुकसानदायक सिद्ध हो रहे हैं।

इसके अलावा युवा वर्ग में निरंतर बढ़ती बेरोजगारी तथा भविष्य की अनिश्चितता के कारण उत्पन्न गंभीर उदासीनता भी खाप पंचायतों की प्राचीन परंपराओं तथा रूढि़वादी विचारधारा के साथ टकराव का कारण बनती जा रही है। यही कारण कि आज की युवा पीढ़ी का शादी-विवाह के मामलों में परंपराओं व रीति-रिवाजों का उल्लंघन करने के कारण खाप पंचायतों से निरंतर टकराव बढ़ रहा है। अनेक युवा दंपती खाप पंचायतों के सामाजिक बहिष्कार, गांव छोड़ने तथा पवित्र बंधन का त्याग करके भाई-बहन का रिश्ता कायम करने तक के बेतुकी फरमानों से दुखी होकर कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहे हैं।

खाप पंचायतों के प्रतिनिधियों द्वारा कई बार भावनाओं से वशीभूत होकर उत्तेजित भाषण दिए जाते हैं, जिसे मीडिया द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। इससे खाप पंचायतों की भूमिका का समाज में गलत संदेश जाता है।

आज कुछेक विभाजित खाप प्रतिनिधि अपने निजी स्वार्थो के कारण सामाजिक विवादों को हल निकालने की बजाए सत्ताधारी दलों के राजनेताओं व अपने राजनैतिक आकाओं के सामने उपस्थिति दर्ज कराने में ज्यादा रुचि रखते हैं। पिछले पांच-छह सालों के अंदर ग्रामीण समाज में हुई हिंसक घटनाएं विशेषकर कमजोर नेतृत्व वाली जातियों में हुए विवादों को सुलझाने में भी खाप पंचायतों की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगे हैं। हरियाणा में कैथल, करनाल, झज्जर, गोहाना तथा मिर्चपुर जिला हिसार में हुई पलायन, आगजनी व हत्या की घटनाएं जिनके अंदर सवर्ण जाति के लोगों को मुख्य रूप से दोषी माना गया है, को सुलझाने में भी खाप पंचायतों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं। इन विवादों को सुलझाने व प्रभावित वर्गो में शांति व सुरक्षा का माहौल स्थापित करने में खाप पंचायतें विफल रहीं हैं।

मेरा मानना है कि आज सगोत्र व गोत्र विवाह संबंधी विवाद केवल हरियाणा में नहीं, बल्कि समस्त उत्तरी भारत की एक गंभीर सामाजिक समस्या बन चुकी है और यह जाट वर्ग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अन्य जातियों व वर्गो में भी इस तरह के विवाद उत्पन्न हो रहे हैं।

प्राचीन सामाजिक परंपराएं हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं, जिनका अनुशरण किया जाना बहुत जरूरी है और इन परंपराओं को तोड़ना व उल्लघंन करना सामाजिक अपराध के क्षेत्र में आता है। यह सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुसार दंडनीय है। हमें हर हालत में दूध व खून के रिश्ते का खयाल रखना है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी मानव शरीर में जींस के संतुलन को कायम रखने तथा वंश के विकास व अनुवांशिक बीमारियों से बचने के लिए सगोत्र शादी वर्जित है। मेरा सुझाव है कि सर्वखाप पंचातयों को भी समय के साथ-साथ अपनी कार्यव्यवस्था व आचार संहिता में जरूरी बदलवाव लाना चाहिए। आज समय तेजी के साथ बदल रहा है। अत: खाप प्रतिनिधियों को भी उदारवादी सोच अपनानी चाहिए।

Sunday, 9 May 2010

जाति भारतीय समाज की सच्चाई है: दिल्ली से योगेश गुलाटी

जाति आधारित जनगणना ना कराने पर अडी सरकार आखिर जातिगत जनगणना के लिये राजी हो ही गई! इसके पहले हमारे देश में इस तरह की जनगणना तीस के दशक में अंग्रेज़ों ने कराई थी! ज़ाहिर है उस वक्त उनका मकसद जातिगत आधार पर देश की एकता को खंडित करने के रास्ते तलाशने का ही रहा था! लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक देश में जाति और धर्म के आधार पर विभाजन लोकतन्त्र को असफल बनाता है! जाहिर सी बात है कि यदि जनता का जाति और धर्म के आधार पर विभाजन हो जायेगा तो लोकतन्त्र कभी भी अपने लक्ष्य को पा नहीं सकेगा! ये विभाजन जितना गहरा होगा लोकतन्त्र उतना ही बीमार होगा! लेकिन हमारे देश में ये कडवी सच्चाई है कि जाति और धर्म हमारी राजनीति का यथार्थ बन चुके हैं! और जाति आधारित जनगणना ना करा कर हम केवल उस यथार्थ से आंखें चुराने का ही काम कर रहे हैं! क्योंकि दुनिया के इस सबसे बडे लोकतन्त्र में जाति और धर्म की खाई को और गहरा करने का काम तो हमारी राजनीति आज़ादी के बाद से ही कर रही है! लेकिन जाति आधारित जनगणना के बाद सही आकडे सामने आ जाने से सही मायनों में वंचित वर्गों की पहचान की जा सकेगी! इसके बाद उस वंचित वर्ग के कल्याण के लिये सरकार क्या करती है ये तो उस वर्ग की संख्याबल पर ही निर्भर करेगा ! लेकिन इससे काफी हद तक परिदृ्श्य स्पष्ट हो जायेगा कि कौन कितने पानी में है? और आज़ादी के बाद से अब तक सरकारी योजनाओं ने पिछडों का वाकई में कितना कल्याण किया है? ये आकडे इस मायने में भी खास होंगे कि ये देश की भावी राजनीति की दिशा निर्धारित करेंगे! वीपी सिंह् ने जब मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए पिछडों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की थी, तब कांग्रेस्-बीजेपी समेत तमाम राजनीतिक पार्टियां इसका व्यापक राजनीतिक निहितार्थ समझ नहीं पाई थीं! और इसके खिलाफ उठ खडी हुई थीं! इस राजनीतिक लडाई में वीपी सिंह ने अपनी कुर्सी खो दी थी! इस लिहाज़ से वो भले ही हारे हुए लगें, लेकिन उनकी राजनीति जीत गई थी! जाति चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है! और कास्ट फेक्टर के आधार पर ही हमारे देश में सरकारें बनती और गिरती हैं! इस हकीकत को सभी राजनीतिक दल बखूबी जानते हैं! और इसका फायदा भी उठाते रहे हैं! जबकि होना तो ये चाहिये था कि लोकतन्त्र को मजबूत बनाने के लिये तमाम राजनीतिक दल मिल कर चुनावों में कास्ट फेक्टर को डाईल्यूट कर धीरे-धीरे खत्म कर देते! लेकिन हुआ इसका ठीक उलट यानि ये फेक्टर उतरोत्तर मजबूत होता गया! और जाति से मुक्ति के बजाये हमारे देश में जाति की जडें गहरी होती गईं! निश्चित तौर पर जाति आधारित जनगणना के आकडों के आधार पर ही राजनैतिक दल आगामी चुनावों की रणनीति तय करेंगे! यानि इस जनगणना के पीछे सत्य का सामना करने का साहस नहीं बल्कि इसके पीछे का स्वार्थ ही अधिक नज़र आ रहा है!

Saturday, 8 May 2010

ANY REMEDY FOR JUDICIAL TORTURE?: दिल्ली से योगेश गुलाटी

जी हां मैं न्यायिक उपचारों की ही बात कर रहा हूँ! हमारे संविधान में प्रदत्त क़ानून के समक्ष समानता आज़ादी के दशकों बाद भी सच्चाई नहीं बन पाई है! आलम ये है कि न्याय पाने की पूरी प्रक्रिया इतनी कष्टप्रद है कि उससे कहीं बेहतर सज़ा भुगतना लगता है! यहां पीड़ित दो तरफा सज़ा भुगता है! पहला तो वो अन्याय को भोगता है! और दूसरा उस पीड़ा से शायद अधिक पीडादायक कानूनी प्रक्रिया के चक्रव्यू में ऐसा फंसता है कि उसकी ज़िंदगी कब इस उलझन में ही बीत जाती है उसे खुद पता नहीं चलता! न्याय की आस में वो बूढा हो जाता है! और मरने से पहले उसे न्याय मिल भी जाए तो ये उसके ज़ख्मो पर नमक का ही काम करता है! इसके ठीक उलट अपराधी हमारी अदालातोम की इस कमजोरी का बखूबी फ़ायदा उठा रहे हैं! वो आसानी से जमानत पर छूट जाते हैं! ह्त्या के मामलों में भी कमजोर जांच और सबूतों का अभाव उन्हें बरी कर देता है! हम इस सिध्दाम्त पर यकीन रखते हैं कि चाहे सौ अपराधी छूट जायें लेकिन एक निर्दोष को सज़ा नहीं होनी चाहिए! निर्दोष तो न्याय की गुहार और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान ही पर्याप्त सज़ा भुगत चुका होता है! क्योंकि अपराध को साबित करने का भार भी उसी के कंधों पर होता है, जिसके साथ अन्याय हुआ है! ऐसे में हमारी जांच एजेंसिया और पुलिस कितनी मददगार साबित होती हैं ये किसी से छुपा नहीं है! जांच में घोर लापरवाही और सबूतों को नष्ट हो जाने देना हमारे यहां जांच एजेसियों के लिए नई बात नहीं है! ऐसे में अदालत में आरोपों को साबित करना लोहे के चने चबाने जैसा है! कहते हैं "डिले डिनाय दी जस्टिस" ! क़ानून की किताब का ये पहला सबक हमारे यहां लागू नहीं होता! और हो भी नहीं सकता! क्योंकि हमारी अदालतों में केसों के अम्बार लगे हैं! हमारे २१ उच्च न्यायालयों में तीन करोड़ से ज्यादा केस पेंडिंग है! और अधीनस्थ न्यायालयों में करीब दो करोड़ से ज्यादा केस विचाराधीन है! देश की विभिन्न जेलों में करीब ढाई लाख लोग अंदर ट्रायल है! और दो हज़ार से ज़्यादा लोग पांच सालो से जेल में बंद है जबकि उनका अपराध साबित नहीं हुआ है! पेंडिंग केसों के मामले में यूपी नंबर एक पर है! अकेले इलाहबाद हाईकोर्ट में एक करोड़ से भी ज्यादा पेंडिंग केस हैं! जबकि सिक्किम महज़ ५१ विचाराधीन मामलों के साथ इस लिस्ट में सबसे नीचे है! यूपी के बाद नंबर आता है महाराष्ट्रा(४१ लाख), गुजरात (३९ लाख), पश्चिम बंगाल(20 लाख), बिहार(१२ लाख), कर्नाटका( १० लाख), राजस्थान( १० लाख), ओडिशा (१० लाख), आंध्र प्रदेश (९ लाख)!
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सी मामले पर अपनी चिंता जाहिर की है! इसके पहले सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन भी कई बार इस मुद्दे पर चिंता जता चुके हैं! लेकिन यहां सवाल ये है कि क्या सिर्फ चिंता जाहिर करना ही पर्याप्त है? सवाल ये भी है कि संविधान की आत्मा यानी क़ानून के समक्ष समानता को लागू करने के लिए क्या कदम उठाये जा रहे हैं? हम अभी तक लोकतंत्र के पहले लक्ष्य को भी नहीं पा सके है! क्योकि हमारी अदालते विचाराधीन मामलों से भरी है! न्याय महँगा ही नहीं आम आदमी की पहुच से बाहर की बात है! और पूरी न्यायिक प्रक्रिया कितनी कष्टप्रद है इसका अंदाज़ तो कोई भुक्तभोगी ही बाया कर सकता है! हमारे देश में १० लाख लोगो पर औसतन १४ जज है! और १५०० लोगो पर एक एडवोकेट! हमारे विश्विद्यालयो में क़ानून की शिक्षा का क्या आलम है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हमारे वकील कानूनी धाराओं से नहीं जुगाड़ से केस जीतने की कोशिश करते है! और ज्यादातर केस इस लिए नहीं सुलझ पाते क्योकि वकील नहीं चाहते कि उनका फैसला हो! सवाल ये भी है कि जब प्रधानमंत्री और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्याधीश इस मुद्दे पर गंभीर है तो फिर क्यों नहीं हो रहा कायाकल्प हमारी न्याय व्यवस्था का? विकसित देशों की न्याय व्यवस्था का माडल अपना कर हम इस दोष को दूर कर सकते है!
दिल्ली से योगेश गुलाटी की रिपोर्ट!

Friday, 7 May 2010

कसाब को फांसी पर, जश्न किसलिये?

हिंदुस्तान के लिए एक ऐतिहासिक मुक़दमा ! आज़ाद हिन्दुस्तान के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था कि एक मुकदमे के फैसले का सारा मुल्क दिल थामे इंतज़ार कर रहा था! पूरे मुल्क को कसाब के लिए मौत की सजा का इंतज़ार था! और अदालत ने आखिर वो फैसला सुना ही दिया! अदालत ने कसाब से कहा कि तुम्हे मरते दम तक फांसी दी जायेगी! क्योंकि तुमने जो किया है, उसके एवज़ में इससे कम कोई सज़ा नहीं है! वाकई हमने इतिहास रच दिया! हम इस बात पर खुश हो सकते है कि हमने महज़ एक साल में एक बड़े आतंकी मुकदमे का फैसला कर दिया! क्योंकि हमारी अदालते साधारण विवादों का फैसला करने में भी दशको का समय लेती है! हम इस बात पर भी खुश हो सकते हैं कि इस संवेदनशील मामले में दो भारतीय आरोपीयों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया ! हमारे विद्वान इसे न्यायालय की निष्पक्षता से जोड़ कर देख रहे हैं! और वो कसाब को मिली फांसी की सज़ा पर जश्न मना रहे हैं! लेकिन जश्न किस बात का? आतंक की इस शतरंज में कसाब महज़ एक प्यादा है! इस खेल के असली खिलाड़ी तो हमारी पहुंच से बाहर हैं! क्या हम अमेरिका की तर्ज़ पर पकिस्तान और पाक- कश्मीर में चल रही आतंक की फेक्त्रीयो को ख़त्म करने की हिम्मत रखते हैं अगर नहीं ...तो एक कसाब को फांसी पर लटकाने से कुछ नहीं होने वाला! क्योंकि महज़ चंद लाख रुपयों के लालच में भारत पर हमला करने को कितने ही कसाब तैयार बैठे है! हमारे पड़ोसी मुल्कों में इतनी गरीबी है कि वहां भारत पर हमला करने के लिए मानव बम तैयार करना कोइ मुश्किल काम नहीं है! और दुर्भाग्य से हमने अब तक आतंक के खिलाफ अमेरिका जैसी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है जिसे देख कर ये लगता हो कि हम आतंक के खिलाफ वाकई में सख्त हैं! और हममे ऐसी किसी हरकत का मुह तोड़ जवाब देने की ताकत है! कसाब तो मरने के लिए भारत आया था....शायद वो खुश होगा कि अदालत में उसकी उम्र बढ़ गयी! क्योंकि अब उसके पास हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और फिर राष्ट्रपति के पास दया के लिए गुहार लगाने का रास्ता बचता है! इसके बाद भी कसाब के ज़िंदा रहने की पूरी उम्मीदें हैं! क्योंकि अकेले महाराष्ट्र में ५८ अपराधी फांसी की सज़ा का इंतजार कर रहे हैं! कसाब का नंबर ५९वां है! और अभी तो संसद पर हमले के दोषी अफ़ज़ल की दया याचिका भी विचाराधीन है! ऐसे में ये कैसे मान लिया जाए कि हामारी सरकारें आतंकवाद पर वाकई में सख्त हैं? लेकिनं २६/११ के हमले में मारे गए लोग इतने खुशकिस्मत नहीं थे! मज़हबी उन्माद ने उन्हें उसी दिन मौत की नींद सुला दिया था! लेकिन इससे भी बड़ा सवाल आतंक की इस साजिश को रचाने वाले वो असली आतंकी कहां हैं? क्या आतंक के असली आकाओं के गिरेबां तक पहुंचने की हिम्मत हमारी सरकारों में है? कहां हैं २६/११ के असली सूत्रधार जो सरहद के पार बैठे इस हमले को अंजाम दे रहे थे? शायद वो इस वक्त अगले हमले की तैय्यारी कर रहे हो? और हम कसाब की फांसी पर जश्न मना रहे हैं? हमें नहीं भूलना चाहिए अमेरिका पर हुए एक आतंकी हमले के बाद उसने दो मुल्क तबाह कर दिए थे! तब से अब तक वहां कोई आतंकी हमला नहीं हुआ! और हम हर महीने औसतन एक आतंकी हमले का गवाह बन रहे हैं! क्योंकि हम हर बार यही कहते हैं कि अगले हमले का मुंह तोड़ जवाब देंगे!