Sunday, 27 June 2010
अंधेर नगरी-चौपट राजा: दिल्ली से योगेश गुलाटी
अंधेर नगरी-चौपट राजा की कहानी तो आपने सुनी ही होगी! आप भले ही उस चौपट राजा को बुरा भला कह लें! लेकिन मेरा मन उस चौपट राजा को प्रणाम कर रहा है! बचपन में मैं यही सोचता था कि लोग उस राजा को बुरा क्यों कहते थे, जिस राजा ने अपनी जनता के लिये हर चीज़ इतनी सस्ती कर दी थी कि टके सेर में जनता कुछ भी खरीद सकती थी! जिस राजा ने महंगाई और कालाबाज़ारी पर इस कदर अंकुश लगा दिया हो कि हर चीज़ आम आदमी की पहुंच में आ गई हो वो राजा तो महान अर्थशास्त्री और कुशल प्रशासक रहा होगा! लेकिन कुछ क्रूर इतिहासकारों ने अपने निहित स्वार्थों के चलते उस महान शासक को बदमान कर दिया! आज जब गरीबों का भोजन आटा और दाल भी आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गया है, मुझे ये कहानी बार- बार याद आ रही है! क्योंकि चौपट राजा की असली भूमिका में तो हमारी सरकार और सांसद हैं! जो इस महंगाई में जनता को राहत देने की बजाय अपना वेतन बढाने की कवायद कर रहे हैं! हमारी सरकार कहती है कि भगवान ने चाहा तो जल्द ही जनता को भी महंगाई से निजात मिलेगी! यानि जनता भगवान भरोसे है और ये लोग अपनी परेशानी से निजात पाने के लिये भगवान भरोसे नहीं हैं वो काम तो ये अपना वेतन पांच गुना करके खुद ही कर लेंगे! अब इसमें भगवान को कष्ट देने की क्या ज़रूरत?
महंगाई की मार से सबसे ज़्यादा अगर कोई परेशान है तो वो हैं हमारे सांसद! अब जल्द ही देश का उद्धार करने वाले हमारे गरीब सांसदों का वेतन पांच गुना हो जायेगा! क्योंकि इनका वेतन बढाने के लिये ना तो किसी वेतन आयोग की ज़रूरत होती है ना ही इनके काम के मुल्यांकन की! चाहे ये संसद में हाज़िर रहें या ना रहें! चाहे ये सदन में सोते हुए दिखाई दें! फिर भी ये आपस में मिल बैठ कर अपना वेतन बढाने का अधिकार रखते हैं! महंगाई बढ़ने के साथ ही दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सांसदों ने बेहतर वेतन पैकेज की मांग शुरू कर दी है। संसद की एक स्थायी समिति ने सिफारिश की है कि सांसदों की मंथली सैलरी 16,000 रुपये से बढ़ा कर 80,001 रुपये यानी केंद्र सरकार के सेक्रेटरी लेवल के अधिकारी से एक रुपया अधिक कर दिया जाए। सरकार इस पर विचार कर रही है। सांसदों को सैलरी के अलावा संसद की कार्यवाही में हिस्सा लेने के लिए अभी 1000 रुपये बतौर अलाउंस मिलते हैं। संभावना जताई जा रही है कि सरकार इसको दोगुना यानी 2000 रुपये कर देगी। वहीं, संसदीय क्षेत्र का अलाउंस भी 40 हजार रुपये तक बढ़ाए जाने के संकेत हैं। इस समय सांसदों को इस मद में 20 हजार रुपये मिलते हैं। ऑफिस अलाउंस के तौर पर सांसदों को अब से हर महीने 54 हजार रुपये मिलने की उम्मीद है। जॉइंट पार्लियामेंटरी कमिटी ने इसे 60 हजार किए जाने की सिफारिश की थी।
जनता भले ही महंगाई की मार से कराह रही हो, लेकिन सरकार की सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पडता है! क्योंकि सरकार ये अच्छी तरह जानती है कि उसके पास पर्याप्त बहुमत है... चुनाव बहुत दूर है.... और जनता की याद्दाश्त बहुत कमज़ोर... इसलिये इस वक्त जनता उसका कुछ नहीं बिगाड सकती! तो वहीं महंगाई पर विपक्ष की नौटंकी भी इस वक्त सारा देश देख रहा है! आम आदमी की किसी को फिक्र नहीं है! कोई ये समझना नहीं चाहता कि प्रति दिन बीस रुपये से भी कम पर गुज़ारा करने वाले 26 करोड हिन्दुस्तानी अब कैसे जीयेंगे? कालाबाज़ारी अपने चरम पर जा पहुंची है और मुनाफाखोर इस स्थिति का बखूबी फायदा उठा रहे हैं! सरकार के प्रवक्ता बडी बेशर्मी के साथ ये बयान देते हैं कि भगवान ने चाहा तो आने वाले दिनों में महंगाई कम हो जायेगी? समझ नहीं आता इस देश की भोली जनता को ये कैसा छलावा दिया जा रहा है? हमारी सरकार ये साफ करे कि क्या महंगाई के लिये भगवान ज़िम्मेदार है? क्या भगवान ये सरकार चला रहा है? अगर नहीं तो भगवान महंगाई कैसे कम कर सकते हैं? आप कालाबज़ारियों पर लगाम क्यों नहीं लगाते? एक तरफ तो आप कहते हैं कि देश में खाद्य पदार्थों की कोई कमी नहीं है तो दूसरी तरफ ज़रूरी चीज़ों की कीमतें आसमान छू रही हैं! आम आदमी अब घर से बाहर निकलने में भी डर रहा है! बस, ट्रेन, मेट्रो, आटो, पेट्रोल, डीज़ल, केरोसिन, रसोई गैंस, स्कूल, कालेज, पानी, बिजली, दाल, आटा, सब्ज़ी, दवाईयां, हर ज़रूरत पर महंगाई की मार पडी है!
आम आदमी अपने पुराने ज़ख्म सहला भी नहीं पया था कि उसे नये ज़ख्म देने की तैयारी कर ली गई! बिजली, पानी, टेक्स के बाद रही सही कसर पेट्रोल डेज़ल और केरोसिन की कीमतों ने पूरी कर दी! और बडी बेशर्मी के साथ इसका ऎलान भी कर दिया गया! और इसे भगवान की मर्ज़ी कह कर जनता को बेहलाया जा रहा है! चुनाव जीतने के लिये तो जनता को सब्जबाग दिखाए जाते हैं! रसोई गैंस पर सब्सीडी देकर उसे दिल्ली में सबसे सस्ता बना दिया जाता है! और फिर सत्ता हथियाते ही जनता पर जुल्म शुरु हो जाते हैं! कामनवेल्थ के नाम पर रुपया पानी की तरह बहाया जा रहा है! इधर आम आदमी महंगाई और करों के बोझ तले दबा जा रहा है! कामनवेल्थ गेम्स के लिये सजाई जा रही दिल्ली की सडकों पर हमारे बच्चे भीख मांगते देखे जा सकते हैं! जब यही बच्चे विदेशी मेहमानों के सामने हाथ फैलाएंगे तब हमारी सरकार की नाक नीची नहीं होगी? लेकिन हमारे सांसदों को इसकी क्या चिंता? इन्हें चिंता है तो इस बात की कि इस महंगाई में उनको मिल रहे वेतन से उनका गुज़ारा नहीं होता इसलिये वे अपना वेतन पांच गुना करने की तैयारी कर रहे हैं! यानि गरीब जनता की गाढी कमाई अब कामनवेल्थ के बाद सांसदों की झोली में जाएगी! और बीस रुपये से भी कम पर अपना गुजारा करने को मजबूर करोडों हिंदुस्तानी महंगाई की मार से यूं ही बेहाल होते रहेगें! लेकिन हमारी सरकार बेचारी क्या करे? ये सब भगवान की मर्ज़ी है!
Monday, 21 June 2010
एंडरसन बडा बेशर्म है: दिल्ली से योगेश गुलाटी
आज से 25 साल पहले 65 साल के एंडरसन को पूरे राजकीय सम्मान के साथ प्लेन में बैठा कर अमेरिका रवाना करते वक्त हमारी सरकार ने शायद यही सोचा होगा कि जब तक हमारी अदालत गैस कांड का फैसला सुनाएगी तब तक बूढा एंडरसन स्वर्ग को कूच कर चुका होगा! ये पुराना आजमाया हुआ फंडा है जो हमारी सरकारें किसी बडे नेता या उद्योगपति के कानून के शिकंजे में फंसने पर अपनाती आई हैं! ऎसे मामले जो खास लोगों से जुडे होते हैं उनमें हमारी धीमी न्याय व्यवस्था की चाल को किस तरह और धीमा किया जाये कि वो घिसट कर चलने लगे, ये हमारी सरकारें अच्छी तरह जानती हैं! हमारे देश में किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति के जुर्म पर फैसला 25-30 सालों से पहले नहीं आता है! अब निचली अदालत ही जब इतना वक्त लेती है तो, चिंता किस बात की? यहां सज़ा सिर्फ उसे होती है जिसके पास हमारी न्याय व्यवस्था में मुकदमों को लंबा खींचने के लिये पैसा नहीं होता! ज़ाहिर सी बात है गरीब के पास चूंकि पैसा नहीं होता इसलिये उसे अपनी छोटी से छोटी भूल के लिये भी सज़ा भुगतनी पडती है! और फैसला आने में भी ज़्यादा देरी नहीं होती!
लेकिन प्रभावशाली लोगों के मुकदमें हमारी अदालतों में कछुए की चाल को भी मात कर देते हैं! ताज़ा उदाहरण शीबू सोरेन का है! जिनपर लगे हत्या के चंद आरोपों में से एक का फैसला बीते दिनों ही आया है! ये मामला सन 1974 का है! बताया जाता है कि शीबू सोरेन ने दो लोगों की हत्या के लिये भीड का नेतृत्व किया था! निचली अदालत में ये मुकदमा दशकों तक चलता रहा! अब जाकर निचली अदालत ने इसका फैसला सुनाया! और ज़ाहिर सी बात है ऎसी घटनाओं के सबूत इतने सालों तक न्याय की आस में ज़िंदा नहीं रह सकते! तो सबूतों के अभाव में गुरुजी को बरी कर दिया गया! दशकों पहले के ऎसे दो अन्य हत्या के मामलों में भी गुरुजी बरी हो चुके हैं! जिन मामलों में आरोपी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया जाता है उनमें आखिर पीडित को न्याय का क्या होता है? अगर आरोपी ने हत्या नहीं की तो फिर हत्या किसने की? हमारी अदालतें ये तो स्वीकर करेंगी कि जुर्म हुआ है? और अगर जुर्म हुआ है तो क्या गुनहगार को ढूंढ कर उसे सज़ा दिलवाना कानून का फर्ज़ नहीं है! खैर सबूतों के अभाव में आरोपी को बरी करना हमारे यहां आम बात है! अब 25 साल तक केस चलेगा तो कौनसा सबूत बचा रहेगा? अगर आरोपी ज़िंदा रह गया इतने वक्त तक तो क्या गारंटी है कि गवाहों की उम्र इतनी लंबी होगी? और कोई गवाह किस्मत से लंबी उम्र का निकला तो भी अब इतने सालों के बाद वो क्यों अपने बयान पर कायम रहेगा? उसे कोई मेडल थोडेय ही मिल जायेगा आरोपी को सज़ा दिला कर? और अगर उसने आरोपी के खिलाफ गवाही दे भी दी तो उसकी और उसके परिवार की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा? लेकिन इन फालतू के सवालों पर विचार करने के लिये हमारे सिस्टम के पाद टाईम नहीं है!
खुदीराम बोस को गिरफ्तारी के 11 दिनों में अदालती कार्वाई पूरी करते हुए अंग्रेज़ों ने फांसी पर लटाका दिया था! उस वक्त उनकी उम्र महज़ 14 साल थी! तो भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को भी फांसी देने में अंग्रेज़ों ने ज़्यादा वक्त नहीं लिया था! ये लोग कोई आतंकवादी नहीं थे! ना ही कोई खूंखार अपराधी, जिनसे समाज को कोई खतरा हो! ये महान विचारक,लेखक, शायर, और विद्वान देशभक्त थे! अंग्रेज़ हुकूमत भी इस बात को अच्छी तरह जानती थी! लेकिन साम्रज्यवादी हितों को पूरा करने के लिये उसने इन महान देशभक्तों को शहीद कर दिया था! ये आज़ादी के पहले की बात थी!
और आज़ादी के बाद.....एक शख्स जो हमारी संसद पर हमला कर इस देश की संप्रभुता को चुनौती देता है, उसके समर्थन में आवाज़ बुलंद करने कईं बडी शख्सियतें सामने आती हैं! सुप्रीम कोर्ट द्वारा दोषी पाये जाने और लंबी कानूनी कार्यवाही के बाद देश के सर्वोच्च न्यायलय द्वारा सज़ाए मौत सुनाए जाने के बाद भी हमारी सरकार इस अदालती फैसले पर अमल करने से डरती है! क्योंकि वो कहती है कि इससे कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड जायेगी! अगर एक आतंकवादी को सज़ा देने से कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड जायेगी तो ये समझा जा सकता है कि हम किस दोराहे पर आ गये हैं! और इसका अंजाम क्या होगा?
एक और शख्स जिसने अपने साथियों के साथ मुंबई में हिंसा का वो तांडव किया कि सारी दुनिया हैरान रह गई! उसे जिंदा गिरफ्तार करने के लिये हमारे जाबाज़ों जान की बाज़ी लगा दी! जिसे हिंसा का तांडव रचते हुए सारी दुनिया ने अपनी टीवी स्क्रीन पर देखा! उसे 800 से ज्यादा लोगों की गवाही और तमाम सबूतों के साथ् लंबी चली अदालती कार्यवाही के बाद जब सज़ा सुनाई गई तो ऎसा प्रदर्शित किया गया मानो हमने आतंकवाद के खिलाफ बहुत बडी जंग जीत ली है! जबकि सबको पता है कि उंची अदालतों से होता हुआ मामला अभी राष्ट्रपति के पास जायेगा! लेकिन हमारी सरकार चिंतित है, उसे इस बात की चिंता है कि इस दौरान आतंकी उसे छुडाने के लिये प्लेन हाईजेक जैसी कोई वारदात कर सकते हैं! इसलिये उसने राज्य सरकारों को अलर्ट कर दिया है!
यानि हमारा सिस्टम हर किस्म के आरोपी के साथ समभाव से पेश आता है! और उसे बचने का पूरा-पूरा मौका देता है! वो गवाहों के बदलने और सबूतों के नष्ट होने का इंतज़ार करता है! ताकि आरोपी को सबूतों के अभाव में छोडा जा सके! ये स्थिति भी केवल उसी दशा में आती है जब हमारी पुलिस स्काटालेंड यार्ड की पुलिस की तर्ज़ पर काम करे! जबकि हम ये अच्छी तरह जानते हैं कि हमारी पुलिस किस मजबूती के साथ अदालत में केस पेश करती है! आरुषी मर्डर केस और निठारी जैसे मामले हमारी पुलिसिया रवैये को दर्शाते हैं! आरोपी को गिरफ्तार करने से ज्यादा मुस्तैदी ये बास का कुत्ता ढूंढने में दिखाते हैं! पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट के सब्र का बांध भी टूट गया और जस्टिस ढींगरा ने पुलिस को बेशर्म और भी जाने क्या-क्या अलंकारों से सुषोभित किया!
तो ये बात गौर करने लायक है कि हमारे यहां ऎसे किसी भी मामले का फैसला 25-30 सालों से पहले नहीं आता जिसमें कोई प्रभावशाली शख्सियत कानून के शिकंजे में होती है! अब यदि ऎसे मामलों में फैसला उस शख्स के खिलाफ आये और वो शख्स बदकिस्मती से उस वक्त तक ज़िंदा हो तो भी उसके पास उपरी अदालतों में अपील करने का मौका होता है! भोपाल गैंस कांड के बाद एंडरसन के मामले में भी सरकार की यही रणनीति रही होगी! लेकिन बदकिस्मती से एंडरसन की उम्र ज़रा लंबी है! सरकार ये अच्छी तरह जानती है कि एंडरसन को भारत वापस लाना उसके लिये टेढी खीर है, इसीलिये इस मामले पर आये अदालती निर्णय में एंडरसन का ज़िक्र तक नहीं हुआ! जब 25 बरस तक केस चलने के बाद आये फैसले में एंडरसन का ज़िक्र तक नहीं है तो किस आधार पर आप एंडरसन के प्रत्यर्पण की बात कर रहे हैं! शायद ये सवाल अमेरिका की तरफ से पूछा जा सकता है! जो भी हो एंडरसन बडा बेशर्म है क्योंकि अगर उसकी उम्र इतनी लंबी ना होती तो हमारी सरकार के लिये वो गले की हड्डी ना बनता! और दिनियाभर में भारत सरकार की किरकिरी ना हो रही होती!
लेकिन प्रभावशाली लोगों के मुकदमें हमारी अदालतों में कछुए की चाल को भी मात कर देते हैं! ताज़ा उदाहरण शीबू सोरेन का है! जिनपर लगे हत्या के चंद आरोपों में से एक का फैसला बीते दिनों ही आया है! ये मामला सन 1974 का है! बताया जाता है कि शीबू सोरेन ने दो लोगों की हत्या के लिये भीड का नेतृत्व किया था! निचली अदालत में ये मुकदमा दशकों तक चलता रहा! अब जाकर निचली अदालत ने इसका फैसला सुनाया! और ज़ाहिर सी बात है ऎसी घटनाओं के सबूत इतने सालों तक न्याय की आस में ज़िंदा नहीं रह सकते! तो सबूतों के अभाव में गुरुजी को बरी कर दिया गया! दशकों पहले के ऎसे दो अन्य हत्या के मामलों में भी गुरुजी बरी हो चुके हैं! जिन मामलों में आरोपी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया जाता है उनमें आखिर पीडित को न्याय का क्या होता है? अगर आरोपी ने हत्या नहीं की तो फिर हत्या किसने की? हमारी अदालतें ये तो स्वीकर करेंगी कि जुर्म हुआ है? और अगर जुर्म हुआ है तो क्या गुनहगार को ढूंढ कर उसे सज़ा दिलवाना कानून का फर्ज़ नहीं है! खैर सबूतों के अभाव में आरोपी को बरी करना हमारे यहां आम बात है! अब 25 साल तक केस चलेगा तो कौनसा सबूत बचा रहेगा? अगर आरोपी ज़िंदा रह गया इतने वक्त तक तो क्या गारंटी है कि गवाहों की उम्र इतनी लंबी होगी? और कोई गवाह किस्मत से लंबी उम्र का निकला तो भी अब इतने सालों के बाद वो क्यों अपने बयान पर कायम रहेगा? उसे कोई मेडल थोडेय ही मिल जायेगा आरोपी को सज़ा दिला कर? और अगर उसने आरोपी के खिलाफ गवाही दे भी दी तो उसकी और उसके परिवार की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा? लेकिन इन फालतू के सवालों पर विचार करने के लिये हमारे सिस्टम के पाद टाईम नहीं है!
खुदीराम बोस को गिरफ्तारी के 11 दिनों में अदालती कार्वाई पूरी करते हुए अंग्रेज़ों ने फांसी पर लटाका दिया था! उस वक्त उनकी उम्र महज़ 14 साल थी! तो भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को भी फांसी देने में अंग्रेज़ों ने ज़्यादा वक्त नहीं लिया था! ये लोग कोई आतंकवादी नहीं थे! ना ही कोई खूंखार अपराधी, जिनसे समाज को कोई खतरा हो! ये महान विचारक,लेखक, शायर, और विद्वान देशभक्त थे! अंग्रेज़ हुकूमत भी इस बात को अच्छी तरह जानती थी! लेकिन साम्रज्यवादी हितों को पूरा करने के लिये उसने इन महान देशभक्तों को शहीद कर दिया था! ये आज़ादी के पहले की बात थी!
और आज़ादी के बाद.....एक शख्स जो हमारी संसद पर हमला कर इस देश की संप्रभुता को चुनौती देता है, उसके समर्थन में आवाज़ बुलंद करने कईं बडी शख्सियतें सामने आती हैं! सुप्रीम कोर्ट द्वारा दोषी पाये जाने और लंबी कानूनी कार्यवाही के बाद देश के सर्वोच्च न्यायलय द्वारा सज़ाए मौत सुनाए जाने के बाद भी हमारी सरकार इस अदालती फैसले पर अमल करने से डरती है! क्योंकि वो कहती है कि इससे कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड जायेगी! अगर एक आतंकवादी को सज़ा देने से कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड जायेगी तो ये समझा जा सकता है कि हम किस दोराहे पर आ गये हैं! और इसका अंजाम क्या होगा?
एक और शख्स जिसने अपने साथियों के साथ मुंबई में हिंसा का वो तांडव किया कि सारी दुनिया हैरान रह गई! उसे जिंदा गिरफ्तार करने के लिये हमारे जाबाज़ों जान की बाज़ी लगा दी! जिसे हिंसा का तांडव रचते हुए सारी दुनिया ने अपनी टीवी स्क्रीन पर देखा! उसे 800 से ज्यादा लोगों की गवाही और तमाम सबूतों के साथ् लंबी चली अदालती कार्यवाही के बाद जब सज़ा सुनाई गई तो ऎसा प्रदर्शित किया गया मानो हमने आतंकवाद के खिलाफ बहुत बडी जंग जीत ली है! जबकि सबको पता है कि उंची अदालतों से होता हुआ मामला अभी राष्ट्रपति के पास जायेगा! लेकिन हमारी सरकार चिंतित है, उसे इस बात की चिंता है कि इस दौरान आतंकी उसे छुडाने के लिये प्लेन हाईजेक जैसी कोई वारदात कर सकते हैं! इसलिये उसने राज्य सरकारों को अलर्ट कर दिया है!
यानि हमारा सिस्टम हर किस्म के आरोपी के साथ समभाव से पेश आता है! और उसे बचने का पूरा-पूरा मौका देता है! वो गवाहों के बदलने और सबूतों के नष्ट होने का इंतज़ार करता है! ताकि आरोपी को सबूतों के अभाव में छोडा जा सके! ये स्थिति भी केवल उसी दशा में आती है जब हमारी पुलिस स्काटालेंड यार्ड की पुलिस की तर्ज़ पर काम करे! जबकि हम ये अच्छी तरह जानते हैं कि हमारी पुलिस किस मजबूती के साथ अदालत में केस पेश करती है! आरुषी मर्डर केस और निठारी जैसे मामले हमारी पुलिसिया रवैये को दर्शाते हैं! आरोपी को गिरफ्तार करने से ज्यादा मुस्तैदी ये बास का कुत्ता ढूंढने में दिखाते हैं! पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट के सब्र का बांध भी टूट गया और जस्टिस ढींगरा ने पुलिस को बेशर्म और भी जाने क्या-क्या अलंकारों से सुषोभित किया!
तो ये बात गौर करने लायक है कि हमारे यहां ऎसे किसी भी मामले का फैसला 25-30 सालों से पहले नहीं आता जिसमें कोई प्रभावशाली शख्सियत कानून के शिकंजे में होती है! अब यदि ऎसे मामलों में फैसला उस शख्स के खिलाफ आये और वो शख्स बदकिस्मती से उस वक्त तक ज़िंदा हो तो भी उसके पास उपरी अदालतों में अपील करने का मौका होता है! भोपाल गैंस कांड के बाद एंडरसन के मामले में भी सरकार की यही रणनीति रही होगी! लेकिन बदकिस्मती से एंडरसन की उम्र ज़रा लंबी है! सरकार ये अच्छी तरह जानती है कि एंडरसन को भारत वापस लाना उसके लिये टेढी खीर है, इसीलिये इस मामले पर आये अदालती निर्णय में एंडरसन का ज़िक्र तक नहीं हुआ! जब 25 बरस तक केस चलने के बाद आये फैसले में एंडरसन का ज़िक्र तक नहीं है तो किस आधार पर आप एंडरसन के प्रत्यर्पण की बात कर रहे हैं! शायद ये सवाल अमेरिका की तरफ से पूछा जा सकता है! जो भी हो एंडरसन बडा बेशर्म है क्योंकि अगर उसकी उम्र इतनी लंबी ना होती तो हमारी सरकार के लिये वो गले की हड्डी ना बनता! और दिनियाभर में भारत सरकार की किरकिरी ना हो रही होती!
Wednesday, 16 June 2010
भीख मांगता बचपन: दिल्ली से योगेश गुलाटी
दिल्ली में मेट्रो ने जिधर का रुख किया उधर वैभव और विलासिता के नित नये नज़ारे उभर आये! या यों कहें कि उन्नति की प्रतीक अट्टालिकाओं की शोभा बढाने मेट्रो ट्रेन भी वहां जा पहुंची! पन्द्रह साल पहले तक नोएडा एक सुनसान गांव हुआ करता था! लेकिन आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है! ये गांव अब महानगर में तब्दील हो चुका है! लेकिन खास बात ये है कि महानगर की तमाम खूबियां और खामियां इस गांव ने तेज़ी के साथ ग्रहण कर ली हैं! दिल्ली और नोएडा में काफी समानताएं हैं यहां भी गरीबी और अमीरी के बीच की खाई गहरी है! आसमान छूती इमारतों के सामने बनी झोंपडियां गरीबी और अमीरी के बीच के इस अंतर को बयान करती हैं! ये सब देख अब हैरानी नहीं होती! क्योंकि यही तो भारतीय महानगरीय संस्कृति की विशेषता है! यहां गरीब और अमीर के हक तो समान हैं लेकिन गरीब और अमीर में अंतर ज़मीन आसमान का है! दिल्ली और नोएडा में एक और अंतर भी है! दिल्ली में कामनवेल्थ गेम्स के मद्देनज़र गरीबी हटाओ का पचास सालों से चला आ रहा अभियान इन दिनों गरीब हटाओ का रूप ले चुका है! जबकि नोएडा में ऎसा बिल्कुल नहीं है! वहां सरकार की रुचि ना तो गरीबी हटाने में है ना ही गरीबों को हटाने जैसा कोई कर्म वो कर रही है! दर-असल यहां व्यवस्था गरीब और गरीबी दोनों को ही फलने फूलने का पूरा मौका दे रही है! झोपडी में रहने वाले गरीबों को जब सरकार घर नहीं दे सकी तो भी उसने गरीबों के आराम की पूरी व्यवस्था की और उनके लिये नोएडा में बडा सा पार्क बनवा कर उसमें लाखों रुपयों की बडी-बडी मूर्तियां लगवाईं! ऎसा शायद इसलिये किया गया कि दिल्ली के पार्कों से कामनवेल्थ गेम्स के मद्देनज़र गरीबों को हटाने का अभियान इन दिनों ज़ोरों पर है! शायद इसीलिये सरकार ने गरीबों को अपना गम भुलाने के लिये नोएडा में एक विशाल पार्क की व्यवस्था कर दी है! हालाकि कानूनी पचडों में पडा ये पार्क इन दिनों बंद है! और निर्माण कार्य रुक गया है!
नोएडा में गरीबों के साथ ही भिखारियों की संख्या में भी इन दिनों खासा इजाफा हुआ है! भिखारियों के लिये यहां की आबो-हवा दिल्ली से बेहतर है! दिल्ली की ही तरह यहां भी सडकों पर बच्चे भीख मांगते देखे जा सकते हैं! हालाकि हमारे यहां बाल मजदूरी और बाल भिक्षा-वृत्ति के खिलाफ दशकों पहले कानून बन चुका है! लेकिन कानून के रक्षकों के सामने हज़ारों मासूम बच्चे जिनकी उम्र 3-10 साल के बीच की है दिल्ली की ही तरह अब नोएडा की सडकों पर भीख मांग रहे हैं! इस गैर कानूनी काम को करने के एवज़ में नियत शुल्क इस धंधे के सरगना कानून के रक्षकों को चुकाते हैं! जिसके एवज़ में उन्हें 24 घंटे बच्चों से भीख मंगवाने की छूट मिलती है! ऎसा नहीं है कि सरकार, कोर्ट या कानून को ये सब दिखाई ना दे रहा हो! शिक्षा के अधिकार का कानून बनाने वाली हमारी सरकार को भी सब कुछ पता है! बावजूद इसके वैभव के प्रतीक नोएडा में देश का भविष्य भीख मांग रहा है! ऎसी ही एक नन्ही बच्ची जब नोएडा के सेक्टर 15 मेट्रो स्टेशन की सीढियों पर बैठी देखी तो मैं सोच में पड गया! क्योंकि गरीबी का ज़िंदा भूत भी मैंने ऎसे ही दिल्ली के कनाट प्लेस मेट्रो स्टेशन की सीढियों पर बैठा देखा था! फर्क सिर्फ इतना था कि लोग गरीबी के उस ज़िंदा भूत से कट कर निकल रहे थे! फैशनेबल लोग उसकी काली पड चुकी, कंकाली काया को घृणा से देख रहे थे! लेकिन नोएडा के मेट्रो स्टेशन की सीढियों पर बैठी इस मासूम बच्ची को लोग बेचारगी से देख रहे थे! और अपने हाथ में लिये जर्मन के कटोरे को वो जिसकी तरफ भी बढाती वो ही शख्स उस कटोरे में एक सिक्का डाल देता था! इस तरह उसके कटोरे में सिक्कों का ढेर लगता जा रहा था! मेट्रो की सीढियों से नीचे उतरते वक्त उस बच्ची ने वो कटोरा मेरी तरफ भी बढा दिया! मैंने उसके मासूम चेहरे को देखा फिर मेरी नज़र सामने खडे यूपी पुलिस के सिपाही पर गयी जो तंबाकू चबा कर थूक रहा था! मैं इसकी तुलना दिल्ली पुलिस के उस सिपाही से करने लगा जो गरीबी के उस ज़िंदा भूत को कनाट प्लेस मेट्रो स्टेशन की सीढियों से हटाने के लिये दौड पडा था! लेकिन यूपी पुलिस के इस सिपाही की इस मामले में कोई रुचि नहीं थी! वो तो रेहडी वाले को हडकाने में व्यस्त था! हां मैं भी एक सिक्का उस मासूम के कटोरे में डाल कर उन दानवीरों की तरह एक महादान का पुण्य कमा सकता था! लेकिन मैंने ऎसा नहीं किया ! मैं चुपचाप आगे बढ गया! लेकिन उस नन्ही बच्ची का चेहरा मेरी आंखों से ओझल नहीं हुआ था! इसलिये मैंने मुड कर देखा! वो नन्हा बचपन खेलने और पढने की उम्र में एक और राहगीर के सामने हाथ फैला रहा था! और कानून का रक्षक रेहडी वाले से हफ्ता वसूल रहा था!
नोएडा में गरीबों के साथ ही भिखारियों की संख्या में भी इन दिनों खासा इजाफा हुआ है! भिखारियों के लिये यहां की आबो-हवा दिल्ली से बेहतर है! दिल्ली की ही तरह यहां भी सडकों पर बच्चे भीख मांगते देखे जा सकते हैं! हालाकि हमारे यहां बाल मजदूरी और बाल भिक्षा-वृत्ति के खिलाफ दशकों पहले कानून बन चुका है! लेकिन कानून के रक्षकों के सामने हज़ारों मासूम बच्चे जिनकी उम्र 3-10 साल के बीच की है दिल्ली की ही तरह अब नोएडा की सडकों पर भीख मांग रहे हैं! इस गैर कानूनी काम को करने के एवज़ में नियत शुल्क इस धंधे के सरगना कानून के रक्षकों को चुकाते हैं! जिसके एवज़ में उन्हें 24 घंटे बच्चों से भीख मंगवाने की छूट मिलती है! ऎसा नहीं है कि सरकार, कोर्ट या कानून को ये सब दिखाई ना दे रहा हो! शिक्षा के अधिकार का कानून बनाने वाली हमारी सरकार को भी सब कुछ पता है! बावजूद इसके वैभव के प्रतीक नोएडा में देश का भविष्य भीख मांग रहा है! ऎसी ही एक नन्ही बच्ची जब नोएडा के सेक्टर 15 मेट्रो स्टेशन की सीढियों पर बैठी देखी तो मैं सोच में पड गया! क्योंकि गरीबी का ज़िंदा भूत भी मैंने ऎसे ही दिल्ली के कनाट प्लेस मेट्रो स्टेशन की सीढियों पर बैठा देखा था! फर्क सिर्फ इतना था कि लोग गरीबी के उस ज़िंदा भूत से कट कर निकल रहे थे! फैशनेबल लोग उसकी काली पड चुकी, कंकाली काया को घृणा से देख रहे थे! लेकिन नोएडा के मेट्रो स्टेशन की सीढियों पर बैठी इस मासूम बच्ची को लोग बेचारगी से देख रहे थे! और अपने हाथ में लिये जर्मन के कटोरे को वो जिसकी तरफ भी बढाती वो ही शख्स उस कटोरे में एक सिक्का डाल देता था! इस तरह उसके कटोरे में सिक्कों का ढेर लगता जा रहा था! मेट्रो की सीढियों से नीचे उतरते वक्त उस बच्ची ने वो कटोरा मेरी तरफ भी बढा दिया! मैंने उसके मासूम चेहरे को देखा फिर मेरी नज़र सामने खडे यूपी पुलिस के सिपाही पर गयी जो तंबाकू चबा कर थूक रहा था! मैं इसकी तुलना दिल्ली पुलिस के उस सिपाही से करने लगा जो गरीबी के उस ज़िंदा भूत को कनाट प्लेस मेट्रो स्टेशन की सीढियों से हटाने के लिये दौड पडा था! लेकिन यूपी पुलिस के इस सिपाही की इस मामले में कोई रुचि नहीं थी! वो तो रेहडी वाले को हडकाने में व्यस्त था! हां मैं भी एक सिक्का उस मासूम के कटोरे में डाल कर उन दानवीरों की तरह एक महादान का पुण्य कमा सकता था! लेकिन मैंने ऎसा नहीं किया ! मैं चुपचाप आगे बढ गया! लेकिन उस नन्ही बच्ची का चेहरा मेरी आंखों से ओझल नहीं हुआ था! इसलिये मैंने मुड कर देखा! वो नन्हा बचपन खेलने और पढने की उम्र में एक और राहगीर के सामने हाथ फैला रहा था! और कानून का रक्षक रेहडी वाले से हफ्ता वसूल रहा था!
Sunday, 13 June 2010
एंडरसन और हमारा मीडिया: दिल्ली से योगेश गुलाटी
देश के स्वतंत्रता आंदोलनों में राष्ट्र प्रेम और जन चेतना की नव ज्योति को जलाए रखने वाली पत्रकरिता आज़ादी के बाद दिशाहीन सी हो गई! आज़ादी के बाद हमारे सामने राष्ट्र निर्माण का लक्ष्य था! इस लक्ष्य को पाने के लिये हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु के नेतृत्व में सरकार काम कर रही थी! आज़ादी के बाद् करीब एक दशक तक तो सब कुछ ठीक चला लेकिन एक दशक के बाद ही राष्ट्र निर्माण का वो जोश जाता रहा! लोकतंत्र की आम कमियां जिनमें भ्रष्ट्राचार प्रमुख थी, सरकार की कार्यप्रणली पर सवालिया निशान लगाने लगी! ऎसे में जनता की सारी उम्मीदें मीडिया पर टिकी थीं! लेकिन मीडिया ने भी वो सक्रिय भूमिका नहीं निभाई जो स्वतंत्रता आंदोलनों के वक्त उसने निभाई थी! अंग्रेज़ हुकूमत की दमनकारी नीतियों के खिलाफ जन चेतना का आगाज़ करने वाला हमारा मीडिया अपनी ही सरकार के शासन में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर ज़्यादा मुखर नहीं दिखा! शायद इसी का परिणाम था कि भ्रष्टाचार का वो घुन हमारी व्यवस्था में इस कदर घुसपैठ कर चुका है कि आज़ादी के साठ सालों के बाद उसने हमारी व्यवस्था को तकरीबन खोखला बना दिया है!
इन दिनों भोपाल गैंस कांड और एंडरसन की चर्चा ज़ोरों पर है! मीडिया में ये मुद्दा इन दिनों छाया हुआ है! मानवता को झकझोर देने वाली इस भीषण औद्योगिक त्रासदी के प्रमुख ज़िम्मेदार एंडरसन को लेकर तात्कालिक सरकार की भूमिका पर सवाल खडे किये जा रहे हैं! लेकिन ये हमारे लिये परेशानी की बात है! परेशानी इसलिये कि आज से पच्चीस बरस पहले अगर मीडिया ने सही भूमिका का निर्वाह किया होता तो शायद आज इस मामले पर दुनिया भर में भारत की जग हसाई ना हो रही होती! कितनी हैरानी की बात है कि 25 साल पहले जो सवाल सरकार से पूछने चाहिये थे वो सवाल 25 बरस के बाद पूछे जा रहे हैं! मीडिया में मुद्दों का पोस्टमार्टम करने की प्रवृत्ति दिनों दिन बढती जा रही है! ये स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिये अच्छा संकेत नहीं है!
हमारे सिस्टम को भ्रष्टाचार का घुन किस कदर खोखला कर चुका है इसकी एक बानगी झारखंड में कोडा सरकार के काले कारनामों और नरेगा जैसी लोक कल्याणकरी योजनाओं में व्यापक धांधलियों से हो जाती है! आटे में नमक के बराबर भ्रष्टाचार पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी के वक्त जब बर्दाश्त के बाहर हो गया तो उन्हें भी ये स्वीकारना पडा कि केन्द्र से चला एक रुपया आम आदमी तक दस पैसे के रुप में ही पहुंच पाता है! लेकिन आज आसमान पर चढ बैठी महंगाई ने आम आदमी के खाने का ज़ायका ही बिगाड दिया है! आटे में भरष्टाचार का ये नमक अब आम आदमी की हड्डियां गला रहा है! उसे समझ नहीं आ रहा कि वो करे तो क्या? क्योंकि उसकी अपनी सरकार को उसकी कोई चिंता नहीं है ! और कानून उसे ज़िंदा रहते न्याय नहीं देता! अदलतों के चक्कर लगा कर उसकी उम्र बीत जाती है! उसके हाथ कुछ आये ना आये इस दौरान उसका सब कुछ लुटना तय होता है! एसे में उसके पास एक ही उम्मीद बचती है और वो है मीडिया! लेकिन हमारा मीडिया जिस तरह पच्चीस बरस बाद जागता है और ज़मीनी मुद्दों के जगह बिकाऊ मुद्दों की तलाश में रहता है उसे देख कर आम आदमी अब किसी भी ज़्यादती पर न्याय मिलने की उम्मीद छोड चुका है! शायद उसने ये मान लिया है कि अन्याय को सहना ही उसकी नियति है!
लेकिन इस दुर्दशा के लिये मीडिया को दोष देना भी सही नहीं है! नज़दीक जाने पर ही मीडिया की सही तस्वीर उभर कर सामने आती है! मीडिया और इसकी कार्यप्रणाली को करीब से जानने और समझने वाले इस बात को बखूबी जानते हैं कि लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ को कभी भी मजबूत बनाने की कोशिश नहीं की गई! अमेरिका और यूरोप के मीडिया और हिंदुस्तान के मीडिया में ज़मीन आसमान का अंतर है! वहां मीडिया नियमों से संचालित होता है! और सही अर्थों में प्रेस की स्वतंत्रता वहां कायम की गई है! कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन वहां का मीडिया पूरी तरह अनुशासन में रह कर काम करता है! इसलिये जनता की असली आवाज़ उभर कर सामने आती है! वहां जिन मुद्दों पर मीडिया में बहस होती है वो बाद में कानून बनाने में सरकार के मददगार बनते हैं! वहां मेडिया की स्वतंत्रता का अंदाज़ इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां नेताओं की व्यक्तिगत ज़िंदगी पर भी मीडिया की पैनी नज़र होती है! अमेरिका और ब्रिटेन के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की ज़िंदगी एक खुली किताब की तरह होती है! और उसमें मीडिया बेरोकटोक तांका-झांकी करता है! लेडी डयना, बिल क्लिंटन और फ्रांस के राष्ट्रपति स्रकोज़ी जैसी हस्तीयों के चटपटे किस्से इसकी पैरवी करते हैं! लेकिन हमारे देश में कितने नेताओं की निजी ज़िंदगी के बारे में हम जानते हैं! सोनिया गांधी पर आधारित ना होने के बावजूद प्रकाश झा की हालिया फिल्म राजनीति का विरोध होता है! रेड सारो जैसी किताब और इंडियन समर जैसी फिल्मों को रोकने के प्रयास भी यही दर्शाते हैं कि मीडिया की स्वतंत्रता के नाम पर सार्वजनिक जीवन में काम करने वालों की निजी ज़िंदगी में झांकने की अनुमति भारत में नहीं है! यहां सवाल ये भी है कि अंग्रेज़ सरकार की ज़्यादतियों के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने वाला मीडिया आज़ादी के बाद अपनी ही सरकार की कमज़ोरियों को उस बुलंदी के साथ सामने लाने और जनता की परेशानियों को सरकार तक पहंचाने का काम करने में काफी हद तक नाकाम क्यों रहा? भोपाल गैंस कांड के 25 बरसों के बाद सुर्खियों में आने से यही जाहिर होता है कि यदि अदालत का निर्णय नहीं आता तो सरकार की संदिग्ध भूमिका पर मीडिया सवाल भी ना उठाता!
लेकिन यहां बात उस मजदूर तबके की भी करनी होगी जो मीडिया में काम करता है जिसे मीडियकर्मी या पत्रकार के नाम से जाना जाता है! पत्रकारों की दुर्दशा पर सरकार का कोई ध्यान नहीं है! ऎसे में पत्रकार बिकाऊ मजदूर बनने को मजबूर हो गया है! कलम पर अगर भूख हावी हो जाये तो ये लोकतंत्र के लिये अच्छा संकेत नहीं है! लेकिन विडंबना यही है कि आज पत्रकारिता की ये सच्चाई बन चुका है! खबर अब बिकाऊ माल बन चुकी है! मार्केटिंग के नये-नये फंडे इजाद किये जा रहे हैं! मीडिया मेनेजमेंट को कभी गलत समझा जाता था, लेकिन आज इसे कानूनी रुप से पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया है! मीडिया मेनेजमेंट का कोर्स कर निकले एमबीए के छात्र लाखों की नौकरी करते हुए कारपोरेट हितों के लिये मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं! ऎसे में असली पत्रकारिता हाशिये पर चली गई है! मेरे मित्र और वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद प्रवीण की कविता मेँ यही दर्द कुछ इस तरह उभर कर सामने आया है!
हम,
कितने बेचारे हैं ?
लाचार,
थके-हारे...
युद्ध में पराजित सा योद्धा ।
चले थे,
दुनिया को दीया दिखाने,
मगर,
भूल गए थे...
कि, हम वहां खड़े हैं,
तलहटी में,
जहां कभी रौशनी पहुंच ही नहीं सकती ।
अंधेरे ने
ठूंठ बना दिया है,
हमें,
और, हमारी चेतना को...
जो कभी,
दुनिया को छांव देती थी,
पथिकों को आगे का रास्ता दिखाती थी।
फिर भी,
नाउम्मीदों के बीच,
एक उम्मीद बना रखी है,
मानसून का...
झमाझम बारिश का...
दादुरों के शोर का...
कौवों के कांव-कांव का...
मगर,
निर्लज्ज जेठ,
हमारी जिंदगी से,
जाने का नाम ही नहीं लेता,
निगोड़ा बादल,
कभी झलक दिखलाता ही नहीं।
फिर,
कैसे कहूं...
शरद आएगा...
शिशिर आएगा...
और फिर,
आएगा बसंत...
हमारी जिंदगी का ...।
इन दिनों भोपाल गैंस कांड और एंडरसन की चर्चा ज़ोरों पर है! मीडिया में ये मुद्दा इन दिनों छाया हुआ है! मानवता को झकझोर देने वाली इस भीषण औद्योगिक त्रासदी के प्रमुख ज़िम्मेदार एंडरसन को लेकर तात्कालिक सरकार की भूमिका पर सवाल खडे किये जा रहे हैं! लेकिन ये हमारे लिये परेशानी की बात है! परेशानी इसलिये कि आज से पच्चीस बरस पहले अगर मीडिया ने सही भूमिका का निर्वाह किया होता तो शायद आज इस मामले पर दुनिया भर में भारत की जग हसाई ना हो रही होती! कितनी हैरानी की बात है कि 25 साल पहले जो सवाल सरकार से पूछने चाहिये थे वो सवाल 25 बरस के बाद पूछे जा रहे हैं! मीडिया में मुद्दों का पोस्टमार्टम करने की प्रवृत्ति दिनों दिन बढती जा रही है! ये स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिये अच्छा संकेत नहीं है!
हमारे सिस्टम को भ्रष्टाचार का घुन किस कदर खोखला कर चुका है इसकी एक बानगी झारखंड में कोडा सरकार के काले कारनामों और नरेगा जैसी लोक कल्याणकरी योजनाओं में व्यापक धांधलियों से हो जाती है! आटे में नमक के बराबर भ्रष्टाचार पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी के वक्त जब बर्दाश्त के बाहर हो गया तो उन्हें भी ये स्वीकारना पडा कि केन्द्र से चला एक रुपया आम आदमी तक दस पैसे के रुप में ही पहुंच पाता है! लेकिन आज आसमान पर चढ बैठी महंगाई ने आम आदमी के खाने का ज़ायका ही बिगाड दिया है! आटे में भरष्टाचार का ये नमक अब आम आदमी की हड्डियां गला रहा है! उसे समझ नहीं आ रहा कि वो करे तो क्या? क्योंकि उसकी अपनी सरकार को उसकी कोई चिंता नहीं है ! और कानून उसे ज़िंदा रहते न्याय नहीं देता! अदलतों के चक्कर लगा कर उसकी उम्र बीत जाती है! उसके हाथ कुछ आये ना आये इस दौरान उसका सब कुछ लुटना तय होता है! एसे में उसके पास एक ही उम्मीद बचती है और वो है मीडिया! लेकिन हमारा मीडिया जिस तरह पच्चीस बरस बाद जागता है और ज़मीनी मुद्दों के जगह बिकाऊ मुद्दों की तलाश में रहता है उसे देख कर आम आदमी अब किसी भी ज़्यादती पर न्याय मिलने की उम्मीद छोड चुका है! शायद उसने ये मान लिया है कि अन्याय को सहना ही उसकी नियति है!
लेकिन इस दुर्दशा के लिये मीडिया को दोष देना भी सही नहीं है! नज़दीक जाने पर ही मीडिया की सही तस्वीर उभर कर सामने आती है! मीडिया और इसकी कार्यप्रणाली को करीब से जानने और समझने वाले इस बात को बखूबी जानते हैं कि लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ को कभी भी मजबूत बनाने की कोशिश नहीं की गई! अमेरिका और यूरोप के मीडिया और हिंदुस्तान के मीडिया में ज़मीन आसमान का अंतर है! वहां मीडिया नियमों से संचालित होता है! और सही अर्थों में प्रेस की स्वतंत्रता वहां कायम की गई है! कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन वहां का मीडिया पूरी तरह अनुशासन में रह कर काम करता है! इसलिये जनता की असली आवाज़ उभर कर सामने आती है! वहां जिन मुद्दों पर मीडिया में बहस होती है वो बाद में कानून बनाने में सरकार के मददगार बनते हैं! वहां मेडिया की स्वतंत्रता का अंदाज़ इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां नेताओं की व्यक्तिगत ज़िंदगी पर भी मीडिया की पैनी नज़र होती है! अमेरिका और ब्रिटेन के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की ज़िंदगी एक खुली किताब की तरह होती है! और उसमें मीडिया बेरोकटोक तांका-झांकी करता है! लेडी डयना, बिल क्लिंटन और फ्रांस के राष्ट्रपति स्रकोज़ी जैसी हस्तीयों के चटपटे किस्से इसकी पैरवी करते हैं! लेकिन हमारे देश में कितने नेताओं की निजी ज़िंदगी के बारे में हम जानते हैं! सोनिया गांधी पर आधारित ना होने के बावजूद प्रकाश झा की हालिया फिल्म राजनीति का विरोध होता है! रेड सारो जैसी किताब और इंडियन समर जैसी फिल्मों को रोकने के प्रयास भी यही दर्शाते हैं कि मीडिया की स्वतंत्रता के नाम पर सार्वजनिक जीवन में काम करने वालों की निजी ज़िंदगी में झांकने की अनुमति भारत में नहीं है! यहां सवाल ये भी है कि अंग्रेज़ सरकार की ज़्यादतियों के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने वाला मीडिया आज़ादी के बाद अपनी ही सरकार की कमज़ोरियों को उस बुलंदी के साथ सामने लाने और जनता की परेशानियों को सरकार तक पहंचाने का काम करने में काफी हद तक नाकाम क्यों रहा? भोपाल गैंस कांड के 25 बरसों के बाद सुर्खियों में आने से यही जाहिर होता है कि यदि अदालत का निर्णय नहीं आता तो सरकार की संदिग्ध भूमिका पर मीडिया सवाल भी ना उठाता!
लेकिन यहां बात उस मजदूर तबके की भी करनी होगी जो मीडिया में काम करता है जिसे मीडियकर्मी या पत्रकार के नाम से जाना जाता है! पत्रकारों की दुर्दशा पर सरकार का कोई ध्यान नहीं है! ऎसे में पत्रकार बिकाऊ मजदूर बनने को मजबूर हो गया है! कलम पर अगर भूख हावी हो जाये तो ये लोकतंत्र के लिये अच्छा संकेत नहीं है! लेकिन विडंबना यही है कि आज पत्रकारिता की ये सच्चाई बन चुका है! खबर अब बिकाऊ माल बन चुकी है! मार्केटिंग के नये-नये फंडे इजाद किये जा रहे हैं! मीडिया मेनेजमेंट को कभी गलत समझा जाता था, लेकिन आज इसे कानूनी रुप से पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया है! मीडिया मेनेजमेंट का कोर्स कर निकले एमबीए के छात्र लाखों की नौकरी करते हुए कारपोरेट हितों के लिये मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं! ऎसे में असली पत्रकारिता हाशिये पर चली गई है! मेरे मित्र और वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद प्रवीण की कविता मेँ यही दर्द कुछ इस तरह उभर कर सामने आया है!
हम,
कितने बेचारे हैं ?
लाचार,
थके-हारे...
युद्ध में पराजित सा योद्धा ।
चले थे,
दुनिया को दीया दिखाने,
मगर,
भूल गए थे...
कि, हम वहां खड़े हैं,
तलहटी में,
जहां कभी रौशनी पहुंच ही नहीं सकती ।
अंधेरे ने
ठूंठ बना दिया है,
हमें,
और, हमारी चेतना को...
जो कभी,
दुनिया को छांव देती थी,
पथिकों को आगे का रास्ता दिखाती थी।
फिर भी,
नाउम्मीदों के बीच,
एक उम्मीद बना रखी है,
मानसून का...
झमाझम बारिश का...
दादुरों के शोर का...
कौवों के कांव-कांव का...
मगर,
निर्लज्ज जेठ,
हमारी जिंदगी से,
जाने का नाम ही नहीं लेता,
निगोड़ा बादल,
कभी झलक दिखलाता ही नहीं।
फिर,
कैसे कहूं...
शरद आएगा...
शिशिर आएगा...
और फिर,
आएगा बसंत...
हमारी जिंदगी का ...।
Saturday, 12 June 2010
भीख मांगता बचपन: दिल्ली से योगेश गुलाटी
दिल्ली में मेट्रो ने जिधर का रुख किया उधर वैभव और विलासिता के नित नये नज़ारे उभर आये! या यों कहें कि उन्नति की प्रतीक अट्टालिकाओं की शोभा बढाने मेट्रो ट्रेन भी वहां जा पहुंची! पन्द्रह साल पहले तक नोएडा एक सुनसान गांव हुआ करता था! लेकिन आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है! ये गांव अब महानगर में तब्दील हो चुका है! लेकिन खास बात ये है कि महानगर की तमाम खूबियां और खामियां इस गांव ने तेज़ी के साथ ग्रहण कर ली हैं! दिल्ली और नोएडा में काफी समानताएं हैं यहां भी गरीबी और अमीरी के बीच की खाई गहरी है! आसमान छूती इमारतों के सामने बनी झोंपडियां गरीबी और अमीरी के बीच के इस अंतर को बयान करती हैं! ये सब देख अब हैरानी नहीं होती! क्योंकि यही तो भारतीय महानगरीय संस्कृति की विशेषता है! यहां गरीब और अमीर के हक तो समान हैं लेकिन गरीब और अमीर में अंतर ज़मीन आसमान का है! दिल्ली और नोएडा में एक और अंतर भी है! दिल्ली में कामनवेल्थ गेम्स के मद्देनज़र गरीबी हटाओ का पचास सालों से चला आ रहा अभियान इन दिनों गरीब हटाओ का रूप ले चुका है! जबकि नोएडा में ऎसा बिल्कुल नहीं है! वहां सरकार की रुचि ना तो गरीबी हटाने में है ना ही गरीबों को हटाने जैसा कोई कर्म वो कर रही है! दर-असल यहां व्यवस्था गरीब और गरीबी दोनों को ही फलने फूलने का पूरा मौका दे रही है! झोपडी में रहने वाले गरीबों को जब सरकार घर नहीं दे सकी तो भी उसने गरीबों के आराम की पूरी व्यवस्था की और उनके लिये नोएडा में बडा सा पार्क बनवा कर उसमें लाखों रुपयों की बडी-बडी मूर्तियां लगवाईं! ऎसा शायद इसलिये किया गया कि दिल्ली के पार्कों से कामनवेल्थ गेम्स के मद्देनज़र गरीबों को हटाने का अभियान इन दिनों ज़ोरों पर है! शायद इसीलिये सरकार ने गरीबों को अपना गम भुलाने के लिये नोएडा में एक विशाल पार्क की व्यवस्था कर दी है! हालाकि कानूनी पचडों में पडा ये पार्क इन दिनों बंद है! और निर्माण कार्य रुक गया है!
नोएडा में गरीबों के साथ ही भिखारियों की संख्या में भी इन दिनों खासा इजाफा हुआ है! भिखारियों के लिये यहां की आबो-हवा दिल्ली से बेहतर है! दिल्ली की ही तरह यहां भी सडकों पर बच्चे भीख मांगते देखे जा सकते हैं! हालाकि हमारे यहां बाल मजदूरी और बाल भिक्षा-वृत्ति के खिलाफ दशकों पहले कानून बन चुका है! लेकिन कानून के रक्षकों के सामने हज़ारों मासूम बच्चे जिनकी उम्र 3-10 साल के बीच की है दिल्ली की ही तरह अब नोएडा की सडकों पर भीख मांग रहे हैं! इस गैर कानूनी काम को करने के एवज़ में नियत शुल्क इस धंधे के सरगना कानून के रक्षकों को चुकाते हैं! जिसके एवज़ में उन्हें 24 घंटे बच्चों से भीख मंगवाने की छूट मिलती है! ऎसा नहीं है कि सरकार, कोर्ट या कानून को ये सब दिखाई ना दे रहा हो! शिक्षा के अधिकार का कानून बनाने वाली हमारी सरकार को भी सब कुछ पता है! बावजूद इसके वैभव के प्रतीक नोएडा में देश का भविष्य भीख मांग रहा है! ऎसी ही एक नन्ही बच्ची जब नोएडा के सेक्टर 15 मेट्रो स्टेशन की सीढियों पर बैठी देखी तो मैं सोच में पड गया! क्योंकि गरीबी का ज़िंदा भूत भी मैंने ऎसे ही दिल्ली के कनाट प्लेस मेट्रो स्टेशन की सीढियों पर बैठा देखा था! फर्क सिर्फ इतना था कि लोग गरीबी के उस ज़िंदा भूत से कट कर निकल रहे थे! फैशनेबल लोग उसकी काली पड चुकी, कंकाली काया को घृणा से देख रहे थे! लेकिन नोएडा के मेट्रो स्टेशन की सीढियों पर बैठी इस मासूम बच्ची को लोग बेचारगी से देख रहे थे! और अपने हाथ में लिये जर्मन के कटोरे को वो जिसकी तरफ भी बढाती वो ही शख्स उस कटोरे में एक सिक्का डाल देता था! इस तरह उसके कटोरे में सिक्कों का ढेर लगता जा रहा था! मेट्रो की सीढियों से नीचे उतरते वक्त उस बच्ची ने वो कटोरा मेरी तरफ भी बढा दिया! मैंने उसके मासूम चेहरे को देखा फिर मेरी नज़र सामने खडे यूपी पुलिस के सिपाही पर गयी जो तंबाकू चबा कर थूक रहा था! मैं इसकी तुलना दिल्ली पुलिस के उस सिपाही से करने लगा जो गरीबी के उस ज़िंदा भूत को कनाट प्लेस मेट्रो स्टेशन की सीढियों से हटाने के लिये दौड पडा था! लेकिन यूपी पुलिस के इस सिपाही की इस मामले में कोई रुचि नहीं थी! वो तो रेहडी वाले को हडकाने में व्यस्त था! हां मैं भी एक सिक्का उस मासूम के कटोरे में डाल कर उन दानवीरों की तरह एक महादान का पुण्य कमा सकता था! लेकिन मैंने ऎसा नहीं किया ! मैं चुपचाप आगे बढ गया! लेकिन उस नन्ही बच्ची का चेहरा मेरी आंखों से ओझल नहीं हुआ था! इसलिये मैंने मुड कर देखा! वो नन्हा बचपन खेलने और पढने की उम्र में एक और राहगीर के सामने हाथ फैला रहा था! और कानून का रक्षक रेहडी वाले से हफ्ता वसूल रहा था!
नोएडा में गरीबों के साथ ही भिखारियों की संख्या में भी इन दिनों खासा इजाफा हुआ है! भिखारियों के लिये यहां की आबो-हवा दिल्ली से बेहतर है! दिल्ली की ही तरह यहां भी सडकों पर बच्चे भीख मांगते देखे जा सकते हैं! हालाकि हमारे यहां बाल मजदूरी और बाल भिक्षा-वृत्ति के खिलाफ दशकों पहले कानून बन चुका है! लेकिन कानून के रक्षकों के सामने हज़ारों मासूम बच्चे जिनकी उम्र 3-10 साल के बीच की है दिल्ली की ही तरह अब नोएडा की सडकों पर भीख मांग रहे हैं! इस गैर कानूनी काम को करने के एवज़ में नियत शुल्क इस धंधे के सरगना कानून के रक्षकों को चुकाते हैं! जिसके एवज़ में उन्हें 24 घंटे बच्चों से भीख मंगवाने की छूट मिलती है! ऎसा नहीं है कि सरकार, कोर्ट या कानून को ये सब दिखाई ना दे रहा हो! शिक्षा के अधिकार का कानून बनाने वाली हमारी सरकार को भी सब कुछ पता है! बावजूद इसके वैभव के प्रतीक नोएडा में देश का भविष्य भीख मांग रहा है! ऎसी ही एक नन्ही बच्ची जब नोएडा के सेक्टर 15 मेट्रो स्टेशन की सीढियों पर बैठी देखी तो मैं सोच में पड गया! क्योंकि गरीबी का ज़िंदा भूत भी मैंने ऎसे ही दिल्ली के कनाट प्लेस मेट्रो स्टेशन की सीढियों पर बैठा देखा था! फर्क सिर्फ इतना था कि लोग गरीबी के उस ज़िंदा भूत से कट कर निकल रहे थे! फैशनेबल लोग उसकी काली पड चुकी, कंकाली काया को घृणा से देख रहे थे! लेकिन नोएडा के मेट्रो स्टेशन की सीढियों पर बैठी इस मासूम बच्ची को लोग बेचारगी से देख रहे थे! और अपने हाथ में लिये जर्मन के कटोरे को वो जिसकी तरफ भी बढाती वो ही शख्स उस कटोरे में एक सिक्का डाल देता था! इस तरह उसके कटोरे में सिक्कों का ढेर लगता जा रहा था! मेट्रो की सीढियों से नीचे उतरते वक्त उस बच्ची ने वो कटोरा मेरी तरफ भी बढा दिया! मैंने उसके मासूम चेहरे को देखा फिर मेरी नज़र सामने खडे यूपी पुलिस के सिपाही पर गयी जो तंबाकू चबा कर थूक रहा था! मैं इसकी तुलना दिल्ली पुलिस के उस सिपाही से करने लगा जो गरीबी के उस ज़िंदा भूत को कनाट प्लेस मेट्रो स्टेशन की सीढियों से हटाने के लिये दौड पडा था! लेकिन यूपी पुलिस के इस सिपाही की इस मामले में कोई रुचि नहीं थी! वो तो रेहडी वाले को हडकाने में व्यस्त था! हां मैं भी एक सिक्का उस मासूम के कटोरे में डाल कर उन दानवीरों की तरह एक महादान का पुण्य कमा सकता था! लेकिन मैंने ऎसा नहीं किया ! मैं चुपचाप आगे बढ गया! लेकिन उस नन्ही बच्ची का चेहरा मेरी आंखों से ओझल नहीं हुआ था! इसलिये मैंने मुड कर देखा! वो नन्हा बचपन खेलने और पढने की उम्र में एक और राहगीर के सामने हाथ फैला रहा था! और कानून का रक्षक रेहडी वाले से हफ्ता वसूल रहा था!
Friday, 11 June 2010
मेरे मित्र वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद प्रवीण की एक कविता: दिल्ली से योगेश गुलाटी
प्रिय श्री योगेश जी,
मजदूर दिवस का उपहार स्वीकार करें...
हम,
कितने बेचारे हैं ?
लाचार,
थके-हारे...
युद्ध में पराजित सा योद्धा ।
चले थे,
दुनिया को दीया दिखाने,
मगर,
भूल गए थे...
कि, हम वहां खड़े हैं,
तलहटी में,
जहां कभी रौशनी पहुंच ही नहीं सकती ।
अंधेरे ने
ठूंठ बना दिया है,
हमें,
और, हमारी चेतना को...
जो कभी,
दुनिया को छांव देती थी,
पथिकों को आगे का रास्ता दिखाती थी।
फिर भी,
फिर भी,
नाउम्मीदों के बीच,
एक उम्मीद बना रखी है,
मानसून का...
झमाझम बारिश का...
दादुरों के शोर का...
कौवों के कांव-कांव का...
मगर,
निर्लज्ज जेठ,
हमारी जिंदगी से,
जाने का नाम ही नहीं लेता,
निगोड़ा बादल,
कभी झलक दिखलाता ही नहीं।
फिर,
कैसे कहूं...
शरद आएगा...
शिशिर आएगा...
और फिर,
आएगा बसंत...
हमारी जिंदगी का ...।
एक मई, यानी मजदूर दिवस पर, मीडिया के मजदूरों की मज़बूर-गाथा के दो शब्द
मजदूर दिवस का उपहार स्वीकार करें...
हम,
कितने बेचारे हैं ?
लाचार,
थके-हारे...
युद्ध में पराजित सा योद्धा ।
चले थे,
दुनिया को दीया दिखाने,
मगर,
भूल गए थे...
कि, हम वहां खड़े हैं,
तलहटी में,
जहां कभी रौशनी पहुंच ही नहीं सकती ।
अंधेरे ने
ठूंठ बना दिया है,
हमें,
और, हमारी चेतना को...
जो कभी,
दुनिया को छांव देती थी,
पथिकों को आगे का रास्ता दिखाती थी।
फिर भी,
फिर भी,
नाउम्मीदों के बीच,
एक उम्मीद बना रखी है,
मानसून का...
झमाझम बारिश का...
दादुरों के शोर का...
कौवों के कांव-कांव का...
मगर,
निर्लज्ज जेठ,
हमारी जिंदगी से,
जाने का नाम ही नहीं लेता,
निगोड़ा बादल,
कभी झलक दिखलाता ही नहीं।
फिर,
कैसे कहूं...
शरद आएगा...
शिशिर आएगा...
और फिर,
आएगा बसंत...
हमारी जिंदगी का ...।
एक मई, यानी मजदूर दिवस पर, मीडिया के मजदूरों की मज़बूर-गाथा के दो शब्द
Tuesday, 8 June 2010
पूंजीपतियों के दरवाज़े हाथ जोड सरकार खडी है: दिल्ली से योगेश गुलाटी
"उठो तुम्हारे अधिकारों पर सबसे ज़्यादा मार पडी है,
पूंजीपतियों के दरवाज़े हाथ जोड सरकार खडी है,
कौन जायेगा हसते-हसते अब चढने को फांसी पर,
भगत सिंह को पैदा करने वाली भारत मां बीमार पडी है!"
क्या कानून वाकई अंधा होता है? क्या सच में उसे कुछ दिखाई नहीं देता? क्या अब वो गूंगा और बेहरा भी हो गया है? कानून की किताब का पहला पाठ "डिले डिनाय द जस्टिस" हमारे यहां लागू नहीं होता! हम लाख न्यायिक स्वतंत्रता की बात कर लें, अदालतों में एडियां रगड कर यहां लोगों की उम्र बीत जाती है! न्याय की आस दम तोड देती है! पीडित को न्याय अव्वल तो मिलता नहीं है और जब मिलता है तो देर हो चुकी होती है! ऎसे उदाहरणों से हमारी कानून की किताबें भरी पडी हैं जहां न्याय मिलने मे 25 से 50 बरस तक लग गये! जबकि विधी तत्काल न्याय की पैरवी करती है! कुछ मामलों में तो स्थिति आईने की तरह साफ होती है बावजूद इसके हमारे यहां कानून अपनी कछुआ चाल से काम करता है! 25 बरस बाद भोपाल गैंस कांड में आया नतीजा हमारी व्यवस्था के उपर सवाल खडे कर रहा है! इस फैसले ने हमारी व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है!
भोपाल आज भी पच्चीस साल पुरानी वो सुबह याद कर सिहर उठता है! उस भयानक हादसे के घाव भोपाल के सीने में दर्ज हैं! यूनियन कारबाईड इंडिया लिमिटेड के पेस्टिसाइड प्लांट से 1984 में 2 और 3 दिसंबर की दरमियानी रात ज़हरीली मिथाइल आईसोसाइनाइड गैस का रिसाव हुआ था! एक टैंक में 42 टन गैंस थी, जो सैफ्टी नियमों की तय सीमा से ज्यादा थी! टैंक में पानी घुसने से रिएक्शन हो गया ! इससे टैंक का तापमान बढा और गैस बाहर निकलने लगी! इसके बाद तो मानो भोपाल में कयामत आ गई थी! गैंस ने पूरे भोपाल शहर को अपनी चपेट में लेना शुरु कर दिया था! जहां जहां तक कयामत की उस रात को ये गैस पहुंची वहां वहां लाशों के ढेर लग गये! बीस हज़ार से ज़्यादा लोग उस रात की सुबह कभी देख नहीं पाये! लाशों की गिनती करने की ज़हमत भी सरकार ने नहीं उठाई! पांच लाख से ज़्यादा लोगों की ज़िंदगी इस हादसे के बाद मौत से भी बदतर हो गई! उन्हें गंभीर बीमारियां हो गईं! हज़ारों लोग अंधे हो गये! तो अनगिनत विकलांग! लेकिन भोपाल के लिये कयामत का ये सिलसिला वहीं नहीं थमा! क्योंकि इस शहर की आने वाली पीढियां भी इस हादसे के ज़ख्म लेकर विकलांग पैदा हुईं!
लेकिन यहां पीडितों के लिये इंसाफ की बात करना बेमानी सा लगता है! मानवता को हिला कर रख देने वाले इस भयानक हादसे के 25 सालों के बाद अदालत का फैसला आया है वो भी मानवता को उसी तरह झकझोर रहा है! सारी दुनिया इस फैसले के बाद हैरानी भरी निगाहों से भारत को देख रही है! क्योंकि सवाल उस व्यवस्था का है जिस पर हम गर्व करते नही थकते! इस फैसले के साथ ही एक बार फिर ये सवाल खडा हो गया है कि क्या हमारे देश में व्यवस्था पूंजीपतियों के हित में काम कर रही है?
ये सवाल इसलिये भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि ये फैसला सिविल न्यूक्लियर लिएबिलिटी बिल पर जारी बहस के बीच आया है! भोपाल गैंस कांड के लिये अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड की भारतीय इकाई पर पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है! दोषी पाये गये कंपनी के सात अफसरों को अधिकतम दो-दो साल जेल की सज़ा मिली है और हर एक पर महज़ एक लाख का जुर्माना लगाया गया है! हैरानी की बात ये है कि अमेरिका में यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन के चेयरमेन वारेन एंडरसन के बारे में कोर्ट ने कुछ नहीं कहा! इस मामले में 4 दिसंबर 1984 को जो नौ लोग गिरफ्तार किये गये थे उसमें एंडरसन भी था! लेकिन उसे 2000 डालर के मुचलके पर जमानत पर छोड दिया गया था! कानून मंत्री वीरप्पा मोईली भी मानते हैं कि इस मामले में ना केवल न्याय को दफना दिया गया है! लेकिन सवाल ये है कि इसके लिये ज़िम्मेदार कौन है?
क्या हमारी सरकार भी ये स्वीकार कर रही है कि हमारा तंत्र पूंजीपतियों के हित में काम कर रहा है? इस हादसे के लिये प्रमुख ज़िम्मेदार वारेन एंड्रसन 90 साल का हो चुका है! उसके प्रत्यर्पण की तमाम कोशिशें नाकाम रही हैं! और बाकी अभियुक्त जिन्हें दोषी पाया गया है वो भी हादसे के 25 सालों के बाद अपना पूरा जीवन जी चुके हैं! लेकिन हादसे के शिकार उन मासूमों का क्या जिन्हें ज़िंदगी शुरुआत से पहले ही ज़िंदगी से बेदखल कर दिया गया!
इस मामले ने हमारे पूरे सिस्टम को बेनकब कर दिया है! भोपाल गैंस कांड को लेकर सरकार और उसकी एजेंसीयों ने जिस तरह से काम किया है, उससे ये साफ हो जाता है कि हमारी व्यवस्था पूंजीपतियों के सामने नतमस्तक नज़र आती है! और उन्हीं के हितों के लिये काम करती है! इसमें समाज के कमज़ोर तबकों के लिये कोई जगह नहीं है! कारोबार के लिये आई विदेशी कंपनीयों के लिये हम इतने उदार हो जाते हैं कि उनकी हर ज़्यादती को अनदेखा कर देते हैं! और उनपर कार्रवाई की बात करने पर हमारी सरकार के हाथ-पांव फूलने लगते हैं! अगर हमारी सरकार ने शुरु से मुस्तैदी दिखाई होती तो आज दुनिया भर में हमारी जग हसाई ना हो रही होती!
इससे दुनिया को ये संदेश गया है कि भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर कितना लापरवाह देश है! और वहां नागरिकों की जान की कोई कीमत नहीं! ये बात आतंकवाद के खिलाफ हमारी खोखली लडाई से भी साबित होती है! क्योंकि लगातार होते आतंकी हमलों के बीच ना तो हम अपने ही देश में पनप रहे आतंक के नेटवर्क का सफाया कर सके हैं ना ही नक्सलवाद को समाप्त कर सके हैं! खोखली व्यवस्था को साथ लेकर हम एक मजबूत राष्ट्र होने का सपना कभी साकार नहीं कर सकते! इस मामले में भी व्यवस्था का खोखलापन मामले के अभियुक्त एंडरसन को भारत लाने में नाकाम रहा! हमारी सरकार पीडितों के लिये मुआवज़ा मांगने अमेरिकी अदालत तो गई, लेकिन समझौता अदालत से बाहर ही कर आई! यूनियन कार्बाइड केवल 47 लाख डालर देने को राज़ी हुई और सरकार ने बेजिझक उसे मान भी लिया! हादसे के बाद भी सरकार ने इससे कोई सबक नहीं सीखा! हमारी इसी कमज़ोरी का फायदा उठाकर कईं विदेशी कंपनियों ने भारत को डंपिंग ग्राउंड बना डाला है! वो दुनिया भर में नकार दी गई वस्तुएं भारत के बाज़ारों में धडल्ले से बेच रही हैं! अपने नागरिकों की जान-माल की परवाह ना करने वाली व्यवस्था कभी भी ज़िम्मेदार नहीं हो सकती! ज़रूरत है ऎसी गैर ज़िम्मेदार व्यवस्था को बदल दिया जाये जो पूंजीपतियों के सम्मुख नतमस्तक हो जाती हो! जो व्यवस्था 125 करोड की आबादी को सारी दुनिया के सामने शर्मिंदा कर दे ऎसी व्यवस्था किस काम की?
पूंजीपतियों के दरवाज़े हाथ जोड सरकार खडी है,
कौन जायेगा हसते-हसते अब चढने को फांसी पर,
भगत सिंह को पैदा करने वाली भारत मां बीमार पडी है!"
क्या कानून वाकई अंधा होता है? क्या सच में उसे कुछ दिखाई नहीं देता? क्या अब वो गूंगा और बेहरा भी हो गया है? कानून की किताब का पहला पाठ "डिले डिनाय द जस्टिस" हमारे यहां लागू नहीं होता! हम लाख न्यायिक स्वतंत्रता की बात कर लें, अदालतों में एडियां रगड कर यहां लोगों की उम्र बीत जाती है! न्याय की आस दम तोड देती है! पीडित को न्याय अव्वल तो मिलता नहीं है और जब मिलता है तो देर हो चुकी होती है! ऎसे उदाहरणों से हमारी कानून की किताबें भरी पडी हैं जहां न्याय मिलने मे 25 से 50 बरस तक लग गये! जबकि विधी तत्काल न्याय की पैरवी करती है! कुछ मामलों में तो स्थिति आईने की तरह साफ होती है बावजूद इसके हमारे यहां कानून अपनी कछुआ चाल से काम करता है! 25 बरस बाद भोपाल गैंस कांड में आया नतीजा हमारी व्यवस्था के उपर सवाल खडे कर रहा है! इस फैसले ने हमारी व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है!
भोपाल आज भी पच्चीस साल पुरानी वो सुबह याद कर सिहर उठता है! उस भयानक हादसे के घाव भोपाल के सीने में दर्ज हैं! यूनियन कारबाईड इंडिया लिमिटेड के पेस्टिसाइड प्लांट से 1984 में 2 और 3 दिसंबर की दरमियानी रात ज़हरीली मिथाइल आईसोसाइनाइड गैस का रिसाव हुआ था! एक टैंक में 42 टन गैंस थी, जो सैफ्टी नियमों की तय सीमा से ज्यादा थी! टैंक में पानी घुसने से रिएक्शन हो गया ! इससे टैंक का तापमान बढा और गैस बाहर निकलने लगी! इसके बाद तो मानो भोपाल में कयामत आ गई थी! गैंस ने पूरे भोपाल शहर को अपनी चपेट में लेना शुरु कर दिया था! जहां जहां तक कयामत की उस रात को ये गैस पहुंची वहां वहां लाशों के ढेर लग गये! बीस हज़ार से ज़्यादा लोग उस रात की सुबह कभी देख नहीं पाये! लाशों की गिनती करने की ज़हमत भी सरकार ने नहीं उठाई! पांच लाख से ज़्यादा लोगों की ज़िंदगी इस हादसे के बाद मौत से भी बदतर हो गई! उन्हें गंभीर बीमारियां हो गईं! हज़ारों लोग अंधे हो गये! तो अनगिनत विकलांग! लेकिन भोपाल के लिये कयामत का ये सिलसिला वहीं नहीं थमा! क्योंकि इस शहर की आने वाली पीढियां भी इस हादसे के ज़ख्म लेकर विकलांग पैदा हुईं!
लेकिन यहां पीडितों के लिये इंसाफ की बात करना बेमानी सा लगता है! मानवता को हिला कर रख देने वाले इस भयानक हादसे के 25 सालों के बाद अदालत का फैसला आया है वो भी मानवता को उसी तरह झकझोर रहा है! सारी दुनिया इस फैसले के बाद हैरानी भरी निगाहों से भारत को देख रही है! क्योंकि सवाल उस व्यवस्था का है जिस पर हम गर्व करते नही थकते! इस फैसले के साथ ही एक बार फिर ये सवाल खडा हो गया है कि क्या हमारे देश में व्यवस्था पूंजीपतियों के हित में काम कर रही है?
ये सवाल इसलिये भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि ये फैसला सिविल न्यूक्लियर लिएबिलिटी बिल पर जारी बहस के बीच आया है! भोपाल गैंस कांड के लिये अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड की भारतीय इकाई पर पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है! दोषी पाये गये कंपनी के सात अफसरों को अधिकतम दो-दो साल जेल की सज़ा मिली है और हर एक पर महज़ एक लाख का जुर्माना लगाया गया है! हैरानी की बात ये है कि अमेरिका में यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन के चेयरमेन वारेन एंडरसन के बारे में कोर्ट ने कुछ नहीं कहा! इस मामले में 4 दिसंबर 1984 को जो नौ लोग गिरफ्तार किये गये थे उसमें एंडरसन भी था! लेकिन उसे 2000 डालर के मुचलके पर जमानत पर छोड दिया गया था! कानून मंत्री वीरप्पा मोईली भी मानते हैं कि इस मामले में ना केवल न्याय को दफना दिया गया है! लेकिन सवाल ये है कि इसके लिये ज़िम्मेदार कौन है?
क्या हमारी सरकार भी ये स्वीकार कर रही है कि हमारा तंत्र पूंजीपतियों के हित में काम कर रहा है? इस हादसे के लिये प्रमुख ज़िम्मेदार वारेन एंड्रसन 90 साल का हो चुका है! उसके प्रत्यर्पण की तमाम कोशिशें नाकाम रही हैं! और बाकी अभियुक्त जिन्हें दोषी पाया गया है वो भी हादसे के 25 सालों के बाद अपना पूरा जीवन जी चुके हैं! लेकिन हादसे के शिकार उन मासूमों का क्या जिन्हें ज़िंदगी शुरुआत से पहले ही ज़िंदगी से बेदखल कर दिया गया!
इस मामले ने हमारे पूरे सिस्टम को बेनकब कर दिया है! भोपाल गैंस कांड को लेकर सरकार और उसकी एजेंसीयों ने जिस तरह से काम किया है, उससे ये साफ हो जाता है कि हमारी व्यवस्था पूंजीपतियों के सामने नतमस्तक नज़र आती है! और उन्हीं के हितों के लिये काम करती है! इसमें समाज के कमज़ोर तबकों के लिये कोई जगह नहीं है! कारोबार के लिये आई विदेशी कंपनीयों के लिये हम इतने उदार हो जाते हैं कि उनकी हर ज़्यादती को अनदेखा कर देते हैं! और उनपर कार्रवाई की बात करने पर हमारी सरकार के हाथ-पांव फूलने लगते हैं! अगर हमारी सरकार ने शुरु से मुस्तैदी दिखाई होती तो आज दुनिया भर में हमारी जग हसाई ना हो रही होती!
इससे दुनिया को ये संदेश गया है कि भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर कितना लापरवाह देश है! और वहां नागरिकों की जान की कोई कीमत नहीं! ये बात आतंकवाद के खिलाफ हमारी खोखली लडाई से भी साबित होती है! क्योंकि लगातार होते आतंकी हमलों के बीच ना तो हम अपने ही देश में पनप रहे आतंक के नेटवर्क का सफाया कर सके हैं ना ही नक्सलवाद को समाप्त कर सके हैं! खोखली व्यवस्था को साथ लेकर हम एक मजबूत राष्ट्र होने का सपना कभी साकार नहीं कर सकते! इस मामले में भी व्यवस्था का खोखलापन मामले के अभियुक्त एंडरसन को भारत लाने में नाकाम रहा! हमारी सरकार पीडितों के लिये मुआवज़ा मांगने अमेरिकी अदालत तो गई, लेकिन समझौता अदालत से बाहर ही कर आई! यूनियन कार्बाइड केवल 47 लाख डालर देने को राज़ी हुई और सरकार ने बेजिझक उसे मान भी लिया! हादसे के बाद भी सरकार ने इससे कोई सबक नहीं सीखा! हमारी इसी कमज़ोरी का फायदा उठाकर कईं विदेशी कंपनियों ने भारत को डंपिंग ग्राउंड बना डाला है! वो दुनिया भर में नकार दी गई वस्तुएं भारत के बाज़ारों में धडल्ले से बेच रही हैं! अपने नागरिकों की जान-माल की परवाह ना करने वाली व्यवस्था कभी भी ज़िम्मेदार नहीं हो सकती! ज़रूरत है ऎसी गैर ज़िम्मेदार व्यवस्था को बदल दिया जाये जो पूंजीपतियों के सम्मुख नतमस्तक हो जाती हो! जो व्यवस्था 125 करोड की आबादी को सारी दुनिया के सामने शर्मिंदा कर दे ऎसी व्यवस्था किस काम की?
Saturday, 5 June 2010
ये लडकियां फोन पर क्या बतियाती हैं?(व्यंग्य): दिल्ली से योगेश गुलाटी
फोन पर ज्यादा बातें करना तो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है जी! लेकिन फोन पर लंबी बातें करते हुए लोगों को देख कर मैं अकसर ये सोचता हूं कि ये लोग इतनी देर तक क्या बात करते होंगे? विशेषकर दिल्ली की लडकियां तो फोन पर घंटों बातें करती हुई देखी जाती हैं! उन्हें देखकर मेरे मन में अकसर चंद सवाल आते हैं, पहला तो ये कि उनका फोन किस कंपनी का है? क्योंकि घंटों बात करने पर जिसकी बेटरी खत्म ही ना होती हो ये तो कमाल है ना! ये तो वो ही बात हुई क्या करूं खतम ही नहीं होता! मेरे कंबख्त फोन की बैटरी तो हर रोज़ चार्ज करनी पडती है जबकि मैं बमुश्किल दिन में दस मिनट ही फोन का इस्तेमाल करता हूं! दूसरा सवाल जो मेंरे ज़हन में आता है वो ये कि इनके पास कौन सी टेलीकाम कंपनी का कनेक्शन है? जो घंटों निर्बाध बातें करने की सुविधा प्रदान करता है! जबकि मेरा कंबख्त आईडिया का कनेक्शन तो बस....पूछिये मत सर जी! मजाल है कि दस मिनिट भी चैन से बात करने दे किसी से! दस मिनिट में दो तीन बार डिस कनेक्ट ना हो तो क्या आईडिया सर जी?
और दिल्ली मेट्रो में तो अकसर लडकियां फोन पर बात करते हुए ही सफर काटती हैं! ( बिन मांगे सजेशन देने की तो मुझे आदत है नहीं पर बात निकली है तो बता देता हूं, बात ही करनी है तो अपने आजू-बाजू बैठे लोगों से ही बात कर लो, काहे को फोन का बिल बढाते हो?) और वैसे भी सुना है मोबाईल पर ज़्यादा देर तक बात करने से त्वचा काली पडने लगती है! सच तुम्हारी कसम ! अमेरिका में हुई ताज़ा रिसर्च में ये बात सामने आई है! लेकिन ये रिसर्च की बात बीच में कहां से आ गई!
आप भी ना मुझे मुद्दे से भटका देते हो! हां तो हम बात कर रहे थे मोबाईल फोन के इस्तेमाल की! भई हमारी प्राब्लम ये है कि मेट्रो में अव्वल तो हम आजू-बाजू बैठे लोगों से ही बात करके अपना टाईम पास कर लेते हैं! क्या फायदा बेफज़ूल फोन पर किसी का दिमाग चाटने का? और फिर हमें अपनी त्वचा की भी चिंता रहती है! वैसे भी कहावत है ना कि त्वचा से ही उम्र का पता चलता है! क्या कहा ऎसी कोई कहावत नहीं है! आप भी बस... बहस करने लगते हैं! अरे अगर ऎसी कोई कहावत नहीं भी है तो मान लेने में आपका कौन सा खर्चा हो जायेगा? भई ऎसे ही तो नई कहावतें बनती हैं! हम तो आपको एक नई कहावत बनाने का क्रेडिट दे रहे थे! अब आपको नहीं चाहिये तो आपकी मर्ज़ी!
आप सोच रहे होंगे आजू बाजू ट्रेन में सफर कर रहे लोगों से हम क्या बात करते होंगें? लो भाई ये तो अंडर्स्टेंडिंग की बात है! भाई साहब या " ......." टाईम क्या हुआ है, बस यहीं से बात शुरु हो जाती है! अब अपने इंडिया में भले ही आपको लाख वक्त की कोई परवाह ना हो, और नीरे निठल्ले हों लेकिन किसी से बात करनी हो तो वक्त पूछने की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है! और हम भी उसी परंपरा का पालन करके बातचीत शुरु किये देते हैं! अब सामने वाला बंदा आपको हसकर टाईम बताएगा ही तो इसके बाद पोलिटिक्स या करप्शन का टापिक छेड दो! या फिर कोई ताज़ा रिलीज़ फिल्म की बात कर्ने लगो! और अगर कोई क्रिकेट मैच चल रहा हो तो उसी के स्कोर पर बातचीत कर लो! इंडियन टीम अच्छा कर रही हो तो तारीफ नहीं तो जम कर कोसो धोनी को! भाई, राजनीति क्रिकेट और फिल्म तो इंडिया में एवरग्रीन देवानंद की तरह हैं! कोई भी इंडियन इन पर अपनी फोकटिया राय देने से खुद को रोक नहीं सकता है!
इस तरह हम जब भी मेट्रो ट्रेन में सफर करते हैं एक ग्रुप डिस्कशन सा माहौल बन जाता है! और बाकी सबको अपने हिंदुस्तानी होने का एहसास होने लगता है! कईं बार तो ऎसा भी होता है कि कुछ यात्री इस ग्रुप डिसकशन में ही इस कदर खो जाते हैं कि अपने जिस स्टेशन पर उन्हें उतरना होता है उसके निकल जाने के बाद उन्हें खयाल आता है कि वो स्टेशन तो निकल चुका! लेकिन हम तो निश्चिंत रहते हैं! हमारे पास मेट्रो का स्मार्ट कार्ड जो है! और हमें खुशी इस बात पर होती है कि हमारे स्टेशन पर उतरने की मजबूरी के बाद भी भाई लोग ग्रुप डिस्कशन जारी रखते हैं और पोलिटिक्स, फिल्म और क्रिकेट जैसे टीआरपी वाले विषयों की वजह से इस डिस्कशन में नये यात्री जुडते रहते हैं और ये क्रम यूं ही बना रहता है! तो है ना ये टाईम पास का अच्छा विकल्प!
वैसे पहले जब हमें ये आईडिया नहीं सूझा था तब हम टाईम पास के लिये अखबार का इस्तेमाल किया करते थे! लेकिन ये इंडिया है भईया! यहां हर कोई मुफ्त का माल बांचना चाहता है! हम जब भी ट्रेन में अखबार खोलते....सीनियर सिटिजन की सीट पर बैठे अंकल हमसे पोलिटिक्स वाला पन्ना मांग लेते! अब तीन रुपये का अखबार मना भी नहीं कर सकते! लेकिन बात यहीं तक रहती तो ठीक था, लेकिन बाजू में बैठी आंटी फिल्म और फैशन वाला पन्ना मांग लेती! और हम मुस्कुरा कर दे देते! इतने दानवीर बनने पर भी हम एक भी खबर पर कंसंट्रेट नहीं कर पाते! क्योंकि हम ये देखते कि जिस खबर को हम पढ रहे हैं सामने खडे दो लोगों की नज़र भी उसी खबर पर टिकी है! हम पन्ना पलट कर दूसरी खबर पर जाते तो वो साहब बहादुर वहां भी अपनी नज़र गडा लेते! इससे हमें एक चीज़ का एहसास तो हो गया कि नज़र भी कितना इरीटेट कर सकती है! इसलिये अब हमनें मेट्रो ट्रेन में टाईम पास के लिये अखबार पढने से तौबा कर ली है! और ग्रुप डिस्कशन का नया तरीका इजाद किया है!
वैसे टाईम पास की बात पर मुझे एक पुराना कस्सा याद आ गया! इससे आपको एक काम की नसीहत मिल सकती है वो भी मुफ्त में! एक बार एक लडकी के साथ चल रही हमारी लंबी वार्ता के दौरान किसी दुष्ट महापुरुष के टोकने पर हमने कह दिया कि बस यूं ही टाईम पास कर रहे हैं! हमारा इतना कहना था कि अप्रत्याशित रूप से वो लडकी छिड माफ कीजियेगा चिढ गई! उसने कहा क्या मैं टाईम पास करने की चीज़ हूं? अब हम क्या जवाब देते इस सवाल का! हमें क्या पता? इसलिये भुक्त्भोगियों से शिक्षा लो और ये मुफ्त की सलाह अपनी गांठ बांध लो कि किसी भी लडकी से कभी भूल कर भी ना कहो कि आप टाईम पास कर रहे थे उसके साथ ! भई लडकियों को टाईम पास करने वाले फाल्तू टाईप के लडके बिल्कुल भी पसंद नहीं आते! उन्हें तो वो लडके पसंद आते हैं जो वक्त की कीमत समझते हों!
उफ्फ..........ये मैं क्या बात करने लगा! आपने मुझे फिर विषय से भटका दिया! हम बात कर रहे थे मोबाईल फोन की और बात जा पहुंची टाईमपास पर! वक्त की कीमत समझेंगे तभी ज़िंदगी की रेस में जीत पायेंगे! देखा नहीं दुनिया कितनी तेज़ी से आगे बढ रही है! दुनिया के पास वक्त ही नहीं और आप हैं कि टाईम पास के उपाय खोजने में लगे हैं! कितने फालतू हैं आप! लेकिन हम वक्त की कीमत जानता हूं इसीलिये तो शोर्ट में अपनी बात कहने की कब से कोशिश कर रहा हूं! हां तो हम बात कर रहे थे मोबाईल फोन की!
अव्वल तो मैं मेट्रो ट्रेन में मोबाईल का इस्तेमाल नहीं करता! लेकिन कभी कोई अर्जेंट फोन आ जाये उस दौरान, तो चलती ट्रेन में मेंरा फोन फटाक से डिसकनेक्ट हो जाता है नेटवर्क ना मिलने की वजह से! जबकि इन लडकियों को उस वक्त भी आराम से अपने मोबाईल पर बातें करते देखा जा सकता है जब ट्रेन सुरंग में होती है! सुरंग में भी उनको टावर मिल जाता है, ये मिस्ट्री अपुन को समझ नहीं आई! तो हमने एक लडकी से पूछ ही लिया, एक्सक्यूज़ मी प्लीज़! फोन पर बात करती हुई वो काल को होल्ड पर रख कर बोली येस! मैंने कहा एक छोटा सा सवाल आपसे पूछना था अगर आप बुरा ना मानें तो...! हां हां पूछो-पूछो उसने उत्साह से कहा! आपका मोबाईल....मेरा इतना कहना था कि वो बोल पडी नोट करो,- 9827828.....नहीं-नहीं मैं आपका मोबाईल नंबर नहीं पूछ रहा! तो...? उसके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा मानो मैंने उसका बडा अपमान कर दिया हो! मैं तो ये जानना चाहता हूं कि आपका मोबाईल किस कंपनी का है! उसने कहा नोकिया! बडा अच्छा मोबाईल है जी आपका! इतनी देर से आप बात किये जा रही हैं फिर भी इसकी बैटरी खत्म ही नहीं होती! अब मैने जल्दी से दूसरा सवाल दाग दिया! और इसमें कनेक्शन कौन सी कंपनी का है? आईडिया का! ये सुनकर मेरा पारा चढ गया! क्योंकि इससे कंपनी का दोहरा चरित्र उजागर हो गया था! उसी कंपनी की सिम में मुझे खुले मैंदान में और सूरज की रोशनी में भी सिग्नल नहीं मिलते! और लडकियों को सुरंग के अंधेरे में भी वो सिग्नल प्रवाईड कर रही थी! हमने भी ठान लिया कि आज ही बदल डालेंगे अपनी सिम और ले लेंगे किसी ऎसी कंपनी की सिम जो लिंग भेद ना करती हो!
मेरा आखिरी सवाल, अब वो मेरी तरफ ऎसे देखने लगी जैसे मैं उसके घर का एड्रेस पूछने वाला हूं! मैं थोडा रुका और सोचने लगा वैसे भी अब एड्रेस पूछने या फोन पर इतना लंबा कैसे बतिया लेती हैं जैसे फालतू सवालों के सिवाय कोई सवाल बचता नहीं है! और दोनों ही सवाल पूछने में उसके छिड माफ कीजियेगा चिढ जाने की संभावना थी! हालाकि लडकियां फोन पर इतना लंबा क्या बतियाती हैं ये जानने की जिग्यासा शांत नहीं हुई थी! दरसल ये जिग्यासा उस वक्त और बढ गई थी जब हमने अपने पडोस की एक लडकी को, उसके घर की छत पर, अपने घर की छत से, रात्री के दूसरे पहर फोन पर, पूरा एक घंटा बतियाते देखा था! और उसकी ये बातचीत भी इसलिये खत्म हुई थी क्योंकि उसके फोन की बैटरी खत्म हो गई थी! लेकिन अभी उसे और बात करना बाकी था इसलिये उसने बेझिझक हमसे हमारा फोन मांग लिया! उस रात हमारी ये जिग्यासा तो खत्म नहीं हुई हां फोन की बैटरी और प्रीपेड बैलेंस ज़रूर खत्म हो गया था!
वो मुझे अभी भी घूर रही थी! किसी खबरिया चैनल में काम करते हो क्या? उसने कहा! " इसे कैसे पता चल गया"? मैंने मन ही मन सोचा! एक और जिग्यासा जाग उठी! मुझे भरी ट्रेन में बेईज़्ज़ती खराब होने का खतरा लेना सही नहीं जान पडा! इसलिये मैंने आगे के सवाल विड्रा करते हुए कहा,-" इस जानकारी के लिये आपका शुक्रिया!" वो फिर फोन पर बिज़ी हो गई थी! अब ये जानने की उत्सुकता तो थी कि ये लडकियां इतनी देर फोन पर बात क्या करती हैं? इसलिए अगली बार हमनें इनकी बातचीत पर कान देने की ठानी! और जो बातें हमने सुनी तो हम दंग रह गये! लेकिन वो सब अगली पोस्ट में! तब तक इस मुद्दे पर कुछ और रिसर्च भी हो जायेगी!
एक छत्तीसगढिया का दर्द: दिल्ली से योगेश गुलाटी
कभी कभी हैरानी होती है कि कुछ लोग अपने निहित स्वार्थों के लिये कैसे आतंकवाद और नक्सलवाद जैसी विनाशकारी विचारधाराओं का समर्थन कर सकते हैं! वो कैसे निर्दोषों और मासूमों की हत्याओं को सही ठहरा सकते हैं? अरुंधति राय से मेरी मुलाकात इंदौर में हुई थी जब वो नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटाकर के साथ विदेशीयों का हुजूम लेकर इंदौर की सडकों पर प्रदर्शन कर रही थीं! उस वक्त मैंने उनसे पूछा था कि आदिवासियों के हित की लडाई में आपने इतने विदेशियों को साथ क्यों लाई हैं? उस वक्त उन्होंने कहा था, "ये विरोध का गांधीवादी तरीका है और मैं इसकी समर्थक हूं!"
उस वक्त गांधीवाद की समर्थक रही मशहूर लेखिका अरुंधति अब नक्सलवाद की समर्थक हो गई हैं! उनका कहना है कि विरोध का गांधीवादी तरीका बहुत पुराना पड चुका है! बकौल अरुंधति "इसके लिये दर्शकों की ज़रूरत होती है जो आदिवासी इलाकों में नहीं मिलते!" उनका कहना है कि अगर मुझे जेल भी भेज दिया जाये तब भी मैं माओवादियों के सशस्त्र संघर्ष का समर्थन करती रहूंगी! एक विद्वान समझी जाने वाली लेखिका अचानक ही सशस्त्र संघर्ष की बात करने लगे तो इसमें कोई गहरा रहस्य तो ज़रूर होगा, जिसे समझने की ज़रूरत है! अरुंधति के इस बयान पर कोई बवाल नहीं मचा है! शायद ये पहली बार है कि देश दुनिया में सम्मानित कही जाने वाली किसी हस्ति ने नक्सलवाद का इस तरह खुल कर समर्थन किया है! हमारे लिये खतरे की घंटी बज चुकी है! क्योंकि कल को विद्वानों की ही किसी जमात से उठ कर कोई महापुरुष आतंकवाद का भी समर्थन कर सकता है! अरुंधति वाकई में विदुषी महिला हैं शायद इसीलिये मासूमों के लहू से होली खेलने का वो समर्थन कर रही हैं! इसलिये अब उनकी विद्वता पर चर्चा का कोई औचित्य नहीं रह जाता! लेकिन ये साफ है कि आदिवासियों की असली आवाज़ को दबा कर और उनके हितचिंतक बनने का स्वांग रचकर कुछ लोग अपने स्वार्थ सिध्द करने में लगे हैं! सवाल ये है कि इन नक्सल प्रभावित इलाकों के निवासियों का दर्द क्या है? यहां मैं एक छत्तीसगढिया का दर्द उसी के शब्दों में बयां करना चाहता हूं,
"मैं ज्यादा दूर की बात नहीं करता। छत्तीसगढ़ प्रदेश का बेटा हूं, इसी की बात करता हूं। यह सच है कि प्रदेश में नक्सली समस्या मुंह बांये खड़ी है, हर रोज कत्लेआम, कोहराम व दहशत का आलम बना हुआ है। नक्सली कहर बरपा रहे हैं, गृहमंत्री अब केन्द्र से सेना भेजेंगे और नक्सलियों का खात्मा होगा। लेकिन जब से मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ विभाजन हुआ है केन्द्र से प्रदेश के विकास के लिए करोड़ों की योजनाओं का क्रियान्वयन किया गया, लेकिन यह चिंतनीय विषय है कि क्या सच में छत्तीसगढ़िया का विकास हुआ है। आज भी छत्तीसगढ़िया अपनी उपेक्षा, शोषण, सरकारी दमनकारी नीति के बोझ तले दबे होने का दंश झेल रहा है। दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज है। यह भी प्रदेश का दुर्भाग्य ही है कि एक भी ऐसा समाचार पत्र नहीं है जो छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रकाशित होता हो। विभाजन के बाद लाखों की संख्या में सरकारी अधिकारी-कर्मचारी शरणार्थियों व खानाबदोशों की तरह जीवन यापन कर रहे हैं। सरहदों के परिवर्तन के साथ ही उनकी जाति का भी परिवर्तन हो गया और वे अनुसूचित जाति से ओबीसी, ओबीसी से अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जनजाति से सामान्य के दर्जे में शामिल हो गए हैं। उन्हें प्रदेश में किसी भी प्रकार का लाभ नहीं मिल पा रहा है। भ्रष्टाचारियों को प्रोत्साहन और ईमानदारों को सजा देना यहां की सरकारों की नीयति बन गयी है। सरकार की विकासकारी नीतियों का लाभ उन्हें ही मिल पा रहा है जो आर्थिक रूप संपन्न हैं और बाहरी मुल्कों से आकर छत्तीसगढ़ में अपना एकाधिपत्य स्थापित कर चुके हैं, पर छत्तीसगढ़िया अभी भी अपनी उपेक्षा का दंश झेल रहा है।" राम मालवीय, रायपुर"
ऎसे में अगर नक्सली इन्हें बहकाने में कामयाब हो जायें और कोई ख्यातिमान लेखिका इस आग में अपनी रोटियां सेकने लगे तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये!
उस वक्त गांधीवाद की समर्थक रही मशहूर लेखिका अरुंधति अब नक्सलवाद की समर्थक हो गई हैं! उनका कहना है कि विरोध का गांधीवादी तरीका बहुत पुराना पड चुका है! बकौल अरुंधति "इसके लिये दर्शकों की ज़रूरत होती है जो आदिवासी इलाकों में नहीं मिलते!" उनका कहना है कि अगर मुझे जेल भी भेज दिया जाये तब भी मैं माओवादियों के सशस्त्र संघर्ष का समर्थन करती रहूंगी! एक विद्वान समझी जाने वाली लेखिका अचानक ही सशस्त्र संघर्ष की बात करने लगे तो इसमें कोई गहरा रहस्य तो ज़रूर होगा, जिसे समझने की ज़रूरत है! अरुंधति के इस बयान पर कोई बवाल नहीं मचा है! शायद ये पहली बार है कि देश दुनिया में सम्मानित कही जाने वाली किसी हस्ति ने नक्सलवाद का इस तरह खुल कर समर्थन किया है! हमारे लिये खतरे की घंटी बज चुकी है! क्योंकि कल को विद्वानों की ही किसी जमात से उठ कर कोई महापुरुष आतंकवाद का भी समर्थन कर सकता है! अरुंधति वाकई में विदुषी महिला हैं शायद इसीलिये मासूमों के लहू से होली खेलने का वो समर्थन कर रही हैं! इसलिये अब उनकी विद्वता पर चर्चा का कोई औचित्य नहीं रह जाता! लेकिन ये साफ है कि आदिवासियों की असली आवाज़ को दबा कर और उनके हितचिंतक बनने का स्वांग रचकर कुछ लोग अपने स्वार्थ सिध्द करने में लगे हैं! सवाल ये है कि इन नक्सल प्रभावित इलाकों के निवासियों का दर्द क्या है? यहां मैं एक छत्तीसगढिया का दर्द उसी के शब्दों में बयां करना चाहता हूं,
"मैं ज्यादा दूर की बात नहीं करता। छत्तीसगढ़ प्रदेश का बेटा हूं, इसी की बात करता हूं। यह सच है कि प्रदेश में नक्सली समस्या मुंह बांये खड़ी है, हर रोज कत्लेआम, कोहराम व दहशत का आलम बना हुआ है। नक्सली कहर बरपा रहे हैं, गृहमंत्री अब केन्द्र से सेना भेजेंगे और नक्सलियों का खात्मा होगा। लेकिन जब से मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ विभाजन हुआ है केन्द्र से प्रदेश के विकास के लिए करोड़ों की योजनाओं का क्रियान्वयन किया गया, लेकिन यह चिंतनीय विषय है कि क्या सच में छत्तीसगढ़िया का विकास हुआ है। आज भी छत्तीसगढ़िया अपनी उपेक्षा, शोषण, सरकारी दमनकारी नीति के बोझ तले दबे होने का दंश झेल रहा है। दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज है। यह भी प्रदेश का दुर्भाग्य ही है कि एक भी ऐसा समाचार पत्र नहीं है जो छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रकाशित होता हो। विभाजन के बाद लाखों की संख्या में सरकारी अधिकारी-कर्मचारी शरणार्थियों व खानाबदोशों की तरह जीवन यापन कर रहे हैं। सरहदों के परिवर्तन के साथ ही उनकी जाति का भी परिवर्तन हो गया और वे अनुसूचित जाति से ओबीसी, ओबीसी से अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जनजाति से सामान्य के दर्जे में शामिल हो गए हैं। उन्हें प्रदेश में किसी भी प्रकार का लाभ नहीं मिल पा रहा है। भ्रष्टाचारियों को प्रोत्साहन और ईमानदारों को सजा देना यहां की सरकारों की नीयति बन गयी है। सरकार की विकासकारी नीतियों का लाभ उन्हें ही मिल पा रहा है जो आर्थिक रूप संपन्न हैं और बाहरी मुल्कों से आकर छत्तीसगढ़ में अपना एकाधिपत्य स्थापित कर चुके हैं, पर छत्तीसगढ़िया अभी भी अपनी उपेक्षा का दंश झेल रहा है।" राम मालवीय, रायपुर"
ऎसे में अगर नक्सली इन्हें बहकाने में कामयाब हो जायें और कोई ख्यातिमान लेखिका इस आग में अपनी रोटियां सेकने लगे तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये!
Thursday, 3 June 2010
इ..... सीनियर जूनियर का है ब्लाग जगत मा?: दिल्ली से योगेश गुलाटी
आजकल ब्लागजगत में सीनियर जूनियर की चर्चा बडी जोरों पर है! बीते दिनों सुनने में आया कि जूनियर ब्लागरों ने अपना संगठन भी बना लिया है! भई हमारी तो कुछ समझ नहीं आया! इसलिये आज हमने निश्चय किया कि ज़्यादा से ज़्यादा ब्लाग्स के नये पुराने सभी लेखों को पढा जाये! ताकि पता लगे कि वाकई में ब्लाग जगत में अपनी लेखनी के दम पर कौन सीनियर है और कौन जूनियर! इस काम में पूरा दिन लग गया! कईं ब्लाग्स इतने उत्कृष्ट थे कि दिल बाग्-बाग हो गया! लेकिन अफसोस ऎसे ब्लाग्स भी देखने को मिले जो........!
इन्हें देखकर जो सवाल मन में आया वो ये कि क्या सच में हमलोग पक्के गुटबाज या यों कहें राजनीतिबाज बन चुके हैं कि हम कोई भी जगह राजनीति से अछूती छोडना नहीं चाहते! मुझे समझ नहीं आता कोई ब्लागर किस बिनाह पर जूनियर कहलता है और कोई ब्लागर किस आधार पर खुद को सीनियर कहलवा सकता है! ब्लाग आपकी निजी अभिव्यक्ति है! ये वो ज़रिया है जिसके माध्यम से आप सच को सच और झूठ को झूठ कह सकते हैं! लेकिन याद रखियेगा आपका ब्लाग आपके व्यक्तित्व का दर्पण भी है! यदि आप इसपर पूर्वाग्रहों से भरी बात करते हैं, साम्प्रदायिक या अश्लील विचार रखते हैं या अन्य कोई आपत्तिजनक बात कहते हैं तो ये आपके अपने व्यक्तित्व के लिये ही नुकसानदायक है! और ऎसे में कोई भी आपके ब्लाग को गंभीरता से नहीं लेगा! मुझे नाम लेने की ज़रूरत नहीं लेकिन इन दिनों ब्लागजगत में ऎसे आपत्तिजनक विचारों वाले ब्लाग्स की कोई कमी नहीं है! एक विद्वान महापुरुष जो एक बडे अखबार के संपादक भी हैं उनके बारे में कोई ये सोच भी नहीं सकता है कि वो इतनी साम्प्रदायिक विचारधारा वाले होंगे! लेकिन उनका ब्लाग देखने पर आप खुद हैरान रह जायेंगे कि इतना बडा आदमी इतनी छोटी बातें कैसे कह सकता है? तो वहीं महिलाओं पर आधारित होने का दावा करने वाले एक ब्लाग में आपको ऎसी सोच मिलेगी जो आधुनिकता के नाम पर दिग्भ्रमित करने का काम कर रही है!
ऎसे कईं ब्लाग हैं जो गलत बातों को सही साबित करने के लिये उलझूलूल तर्क दिये जा रहे हैं! जबकि वो खुद ये जानते हैं कि ये उचित नहीं है! हो सकता है इसमें मेंरा भी कोई लेख शामिल हो, क्योंकि मैं कभी पूर्ण सत्य होने का दावा नहीं करता! लेकिन मेरे ब्लाग पर आने वाले ब्लागरों की टिप्पणीयां ही मुझे ये बताती हैं कि मेरी दिशा सही है या गलत! उन ब्लागरों के ब्लाग्स को पढ कर ही मैं इस बात का अनुमान लगाता हूं कि कहीँ वो किसी पूर्वाग्रह के चलते तो मेरी किसी बात का समर्थन या विरोध नहीं कर रहे? इसतरह मुझे ये समझने में मदद मिलती है कि मेरी दिशा सही है या नहीं? इसीलिये अपने ब्लाग में मैं बेनामी टिप्पणीयों को भी स्थान देता हूं! यदि वे शालीन हैं तो उसमें तर्क खोजने की कोशिश करता हूं! यदि वे मेरी लेखनी से सहमत नहीं हैं या उन्हें मेरी लेखनी पसंद नहीं आ रही तो मेरी कोशिश यही रहती है कि यदि वे चाकई में सही हैं तो मैं अपनी गलतियों को सुधार लूं!
लेकिन आज ढेर सारे ब्लाग्स पढकर मुझे इस बात का अंदाज़ा हो गया कि कुछ लोगों ने स्वतंत्रता का मतलब कुछ भी करने या कहने से लगा लिया है! जबकि आपकी स्वतंत्रता तो केवल आपकी नाक की नोक तक सीमित है! और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ये मतलब कतई नहीं कि जो मन में आया वो कह दिया! और बेतुके और फिज़ूल के तर्कों के आधार पर भारतीय संस्कृति पर कीचड उछालने लगे! या साम्प्रदायिक सोच को दर्शाने वाली बातें करने लगे! वाकई में मैं हैरान हूं कि कैसे लोग बेतुके तर्कों के आधार पर अपनी ही सभ्यता और रीति रीवाजों का मखौल उडा सकते हैं! चार किताबें पढ कर ये लोग खुद को सारे जहान से समझदार समझने का दावा कैसे कर सकते हैं! कुछ ऎसे भी युवा देखे जो विदेशों में जाने को ही बहुत बडी उपलब्धि मान बैठे हैं! और वहां बैठ कर अपने ब्लाग्स पर भारतीय संस्क्रिति और यहां के आदर्शों को गरिया रहे हैं! अगर हम थोडा सा सीख कर खुद को समझदार मानने लगें तो ये हमारी बहुत बडी भूल है! हर संस्कृति में अच्छे और बुरे की परिभाषा अलग होती है! जैसे यूरोप में महिलाओं से अभिवादन के वक्त उनके गालों या हाथों को चूमना सभ्य माना जाता है! जबकि हमारे यहां यही असभ्यता की निशानी है!
चोला बदल लेने से व्यक्ति तो बदल नहीं जाता? हमें गर्व होना चाहिये कि हमारी संस्कृति चरित्र पर ज़ोर देती है! क्योंकि शुध्द चरित्र ही शुध्द चिंतन को उत्पन्न करता है! और शुद्ध चिंतन से ही विश्व कल्याण हो सकता है! खैर ये बहस का अच्छा मुद्दा हो सकता है और ऎसे मुद्दों पर सार्थक बहस होनी भी चाहिये ताकि अपने ब्लाग्स पर सिगरेट पीने शराब पीने या अन्य आपत्तिजनक बातों को अपने फिज़ूल के तर्कों से सही बताने वाले नादान ब्लागरों को जवाब मिल सके! और बाकी लोग भी ये जान सकें कि नैतिकता ज़िंदा है अभी!
इन्हें देखकर जो सवाल मन में आया वो ये कि क्या सच में हमलोग पक्के गुटबाज या यों कहें राजनीतिबाज बन चुके हैं कि हम कोई भी जगह राजनीति से अछूती छोडना नहीं चाहते! मुझे समझ नहीं आता कोई ब्लागर किस बिनाह पर जूनियर कहलता है और कोई ब्लागर किस आधार पर खुद को सीनियर कहलवा सकता है! ब्लाग आपकी निजी अभिव्यक्ति है! ये वो ज़रिया है जिसके माध्यम से आप सच को सच और झूठ को झूठ कह सकते हैं! लेकिन याद रखियेगा आपका ब्लाग आपके व्यक्तित्व का दर्पण भी है! यदि आप इसपर पूर्वाग्रहों से भरी बात करते हैं, साम्प्रदायिक या अश्लील विचार रखते हैं या अन्य कोई आपत्तिजनक बात कहते हैं तो ये आपके अपने व्यक्तित्व के लिये ही नुकसानदायक है! और ऎसे में कोई भी आपके ब्लाग को गंभीरता से नहीं लेगा! मुझे नाम लेने की ज़रूरत नहीं लेकिन इन दिनों ब्लागजगत में ऎसे आपत्तिजनक विचारों वाले ब्लाग्स की कोई कमी नहीं है! एक विद्वान महापुरुष जो एक बडे अखबार के संपादक भी हैं उनके बारे में कोई ये सोच भी नहीं सकता है कि वो इतनी साम्प्रदायिक विचारधारा वाले होंगे! लेकिन उनका ब्लाग देखने पर आप खुद हैरान रह जायेंगे कि इतना बडा आदमी इतनी छोटी बातें कैसे कह सकता है? तो वहीं महिलाओं पर आधारित होने का दावा करने वाले एक ब्लाग में आपको ऎसी सोच मिलेगी जो आधुनिकता के नाम पर दिग्भ्रमित करने का काम कर रही है!
ऎसे कईं ब्लाग हैं जो गलत बातों को सही साबित करने के लिये उलझूलूल तर्क दिये जा रहे हैं! जबकि वो खुद ये जानते हैं कि ये उचित नहीं है! हो सकता है इसमें मेंरा भी कोई लेख शामिल हो, क्योंकि मैं कभी पूर्ण सत्य होने का दावा नहीं करता! लेकिन मेरे ब्लाग पर आने वाले ब्लागरों की टिप्पणीयां ही मुझे ये बताती हैं कि मेरी दिशा सही है या गलत! उन ब्लागरों के ब्लाग्स को पढ कर ही मैं इस बात का अनुमान लगाता हूं कि कहीँ वो किसी पूर्वाग्रह के चलते तो मेरी किसी बात का समर्थन या विरोध नहीं कर रहे? इसतरह मुझे ये समझने में मदद मिलती है कि मेरी दिशा सही है या नहीं? इसीलिये अपने ब्लाग में मैं बेनामी टिप्पणीयों को भी स्थान देता हूं! यदि वे शालीन हैं तो उसमें तर्क खोजने की कोशिश करता हूं! यदि वे मेरी लेखनी से सहमत नहीं हैं या उन्हें मेरी लेखनी पसंद नहीं आ रही तो मेरी कोशिश यही रहती है कि यदि वे चाकई में सही हैं तो मैं अपनी गलतियों को सुधार लूं!
लेकिन आज ढेर सारे ब्लाग्स पढकर मुझे इस बात का अंदाज़ा हो गया कि कुछ लोगों ने स्वतंत्रता का मतलब कुछ भी करने या कहने से लगा लिया है! जबकि आपकी स्वतंत्रता तो केवल आपकी नाक की नोक तक सीमित है! और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ये मतलब कतई नहीं कि जो मन में आया वो कह दिया! और बेतुके और फिज़ूल के तर्कों के आधार पर भारतीय संस्कृति पर कीचड उछालने लगे! या साम्प्रदायिक सोच को दर्शाने वाली बातें करने लगे! वाकई में मैं हैरान हूं कि कैसे लोग बेतुके तर्कों के आधार पर अपनी ही सभ्यता और रीति रीवाजों का मखौल उडा सकते हैं! चार किताबें पढ कर ये लोग खुद को सारे जहान से समझदार समझने का दावा कैसे कर सकते हैं! कुछ ऎसे भी युवा देखे जो विदेशों में जाने को ही बहुत बडी उपलब्धि मान बैठे हैं! और वहां बैठ कर अपने ब्लाग्स पर भारतीय संस्क्रिति और यहां के आदर्शों को गरिया रहे हैं! अगर हम थोडा सा सीख कर खुद को समझदार मानने लगें तो ये हमारी बहुत बडी भूल है! हर संस्कृति में अच्छे और बुरे की परिभाषा अलग होती है! जैसे यूरोप में महिलाओं से अभिवादन के वक्त उनके गालों या हाथों को चूमना सभ्य माना जाता है! जबकि हमारे यहां यही असभ्यता की निशानी है!
चोला बदल लेने से व्यक्ति तो बदल नहीं जाता? हमें गर्व होना चाहिये कि हमारी संस्कृति चरित्र पर ज़ोर देती है! क्योंकि शुध्द चरित्र ही शुध्द चिंतन को उत्पन्न करता है! और शुद्ध चिंतन से ही विश्व कल्याण हो सकता है! खैर ये बहस का अच्छा मुद्दा हो सकता है और ऎसे मुद्दों पर सार्थक बहस होनी भी चाहिये ताकि अपने ब्लाग्स पर सिगरेट पीने शराब पीने या अन्य आपत्तिजनक बातों को अपने फिज़ूल के तर्कों से सही बताने वाले नादान ब्लागरों को जवाब मिल सके! और बाकी लोग भी ये जान सकें कि नैतिकता ज़िंदा है अभी!
पुरुषों से मुकाबला: दिल्ली से योगेश गुलाटी
मेरे पास बैठी वो भद्र महिला सिगरेट के कश लगा रही थी! लेकिन सिगरेट के धुंए से मुझे खासी परेशानी हो रही थी! आखिर मुझसे रहा नहीं गया और मैने पूछ ही लिया,- "बहनजी आपको नहीं लगता सिगरेट आपके स्वास्थ्य के लिये नुकसान दायक हो सकता है! उसने मुझे घूर कर देखा! और बोली, एक्सक्यूज़ मी, बहन किसे कहा आपने? मैंने कहा हिंदी में ये एक सामान्य शिष्टाचार है! वैसे तंबाकू निषेध दिवस पर तो आप जम कर सिगरेट और तंबाकू के खिलाफ बोल रही थीं! आपका स्पेशल प्रोग्राम देखा था मैंने! वो खबरों के पीछे दौडने वाले एक चैनल की स्टार एंकर थी!
वो मेरा पेशा है उसने जवाब दिया! तो आपको लगता है सिगरेट पीना अच्छी बात है? इसमें बुरा क्या है? उसने कहा! जो काम पुरुष कर सकते हैं वो काम अगर महिलाएं करें तो आप जैसे लोगों को परेशानी क्यों होने लगती है! आज हर काम में महिलयें पुरुषों को कडी टक्कर दे रही हैं! जो काम पुरुष करते हैं अगर वही काम हम महिलायें करें तो आपको क्यों दिक्कत होती है? मैंने कहा आप पुरुषों से मुकाबला कर रही हैं ये अच्छी बात है, लेकिन परेशानी मुझे नहीं परेशानी तो आपको होने वाली है स्मोकिंग से! क्योंकि इसके साइड इफेक्ट आप ही को झेलने होगें! आप तो खुद इतनी पढी-लिखी और समझदार दिखती हैं, मुकाबला अच्छी बात के लिये हो तो ठीक है लेकिन क्या बुरे कामों में मुकाबला अच्छी बात है? वो बोली मुकाबला तो मुकाबला है फिर वो किसी भी बात में हो सकता है! हमारा मकसद पुरुषों को हर मामले में कडी टक्कर देना है!
ये कहते हुए उसने सिगरेट का एक ज़ोरदार कश अपने फेफडों में भर लिया! मुंह से धुआं निकालते हुए उसने आसमान की तरफ देखा और बोली मैं एक मिडिल क्लास फेमिली को बिलांग करती थी, जहां लडकियों को पढाई के लिये दूसरे शहर में भेजना भी बडी बात होती थी! लेकिन मैंने पुरुषों की इस व्यवस्था से बगावत की! मैं दिल्ली आई और अपना मुकाम हासिल किया! मैं पुरुषों के बीच काम करती हूं! और उनके बीच उन्हीं की तरह रहती हूं! जहां तक बात है शराब और सिगरेट की तो मुझे लगता है इनसे किसी भी लडकी को परहेज़ नहीं करना चाहिये! यूरोप और अमेरिका में भी तो लडकियों के लिये ये सब आम बात है! फिर भारत में महिला विरोधी किस अधिकार से महिलाओं की मारल पोलिसिंग करते हैं? तरक्की का रास्ता तो यहीं से होकर गुजरता है! क्या साडी पहनकर एक सती सावित्री महिला पुरुषों से मुकाबला कर सकती है? सिगरेट के एक ही कश में वो इतना सब कह गई थी! उसके ऎसे महान विचारों से मैं स्तब्ध था! वो सिगरेट का दूसरा कश ले इससे पहले ही मैं वहां से उठकर चल दिया!
वो मेरा पेशा है उसने जवाब दिया! तो आपको लगता है सिगरेट पीना अच्छी बात है? इसमें बुरा क्या है? उसने कहा! जो काम पुरुष कर सकते हैं वो काम अगर महिलाएं करें तो आप जैसे लोगों को परेशानी क्यों होने लगती है! आज हर काम में महिलयें पुरुषों को कडी टक्कर दे रही हैं! जो काम पुरुष करते हैं अगर वही काम हम महिलायें करें तो आपको क्यों दिक्कत होती है? मैंने कहा आप पुरुषों से मुकाबला कर रही हैं ये अच्छी बात है, लेकिन परेशानी मुझे नहीं परेशानी तो आपको होने वाली है स्मोकिंग से! क्योंकि इसके साइड इफेक्ट आप ही को झेलने होगें! आप तो खुद इतनी पढी-लिखी और समझदार दिखती हैं, मुकाबला अच्छी बात के लिये हो तो ठीक है लेकिन क्या बुरे कामों में मुकाबला अच्छी बात है? वो बोली मुकाबला तो मुकाबला है फिर वो किसी भी बात में हो सकता है! हमारा मकसद पुरुषों को हर मामले में कडी टक्कर देना है!
ये कहते हुए उसने सिगरेट का एक ज़ोरदार कश अपने फेफडों में भर लिया! मुंह से धुआं निकालते हुए उसने आसमान की तरफ देखा और बोली मैं एक मिडिल क्लास फेमिली को बिलांग करती थी, जहां लडकियों को पढाई के लिये दूसरे शहर में भेजना भी बडी बात होती थी! लेकिन मैंने पुरुषों की इस व्यवस्था से बगावत की! मैं दिल्ली आई और अपना मुकाम हासिल किया! मैं पुरुषों के बीच काम करती हूं! और उनके बीच उन्हीं की तरह रहती हूं! जहां तक बात है शराब और सिगरेट की तो मुझे लगता है इनसे किसी भी लडकी को परहेज़ नहीं करना चाहिये! यूरोप और अमेरिका में भी तो लडकियों के लिये ये सब आम बात है! फिर भारत में महिला विरोधी किस अधिकार से महिलाओं की मारल पोलिसिंग करते हैं? तरक्की का रास्ता तो यहीं से होकर गुजरता है! क्या साडी पहनकर एक सती सावित्री महिला पुरुषों से मुकाबला कर सकती है? सिगरेट के एक ही कश में वो इतना सब कह गई थी! उसके ऎसे महान विचारों से मैं स्तब्ध था! वो सिगरेट का दूसरा कश ले इससे पहले ही मैं वहां से उठकर चल दिया!
एक बंदर, मेट्रो के अंदर: दिल्ली से योगेश गुलाटी
दिल्ली मेट्रो में बंदर के घुसने के बाद से ही दिल्ली सरकार खासी चिंतित नज़र आ रही है! मुख्यमंत्री का ये सख्त आदेश था कि कामनवेल्थ गेम्स के मद्देनज़र गरीब और उनके पूर्वज यानि बंदर मेट्रो स्टेशन के आस-पास भी ना फटकें! गरीबों पर तो दिल्ली सरकार का ज़ोर चल गया लेकिन बंदरों पर नही चल सका! तमाम सुरक्षा व्यवस्था की धज्जियां उडाते हुए एक फिदायीन बंदर दिल्ली मेट्रो में घुसने में कामयाब हो ही गया! दिलशाद गार्डन की ओर जाने वाली रिठाला मेट्रो में ये बंदर ना केवल घुसने में कामयाब हुआ बल्कि उसने बकायदा मेट्रो में बिना टिकिट सफर भी कर डाला!
हालाकि यात्रियों को इस बंदर के अपने साथ सफर करने से कोई परेशानी नहीं हुई और उन्होंने बिस्किट खिला कर अपने साथी यात्री का स्वागत किया!लेकिन मेट्रो में बंदर के घुस आने की खबर लगते ही प्रशासन में हडकंप मच गया! उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि गरीबों का पूर्वज ये कम्बख्त बंदर इतनी कडी सुरक्षा के बावजूद इतनी बडी हिमाकत करने में कामयाब कैसे हो गया! इसलिये तत्काल बंदर को बाहर निकालने के लिये औद्योगिक सुरक्षा बल मौके पर बुला ली गई! मेट्रो ट्रेन को अगले स्टेशन पर रोक कर यात्रियों से खाली कराया गया! और फिर सुरक्षा बल के जवान बंदर को ट्रेन से बाहर निकालने के काम में जुट गये! इसके लिये उन्होंने साम-दाम, दंड-भेद सारी नीतियों का सहारा लिया! लेकिन कम्बख्त बंदर एयरकंडीशन ट्रेन से बाहर आने को राज़ी ही नहीं हुआ!
जब सुरक्षा बलों ने हार मान ली तो मेट्रो स्टाफ के एक समझदार कर्मचारी ने अक्ल का इस्तेमाल किया! उसने थोडे से चने मेट्रो के बाहर रख दिये, जिसे देख कर वो भोला बंदर ललचाया और एक ही छलांग में मेट्रो ट्रेन से बाहर आ गया! मेट्रो प्रशासन ने तत्काल मेट्रो ट्रेन के दरवाज़े बंद किये और मेट्रो को रवाना कर दिया! मेट्रो प्रशासन ने खुशी के लड्डू यात्रीयों में बंटवाए! इस कामयाबी की सूचना तत्काल मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंचा दी गई! क्योंकि आखिर उन्हें गरीबों के पूर्वज उस बंदर को मेट्रो से बाहर करने में कामयाबी मिल गयी थी! खैर बंदर वो काम कर चुका था जो वो करने आया था! मेट्रो की सवारी कर वो दिल्ली सरकार को अपना संदेश दे चुका था!
दरसल इस घटना की स्क्रिप्ट घटना से एक दिन पहले ही रिठाला के नज़दीक एक बगीचे में उस समय लिख दी गई थी! जब सर्व समाज बंदर महा सभा ने सर्व सहमति से ये प्रस्ताव पारित किया था कि दिल्ली पर उनका भी उतना ही हक है जितना कि उनके वंशजों का! दिल्ली के तमाम बुध्दिजीवी बंदर इस सभा में शिरकत करने पहुंचे थे! सर्व समाज बंदर महासभा का मानना है कि वो भी दिल्लीवासी हैं, और रिश्ते में चूंकि इंसानों के पूर्वज हैं इस लिहाज से उन्हें सीनियर सिटिजन का दर्जा मिलना चाहिये! और इस गर्मी में मुफ्त में मेट्रो की सवारी की अनुमति मिलनी चाहिये!
ये सर्व समाज बंदर महासभा बंदरों के साथ दिल्ली सरकार के रवैये से खासी नाराज़ है! उनका कहना है कि दिल्ली सरकार को गरीबों की ही तरह उनकी भी कोई चिंता नहीं है! बल्कि दिल्ली सरकार ने पिछले साल बंदरों को दिल्ली से दफा करने के लिये ठीक वैसी ही मुहीम चालाई थी जैसी इन दिनों वो गरीबों के लिये चला रही है! लेकिन इस मुहीम को धता बताते हुए तमाम बंदर दिल्ली वापस आ गये! इतना ही नहीं इस मुहीम का विरोध करने की खातिर उन्होंने अन्य प्रदेशों से अपने रिश्तेदारों को भी बुला लिया था! और आज दिल्ली में पिछले साल की तुलना में दुगने बंदर हैं! सर्व समाज बंदर महासभा का कहना है कि वो गरीब नहीँ हैं, जो चुप रहेंगे! वो बंदर हैं और अपने हक की लडाई पुरज़ोर तरीके से लडेंगे!
इसतरह बंदर महसभा में सर्व सम्मत्ति से ये प्रस्ताव पास हुआ कि दिल्ली मेट्रो में घुस कर दिल्ली की शीला सरकार को चुनौती दी जाये! इसके लिये बकायदा एक ट्रेंड फिदायीन बंदर का इस्तेमाल किया गया! उसे किसी भी कीमत पर मेट्रो ट्रेन से बाहर ना आने की नसीहत दी गई थी! लेकिन वो मूर्ख बंदर गरीबों के ही तरह लालच में फंस गया! और थोडे से चने के लालच मे अपने उद्देश्य से भटक कर ट्रेन से बाहर आ गया! शायद इसलिये क्योंकि गरीब और बंदर दोनों में ही एक समानता उनका खाली पेट है! और शायद यही कारण है कि सरकार ने बंदर और उनके वंशजों को विदेशी मेहमानों के आने से पहले दिल्ली से बाहर करने की ठानी है! क्योंकि पेट की खातिर अगर इन्होंने विदेशी मेहमानों के सामने हाथ फैला दिये तो दिल्ली की इज़्ज़त का क्या होगा?
हालाकि यात्रियों को इस बंदर के अपने साथ सफर करने से कोई परेशानी नहीं हुई और उन्होंने बिस्किट खिला कर अपने साथी यात्री का स्वागत किया!लेकिन मेट्रो में बंदर के घुस आने की खबर लगते ही प्रशासन में हडकंप मच गया! उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि गरीबों का पूर्वज ये कम्बख्त बंदर इतनी कडी सुरक्षा के बावजूद इतनी बडी हिमाकत करने में कामयाब कैसे हो गया! इसलिये तत्काल बंदर को बाहर निकालने के लिये औद्योगिक सुरक्षा बल मौके पर बुला ली गई! मेट्रो ट्रेन को अगले स्टेशन पर रोक कर यात्रियों से खाली कराया गया! और फिर सुरक्षा बल के जवान बंदर को ट्रेन से बाहर निकालने के काम में जुट गये! इसके लिये उन्होंने साम-दाम, दंड-भेद सारी नीतियों का सहारा लिया! लेकिन कम्बख्त बंदर एयरकंडीशन ट्रेन से बाहर आने को राज़ी ही नहीं हुआ!
जब सुरक्षा बलों ने हार मान ली तो मेट्रो स्टाफ के एक समझदार कर्मचारी ने अक्ल का इस्तेमाल किया! उसने थोडे से चने मेट्रो के बाहर रख दिये, जिसे देख कर वो भोला बंदर ललचाया और एक ही छलांग में मेट्रो ट्रेन से बाहर आ गया! मेट्रो प्रशासन ने तत्काल मेट्रो ट्रेन के दरवाज़े बंद किये और मेट्रो को रवाना कर दिया! मेट्रो प्रशासन ने खुशी के लड्डू यात्रीयों में बंटवाए! इस कामयाबी की सूचना तत्काल मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंचा दी गई! क्योंकि आखिर उन्हें गरीबों के पूर्वज उस बंदर को मेट्रो से बाहर करने में कामयाबी मिल गयी थी! खैर बंदर वो काम कर चुका था जो वो करने आया था! मेट्रो की सवारी कर वो दिल्ली सरकार को अपना संदेश दे चुका था!
दरसल इस घटना की स्क्रिप्ट घटना से एक दिन पहले ही रिठाला के नज़दीक एक बगीचे में उस समय लिख दी गई थी! जब सर्व समाज बंदर महा सभा ने सर्व सहमति से ये प्रस्ताव पारित किया था कि दिल्ली पर उनका भी उतना ही हक है जितना कि उनके वंशजों का! दिल्ली के तमाम बुध्दिजीवी बंदर इस सभा में शिरकत करने पहुंचे थे! सर्व समाज बंदर महासभा का मानना है कि वो भी दिल्लीवासी हैं, और रिश्ते में चूंकि इंसानों के पूर्वज हैं इस लिहाज से उन्हें सीनियर सिटिजन का दर्जा मिलना चाहिये! और इस गर्मी में मुफ्त में मेट्रो की सवारी की अनुमति मिलनी चाहिये!
ये सर्व समाज बंदर महासभा बंदरों के साथ दिल्ली सरकार के रवैये से खासी नाराज़ है! उनका कहना है कि दिल्ली सरकार को गरीबों की ही तरह उनकी भी कोई चिंता नहीं है! बल्कि दिल्ली सरकार ने पिछले साल बंदरों को दिल्ली से दफा करने के लिये ठीक वैसी ही मुहीम चालाई थी जैसी इन दिनों वो गरीबों के लिये चला रही है! लेकिन इस मुहीम को धता बताते हुए तमाम बंदर दिल्ली वापस आ गये! इतना ही नहीं इस मुहीम का विरोध करने की खातिर उन्होंने अन्य प्रदेशों से अपने रिश्तेदारों को भी बुला लिया था! और आज दिल्ली में पिछले साल की तुलना में दुगने बंदर हैं! सर्व समाज बंदर महासभा का कहना है कि वो गरीब नहीँ हैं, जो चुप रहेंगे! वो बंदर हैं और अपने हक की लडाई पुरज़ोर तरीके से लडेंगे!
इसतरह बंदर महसभा में सर्व सम्मत्ति से ये प्रस्ताव पास हुआ कि दिल्ली मेट्रो में घुस कर दिल्ली की शीला सरकार को चुनौती दी जाये! इसके लिये बकायदा एक ट्रेंड फिदायीन बंदर का इस्तेमाल किया गया! उसे किसी भी कीमत पर मेट्रो ट्रेन से बाहर ना आने की नसीहत दी गई थी! लेकिन वो मूर्ख बंदर गरीबों के ही तरह लालच में फंस गया! और थोडे से चने के लालच मे अपने उद्देश्य से भटक कर ट्रेन से बाहर आ गया! शायद इसलिये क्योंकि गरीब और बंदर दोनों में ही एक समानता उनका खाली पेट है! और शायद यही कारण है कि सरकार ने बंदर और उनके वंशजों को विदेशी मेहमानों के आने से पहले दिल्ली से बाहर करने की ठानी है! क्योंकि पेट की खातिर अगर इन्होंने विदेशी मेहमानों के सामने हाथ फैला दिये तो दिल्ली की इज़्ज़त का क्या होगा?
Wednesday, 2 June 2010
सरकार को दी चुनौती, मेट्रो में घुसा बंदर: दिल्ली से योगेश गुलाटी
दिल्ली मेट्रो में बंदर के घुसने के बाद से ही दिल्ली सरकार खासी चिंतित नज़र आ रही है! मुख्यमंत्री का ये सख्त आदेश था कि कामनवेल्थ गेम्स के मद्देनज़र गरीब और उनके पूर्वज यानि बंदर मेट्रो स्टेशन के आस-पास भी ना फटकें! गरीबों पर तो दिल्ली सरकार का ज़ोर चल गया लेकिन बंदरों पर नही चल सका! तमाम सुरक्षा व्यवस्था की धज्जियां उडाते हुए एक फिदायीन बंदर दिल्ली मेट्रो में घुसने में कामयाब हो ही गया! दिलशाद गार्डन की ओर जाने वाली रिठाला मेट्रो में ये बंदर ना केवल घुसने में कामयाब हुआ बल्कि उसने बकायदा मेट्रो में बिना टिकिट सफर भी कर डाला! हालाकि यात्रियों को इस बंदर के अपने साथ सफर करने से कोई परेशानी नहीं हुई और उन्होंने बिस्किट खिला कर अपने साथी यात्री का स्वागत किया!
लेकिन मेट्रो में बंदर के घुस आने की खबर लगते ही प्रशासन में हडकंप मच गया! उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि गरीबों का पूर्वज ये कम्बख्त बंदर इतनी कडी सुरक्षा के बावजूद इतनी बडी हिमाकत करने में कामयाब कैसे हो गया! इसलिये तत्काल बंदर को बाहर निकालने के लिये औद्योगिक सुरक्षा बल मौके पर बुला ली गई! मेट्रो ट्रेन को अगले स्टेशन पर रोक कर यात्रियों से खाली कराया गया! और फिर सुरक्षा बल के जवान बंदर को ट्रेन से बाहर निकालने के काम में जुट गये! इसके लिये उन्होंने साम-दाम, दंड-भेद सारी नीतियों का सहारा लिया! लेकिन कम्बख्त बंदर एयरकंडीशन ट्रेन से बाहर आने को राज़ी ही नहीं हुआ!
जब सुरक्षा बलों ने हार मान ली तो मेट्रो स्टाफ के एक समझदार कर्मचारी ने अक्ल का इस्तेमाल किया! उसने थोडे से चने मेट्रो के बाहर रख दिये, जिसे देख कर वो भोला बंदर ललचाया और एक ही छलांग में मेट्रो ट्रेन से बाहर आ गया! मेट्रो प्रशासन ने तत्काल मेट्रो ट्रेन के दरवाज़े बंद किये और मेट्रो को रवाना कर दिया! मेट्रो प्रशासन ने खुशी के लड्डू यात्रीयों में बंटवाए! इस कामयाबी की सूचना तत्काल मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंचा दी गई! क्योंकि आखिर उन्हें गरीबों के पूर्वज उस बंदर को मेट्रो से बाहर करने में कामयाबी मिल गयी थी! खैर बंदर वो काम कर चुका था जो वो करने आया था! मेट्रो की सवारी कर वो दिल्ली सरकार को अपना संदेश दे चुका था!
दरसल इस घटना की स्क्रिप्ट घटना से एक दिन पहले ही रिठाला के नज़दीक एक बगीचे में उस समय लिख दी गई थी! जब सर्व समाज बंदर महा सभा ने सर्व सहमति से ये प्रस्ताव पारित किया था कि दिल्ली पर उनका भी उतना ही हक है जितना कि उनके वंशजों का! दिल्ली के तमाम बुध्दिजीवी बंदर इस सभा में शिरकत करने पहुंचे थे! सर्व समाज बंदर महासभा का मानना है कि वो भी दिल्लीवासी हैं, और रिश्ते में चूंकि इंसानों के पूर्वज हैं इस लिहाज से उन्हें सीनियर सिटिजन का दर्जा मिलना चाहिये! और इस गर्मी में मुफ्त में मेट्रो की सवारी की अनुमति मिलनी चाहिये!
ये सर्व समाज बंदर महासभा बंदरों के साथ दिल्ली सरकार के रवैये से खासी नाराज़ है! उनका कहना है कि दिल्ली सरकार को गरीबों की ही तरह उनकी भी कोई चिंता नहीं है! बल्कि दिल्ली सरकार ने पिछले साल बंदरों को दिल्ली से दफा करने के लिये ठीक वैसी ही मुहीम चालाई थी जैसी इन दिनों वो गरीबों के लिये चला रही है! लेकिन इस मुहीम को धता बताते हुए तमाम बंदर दिल्ली वापस आ गये! इतना ही नहीं इस मुहीम का विरोध करने की खातिर उन्होंने अन्य प्रदेशों से अपने रिश्तेदारों को भी बुला लिया था! और आज दिल्ली में पिछले साल की तुलना में दुगने बंदर हैं! सर्व समाज बंदर महासभा का कहना है कि वो गरीब नहीँ हैं, जो चुप रहेंगे! वो बंदर हैं और अपने हक की लडाई पुरज़ोर तरीके से लडेंगे!
इसतरह बंदर महसभा में सर्व सम्मत्ति से ये प्रस्ताव पास हुआ कि दिल्ली मेट्रो में घुस कर दिल्ली की शीला सरकार को चुनौती दी जाये! इसके लिये बकायदा एक ट्रेंड फिदायीन बंदर का इस्तेमाल किया गया! उसे किसी भी कीमत पर मेट्रो ट्रेन से बाहर ना आने की नसीहत दी गई थी! लेकिन वो मूर्ख बंदर गरीबों के ही तरह लालच में फंस गया! और थोडे से चने के लालच मे अपने उद्देश्य से भटक कर ट्रेन से बाहर आ गया! शायद इसलिये क्योंकि गरीब और बंदर दोनों में ही एक समानता उनका खाली पेट है! और शायद यही कारण है कि सरकार ने बंदर और उनके वंशजों को विदेशी मेहमानों के आने से पहले दिल्ली से बाहर करने की ठानी है! क्योंकि पेट की खातिर अगर इन्होंने विदेशी मेहमानों के सामने हाथ फैला दिये तो दिल्ली की इज़्ज़त का क्या होगा?
लेकिन मेट्रो में बंदर के घुस आने की खबर लगते ही प्रशासन में हडकंप मच गया! उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि गरीबों का पूर्वज ये कम्बख्त बंदर इतनी कडी सुरक्षा के बावजूद इतनी बडी हिमाकत करने में कामयाब कैसे हो गया! इसलिये तत्काल बंदर को बाहर निकालने के लिये औद्योगिक सुरक्षा बल मौके पर बुला ली गई! मेट्रो ट्रेन को अगले स्टेशन पर रोक कर यात्रियों से खाली कराया गया! और फिर सुरक्षा बल के जवान बंदर को ट्रेन से बाहर निकालने के काम में जुट गये! इसके लिये उन्होंने साम-दाम, दंड-भेद सारी नीतियों का सहारा लिया! लेकिन कम्बख्त बंदर एयरकंडीशन ट्रेन से बाहर आने को राज़ी ही नहीं हुआ!
जब सुरक्षा बलों ने हार मान ली तो मेट्रो स्टाफ के एक समझदार कर्मचारी ने अक्ल का इस्तेमाल किया! उसने थोडे से चने मेट्रो के बाहर रख दिये, जिसे देख कर वो भोला बंदर ललचाया और एक ही छलांग में मेट्रो ट्रेन से बाहर आ गया! मेट्रो प्रशासन ने तत्काल मेट्रो ट्रेन के दरवाज़े बंद किये और मेट्रो को रवाना कर दिया! मेट्रो प्रशासन ने खुशी के लड्डू यात्रीयों में बंटवाए! इस कामयाबी की सूचना तत्काल मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंचा दी गई! क्योंकि आखिर उन्हें गरीबों के पूर्वज उस बंदर को मेट्रो से बाहर करने में कामयाबी मिल गयी थी! खैर बंदर वो काम कर चुका था जो वो करने आया था! मेट्रो की सवारी कर वो दिल्ली सरकार को अपना संदेश दे चुका था!
दरसल इस घटना की स्क्रिप्ट घटना से एक दिन पहले ही रिठाला के नज़दीक एक बगीचे में उस समय लिख दी गई थी! जब सर्व समाज बंदर महा सभा ने सर्व सहमति से ये प्रस्ताव पारित किया था कि दिल्ली पर उनका भी उतना ही हक है जितना कि उनके वंशजों का! दिल्ली के तमाम बुध्दिजीवी बंदर इस सभा में शिरकत करने पहुंचे थे! सर्व समाज बंदर महासभा का मानना है कि वो भी दिल्लीवासी हैं, और रिश्ते में चूंकि इंसानों के पूर्वज हैं इस लिहाज से उन्हें सीनियर सिटिजन का दर्जा मिलना चाहिये! और इस गर्मी में मुफ्त में मेट्रो की सवारी की अनुमति मिलनी चाहिये!
ये सर्व समाज बंदर महासभा बंदरों के साथ दिल्ली सरकार के रवैये से खासी नाराज़ है! उनका कहना है कि दिल्ली सरकार को गरीबों की ही तरह उनकी भी कोई चिंता नहीं है! बल्कि दिल्ली सरकार ने पिछले साल बंदरों को दिल्ली से दफा करने के लिये ठीक वैसी ही मुहीम चालाई थी जैसी इन दिनों वो गरीबों के लिये चला रही है! लेकिन इस मुहीम को धता बताते हुए तमाम बंदर दिल्ली वापस आ गये! इतना ही नहीं इस मुहीम का विरोध करने की खातिर उन्होंने अन्य प्रदेशों से अपने रिश्तेदारों को भी बुला लिया था! और आज दिल्ली में पिछले साल की तुलना में दुगने बंदर हैं! सर्व समाज बंदर महासभा का कहना है कि वो गरीब नहीँ हैं, जो चुप रहेंगे! वो बंदर हैं और अपने हक की लडाई पुरज़ोर तरीके से लडेंगे!
इसतरह बंदर महसभा में सर्व सम्मत्ति से ये प्रस्ताव पास हुआ कि दिल्ली मेट्रो में घुस कर दिल्ली की शीला सरकार को चुनौती दी जाये! इसके लिये बकायदा एक ट्रेंड फिदायीन बंदर का इस्तेमाल किया गया! उसे किसी भी कीमत पर मेट्रो ट्रेन से बाहर ना आने की नसीहत दी गई थी! लेकिन वो मूर्ख बंदर गरीबों के ही तरह लालच में फंस गया! और थोडे से चने के लालच मे अपने उद्देश्य से भटक कर ट्रेन से बाहर आ गया! शायद इसलिये क्योंकि गरीब और बंदर दोनों में ही एक समानता उनका खाली पेट है! और शायद यही कारण है कि सरकार ने बंदर और उनके वंशजों को विदेशी मेहमानों के आने से पहले दिल्ली से बाहर करने की ठानी है! क्योंकि पेट की खातिर अगर इन्होंने विदेशी मेहमानों के सामने हाथ फैला दिये तो दिल्ली की इज़्ज़त का क्या होगा?
Monday, 31 May 2010
कौन समझेगा झारखंड का दर्द?: दिल्ली से योगेश गुलाटी
झारखंड जिसे वन प्रदेश के नाम से भी जाना जाता है, उसे प्रकृति ने भरपूर संपदा से नवाज़ा है! झार का अर्थ होता है पेड और खंड का अर्थ प्रदेश! नाम से ही स्पष्ट है कि वनों का ये प्रदेश निश्चय ही प्राकृतिक संधानों से परिपूर्ण होगा! और ऎसा ही है भी, यहां वन संपदा, कोयला और खनिजों के भंडार हैं! बावजूद इसके ये आदिवासी प्रदेश देश के सबसे गरीब प्रदेशों में आता है! 22 जिले और दो करोड सत्तर लाख की जनसंख्या वाले इस वन प्रदेश का ये दुर्भाग्य ही रहा है कि हमेंशा से ही यहां के भोले-भाले आदिवासियों को छला गया है!
आज से 72 साल पहले आदिवासी महासभा ने अलग झारखंड का जो सपना देखा था वो 15 नवंबर 2000 को आदिवासी नेता बिरसा मुंडा के जन्मदिन पर पूरा हुआ! इस दिन झारखंड देश का 28 वां राज्य बना! तब ये माना जा रहा था कि अब झारखंड की बदहाली के दिन लद जायेंगे, और ये वन प्रदेश तरक्की की राह में बाकी प्रदेशों को पीछे छोड देगा! क्योंकि जितने प्राकृतिक संसाधन झारखंड के पास हैं उतने सपन्न दूसरे प्रदेश नहीं हैं! लेकिन इसे झारखंड का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि 72 साल पहले देखा गया आदिवासी महासभा का वो सपना पूरा तो हो गया लेकिन परवान नहीं चढ सका! क्योंकि झारखंड राजनीति के खेल में इस कदर उलझ गया कि यहां के मूल मुद्दे आदिवासी और विकास एक बार फिर दरकिनार कर दिये गये!
आदिवासियों के विकास के नाम पर बना ये प्रदेश लूट का केन्द बन गया! झारखंड में जो लूट मची उसे देख कर सारा देश स्तब्ध रह गया! लगातार मुख्यमंत्री बदले गये! खुद को आदिवासियों का नेता बताने वालों ने लूट का कोई मौका हाथ से जाने नहीं दिया! झारखंड के एक पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा इन दिनों भ्रष्टाचार और अकूत संपत्ति अर्जित करने के आरोपों के बाद से ही जेल में हैं ! तो पूर्व मंत्री एनोस एक्का, कमलेश सिंह, और हरिनारायण सिंह भी जेल में उनका साथ दे रहे हैं! कुछ और पूर्व मंत्री और उनके नज़दीकीयों पर भी कानून का शिकंजा जल्द ही कसता दिख रहा है! यानि एक पूर्व मुख्यमंत्री का पूरा मंत्रीमंडल ही प्रदेश को लूटने के आरोपों के चलते सलाखों के पीछे है! झामुमो के मुखिया शिबू सोरेन के समर्थन में बनी मधु कोडा सरकार ने प्रदेश में जो लूट मचाई उसने सारे देश को हैरान कर दिया! और बुध्दिजीवी सोच में पड गये कि लोकतंत्र में यदि चुनी हुई सरकार ही प्रदेश को लूटने लगे तो क्या किया जाये?
इधर मधु कोडा को समर्थन देने वाले शीबू सोरेन का दामन भी पाक साफ नहीं है! उन पर भी कई संगीन आरोप लगते रहे हैं! कितने आश्चर्य की बात है कि झारखंड में सोरेन बीजेपी के सहयोग से मुख्यमंत्री बनते हैं और नई दिल्ली में जाकर कांग्रेस की यूपीए सरकार के पक्ष में वोट करते हैं! इस पर भी जब बीजेपी ने समर्थन वापस लिया तो सोरेन अपनी कुर्सी बचाने के लिये पूरी तरह आश्वस्त दिख रहे थे! शायद उन्हें ये भरोसा था कि कांग्रेस के साथ उनकी डील हो जायेगी और अगर कांग्रेस ने अपना मुख्यमंत्री बनाने की शर्त रखी तो वो केन्द्र में कोई भारी भरकम मंत्रालय मांग कर सौदा पटा लेंगे! लेकिन लगता है अंतिम समय में सोरेन का ये भ्रम टूट गया! और महज़ 14 विधायकों के बल पर झारखंड पर राज करने वाले सोरेन को इस्तीफा देने पर मजबूर होना पडा!
झारखंड में चाहे राष्ट्रपति शासन लग रहा हो, चाहे वहां विधानसभा निलंबित हो जाये, तब भी राजनीति के गलियारों में जोतोड का खेल बंद नहीं होने वाला! एक तरफ अमीर धरती के गरीब लोग विकास की उम्मीद लगाये बैठे हैं, तो दूसरी तरह उनके नेता जोड-तोड की राजनीति में मगन होकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं! ये वो प्रदेश है जहां लोग बीस रुपये प्रतिदिन से भी कम आय पर अपना गुजारा करते हैं! जहां की साक्षरता, भुखमरी, बेरोज़गारी और मानव विकास संबंधी आकडे आपको हिला कर रख देँगे! लेकिन 72 साल पहले आदिवासी महासभा ने झारखंड प्रदेश का सपना इसलिये तो नहीं देखा था कि झारखंड लूट और राजनीति के अखाडे में तब्दील हो जाये, और यहां के आदिवासी भूख से दम तोडते रहें?
आज से 72 साल पहले आदिवासी महासभा ने अलग झारखंड का जो सपना देखा था वो 15 नवंबर 2000 को आदिवासी नेता बिरसा मुंडा के जन्मदिन पर पूरा हुआ! इस दिन झारखंड देश का 28 वां राज्य बना! तब ये माना जा रहा था कि अब झारखंड की बदहाली के दिन लद जायेंगे, और ये वन प्रदेश तरक्की की राह में बाकी प्रदेशों को पीछे छोड देगा! क्योंकि जितने प्राकृतिक संसाधन झारखंड के पास हैं उतने सपन्न दूसरे प्रदेश नहीं हैं! लेकिन इसे झारखंड का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि 72 साल पहले देखा गया आदिवासी महासभा का वो सपना पूरा तो हो गया लेकिन परवान नहीं चढ सका! क्योंकि झारखंड राजनीति के खेल में इस कदर उलझ गया कि यहां के मूल मुद्दे आदिवासी और विकास एक बार फिर दरकिनार कर दिये गये!
आदिवासियों के विकास के नाम पर बना ये प्रदेश लूट का केन्द बन गया! झारखंड में जो लूट मची उसे देख कर सारा देश स्तब्ध रह गया! लगातार मुख्यमंत्री बदले गये! खुद को आदिवासियों का नेता बताने वालों ने लूट का कोई मौका हाथ से जाने नहीं दिया! झारखंड के एक पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा इन दिनों भ्रष्टाचार और अकूत संपत्ति अर्जित करने के आरोपों के बाद से ही जेल में हैं ! तो पूर्व मंत्री एनोस एक्का, कमलेश सिंह, और हरिनारायण सिंह भी जेल में उनका साथ दे रहे हैं! कुछ और पूर्व मंत्री और उनके नज़दीकीयों पर भी कानून का शिकंजा जल्द ही कसता दिख रहा है! यानि एक पूर्व मुख्यमंत्री का पूरा मंत्रीमंडल ही प्रदेश को लूटने के आरोपों के चलते सलाखों के पीछे है! झामुमो के मुखिया शिबू सोरेन के समर्थन में बनी मधु कोडा सरकार ने प्रदेश में जो लूट मचाई उसने सारे देश को हैरान कर दिया! और बुध्दिजीवी सोच में पड गये कि लोकतंत्र में यदि चुनी हुई सरकार ही प्रदेश को लूटने लगे तो क्या किया जाये?
इधर मधु कोडा को समर्थन देने वाले शीबू सोरेन का दामन भी पाक साफ नहीं है! उन पर भी कई संगीन आरोप लगते रहे हैं! कितने आश्चर्य की बात है कि झारखंड में सोरेन बीजेपी के सहयोग से मुख्यमंत्री बनते हैं और नई दिल्ली में जाकर कांग्रेस की यूपीए सरकार के पक्ष में वोट करते हैं! इस पर भी जब बीजेपी ने समर्थन वापस लिया तो सोरेन अपनी कुर्सी बचाने के लिये पूरी तरह आश्वस्त दिख रहे थे! शायद उन्हें ये भरोसा था कि कांग्रेस के साथ उनकी डील हो जायेगी और अगर कांग्रेस ने अपना मुख्यमंत्री बनाने की शर्त रखी तो वो केन्द्र में कोई भारी भरकम मंत्रालय मांग कर सौदा पटा लेंगे! लेकिन लगता है अंतिम समय में सोरेन का ये भ्रम टूट गया! और महज़ 14 विधायकों के बल पर झारखंड पर राज करने वाले सोरेन को इस्तीफा देने पर मजबूर होना पडा!
झारखंड में चाहे राष्ट्रपति शासन लग रहा हो, चाहे वहां विधानसभा निलंबित हो जाये, तब भी राजनीति के गलियारों में जोतोड का खेल बंद नहीं होने वाला! एक तरफ अमीर धरती के गरीब लोग विकास की उम्मीद लगाये बैठे हैं, तो दूसरी तरह उनके नेता जोड-तोड की राजनीति में मगन होकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं! ये वो प्रदेश है जहां लोग बीस रुपये प्रतिदिन से भी कम आय पर अपना गुजारा करते हैं! जहां की साक्षरता, भुखमरी, बेरोज़गारी और मानव विकास संबंधी आकडे आपको हिला कर रख देँगे! लेकिन 72 साल पहले आदिवासी महासभा ने झारखंड प्रदेश का सपना इसलिये तो नहीं देखा था कि झारखंड लूट और राजनीति के अखाडे में तब्दील हो जाये, और यहां के आदिवासी भूख से दम तोडते रहें?
लिव इन, प्यार या व्याभिचार?: दिल्ली से योगेश गुलाटी
जेट एयरवेज़ की एक एयरहोस्टेस ने अपने साथी पायलेट के खिलाफ रेप का मामला दर्ज करवाया है! जिसके बाद महिला के साथी पायलेट को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया! 22 वर्षीय एयरहोस्टेस 27 साल के पायलेट के साथ लिव इन रिलेशशिप में 2009 से रह रही थी! एयरहोस्टेस ने आरोप लगाया है कि उसके साथी पायलेट ने उसे शादी का वादा किया था, लेकिन बाद में वो मुकर गया! इससे एक बात उभर कर सामने आयी है कि महानगरों में लिव इन का प्रचलन बढ रहा है! सवाल ये है कि हमारे आधुनिक कहे जाने वाले युवा लिव इन का खुल कर समर्थन करते हैं! वो कहते हैं अगर दो प्यार करने वाले साथ रहना चाहते हैं तो इसमें बुराई क्या है! हैरानी की बात ये है कि लडकियां भी ऎसे तर्कों के मामले में पीछे नहीं हैं! लेकिन सवाल ये है पहले शादी के बिना साथ रहने का फैसला करते हो, बाद में शादी की ही बात पर अलगाव करते हो? अगर शादी ही करनी थी तो शादी करके साथ क्यों नहीं रहे सम्मान के साथ? पहले लिव - इन में रहते हो बाद में शादी की बात करते हो? शादी का इरादा था तो लिव - इन में क्यों रहे?
लिव -इन और शादी दोनों ही दो अलग - अलग मुद्दे हैं! हमारे कानून ने युवाओं को पूरी आज़ादी दे रखी है! और दो लोगों के मर्ज़ी से साथ रहने पर कानूनन कोई बंदिश नहीं है! लेकिन शादी में जहां ज़िम्मेदारी जुड जाती है, वहीं लिव - इन में ज़िम्मेदारी जैसी कोई बात नहीं होती! और आप कानूनी तौर पर अपने पार्टनर को किसी बात के लिये बाध्य नहीं कर सकते! आमतौर पर लिव- इन में रहने के बाद लडकियां अपने पार्टनर पर शादी के लिये दबव डालने लगती हैं! और जब वो शादी से इन्कार कर देता है तो चुंकि उनके पास दूसरा कोई रास्ता नहीं होता इसलिये वो प्रतिशोध में अपने उसी साथी पर जिसके साथ वो अपनी मर्ज़ी से रह रही थीं रेप का केस कर जेल भिजवा देती हैं!
लिव - इन प्यार है, इसके समर्थन में तर्क देने वाले महापुरुषों की लंबी फेहरिस्त है! लेकिन मुझे समझ नहीं आता अगर ये प्यार है तो व्याभिचार क्या है? हमारे युवाओं का एक वर्ग अति आधुनिक होने का दावा करता है! इसमें अधिकांश वे लोग हैं जो छोटे कस्बों में पले बढे हैं और अब नौकरी या शिक्षा के लिये महानगरों में रह रहे हैं! ऎसे में वो खुद को एक आज़ाद पंछी की तरह समझने लगते हैं! जो पिंजरे से अभी - अभी मुक्त हुआ हो! ये अपनी ज़िंदगी को खुल कर जीना चाहते हैं! और अपनी आज़ादी का भरपूर फायदा उठाना चाहते हैं! इसलिए इन्हें लिव इन से भी परहेज़ नहीं और खुल कर उसका समर्थन करते हैं! लेकिन कुछ समय बाद शादी के मुद्दे पर अलगाव सामने आ जाता है! और फिर वही सवाल उठता है कि अगर शादी ही करनी थी तो लिव - इन की क्या ज़रूरत थी? और अगर लिव - इन प्यार है तो व्याभिचार क्या है?
लिव -इन और शादी दोनों ही दो अलग - अलग मुद्दे हैं! हमारे कानून ने युवाओं को पूरी आज़ादी दे रखी है! और दो लोगों के मर्ज़ी से साथ रहने पर कानूनन कोई बंदिश नहीं है! लेकिन शादी में जहां ज़िम्मेदारी जुड जाती है, वहीं लिव - इन में ज़िम्मेदारी जैसी कोई बात नहीं होती! और आप कानूनी तौर पर अपने पार्टनर को किसी बात के लिये बाध्य नहीं कर सकते! आमतौर पर लिव- इन में रहने के बाद लडकियां अपने पार्टनर पर शादी के लिये दबव डालने लगती हैं! और जब वो शादी से इन्कार कर देता है तो चुंकि उनके पास दूसरा कोई रास्ता नहीं होता इसलिये वो प्रतिशोध में अपने उसी साथी पर जिसके साथ वो अपनी मर्ज़ी से रह रही थीं रेप का केस कर जेल भिजवा देती हैं!
लिव - इन प्यार है, इसके समर्थन में तर्क देने वाले महापुरुषों की लंबी फेहरिस्त है! लेकिन मुझे समझ नहीं आता अगर ये प्यार है तो व्याभिचार क्या है? हमारे युवाओं का एक वर्ग अति आधुनिक होने का दावा करता है! इसमें अधिकांश वे लोग हैं जो छोटे कस्बों में पले बढे हैं और अब नौकरी या शिक्षा के लिये महानगरों में रह रहे हैं! ऎसे में वो खुद को एक आज़ाद पंछी की तरह समझने लगते हैं! जो पिंजरे से अभी - अभी मुक्त हुआ हो! ये अपनी ज़िंदगी को खुल कर जीना चाहते हैं! और अपनी आज़ादी का भरपूर फायदा उठाना चाहते हैं! इसलिए इन्हें लिव इन से भी परहेज़ नहीं और खुल कर उसका समर्थन करते हैं! लेकिन कुछ समय बाद शादी के मुद्दे पर अलगाव सामने आ जाता है! और फिर वही सवाल उठता है कि अगर शादी ही करनी थी तो लिव - इन की क्या ज़रूरत थी? और अगर लिव - इन प्यार है तो व्याभिचार क्या है?
शर्मनाक...लाश के ऊपर से चलाते रहे कार: दिल्ली से योगेश गुलाटी
रिंग रोड पर हुए एक दर्दनाक हादसे में दिल्ली वालों की असंवेदनशीलता सामने आ गई। महिला की लाश सड़क पर पड़ी थी और कार वाले उसके ऊपर से गाड़ियां चलाते रहे। महिला का शव बुरी तरह क्षत - विक्षत हो गया। रोड एक्सिडेंट के अलावा पुलिस को आशंका है कि महिला की मौत की वजह चलती कार से उसे नीचे फेंकना भी हो सकती है।
यह घटना शनिवार रात 9:45 बजे राजौरी गार्डन इलाके में रिंग रोड फ्लाईओवर पर हुई। किसी राहगीर ने पुलिस को जानकारी दी कि कारें किसी लाश के ऊपर से गुजर रही हैं। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर ट्रैफिक रोक कर किसी तरह शव उठाने की कोशिश की। लगातार गाडि़यां चलते रहने के कारण शव के कई टुकड़े हो चुके थे। पायल और उसके कपड़ों की वजह से यह जानकारी मिल सकी कि शव किसी महिला का है। हालांकि जब लोगों को इस बारे में पता चला तो इसके बाद रिंग रोड पर दो घंटे तक जाम लगा रहा।
यह घटना शनिवार रात 9:45 बजे राजौरी गार्डन इलाके में रिंग रोड फ्लाईओवर पर हुई। किसी राहगीर ने पुलिस को जानकारी दी कि कारें किसी लाश के ऊपर से गुजर रही हैं। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर ट्रैफिक रोक कर किसी तरह शव उठाने की कोशिश की। लगातार गाडि़यां चलते रहने के कारण शव के कई टुकड़े हो चुके थे। पायल और उसके कपड़ों की वजह से यह जानकारी मिल सकी कि शव किसी महिला का है। हालांकि जब लोगों को इस बारे में पता चला तो इसके बाद रिंग रोड पर दो घंटे तक जाम लगा रहा।
Saturday, 29 May 2010
डीयू से तौबा!: दिल्ली से योगेश गुलाटी
मेरे एक देहाती मित्र ने 12वीं में 96 प्रतिशत अंक अर्जित किये तो मैने उसे दिल्ली विश्चिद्यालय में दाखिला लेकर आगे पढाई करने की सलाह दी! मेरी इस सलाह को मानकर वो दाखिले की दौड में शामिल होने मेरे साथ दिल्ली विश्विद्यालय जा पहुंचा! खादी का कुर्ता-पजामा, और पैरों में चमडे की चप्पल पहने जब वो डीयू केम्पस में दाखिल हुआ, तो वहां के नज़ारे देख कर वो चौक गया! लेटेस्ट फैशन ट्रेंड को फालो करते छात्र-छात्राएं डीयू केंपस की शोभा बढा रहे थे! पूरा कैम्पस किसी फैशन शो से कम नहीं लग रहा था! अखबार और टीवी वाले भी डीयू के फैशन ट्रेंड की रिपोर्टिंग और हाट फोटो लेने में व्यस्त थे! लेकिन मेरे देहाती मित्र को कुछ समझ नहीं आ रहा था! जैसे-जैसे वो कैम्पस में आगे बढता जा रहा था, उसकी हैरानी बढती ही जा रही थी! उसे परेशान देख कर मैंने उसकी परेशानी का कारण जानना चाहा! उससे रहा नहीं गया और वो बोला, "यहां सब कार्टून बन कर क्यों घूम रहे हैं?" उसके इस सवाल पर मेंरी हंसी छूट गई! मैंने कहा ये तो डीयू का लेटेस्ट फैशन ट्रेंड है! देखा नहीं यहां इस फैशन को कवर करने के लिये कितनी मीडिया जुटी है़? वो बोला, "फैशन ट्रेंड? लेकिन हम तो यहां दाखिला करवाने आये हैं, क्या दिल्ली विश्विद्यालय में आज कोई फैशन परेड का आयोजन है?" उसके इस भोले सवाल पर मैंने कहा, अभी तो दाखिले की दौड है, एडमिशन के बाद के नज़ारे क्या तुम झेल पाओगे? शायद अपने पुराने और दकियानूसी संस्कारों की वजह से मेरा वो मित्र दिल्ली विश्वविद्यालय के उन्मुक्त वातावरण में असहज महसूस कर रहा था! बगीचे में लेटे छात्र-छात्राओं की नज़दीकीयां, बात-बात में एक दूसरे को छूना उसे जाने क्यों शर्मिंदा कर रहा था!! ऎसा वातावरण उसने शायद पहली बार देखा था, इसलिये मैंने उससे पूछ लिया, तुम्हारे शहर की यूनिवर्सिटी में कैसा माहौल होता है? "हमारे यहां तो बेहद सादगी भरा माहौल होता है, और हमें तो किसी लेटेस्ट फैशन ट्रेंड के बारे में कुछ पता ही नहीं होता है! हम तो वो ही सादे से कपडे पहनते हैं और हाथों में किताब लिये पढने पहुंच जाते हैं! बगीचों में बैठ कर भी हम पढाई ही करते हैं! और बात-बात में एम दूसरे को छूने को हमारे यहां अशिष्टता माना जाता है! और हां लडके-लडकियां इस तरह बगीचे में कभी लेटे हुए नहीं मिलते! वो सीना फुला कर बोला! "अरे भाई वो तुम्हारी देहाती यूनिवर्सिटी है और ये अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विश्विद्यालय! कुछ तो अंतर होगा ही! मैंने कहा! "अगर ऎसा है तो हमें हमारी वो देहाती यूनिवर्सिटी ही प्यारी है, हमें नहीं लेना यहां दाखिला! आप चलिये यहां से!" उसकी ये बात सुनकर मैं सन्न रह गया! वो वाकई में गंभीर नज़र आ रहा था! एक होनहार छात्र दिल्ली विश्विद्यालय में दाखिला लेना नहीं चाहता था! मैंने उसे समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वो अपने निर्णय पर अडिग रहा! देहात के सरकारी स्कूल में पढे उस होनहार लडके ने कानवेंट में पढे छात्रों के साथ दिल्ली विश्विद्यालय में पढने से इन्कार कर दिया था!
जन्मदिन है आज सोच रहा मैं क्या खोया क्या पाया: दिल्ली से योगेश गुलाटी
जन्म दिन है आज सोच रहा मैं, क्या खोया क्या पाया,
क्या अब तक जीवन यों ही व्यर्थ गवाया?
कितने बसंत देखे अब तक उनका हिसाब करूं,
या आने वाले कल को मैं प्रणाम करूं?
करने क्या आया मैं धरा पर,
क्या इस पर विचार करूं?
या जीवन की उलझनों को मैं पार करूं,
क्या द्रव्य का संग्रहण ही लक्ष्य है जीवन का,
या जीवन में एक नया लक्ष्य मैं तैयार करूं!
जितना समझता हूं दुनिया को,
उतना ही होता हूं निराश,
इससे तो अच्छा था मैं बच्चा ही रहता,
दुनिया के छल-कपट से दूर मन का सच्चा ही रहता!
देखे दुनिया के मेले,
और मेलों में देखे झमेले,
धन की चिन्ता में पिसता इंसान,
जब पैसा ही बन जाता भगवान,
तब सस्ती हो जाती इंसानी जान,
सबकी यही कोशिश,
बनानी है अपनी पहचान,
और इसी पहचान की चाहत में,
चल पडा है हर इंसान,
लेकिन वो जानता नहीं कि,
रेत पर खींची लकीरों की तरह है इंसान का वजूद,
वजूद जो इक दिन मिट जायेगा,
सागर की लहरों से लकीरों का,
नाम फिर गुम जायेगा,
जो रहेगा वो कर्म हैं,
विचार हैं, और ये संसार है!
इस नश्वर संसार में अनश्वर कुछ भी नहीं,
परिवर्तन तो प्रकृतिक का नियम है,
इस नियम से बढकर कुछ भी नहीं,
एक मदारी आया था,
संग अपने वो बंदर लाया था,
डमरू की थाप पर नाचता था बंदर,
मदारी की हर बात को मानता था बंदर,
वो कहता उठ तो उठ जाता,
वो कहता बैठ तो वो बैठ जाता,
मदारी के कहने पर वो करता था हर काम,
और हाथ जोड कर करता था सबको सलाम!
लेकिन जीवन मदारी का खेल तो नहीं,
पटरी पर चलने वाली ये कोई रेल तो नहीं,
जब तक ना मिलती राह कोई,
जीवन तब तक संग्राम रहेगा,
मंज़िल पर जब तक ना पहुंचोगे,
तब तक नहीं आराम रहेगा!
क्या अब तक जीवन यों ही व्यर्थ गवाया?
कितने बसंत देखे अब तक उनका हिसाब करूं,
या आने वाले कल को मैं प्रणाम करूं?
करने क्या आया मैं धरा पर,
क्या इस पर विचार करूं?
या जीवन की उलझनों को मैं पार करूं,
क्या द्रव्य का संग्रहण ही लक्ष्य है जीवन का,
या जीवन में एक नया लक्ष्य मैं तैयार करूं!
जितना समझता हूं दुनिया को,
उतना ही होता हूं निराश,
इससे तो अच्छा था मैं बच्चा ही रहता,
दुनिया के छल-कपट से दूर मन का सच्चा ही रहता!
देखे दुनिया के मेले,
और मेलों में देखे झमेले,
धन की चिन्ता में पिसता इंसान,
जब पैसा ही बन जाता भगवान,
तब सस्ती हो जाती इंसानी जान,
सबकी यही कोशिश,
बनानी है अपनी पहचान,
और इसी पहचान की चाहत में,
चल पडा है हर इंसान,
लेकिन वो जानता नहीं कि,
रेत पर खींची लकीरों की तरह है इंसान का वजूद,
वजूद जो इक दिन मिट जायेगा,
सागर की लहरों से लकीरों का,
नाम फिर गुम जायेगा,
जो रहेगा वो कर्म हैं,
विचार हैं, और ये संसार है!
इस नश्वर संसार में अनश्वर कुछ भी नहीं,
परिवर्तन तो प्रकृतिक का नियम है,
इस नियम से बढकर कुछ भी नहीं,
एक मदारी आया था,
संग अपने वो बंदर लाया था,
डमरू की थाप पर नाचता था बंदर,
मदारी की हर बात को मानता था बंदर,
वो कहता उठ तो उठ जाता,
वो कहता बैठ तो वो बैठ जाता,
मदारी के कहने पर वो करता था हर काम,
और हाथ जोड कर करता था सबको सलाम!
लेकिन जीवन मदारी का खेल तो नहीं,
पटरी पर चलने वाली ये कोई रेल तो नहीं,
जब तक ना मिलती राह कोई,
जीवन तब तक संग्राम रहेगा,
मंज़िल पर जब तक ना पहुंचोगे,
तब तक नहीं आराम रहेगा!
Thursday, 27 May 2010
वो सूरज को आंख दिखाता था: दिल्ली से योगेश गुलाटी
करोल बाग मेट्रो स्टेशन के करीब एक मरियल सा रिक्षावाला तपती दुपहरी में रिक्षा खींच रहा था! फटी पैंट और एक बनियान बस यही था उसके तन पर! लू के थपेडों से बचने के लिये उसने अपने कान कपडे से ढक रखे थे! पैरों में टूटी सी चप्पल थी! गर्मी की इस दुपहरी में उसके पसीने से नहाये शरीर को देख कर तापमान की भीषणता का अंदाज़ा लग रहा था! उसके रिक्षे पर एक प्रेमी जोडा बैठा था! दोनों एक दूसरे की बाहों में मगन थे! आते-जाते लोगों की निगाहें उनकी हरकतों पर टिकी थी! लेकिन दोनों ही इस बात से बेपरवाह थे! प्रेमी अपनी प्रेमिका को सूरज से बचाने की कोशिश करता दिख रहा था! दोनों ही पहनावे से काफी उन्मुक्त और आधुनिक नज़र आ रहे थे! हालाकि दिल्ली में इस तरह के नज़ारे आम हो चले हैं! लेकिन मुझे उसमें कुछ खास नज़र आ रहा था! रिक्षावाला चुंकि शरीर से काफी दुबला था इसलिये उसे दोनों को खींचने में काफी ज़ोर लगाना पड रहा था! वो कभी सूरज को आंख दिखाता तो कभी ज़ोर लगा कर रिक्षा खींचता! ऎसा लग रहा था मानो वो सूरज को चुनौती दे रहा हो, कि "तू चाहे कितनी भी आग बरसा ले, मेरे हौंसले को डिगा नहीं पायेगा"! लेकिन मैं उसकी मजबूरी को समझ रहा था! क्योंकि पेट की आग सबसे भयानक होती है! करोल बाग मेट्रो स्टेशन के नज़दीक रिक्षा रोक कर रिक्षावाले ने कहा, साहब मेट्रो स्टेशन आ गया! प्रेमी युगल ने होंश संभाला, अपने आस-पास देखा और रिक्षा से उतर गये! प्रेमी ने दस रुपये का नोट रिक्षा वाले को थमा दिया! "साहब इतनी दूर से आप दोनों को खींच कर लाया हूं, बीस रुपये होते हैं"! रिक्षावाले ने कहा! "मेरे पास छुट्टे नहीं हैं बस यही दस का नोट है लेना हो तो लो"! ये कह कर प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ आगे बढ गया! पसीने में तर रिक्षावाला उस दस के नोट को देख कर कुछ सोचने लगा! उसने फिर सूरज की तरफ देखा! सामने की दुकान से प्रेमी युगल ने पचास रुपये में कोका-कोला की दो बोतलें खरीदीं, अपना गला तर किया! इसके बाद गर्मी में आराम से वक्त बिताने के लिये पास के मेक्डानेल्स में जा कर बैठ गये! इधर रिक्षावाला मेट्रो स्टेशन के सामने लगी रिक्षों की लंबी लाईन में सबसे पीछे अपना रिक्षा लगा कर सवारी के लिये अपनी बारी का इंतज़ार करने लगा! लू के थपेडों का असर उसके शरीर पर तो हो रहा था लेकिन मेहनत और इमानदारी के उसके हौंसले पर लू के थपेडे कोई असर नहीं डाल पाये थे! रिक्षावाला सूरज को देख कर मुस्कुरा रहा था!
Wednesday, 26 May 2010
गन्दे नाले पर भी जुटेंगे ब्लागर: दिल्ली से योगेश गुलाटी
प्यार भरा निमन्त्रण कोई भला कैसे अस्वीकार कर सकता है! पिछले रविवार मुझे एक ज़रूरी मीटिंग में जाना था! उस दिन गर्मी भी बहुत थी, और नांगलोई मेरे घर से करीब दो घंटे का सफर था! लेकिन अविनाश जी ने जो स्नेहभरा निमन्त्रण मेरे ब्लाग पर छोडा वो मुझे नांगलोई की उस छोटूमल जाट धर्मशाला तक खींच लाया! अपना एक दिन मैंने उन लोगों से मिलने के लिये दिया जिन्हें मैं जानता तक नहीं था! बडा ही अदभुत अनुभव था ये मेरे जीवन का! सभी से मिल कर और उनके विचार जानकर जो खुशी हुई उसका मैं शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता! वो गर्म दोपहरी एक अनोखी शीतलता का एहसास करा रही थी! इसी लिये मैंने कहा कि ये हिन्दी ब्लागिंग के इतिहास में एक पन्ना दर्ज हो रहा था! ब्लागर्स एसोसिएशन एक बहुत सुन्दर विचार है! यदि ये विचार कार्य रूप में परिणित होता है, तो एक मिसाल कायम की जा सकती है! निश्चित तौर पर ये मीडिया का विकल्प और सामाजिक चेतना का बडा मंच साबित हो सकता है! क्योंकि प्रबुध्द ब्लागरों में अपने-अपने क्षेत्र के विद्वान और विषय वेत्ता भी शामिल हैं! आज की इस भागमभाग वाली ज़िन्दगी में जहां लोगों के पास वक्त की सख्त कमी है, और सभी सिर्फ अपने बारे में ही सोचने में व्यस्त हैं, वहां यदि ब्लागिंग जैसी कोई चीज़ प्रबुध्दजनों को एक दूसरे से सीधे जोड रही है, तो निश्चय ही इसे नज़रअंदाज़ करना एक बडी भूल होगी! मैं ये नहीं कहता कि ब्लागिंग से हम कोई क्रांति कर देंगे! क्रांति हमारा उद्देश्य भी नहीं है! लेकिन विभिन्नताओं वाले कईं लोगों में कोई चीज़ यदि समान हो, जो उन्हें एक मंच पर लाने का काम करे तो निश्चय ही उसमें कोई असाधारण बात तो होगी ही! मुझे लगता है कि हिन्दी ब्लागिंग अपने शुरुआती दौर में है! इसे अभी लंबा सफर तय करना है! लेकिन एक नदी की तरह ये अपना मार्ग खुद बना लेगी! इसलिये खुशदीप जी आप गंदे नाले पर भी ब्लागर मिलन समारोह करवा लीजिये, मेरा दावा है वहां भी ब्लागर आयेंगे! बिन बुलाये आयेंगे! और हर ब्लागर मीट में उनकी संख्या बढती ही जायेगी! यही हिंदी ब्लागिंग की असली ताकत है, जो वक्त आने पर उभर कर सामने आयेगी!
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