Thursday, 3 June 2010

पुरुषों से मुकाबला: दिल्ली से योगेश गुलाटी

मेरे पास बैठी वो भद्र महिला सिगरेट के कश लगा रही थी! लेकिन सिगरेट के धुंए से मुझे खासी परेशानी हो रही थी! आखिर मुझसे रहा नहीं गया और मैने पूछ ही लिया,- "बहनजी आपको नहीं लगता सिगरेट आपके स्वास्थ्य के लिये नुकसान दायक हो सकता है! उसने मुझे घूर कर देखा! और बोली, एक्सक्यूज़ मी, बहन किसे कहा आपने? मैंने कहा हिंदी में ये एक सामान्य शिष्टाचार है! वैसे तंबाकू निषेध दिवस पर तो आप जम कर सिगरेट और तंबाकू के खिलाफ बोल रही थीं! आपका स्पेशल प्रोग्राम देखा था मैंने! वो खबरों के पीछे दौडने वाले एक चैनल की स्टार एंकर थी!
वो मेरा पेशा है उसने जवाब दिया! तो आपको लगता है सिगरेट पीना अच्छी बात है? इसमें बुरा क्या है? उसने कहा! जो काम पुरुष कर सकते हैं वो काम अगर महिलाएं करें तो आप जैसे लोगों को परेशानी क्यों होने लगती है! आज हर काम में महिलयें पुरुषों को कडी टक्कर दे रही हैं! जो काम पुरुष करते हैं अगर वही काम हम महिलायें करें तो आपको क्यों दिक्कत होती है? मैंने कहा आप पुरुषों से मुकाबला कर रही हैं ये अच्छी बात है, लेकिन परेशानी मुझे नहीं परेशानी तो आपको होने वाली है स्मोकिंग से! क्योंकि इसके साइड इफेक्ट आप ही को झेलने होगें! आप तो खुद इतनी पढी-लिखी और समझदार दिखती हैं, मुकाबला अच्छी बात के लिये हो तो ठीक है लेकिन क्या बुरे कामों में मुकाबला अच्छी बात है? वो बोली मुकाबला तो मुकाबला है फिर वो किसी भी बात में हो सकता है! हमारा मकसद पुरुषों को हर मामले में कडी टक्कर देना है!
ये कहते हुए उसने सिगरेट का एक ज़ोरदार कश अपने फेफडों में भर लिया! मुंह से धुआं निकालते हुए उसने आसमान की तरफ देखा और बोली मैं एक मिडिल क्लास फेमिली को बिलांग करती थी, जहां लडकियों को पढाई के लिये दूसरे शहर में भेजना भी बडी बात होती थी! लेकिन मैंने पुरुषों की इस व्यवस्था से बगावत की! मैं दिल्ली आई और अपना मुकाम हासिल किया! मैं पुरुषों के बीच काम करती हूं! और उनके बीच उन्हीं की तरह रहती हूं! जहां तक बात है शराब और सिगरेट की तो मुझे लगता है इनसे किसी भी लडकी को परहेज़ नहीं करना चाहिये! यूरोप और अमेरिका में भी तो लडकियों के लिये ये सब आम बात है! फिर भारत में महिला विरोधी किस अधिकार से महिलाओं की मारल पोलिसिंग करते हैं? तरक्की का रास्ता तो यहीं से होकर गुजरता है! क्या साडी पहनकर एक सती सावित्री महिला पुरुषों से मुकाबला कर सकती है? सिगरेट के एक ही कश में वो इतना सब कह गई थी! उसके ऎसे महान विचारों से मैं स्तब्ध था! वो सिगरेट का दूसरा कश ले इससे पहले ही मैं वहां से उठकर चल दिया!

8 comments:

माधव said...

बेवकूफ को उपदेश देना उसके क्रोध को बढ़ाना है , उसी प्रकार जैसे साँप को दूध पिलाना उसके विष को बढ़ाना है .

Anonymous said...

भाई साहब,

ऐसा है कि कहानी बनाना एक बात है और कहानी लिखना सर्वथा दूसरी. कहानी लिखने की आपकी क्षमता निहायत ही निम्न स्तर की है. तो आप कहानियां मत लिखा करें. आपकी कहानियां जरा भी कन्विन्शिंग नहीं लगतीं. उस दिन आपने दिल्ली यूनिवर्सिटी के तथाकथित फैशन परेड पर भी एक कहानी लिखने की कोशिश की थी. उस दिन भी यही हाल था और आज भी वही.

समाज के लिए आप आदर्श ठेलना चाहते हैं तो निबंध ठेला करें. कृपा करके कहानी मत बनाया करें प्रभु. आपका यह कर्म आपको हँसी का पात्र बनाता है.

Neeraj Rohilla said...

बेगानी महोदय की बात वाजिब लगती है, ;)
वैसे महज एक इत्तेफ़ाक भी हो सकता है कि आपका सामना ऐसे युवा और प्रगतिशील महिलाओं से ज्यादा होता है।

हमने भी एक बार लडकियों के सिगरेट पीने पर एक पोस्ट लिखी थी। समय मिले तो बांच लीजियेगा और उस पर घुघूती बासूती जी की टिप्पणी जरूर पढ लीजियेगा।

http://antardhwani.blogspot.com/2008/12/blog-post_08.html

Yogesh Gulati said...

आभार आपका इस बहुमूल्य सलाह के लिये! लेकिन मेरे ब्लाग से अगर किसी के चेहरे पर मुस्कान आती है तो ये खुशी की बात है! आपकी जानकारी के लिये बता दूं कि मैं कहानीकार नहीं हूं! ना ही मैं कहानी लिख रहा हूं! घटनाओं का वर्णन कहानी नहीं होता महाप्रभु! वैसे वीरता अपनी पहचान छुपाने में नहीं होती! जो भी कहना है अपनी पहचान के सथ कहिये!

M VERMA said...

अगर यह कहानी है तो बहुत अच्छी और सीख दे रही है, अगर यह हकीकत है तो चिंताजनक है

abhivyakti said...

सिगरेट के एक ही कश में वो इतना सब कह गई थी! उसके ऎसे महान विचारों से मैं स्तब्ध था! वो सिगरेट का दूसरा कश ले इससे पहले ही मैं वहां से उठकर चल दिया!
आपने लिखा तो बहुत अच्छा है! लेकिन मधव जी की बात से मैं सहमत हूं! मूर्खों को इसमें कुतर्क नज़र आ ही जायेगा! सच है मूर्खों को उपदेश देना उनके क्रोध लो बढाता है! दो उदाहरण तो देख ही चुके आप! ये एनोनिमस भी सिगरेट पीने वाली कोई आधुनिक महिला ही लगती हैं!

abhivyakti said...

आज ज़मान ये हो गया है कि कुए मे गिरने जा रहे को बचाने वाले को ही लोग गरियाते हैं! और जो उसे धक्का दे उसी की जयजयकार होती है! बचपन में एक पूंछ कटे बंदर की कहानी सुनी थी! नीरज जी भी कुछ वैसा ही प्रयास कर रहे हैं! जिस समाज में महिलायें भ्रष्ट हो जात्ती हैं वो समाज खत्म हो जाता है! यूरोप और अमेरिका का उदाहरण हम देख रहे हैं जहां समाज और परिवार खत्म हो चुके हैं! अब हिंदुस्तान में भी ये पूंछ कटे बंदर ऎसा ही करना चाहते हैं!

राज भाटिय़ा said...

अरे आप की बात किसी खास को चुभ गई लगती है.... तभी तो अनामी बन कर आ गई/गया, छोडिये... ओर माधब की टिपण्णी पर ध्यान दे आप के लेख की तरह यह टिपण्णी भी बहुत अच्छी लगी, धन्यवाद सुंदर लेख के लिये,