Wednesday, 4 March 2009

गरीबी पश्चिम में खूब बिकती है।




फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनेर' का इतना हल्ला मचा हुआ है कि मुझ जैसे साधारण पत्रकार को भी यह देखनी पड़ी। मैं इस फिल्म की कलात्मक उत्कृष्टता, म्यूजिक या सॉन्ग पर टिप्पणी करने की पात्रता नहीं रखता, लेकिन एक बात निश्चय ही पूरे आत्म विश्वास के साथ कर सकता हूं और वह यह कि ब्रिटेन, अमेरिका और कई पश्चिमी देशों की भारत को देखने की जो पुरानी और पूर्वाग्रहपूर्ण दृष्टि रही है, उसमें कोई खास बदलाव नहीं आया है। भारत को एक गरीब, आपस में लड़नेवाला, भ्रष्ट और कमजोर देश माना जाता रहा है। एक ऐसा देश जहां गरीब मनुष्य होकर भी समाज में आधे-पौने मनुष्य का दर्जा रखते हैं। जिनकी अपनी कोई कीमत नहीं लेकिन जिनकी गरीबी पश्चिम में खूब बिकती है। भारत में गरीब होना चूंकि कमतर मनुष्य होना है, इसलिए कम से कम हमारे शहरों में तो कोई गरीब भी यह नहीं चाहता कि उसकी गरीबी दिखाई जाए। यही कारण है कि इस फिल्म के ब्रिटिश निर्देशक डैनी ब्वॉयल जब फिल्मांकन के सिलसिले में स्लम बस्तियों में गए तो वहां उनके साथ काम करने को तैयार हुए लोगों ने पूछा : 'आप हमें गरीबों के रूप में तो दर्शाने नहीं जा रहे?' उन्होंने क्या उत्तर दिया यह तो मालूम नहीं है लेकिन 'टाइम' पत्रिका में '10 क्वेश्चन्स' कॉलम के अंतर्गत उनसे पूछे गए एक सवाल का उत्तर यहां दृष्टव्य है। उनसे पूछा गया था कि भारत में गरीबी का रोमानीकरण करने के आरोपों के बारे में आपका क्या उत्तर है तो उन्होंने कहा 'लोगों ने जो स्लम बस्तियों में हमारे साथ काम कर रहे थे, हमसे पूछा कि आप (फिल्म में)हमें गरीबों के रूप में तो चित्रित नहीं करेंगे? या करेंगे? क्योंकि पश्चिमी लोग हमेशा ऐसा ही करते हैं। मगर मैंने फिल्म को एक ऐसी ऊर्जा के साथ बनाने की कोशिश की है ताकि यह प्रतिबिम्बित हो कि यह जगह कैसी है (जहां ये लोग रहते हैं) कि गरीबी के बावजूद यहां एक जीवंतता-जिजीविषा है।' लेकिन गरीबी दिखाने के पश्चिमी पूर्वाग्रह के चलते उन्हें स्लम के अपने सहयोगियों की संवेदनशीलता का जरा भी ध्यान नहीं रहा। कुरूप यथार्थ का जैसा वीभत्सीकरण यहां दिखाई देता है, उसे देखकर रुह तक कंपा देनेवाली जुगुप्सा पैदा होती है। एक दृश्य में स्लम का बच्चा संडास में बैठा है। उसे पता चलता है कि वहीं कहीं अमिताभ बच्चन आया है। अमिताभ बच्चन के ऑटग्राफ लेने के लिए वह बच्चा संडास से मल के कुण्ड में नाक दबाकर कूद जाता है और शायद सामने से तत्काल हटाने के लिए मजबूर कर देनेवाली स्थिति में ऑटग्राफ भी पा लेता है। कलाओं में यथार्थ का अतिकरण कई बार भाव-भंगिमाओं के साधारणीकरण और संप्रेषण के लिहाज से किया जाता है। लेकिन ऐसी वीभत्स अति? मैं पूछना चाहूंगा कि मल से सने बल्कि नहाये बच्चे को कल यदि खुद फिल्म निर्देशक डैनी बॉयल को ऑटग्राफ देना पड़े तो क्या वह कुछ सेकंड भी वहां ठहरना सह सकेंगे? ठीक है कि सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा आज भी भारत में जारी है, लेकिन गरीब बच्चे के अमिताभ-आकर्षण के एक प्रतीक को इस सीमा तक खींचना किस कलागत औचित्य को दर्शाता है? डैनी बॉयल इसके लिए अपनी ब्रिटेन में हुई परविश या संस्कार को जिम्मेदार मानते हैं। तो यह संस्कार या पूर्वाग्रह क्या है? कि भारतीय गंदे होते हैं? उनके घरों से मैला उठाने के लिए एक अलग जाति के लोग आते हैं? कि वे गंदा पानी पीते हैं और गंदे हाथों से खाना खाते है? आदि-आदि। जो लोग इस फिल्म को भारतीय फिल्म सिद्ध करने के लिए शीर्षासन कर रहे है, और कह रहे है कि इसकी कहानी भारतीय है और एक भारतीय द्वारा ही लिखी गई है, इसके पात्र भारतीय हैं, संगीत और संगीतकार भारतीय है, इसका फिल्मांकन भारत में हुआ है, वे लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि इसका निर्देशक और उसकी टीम विदेशी है। और उसने माना है कि यह फिल्म एक हाइब्रिड फिल्म है। देशी और विदेशी टीमों का एक संयुक्त उपक्रम। फिल्म निर्देशक और पटकथा दोनों सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं और ये दोनों विदेशी हैं। इसलिए यह भारतीय फिल्म नहीं मानी जा सकती। आप चाहें तो खुद निर्देशक से सत्र लेकर इसे वर्णसंकर कह सकते हैं। फिल्म का नजरिया पश्चिमी है, संवेदनशीलता पश्चिमी है और बम्बइया फिल्मों के लटके-झटकों के बावजूद इसमें वही दिखाया गया है, जो पश्चिमी दर्शक देखना चाहता है। पिछले एक दशक में यूरोप और अमेरिका में भारत की पुरानी गरीब और पिछड़े देश की इमेज पर एक उभरती हुई आर्थिक और सैन्य ताकत की इमेज हावी है। यह धारणा बनी है कि भारत और चीन कुछ दशकों में दुनिया की महाशक्तियों में होंगे। भारतीय या भारतीय मूल के उद्योगपति विदेशी कंपनियां खरीद रहे है और अरबपतियों की विश्व कतार में खड़े होने वाले भारतीयों या भारतवंशियों की संख्या बढ़ रही है। भारत को जी-8 जैसे अमीर देशों की बैठकों में बुलाया जाने लगा है। अपनी प्रतिभा और परिश्रम से अमेरिका और अन्य देशों में भारतीय छा गए हैं। भारत अंतरिक्ष की भी एक ताकत बन चुका है और उसके पास करीब-करीब इतनी आबादी वाला मध्यवर्ग है, जो अमेरिका की पूरी आबादी है। यह एक तरह का कल्चरल शॉक जैसा है। इसलिए दो छवियों के बीच इस पृष्ठभूमि में द्वंद्व में संतुलन बैठाने का रास्ता यह निकाला गया है कि भारत की इस नई इमेज को तोड़ो। उसे पुरानी गरीब, पिछड़ी और जाहिल की इमेज पर हावी मत होने दो। भारत को उसके अंधेरे में, उसकी दरारों में पकड़ो, जहां सीलन है, बदबू है, गंदगी है और जहां लोग नहीं मानों कॉकरोच रहते हैं। ऐसे कॉकरोच जिन्हें करीब 60 सालों में न तो मिटाया जा सका है और न मिटाया जा सकेगा। भारत की इस कटु सचाई से मैं मुंह नहीं मोड़ रहा। भारत निश्चय ही गरीब और पिछड़ा देश है। देश की 77 प्रतिशत आबादी प्रतिदिन एक डॉलर (करीब 50 रु.)भी नहीं कमा पाती। करोड़ों लोगों को दिन में एक बार ही मुश्किल से खाना मिल पाता है। बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। रहने के लिए झोपड़ी और पीने के लिए साफ पानी नहीं है। हिन्दू-मुस्लिम दंगे होते हैं (फिल्म में ऐसे ही एक दंगे में बचपन में ही नायक की माँ मारी जाती है), अल्पसंख्यक जुल्मों का शिकार होते हैं और जमाल जैसा बच्चा अगर एक दिन अमीर बन भी सकता है तो यह कौन बनेगा करोड़पति जैसे टीवी कार्यक्रमों से निकला एक चमत्कार ही है। भारत में ज्ञान की कद्र है और ज्ञान से धन भी अर्जित किया जा सकता है, लेकिन गरीब मुसलमानों के बच्चे शिक्षा से नहीं, अंडरवर्ल्ड के फंदे में फंसकर वह ज्ञान अर्जित करते हैं जो एक दिन टीवी कार्यक्रमों के जरिए उन्हें लॉटरी तक पहुंचाता है। फिल्म में नायक एक जगह चैनल के स्टूडियो में बैठा अनिल कपूर के प्रश्नों के उत्तर दे रहा है तो फ्लैशबैक में दो पुलिसकमिर्यों की ज्यादतियों के बीच उन यातनाओं को बयान कर रहा है, जिनसे गुजरते हुए उसे क्विज के उत्तर प्राप्त हुए। तो फिल्म का असली पक्ष वह नहीं है जो स्टूडियो की चमक-दमक में दिखाया गया है, असली पक्ष फ्लैशबैक में है, जहां दंगों में अल्पसंख्यकों का मारा जाना है, भिक्षा कराने वाले गिरोहों द्वारा अबोध बच्चों का पकड़ा जाना और फिर हाथ-पैर तुड़वाना या आंख फुड़वाना है, ताकि लोगों को दया आए और वे ज्यादा भीख दें। बड़ी बारीक तरह से फिल्म में उग्र हिन्दूवाद को भी उठाया गया है और जैसे संकेत किया गया है कि भिखारी बच्चा हिन्दू हो या मुसलमान पर भीख मांगते हुए वह हिन्दू प्रार्थना ही गाता है। स्लम की बच्चियां देह शोषण की शिकार हैं और लोग अपना जीवन या तो अमिताभ बच्चन की एक झलक पाने की चाह में या फिर कौन बनेगा करोड़पति जैसे कार्यक्रमों के जरिए भाग्य उदय होने की आशा में जीते हैं। अगर फिल्म में कोई मन को छूनेवाली बात है तो जमाल और लतिका का प्रेम है, जो आश्रयहीन और अनाथ बच्चों में भी उतना ही मौलिक और निश्छल हो सकता है, जैसा सामान्य तौर पर होता है। रहमान बड़े संगीतकार है लेकिन उनके जिस गीत का शोर है, उसे भी उनका उत्कृष्ट या प्रतिनिधि गीत नहीं माना जा सकता। जरा सोचिए कि अगर यही फिल्म किसी भारतीय ने बनाई होती तो क्या उसे 8 ऑस्कर मिलते। एक साधारण दर्शक के नाते मैं सत्यजित राय की पथेर पांचाली जैसी उत्कृष्ट फिल्म से इस फिल्म की तुलना करना चाहता जिसकी गरीबी के आधार पर की जा रही है ना ही किसी को करनी चाहिए। वहां गरीबी गौण हो जाती है और मानवीय प्रश्न ही अंतत: आपका पीछा करता रहता है। उन्हें सम्मान भी बहुत बाद में मिला। इस फिल्म को मिल रहे सम्मान कोई भी अवहेलना नहीं कर सकता, लेकिन कृपया इस फिल्म को इस संदर्भ के साथ भी मिलाकर देखिए कि एक उभरते भारत का धीरे-धीरे पश्चिमी दृष्टि से ओझल हो रहा पुराना सच इस रूप में आखिर क्यों याद दिलाया जा रहा है? क्या इस मनोरंजन-सरोकार के पीछे वही पुरानी श्रेष्ठता ग्रन्थि काम नहीं कर रही है? लेकिन क्रोध करने की बजाय आप भी इस फिल्म को जरूर देखिए और सोचिए कि क्या नाराज होकर हम भारत को देखने वाली इस पुरानी पश्चिमी दृष्टि को बदलवा सकते हैं या हमें ही अपने यहां व्यापक पटल पर बदलाव लाने की जरूरत है? तो उत्तर इस वाक्य के अन्त में है लेकिन मैं नहीं जानता कि यह कैसे होगा।

1 comment:

अंशुमाली रस्तोगी said...

शायद गरीबी का यह त्रास पक्ष है। शानदार लेख।